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जोंटी रोड्स : जिसकी फ़ील्डिंग की तस्वीर सिक्कों पर छापी गई

22 साल का एक बालक साउथ अफ्रीका नेशनल टीम के लिए सेलेक्ट हुआ. मौका था 1992 में हुए वर्ल्ड कप का. लोगों के मन में एक ही सवाल था. टीम में टिक पायेगा ये? फील्डिंग कर लेता है, लेकिन बैटिंग का क्या? और दूसरी तरफ़ उस लड़के के मन में टेस्ट प्लेयर बनने का सपना बसा हुआ था.

ठीक दस साल बाद, अक्टूबर 2002 में दुनिया भर के क्रिकेटरों की एक वोटिंग हुई. तीन-चौथाई यानी 75% खिलाड़ियों ने उस लड़के को सबसे बेहतरीन फील्डर बताया. जॉन्टी रोड्स. वो लड़का अब एक खिलाड़ी मात्र से बैकवर्ड पॉइंट पर खड़ी दीवार में तब्दील हो चुका था. दीवार जिसमें चुम्बक सी ताकत होती थी. गेंद को खुद तक खींच लाने की. टप्पा खा के आई तो कोई रन नहीं. हवा में आई तो बैट्समैन आउट. किसी ने जो रन चुराने की गलती की तो सज़ा भुगतता था.

जोनाथन नील रोड्स. 27 जुलाई 1969 को पीटरमैरित्ज्बर्ग में पैदा हुआ. पापा डिग्बी रग्बी खेलते थे और मां तिश टेनिस की खिलाड़ी थीं. बस यूं हुआ कि जोंटी ने खेलों के आस-पास ही रहने को जन्म लिया था. डिग्बी हमेशा जोंटी को एक नसीहत दिया करते थे – “अगर तुम अपने कपड़ों पर बिना घास के निशानों के वापस आते हो, तो तुमने अपना काम ढंग से नहीं किया है.”

1998 में हुई टेक्सेको ट्रॉफी में डैरेन गॉफ़ के साथ जब जोंटी को अपनी गंदी कमीज़ के बदले बेहतरीन फील्डिंग के लिए मैन ऑफ़ द सीरीज़ का अवॉर्ड मिला तो ज़रूर ही उन्हें अपना काम ढंग से करने का अहसास हो गया होगा. अगले ही साल मई में 1999 के वर्ल्ड कप में इंग्लैण्ड के खिलाफ़ खेलते हुए रोबर्ट क्रॉफ्ट के कैच ने ग्रेविटी के नियमों पर सवाल खड़े कर दिए थे. (वीडियो का पहला कैच)

लेकिन वो रन आउट जिसने जॉन्टी रोड्स को एक खिलाड़ी से एक घटना में बदल दिया, वो था इंज़माम-उल-हक़ का रन आउट. बैकवर्ड पॉइंट पर खड़े रोड्स के पास इंज़माम की मिस-हिट पहुंची. इंज़माम रन लेना चाहते थे. इमरान दूसरे एंड पर खड़े रन न लेने का मन बना चुके थे. उन्हें शायद रोड्स की मौजूदगी की खबर थी. लेकिन इंज़माम रन के लिए इस कदर कमिट हो चुके थे कि वो लगभग आधी पिच पर पहुंच चुके थे. इमरान के वापस लौटाने पर वो उलटे. इसी बीच रोड्स के पास गेंद पहुंच चुकी थी. वो अपनी पोज़ीशन से विकेट्स के लिए दौड़ पड़े. उन्होंने गेंद फेंकने की बजाय दौड़ कर विकेटों पर मारने का मन बना लिया था. जब रोड्स ने गेंद को विकेटों पर मारा, वो ज़मीन के पैरेलल हवा में उड़ रहे थे, तीनों स्टम्प उखड़ के नीचे पड़े हुए थे. इंज़माम अब भी सोच रहे थे कि आखिर कोई इतना तेज़ कैसे हो सकता है?

जॉन्टी रोड्स हाल ही में हिंदुस्तान के और हिंदुस्तान जॉन्टी रोड्स का होकर रह गया है. रोड्स के दिल में हिंदुस्तान के बारे में प्यार और इज्ज़त का ये आलम है कि अपनी नयी-नवेली बिटिया का नाम उन्होंने इंडिया रक्खा है. रोड्स सालों से मुंबई इंडियन्स के साथ जुड़े हुए हैं और उनका काफी वक़्त यहीं गुज़रता है.

एक बार रोड्स ने बताया था कि उन्हें जब भी लगता था कि वो आउट हैं तो वो बिना अम्पायर का इंतज़ार किये चले जाते थे. उन्होंने कभी भी बाउंस हुई गेंद पर कैच की अपील नहीं की. कहते हैं, “भगवान को चीटिंग पसंद नहीं है.” वो आगे कहते हैं, “एवरेज ही सब कुछ नहीं होता. आप कैसे अपने गेम को खेलते हैं, इस पर भी बहुत कुछ डिपेंड करता है.”

साल 2003. अफ़्रीकी ज़मीन पर वर्ल्ड कप खेला जा रहा था. जॉन्टी रोड्स अपने करियर का गोल्डन एंड चाह रहे थे. वर्ल्ड कप जीतने का सपना था. साउथ अफ़्रीका के दूसरे मैच में केन्या के खिलाफ़ उनके हाथ में चोट लग गयी. उनका हाथ टूट गया. वर्ल्ड कप का सपना और करियर, दोनों पर वहीं फ़ुल स्टॉप लग गया. साउथ अफ़्रीका सुपर सिक्स में भी न पहुंच पाया.

जॉन्टी रोड्स. वो प्लेयर जो अपने करियर को एक गोल्डन एंड तो नहीं दिलवा सका. लेकिन हां, क्रिकेट के खेल को, जिसे उसने अपनी पूरी ज़िन्दगी दी, उसने एक गोल्डन शुरुआत ज़रूर दी. वो शुरुआत जिसकी वजह से ये गेम आज वहां पहुंच गया है, जहां खिलाड़ियों ने अपने से डेढ़ गुनी लम्बी परिधि के अन्दर से गेंद न जाने की परम्परा शुरू की. क्रिकेट में बल्लेबाजी के लिए अगर सचिन, गेंदबाजी में वॉर्न, एक पैमाना बने हुए हैं तो फ़ील्डिंग में जॉन्टी रोड्स बने हुए हैं. और वो इंज़माम को सुपरमैन बन रन-आउट कर देने वाली तस्वीर अमर हो चुकी है.

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