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जलियांवाला बाग: जहां गोलियों के निशान अब भी बाकी हैं

102 साल पहले कामागाटामारू कांड हुआ. करीब 350 इंडियंस को लेकर एक जहाज कामागाटामारू  कनाडा पहुंचा. लेकिन वहां उतारे गए सिर्फ 24 इंडियन. बाकी इंडियंस को लेकर जब जहाज कोलकाता पहुंचा तो अंग्रेजों ने फायरिंग कर दी. 19 लोगों की मौत हो गई. उसके लिए कनाडा ने माफी मांग ली. अंग्रेजों ने जलियांवाला के लिए आज तक नहीं मांगी, हाल ही में खेद प्रकट किया गया, माफी नहीं मांगी गई.

13 अप्रैल को जलियांवाला बाग कांड की बरसी होती है. दिन के हिसाब से बैसाखी का दिन. 1919 में हजारों लोगों को जनरल डायर के आदेश पर गोलियों से भून दिया गया था. वो दिन भी बैसाखी का ही था. जिसके बाद हजारों हत्याओं का बदला लेने के लिए उधम सिंह ने हथियार उठा लिए. भगत सिंह समेत न जाने कितनों बच्चों को छुटपन के खेलों से ज्यादा आजादी से मुहब्बत हो गई.

बैसाखी की वो काली सुबह…

अमृतसर में गोल्डन टेंपल है. गोल्डन टेंपल के ठीक पास है जलियांवाला बाग. जहां अक्सर लोग जुटते, मिलते. बतियाते. बच्चे खेलने भी पहुंच जाते. कई बार मीटिंग्स भी की जाती. साल 1919 में बैसाखी 13 अप्रैल को थी. पंजाब समेत देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग अमृतसर पहुंचे थे. अमृतसर में एक दिन पहले ही अंग्रेजी हुकुमत ने कर्फ्यू लगा दिया. ऐलान किया गया कि लोग इकट्ठा नहीं हो सकते. फिर आती है बैसाखी की सुबह. गोल्डन टेंपल में दर्शन के बाद धीरे-धीरे लोग जलियांवाला बाग में जुटने लगे. कुछ वक्त में हजारों की भीड़ इकट्ठा हो चुकी थी. ब्रिगेडियर जनरल डायर को मालूम चला कि बाग में कोई मीटिंग होने वाली है.

गुस्साया जनरल डायर जलियांवाला बाग की तरफ पुलिस के साथ बढ़ चला. जलियांवाला बाग के गेट का वो संकरा रास्ता पुलिस के सिपाहियों से भर चुका था. जनरल डायर ने बिना किसी वॉर्निंग के सिर्फ एक शब्द FIRE कहा और हजारों ज़िंदगियां खामोश हो गईं.

बताते हैं कि फायरिंग से बचने के लिए औरतों ने बाग में बने कुएं में कूदकर अपनी जान दे दी. दीवारों पर चढ़कर बाग से बचकर निकलने की कोशिश करते लोगों पर भी पुलिस ने फायरिंग की. गोलियों के निशां बाग की दीवारों पर आज तक मौजूद हैं. सरकारी दस्तावजों में मौत का आंकड़ा 380 बताया गया. लेकिन असल में हजारों लोग मारे गए थे.

14 अक्टूबर 1997 को ब्रिटेन की महारानी क्वीन एलिज़ाबेथ-2 इंडिया आईं. जलियांवाला बाग भी गईं. श्रद्धांजलि दी. ब्रिटेन के प्राइम मिनिस्टर डेविड कैमरून भी 2013 में जब इंडिया आए तो जलियांवाला बाग गए. कैमरन ने जलियांवाला बाग कांड को शर्मनाक बताया. माफी नहीं मांगी, ब्रिटेन ने आज तक माफी नहीं मांगी. कोई देश इतना बेशरम भी हो सकता है क्या?


 

पढ़िए सुभद्राकुमारी चौहान की कविता: जलियांवाला बाग

यहां कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते,
काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते।

कलियां भी अधखिली, मिली हैं कंटक-कुल से,
वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे।

परिमल-हीन पराग दाग सा बना पड़ा है,
हा! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है।

ओ, प्रिय ऋतुराज! किन्तु धीरे से आना,
यह है शोक-स्थान यहां मत शोर मचाना।

वायु चले, पर मंद चाल से उसे चलाना,
दुःख की आहें संग उड़ा कर मत ले जाना।

कोकिल गावें, किन्तु राग रोने का गावें,
भ्रमर करें गुंजार कष्ट की कथा सुनावें।

लाना संग में पुष्प, न हों वे अधिक सजीले,
तो सुगंध भी मंद, ओस से कुछ कुछ गीले।

किन्तु न तुम उपहार भाव आ कर दिखलाना,
स्मृति में पूजा हेतु यहां थोड़े बिखराना।

कोमल बालक मरे यहां गोली खा कर,
कलियां उनके लिये गिराना थोड़ी ला कर।

आशाओं से भरे हृदय भी छिन्न हुए हैं,
अपने प्रिय परिवार देश से भिन्न हुए हैं।

कुछ कलियां अधखिली यहां इसलिए चढ़ाना,
कर के उनकी याद अश्रु के ओस बहाना।

तड़प तड़प कर वृद्ध मरे हैं गोली खा कर,
शुष्क पुष्प कुछ वहां गिरा देना तुम जा कर।

यह सब करना, किन्तु यहां मत शोर मचाना,
यह है शोक-स्थान बहुत धीरे से आना।


 

ये आर्टिकल पहली बार 13 अप्रैल 2016 को प्रकाशित हुआ था. 

 

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