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कोरोना वैक्सीन पर प्रशांत भूषण की बातें कितनी सही, कितनी गलत?

जाने-माने वकील प्रशांत भूषण अलग-अलग मुद्दों पर सरकार से टक्कर लेने के लिए चर्चा में रहते हैं. कोविड-19 महामारी की रोकथाम के लिए जरूरी कदम उठाने को लेकर भी वे केंद्र सरकार की आलोचना करते रहे हैं. लेकिन बीते कुछ समय से प्रशांत भूषण इस मुद्दे पर खुद भी आलोचना का सामना कर रहे हैं. वजह है कोविड-19 के नियंत्रण के लिए बनाई गई वैक्सीनों पर उनकी टिप्पणियां. प्रशांत भूषण इन वैक्सीनों की कोरोना वायरस संक्रमण से बचाने की क्षमता पर संदेह जताते हैं. हालांकि वे साफ करते हैं कि वे वैक्सीन विरोधी नहीं हैं. लेकिन इस बात पर प्रशांत भूषण का काफी जोर है कि सरकारों और आम लोगों ने वैक्सीनेशन को ही इस वैश्विक स्वास्थ्य संकट से निपटने का उपाय मान लिया है. वे इसके लिए सरकारों से लेकर मेन स्ट्रीम मीडिया को जिम्मेदार बताते हैं.

हालांकि कई लोग प्रशांत भूषण की बातों से नाराज दिखते हैं. खासकर कोरोना वैक्सीनों पर उनके बयानों को उन्होंने सीधे खारिज किया है. लेकिन ये समझने की जरूरत है कि प्रशांत भूषण जो कुछ भी कह रहे हैं, क्या वो पूरी तरह निराधार और अवैज्ञानिक है, जबकि उनसे मिलती-जुलती राय दुनिया के दूसरे वैज्ञानिक और मेडिकल एक्सपर्ट ने भी दी हैं. ऐसे में समझना जरूरी है कि प्रशांत भूषण असल में क्या कहना चाहते हैं और उनकी बातें कितनी सही या गलत हैं.

Prashant Bhushan
प्रशांत भूषण (फाइल फोटो)

क्या कहना चाहते हैं प्रशांत भूषण?

कोरोना वैक्सीनेशन पर अपनी टिप्पणियों के लिए विरोध का सामने कर रहे प्रशांत भूषण दावा करते हैं कि इतिहास में किसी भी संक्रामक महामारी के मास वैक्सीनेशन के जरिए नियंत्रित होने का कोई उदाहरण नहीं है. इस मुद्दे पर अपने एक नए लेख में उन्होंने ये बात कही है.

प्रशांत भूषण ने विस्तार से बताया है कि वे क्यों कोरोना वैक्सीनों को लेकर संदेहवादी बने हुए हैं. उनका कहना है,

“कोविड वैक्सीन के प्रभावों को लेकर सामने आ रही उन बातों पर चर्चा नहीं हो रही, जो कहती हैं कि बिना टेस्ट किए विकसित की गई इन वैक्सीनों को लेकर सही तरीके से रिसर्च नहीं हुआ, इनके इस्तेमाल के बाद वॉलंटियर्स में विपरीत प्रभाव होने के सबूत बढ़े हैं, टीकों की वजह से लंबे समय तक के लिए गंभीर साइडइफेक्ट होने का साफ डर है और ये वैक्सीन खुद भी कोरोना वायरस के नए और ज्यादा संक्रामक स्ट्रेन पैदा होने के खतरे को बढ़ा सकती हैं.”

भूषण के मुताबिक, कोरोना वैक्सीन के प्रभावों से जुड़े इन मतों को ‘साजिश’ बताया जा रहा है और इस काम में मेन स्ट्रीम मीडिया भी शामिल है, जिसने इन बातों को सेंसर करने का काम किया है. सीनियर ऐडवोकेट का कहना है,

“ये साफ है कि वैक्सीन से मिलने वाले (आर्थिक) फायदे के लिए दूसरे इलाजों को दबाया गया और सच्चाई छिपाई गई. बड़ी दवा कंपनियों से पैसा ले रहे वैज्ञानिकों ने इसे बढ़ावा दिया. फरवरी 2021 में ब्रिटिश आइवरमेक्टिन रेकमेंडेशन डेवलेपमेंट (बर्ड) नाम से अंतरराष्ट्रीय फिजिशन, शोधकर्ताओं और कोरोना मरीजों की बैठक हुई थी. इस बैठक का निष्कर्ष ये था कि आइवरमेक्टिन दवा को कोविड ट्रीटमेंट के लिए तुरंत वैश्विक स्तर पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए, क्योंकि ये सस्ती और आसानी से मिलने वाला ड्रग है. बर्ड ग्रुप की ये रेकमेंडेशन कई अध्ययनों पर आधारित थी, जिनमें कहा गया था कि आइवरमेक्टिन से कोविड-19 होने का खतरा 90 प्रतिशत, जबकि मौत का खतरा 68 प्रतिशत से 91 प्रतिशत तक कम हो जाता है. वॉशिंगटन स्थित फ्रंटलाइन कोविड-19 क्रिटिकल केयर अलायंस ने आइवरमेक्टिन के खिलाफ गलत जानकारी फैलाने वाले कैंपेन और इस दवा को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन के पैनल के बहुत ही खराब विश्लेषण का भंडाफोड़ किया था.”

इसके बाद भूषण ने अमेरिकन जर्नल ऑफ थेरप्यूटिक्स नाम के अंतरराष्ट्रीय मेडिकल पत्रिका में छपे एक नए अध्ययन के हवाले कहा है कि आइवरमेक्टिन दवा के इस्तेमाल से कोविड-19 से होने वाली मौतों को बड़े स्तर पर कम किया जा सकता है. दवा को शुरुआती क्लिनिकल कोर्स में शामिल कर बीमारी को गंभीर होने से रोका जा सकता है. इस अध्ययन का निष्कर्ष ये था कि असरदार होने के साथ सुरक्षित और सस्ती होने के चलते आइवरमेक्टिन कोरोना महामारी के खिलाफ वैश्विक रूप से प्रभावी हो सकती है.

प्रशांत भूषण ने अमेरिकी सरकार, WHO और बिल गेट्स तक को लपेटा है. अमेरिका के एक चर्चित मेडिसिन प्रोफेसर, कार्डियोलॉजिस्ट और महामारी विशेषज्ञ डॉ. पीटर मैक्कलफ के 19 मई 2021 को दिए एक इंटरव्यू के हवाले से भूषण ने दावा किया है कि अमेरिका की सरकार ने जानबूझकर डब्ल्यूएचओ, गेट्स फाउंडेशन और बड़ी फार्मा कंपनियों के साथ मिलकर कोविड-19 के उन कॉम्बिनेशन ट्रीटमेंट की जानकारी दबाई, जिन्हें वैज्ञानिकों ने क्लिनिकली साबित किया है कि उनसे इस बीमारी का इलाज हो सकता है. इनमें विटामिन सी, विटामिन डी, आइवरेक्टिन, हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन और अन्य दवाएं शामिल हैं.

प्रशांत भूषण का कहना है कि कोरोना वैक्सीनेशन ड्राइव के बढ़ने के साथ कई विश्वसनीय स्वतंत्र फिजिशन और मेडिकल साइंटिस्ट ने इस अभियान को लेकर सावधान किया है. लेकिन सार्वजनिक उन्माद को बढ़ावा देने वाली राजनीतिक अर्थव्यवस्था ने इन दवाओं के बारे में इस कदर नेगेटिव जानकारी फैलाई कि महामारी के खिलाफ पब्लिक हेल्थ रेस्पॉन्स का रुख ही प्रमाणित दवाओं से हट गया. लोगों ने वैक्सीनों को ही कोरोना का समाधान मान लिया.

Vaccine
कोवैक्सीन (बाएं) और कोविशील्ड (दाएं). (तस्वीरें- पीटीआई)

प्रशांत भूषण कोरोना वैक्सीन से जुड़ी वैज्ञानिक चिंता भी जताते हैं. उन्होंने कहा है कि कई वैक्सीन वंशाणु आधारित तकनीक से बनाई गई हैं, जिसे एमआरएनए/डीएनए वेक्टर टेक्नोलॉजी कहते हैं. अमेरिका की बड़ी दवा कंपनी फाइजर और मॉडेर्ना द्वारा विकसित कोविड वैक्सीन इसी तकनीक पर आधारित हैं. प्रशांत भूषण ने कहा है कि इतिहास में कभी भी इस तकनीक से बने टीकों को इन्सानों को लगाने के लिए रेग्युलेटरी अप्रूवल नहीं दिया गया. इस तरह की वैक्सीन तीसरे और अंतिम चरण के मानव परीक्षण पूरे होने तक एक्सपेरिमेंटल मानी जाती हैं.

लेकिन कोरोना संकट से घबराई सरकारों ने जिस तरह रेस्पॉन्स दिया, उसे देखते हुए इन वैक्सीनों को ट्रायल पूरा होने से पहले ही इमरजेंसी अप्रूवल दे दिया गया, जबकि तब तक इन वैक्सीन की क्षमता और इनके संभावित ‘नुकसानदेह’ साइडइफेक्ट को लेकर अध्ययन अब तक नहीं किए गए हैं. प्रशांत भूषण के मुताबिक,

“इससे बचने के लिए ट्रायल से जुड़ा क्लिनिकल डेटा सामने नहीं रखा गया, जिससे कि स्वतंत्र वैज्ञानिक और शोधकर्ता उसकी जांच करते. नैतिक क्लिनिक रिसर्च के नियम-कायदों का उल्लंघन करते हुए डेटा छिपाया गया.”

प्रशांत भूषण कोरोना वैक्सीनेशन को लागू करने के तरीके के चलते भी संशय में हैं. वे कहते हैं कि संक्रमण को मात देने वाले लोगों में पैदा हुई इम्यूनिटी वैक्सीन से मिलने वाली इम्यूनिटी से कहीं बेहतर और विस्तृत है. इसके बावजूद कोरोना से बीमार पड़े और रिकवर हो चुके लोगों में फर्क किए बिना अंधाधुंध टीके लगाए जा रहे हैं. वरिष्ठ वकील बच्चों को भी वैक्सीनेशन में शामिल करने के विचार से हैरान हैं. उनका कहना है कि ये ‘साबित हो गया है’ कि स्वस्थ बच्चों को कोविड-19 से लगभग कोई खतरा नहीं है.

ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में छपी एक अध्ययन रिपोर्ट के आधार पर भूषण ने कहा कि 25 लाख बच्चों में से केवल एक बच्चे की मौत कोरोना संक्रमण से हो सकती है. ऐसे में वयस्कों पर हुए तीसरे चरण के ट्रायल के परिणाम, जो 2023 तक आएंगे, आने से पहले ही बच्चों को वैक्सीनेट करना अनैतिक है और इसे तुरंत रोका जाना चाहिए. प्रशांत के मुताबिक, वैक्सीनों के दुष्प्रभावों को जाने बिना उनके लगाने से बच्चों में दिल, इम्यून सिस्टम और न्यूरोलॉजिकल समेत कई तरह की समस्याएं हो सकती हैं. इनमें फर्टिलिटी पर पड़ने वाले प्रभाव भी शामिल हैं.

इस दावे के पीछे प्रशांत भूषण ने शीर्ष अमेरिकी हेल्थ एजेंसी सीडीसी का हवाला दिया है. अप्रैल 2021 में सीडीसी ने रिपोर्ट दी थी कि अमेरिका में एमआरएनए आधारित कोविड-19 वैक्सीन लगवाने वाले लोगों, विशेषकर किशोरों और युवा वयस्कों में म्योकार्डाइटिस और पेरिकार्डाइटिस के मामले बढ़े हैं. ये दोनों हृदय से जुड़ी समस्याएं हैं. भूषण के मुताबिक, एक और बड़ी फार्मा कंपनी जॉनसन एंड जॉनसन की कोरोना वैक्सीन के मामले में भी यही ट्रेंड देखने को मिला है.

Pfizer Coronavirus Vaccine
फाइजर के कोरोना के टीके दुनिया के टॉप टीकों में से एक बताए जाते हैं. (तस्वीर: एपी)

प्रशांत भूषण ने और भी उदाहरण दिए हैं. बताया कि यूरोप में स्वाइन फ्लू की वैक्सीन के इमरजेंसी अप्रूवल के बाद वहां 1000 बच्चों की मौत हो गई थी. आखिरकार यूरोपीय सरकारों को वैक्सीनेशन का फैसला वापस लेना पड़ा. हाल में इटली ने कथित रूप से कोरोना वैक्सीन से एक बच्चे की मौत की घटना सामने आने के बाद वहां 60 साल से कम उम्र के लोगों को ये टीका नहीं लगाने का फैसला किया है. बता दें कि एस्ट्राजेनेका वही कंपनी है, जिसने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर कोरोना की चर्चित वैक्सीन बनाई थी, जिसे इंडिया में कोवीशील्ड के नाम से जाना जाता है.

कोरोना वैक्सीनों के दुष्प्रभावों से जुड़े अध्ययनों और घटनाओं के आधार पर प्रशांत भूषण का मानना है कि बच्चों और युवाओं को कोरोना वैक्सीन लगाने से फायदा कम और नुकसान ज्यादा है. उन्होंने बताया कि यूरोप के कई डॉक्टरों ने वहां के ड्रग रेग्युलेटर एमएचआरए को लिखे एक ओपन लेटर में कहा था कि मौजूदा साक्ष्य साफ बताते हैं कि कोरोना टीकों से बच्चों को फायदा कम और नुकसान ज्यादा है, लिहाजा वे इन टीकों को बच्चों को दिए जाने का समर्थन नहीं करते, बल्कि इसे गैरजिम्मेदाराना, अनैतिक और निश्चित ही गैरजरूरी मानते हैं.

लेख में प्रशांत भूषण ने लिखा है,

“कई अन्य वैज्ञानिकों और डॉक्टरों ने कहा है कि एमआरएनए वैक्सीन के जरिये शरीर में जाने वाला स्पाइक प्रोटीन ना सिर्फ वैक्सीनेशन वाली जगह पर बना रहता है, बल्कि शरीर की रक्तवाहिकाओं में भी सर्कुलेट होता है और कई मुख्य अंगों तक पहुंच जाता है. ये अत्यंत विषैला रोगाणु कई प्रकार की समस्याओं का कारण बन सकता है. जैसे म्योकार्डाइटिस, रक्तवाहिकाओं में मौजूद एडोथीलियल सेल्स को नुकसान और लिम्फ ग्लैंड, जो ब्लड क्लॉटिंग का कारण बन सकता है आदि. कुछ अध्ययनों में तो ये संभावना भी जताई गई है कि वैक्सीन से डीएनए भी प्रभावित हो सकता है, जिसके गंभीर परिणाम पीढ़ियों को प्रभावित कर सकते हैं.”

प्रशांत भूषण ने भारत में बनी पहली कोरोना वैक्सीन कोवैक्सीन पर भी सवाल उठाए हैं. उन्होंने ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया के इस वैक्सीन को इमरजेंसी अप्रूवल देने के फैसले को हैरानी भरा बताया है. भूषण ने कहा कि कोवैक्सीन को अमेरिका के ड्रग कंट्रोलर एफडीए ने इमरजेंसी अप्रूवल देने से इन्कार कर दिया था. ये टीका डब्ल्यूएचओ की भी लिस्ट में नहीं है, और ना ही यूरोपियन मेडिसिन एजेंसी ने इसे ये अप्रूवल दिया है. भूषण ने कहा,

“भारत बायोटेक ने भारत के कई अस्पतालों में बच्चों के छोटे से समूह पर ट्रायल शुरू कर दिए हैं. प्रतियोगियों की इतनी कम संख्या और ट्रायल में प्लसीबो ड्रग का इस्तेमाल नहीं करने को लेकर विशेषज्ञों ने चिंता जताई है.”

प्लसीबो एक प्रकार का ड्रग है, जो मेन दवा से तुलना के लिए कुछ प्रतियोगियों को लगाया जाता है. इसका उपचार से कोई संबंध नहीं होता.

साइंस क्या कहता है?

यही कि लगातार शोध करते रहना चाहिए. केवल अपनी राय से मिलते-जुलते तथ्यों (भले वे वैज्ञानिक आधारित क्यों ना हों) को अंतिम सत्य नहीं मानना चाहिए. इसलिए ये पहले समझ लीजिए कि सीनियर ऐडवोकेट की कुछ बातों को सीधे खारिज करना सही नहीं होगा. लेकिन कुछ बातें केवल आशंका भर लगती हैं, जो सही हो भी सकती हैं और नहीं भी. ऐसा इसलिए क्योंकि एक ही विषय पर दुनिया में अलग-अलग वैज्ञानिक शोध होते हैं. इनके परिणाम भी अलग-अलग हो सकते हैं. संभव है ये परिणाम परस्पर विरोधी हों.

जैसे कोविड-19 बीमारी किन-किन तरीकों से फैलती है, इसे लेकर कई शोध सामने आ चुके हैं. महामारी की शुरुआत से हाल के समय तक ये बात जोर देकर की जाती रही कि वायरस से दूषित सरफेस से कोविड संक्रमण तेजी से फैलता है. अलग-अलग सतह पर वायरस कई दिनों तक जिंदा रह सकता है. लेकिन अप्रैल 2021 में सीडीसी ने माना कि सतह के जरिये वायरस फैलने का खतरा काफी कम है. इतना कम कि 10 हजार लोगों में केवल एक को दूषित सतह से संक्रमण हो सकता है.

वैक्सीन जल्दी कैसे बन गईं?

कोरोना वायरस की वैक्सीन जिस रफ्तार से बनाई गई और जिस जल्दबाजी में उसके मानव परीक्षण हुए, उसे लेकर पहले भी चिंताएं जताई गई हैं. ये लाजमी था, क्योंकि वैक्सीन महीनों में नहीं, सालों में जाकर बनती हैं. वायरस की जीनोम सीक्वेंसिंग करने से लेकर मानव परीक्षणों में उसके प्रभाव और नुकसान जानने की प्रक्रिया में एक से डेढ़ दशक का समय लग जाता है. लेकिन कोविड-19 वैक्सीन एक साल से भी कम समय में बना ली गई और इसके शुरुआती ट्रायल भी कर लिए गए. ये कैसे संभव हुआ?

इस सवाल के जवाब में वैक्सीन निर्माता कंपनियों के शोधकर्ताओं का अपना तर्क था. उनका कहना था कि कोरोना वायरस कोई नया विषाणु नहीं है. इसकी खोज दशकों पहले हो गई थी और अब तक इसके कम से कम छह रूप सामने आ चुके हैं. ये सभी कोरोनाविरिडाई नाम के वायरस ग्रुप के सदस्य हैं. इनमें सबसे ज्यादा खतरनाक रहे सार्स-सीओवी-1 और सार्स-सीओवी-2. एक 2003-04 में सामने आया था और दूसरे का दिसंबर 2019 के अंत में पता चला. दोनों के मिलने के बीच 15-16 साल का अंतर है. इस दौरान कोरोना वायरसों को लेकर दुनियाभर में काफी रिसर्च पहले ही हो चुका था. वैक्सीन निर्माता वैज्ञानिकों की मानें तो सार्स-सीओवी-2 के खिलाफ वैक्सीन तैयार करने में ये रिसर्च काफी काम आया. यही वजह है कि वैक्सीन इतनी जल्दी तैयार कर ली गई.

वैक्सीन कम्युनिटी से नहीं रुकेगा ट्रांसमिशन

यहां प्रशांत भूषण की ये बात गलत नहीं लगती कि केवल वैक्सीनेशन को इस संकट का हल बताना सही नहीं है. दुनियाभर के कई वैज्ञानिक और शोधकर्ता आशंका जता चुके हैं कि अगर मौजूदा कोरोना वैक्सीन बीमारी के खिलाफ असरदार हैं भी, तो भी इससे महामारी पूरी तरह रुकने का दावा नहीं किया जा सकता. इन्फ्लूएंजा, स्वाइन फ्लू आदि संक्रामक बीमारियां अब तक खत्म नहीं हुई हैं.

एक और बात. ये ट्रेंड हर जगह देखा गया है कि लोगों के बड़े हिस्से ने संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए सरकारों या विशेषज्ञों द्वारा सुझाए गए उपायों-प्रोटोकॉलों का पालन नहीं किया है. इससे नए वायरस वैरिएंट पैदा होने का खतरा बढ़ा है. कोरोना काल में ब्राजील, यूरोप और भारत में हम ये होता देख चुके हैं. इससे इस थ्योरी को बल मिला है कि हो सकता है मौजूदा वैक्सीन कोरोना वायरस के भावी स्ट्रेन्स को ना रोक पाएं. खुद डब्ल्यूएचओ ने इस खतरे से आगाह किया है. उसने संकेत दिया है कि कोरोना वायरस के डेल्टा वैरिएंट से उन लोगों को भी खतरा है, जो कोविड-19 की एक या दोनों डोज ले चुके हैं. डब्ल्यूएचओ ने कहा कि ऐसे लोगों को भी सोशल डिस्टेंस बनाए रखना और मास्क पहनना उतना ही जरूरी है जितना दूसरे लोगों को, क्योंकि वैक्सीन कम्युनिटी से कोरोना वायरस का ट्रांसमिशन नहीं रुकेगा.

वैक्सीनों की भूमिका है अहम

बीते हफ्ते एम्स प्रमुख डॉ. रणदीप गुलेरिया ने ऐसा बयान दिया. एनडीटीवी से बातचीत में डॉ. गुलेरिया का कहना था कि कोरोना वायरस के नए म्यूटेशन से कैसे निपटें, इसका जवाब मौजूदा वैक्सीन की मिक्सिंग में हो सकता है. गुलेरिया ने कहा,

“पहले भी इस तरह का विचार किया गया है. एक वैक्सीन प्राइम शॉट के तहत और दूसरा बूस्टर के रूप में दिया जा सकता है. कुछ डेटा से पता चलता है कि वैक्सीन की मिक्सिंग से थोड़े और ज्यादा साइडइफेक्ट हो सकते हैं. लेकिन दूसरे डेटा बताते हैं कि इससे बेहतर इम्यूनिटी जनरेट हो सकती है और ज्यादा एंटीबॉडी प्रोटेक्शन मिल सकता है. इसके लिए और ज्यादा डेटा की जरूरत है. भविष्य में बड़ी संख्या में वैक्सीन उपलब्ध होंगी. आपके पास फाइजर, मॉडेर्ना, स्पूतनिक 5 और जाइडस कैडिला के टीके होंगे. कौन सा कॉम्बिनेशन बेहतर होगा, इसका जवाब अभी हमारे पास नहीं हैं. लेकिन हां, शुरुआती अध्ययन बताते हैं कि ये एक विकल्प हो सकता है. सरकार इस पर काम कर रही है. अगले कुछ महीनों में ट्रायल परिणाम सामने होंगे.”

Astrazeneca Dose Followed By Pfizer Report
दी कार्लोस हेल्थ इंस्टिट्यूट का दावा है कि दो अलग-अलग वैक्सीन अधिक प्रभावी हैं. (तस्वीर: एपी)

डॉ. रणदीप गुलेरिया ने जिन अध्ययनों के आधार पर वैक्सीन मिक्सिंग के विकल्प पर बात की, उनमें ब्रिटेन में हुआ एक अध्ययन भी शामिल है. बीते महीने आई रिपोर्टों के मुताबिक, ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने एक्सपेरिमेंट के तहत कुछ प्रतियोगियों को एस्ट्राजेनेका (यानी कोवीशील्ड) और फाइजर वैक्सीन का एक-एक शॉट दिया था. शुरुआती परिणामों से पता चला कि इस कॉम्बिनेशन से पार्टिसिपेंट में साइडइफेक्ट और भी कम हो गए. हालांकि वैक्सीन की क्षमता से जुड़ा डेटा अभी साझा नहीं किया गया है. लेकिन स्पेन में हुए ऐसे ही एक अध्ययन में इस वैक्सीन कॉम्बिनेशन को वायरस के खिलाफ सक्षम और सुरक्षित पाया गया.

बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए खतरनाक है वैक्सीन?

इस बारे में भी वैज्ञानिकों और डॉक्टरों की राय बंटी हुई है. इसका कोई पुख्ता एविडेंस नहीं है कि कोरोना वैक्सीन से बच्चों और युवाओं को फायदा ज्यादा है या नुकसान. फिलहाल अध्ययनों के हवाले से मीडिया रिपोर्टों में अलग-अलग जानकारी सामने आती रहती है. न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सीडीसी कोविड वैक्सीन लेने वाले कुछ युवाओं में कथित रूप से हृदय की समस्या होने की जांच कर रही है. लेकिन उसने इसकी पुष्टि नहीं की है कि ऐसा वैक्सीन के कारण ही हुआ है.

इस बीच, भारत की सरकार ने साफ कर दिया है कि देश में कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए इस्तेमाल की जा रही या इस्तेमाल होने वाली कोई भी वैक्सीन गर्भवती महिलाओं और दूध पिलाने वाली माओं के लिए खतरनाक नहीं है. इंडिया टुडे के मुताबिक, नीति आयोग के सदस्य डॉ. वीके पॉल ने कोवैक्सीन, कोवीशील्ड, स्पूतनिक 5 और मॉडेर्ना वैक्सीन को नई मांओं और गर्भवती महिलाओं के सुरक्षित बताया है. उन्होंने कहा है कि ऐसी महिलाओं के वैक्सीनेशन को लेकर जल्दी ही एडवाइजरी जारी की जाएगी. इसके साथ ही डॉ. पॉल ने कहा कि इन वैक्सीनों का इन्फर्टिलिटी से कोई संबंध नहीं है.

यही बात बीबीसी की एक रिपोर्ट में भी कही गई है. हालांकि ये रिपोर्ट केवल फाइजर वैक्सीन के बारे में है. इसके मुताबिक, इस टीके से महिलाओं और पुरुषों दोनों में इन्फर्टिली का खतरा नहीं है और ना ही वास्तव में ऐसा संभव है. रिपोर्ट कहती है कि ये वैक्सीन केवल वायरस के जेनेटिक मटीरियल को शरीर में पहुंचाती है, जो बिल्कुल भी नुकसानदेह नहीं है. ये किसी भी तरह व्यक्ति को कोविड-19 से संक्रमित नहीं कर सकती और ना ही डीएनए को प्रभावित कर सकती है.

आइवरमेक्टिन के निर्माता को ही नहीं मिले सबूत

प्रशांत भूषण कहते हैं कि कोरोना के इलाज के लिए दूसरे ड्रग कॉम्बिनेशन्स की जानकारी को दबाया गया. इसके लिए वे सरकारों के साथ डब्ल्यूएचओ को भी जिम्मेदार बताते हैं. लेकिन ये कम दिलचस्प नहीं है कि जहां भारत समेत कई देशों में आइवरमेक्टिन को कोविड-19 के संभावित इलाज के रूप में देखा गया, वहीं इसके मैन्युफैक्चरर ने इसे कोरोना मरीजों पर नहीं आजमाने की बात का एक तरह से समर्थन किया था.

खबर मई 2021 की है. आइवरमेक्टिन बनाने वाली कंपनी मर्क ने एक प्रेस रिलीज जारी कर कहा था कि शुरुआती अध्ययनों से उसके वैज्ञानिकों को ऐसे कोई सबूत नहीं मिले हैं, जिससे साबित हो कि आइवरमेक्टिन कोविड-19 के इलाज में प्रभावी और सुरक्षित है. ना ही कोविड मरीजों में इसके इस्तेमाल से किसी प्रकार की क्लिनिकल एक्टिविटी या एफिकेसी होने का पता चला. मर्क ने इस दवा को लेकर किए गए ज्यादातर अध्ययनों में सेफ्टी डेटा की कमी होने का भी हवाला दिया.

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तस्वीर- पीटीआई.

इस खबर के कुछ समय बाद भारत में जारी हुए नए कोविड ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल में आइवरमेक्टिन का नाम नहीं था. स्वास्थ्य मंत्रालय ने हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन और डॉक्सीसाइक्लिन समेत कुछ दूसरी दवाओं के नाम भी हटा दिए थे. हालांकि यहां ये भी बता दें कि कई देश अभी भी आइवरमेक्टिन को कोविड ट्रीटमेंट के लिए अहम मानते हुए इस पर रिसर्च कर रहे हैं. हो सकता है कि आने वाले समय में इस दवा को कोरोना मरीजों के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति मिल जाए. डेक्सामेथासोन के मामले में ये देखा गया है.

अप्रैल में यूनिवर्सिटी ऑफ हडर्सफील्ड (इंग्लैंड) के दो वैज्ञानिकों के अध्ययन में इस दवा को कोरोना के गंभीर मरीजों के लिए कारगर बताया गया था. लेकिन उस समय इस स्टडी पर ध्यान नहीं दिया गया. लेकिन बाद में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने इस दवा को कोरोना के गंभीर मरीजों पर आजमाया तो उनकी मृत्यु दर में कमी देखने को मिली. फिर डब्ल्यूएचओ ने भी दवा के इस्तेमाल को अप्रूवल दे दिया. तब से दुनियाभर में डेक्सामेथासोन कोरोना संक्रमण से ग्रस्त लोगों को बचाने के लिए इस्तेमाल की जा रही है.

नेचुरल इम्यूनिटी वैक्सीन से मिलने वाली प्रतिरक्षा से बेहतर?

ये भी डिबेटेबल है. नेचुरल इम्यूनिटी को लेकर अलग-अलग थ्योरी दुनियाभर की स्टडी में मिलती हैं. इनमें ये भी शामिल है कि कोविड-19 के कम या मामूली लक्षणों वाले मरीजों में विकसित हुई नेचुरल इम्यूनिटी, गंभीर मरीजों की तुलना में कमजोर और कम अवधि वाली हो सकती है. ऐसे में उनकी और संक्रमण की चपेट से बचे रहे लोगों में वैक्सीन की जरूरत एक बराबर है.


वीडियो: अगस्त से लेकर दिसंबर के बीच देश में कितनी कोविड-19 वैक्सीन उपलब्ध हो सकेंगी, जानिए

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