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कोरोना वैक्सीन विदेश भेजते हुए मोदी सरकार ने सच छिपाया?

“मोदी जी, हमारे बच्चों की वैक्सीन विदेश क्यों भेजी?”

ऐसी लाइनें लिखे पोस्टर्स दो दिन पहले दिल्ली में दिखते हैं. जिसके बाद पोस्टर लगाने वालों के खिलाफ दिल्ली पुलिस FIR करती है. 17 लोगों की गिरफ्तारी की खबर आती है. और फिर 16 मई को पूरे दिन कांग्रेस के नेता ऐसे पोस्टर्स ट्विटर पर शेयर करते हैं. और अरेस्ट मी टू का कैंपेन चलाया जाता है.

वैक्सीन का निर्यात मोदी सरकार की कोई मज़बूरी थी?

विदेश में वैक्सीन भेजने वाले सवाल से मोदी सरकार का पीछा नहीं छूट रहा. इस सवाल पर सरकार असहज दिखती है, और विपक्ष इस असहजता को बढ़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ता. आज हम गिरफ्तारी या पोस्टर्स लगाने वाली राजनीति में नहीं पड़ेंगे. पोस्टर पर लिखी लाइन की सत्यता तक पहुंचने की कोशिश करेंगे. कई तरह के दावे और तर्क हैं. सरकार कहती है कि जो वैक्सीन के निर्यात पर सवाल उठाते हैं वो गैरजिम्मेदार हैं. विपक्षी कहते हैं कि वैक्सीन विदेश ना भेजते तो कितने जानें देश में बच जाती. और अब सत्तारूढ़ पार्टी से ही तीसरा पक्ष आ रहा है कि वैक्सीन का निर्यात तो मजबूरी थी क्योंकि लाइसेंस में ऐसे ही क्लॉज थे. तो विदेश में वैक्सीन भेजने का फैसला सही था, या ग़लत था. या वैक्सीन का निर्यात मोदी सरकार की कोई मज़बूरी थी? पूरे मामले को तह तक जाकर समझेंगे.

पूरी कहानी को दो कालखंडों में बांट लेते हैं. एक हिस्सा 16 जनवरी 2021 से पहले का और दूसरा बाद का. और 16 जनवरी को क्या हुआ था. इसी दिन भारत में टीके लगने शुरू हुए थे. तो पहले हिस्से में थोड़ा बैकग्राउंड. 4 जून 2020 को ब्रिटेन की दवा कंपनी एस्ट्राजेनेका ने ऐलान किया कि उसने सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया के साथ वैक्सीन का करार किया है. तभी शायद हम में से ज़्यादातर लोगों ने सीरम इंस्टिट्यूट का नाम पहली बार सुना होगा. एस्ट्राजेनेका कंपनी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर कोरोना का टीका बना रही थी और टीके का बड़े स्तर पर उत्पादन करने के लिए सीरम इंस्टिट्यूट को साथ लिया. करार था कि सीरम इंस्टिट्यूट कोरोना के 1 अरब टीके बनाएगा और low-and middle-income countries यानी निम्न मध्यम आय वाले देशों को टीके बेचेगा. अब यहां तक विशुद्ध रूप से दो कंपनियों के बीच की बात थी. कहीं भी भारत सरकार का रोल नहीं था. ना ही भारत को किसी निश्चित समय में मिलने वाले टीकों की संख्या तय हुई थी. Pause
इसके बाद सीरम इंस्टिट्यूट कुछ और बड़े ऐलान करता है. सीरम इंस्टिट्यूट की वेबसाइट पर ही 7 अगस्त की एक प्रेस रिलीज़ मिलती है. इसमें सीरम इंस्टिट्यूट के साथ हुए एक बड़े करार का ज़िक्र है. क्या था ये करार. बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन और गावी नाम के संगठन ने सीरम इंस्टिट्यूट के साथ एक डील साइन की थी. 10 करोड़ वैक्सीन डोज़ भारत और निम्न-मध्यम आय वाले देशों को देने की डील. अब यहां गावी एक नया नाम आया है, इसका तारूफ कर लेते हैं.

क्या वैक्सीन बनने से पहले देने का करार हो गया था?

गावी-द वैक्सीन एलायंस नाम का ये एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन है जो ग़रीब देशों को वैक्सीन पहुंचाने के क्षेत्र में काम करता रहा है. वर्ल्ड बैंक, बिल-मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन जैसी संस्थाओं से गावी, फंड की मदद लेता है. और एक प्लेटफॉर्म तैयार करता है ताकि गरीब देश वैक्सीन से वंचित ना रहें. कोरोना वैक्सीन भी सभी ज़रूरतमंद मुल्कों तक पहुंचाने के लिए पिछले साल गावी ने WHO और कुछ और संगठनों के साथ मिलकर एक मुहिम शुरू की. इसे कोवैक्स नाम दिया गया. और कोवैक्स के तहत ही डिलवरी पार्टनर बन गए सीरम इंस्टिट्यूट जैसी वैक्सीन बनाने वाली कंपनियां. करार इस शर्त पर कि गावी वैक्सीन उत्पादन के लिए फंड में मदद करेगा बदले में वैक्सीन वाली कंपनी एक तय संख्या में डोज़ निम्न और मध्यम आय वाले देशों को देंगी. इस करार में पैसे देने वाला काम, बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन ने किया था. अगस्त में गेट्स फाउंडेशन ने 15 करोड़ डॉलर दिए और सीरम इंस्टिट्यूट ने 10 करोड़ वैक्सीन देने का करार किया. सीरम इंस्टिट्यूट ने ऐसा ही एक करार फिर सितंबर में गावी और गेट्स फाउंडेशन के साथ किया. यानी सितंबर के आखिर तक सीरम इंस्टिट्यूट टीके की 20 करोड़ खुराक देने का करार कर चुका था. भारत और निम्न-मध्यम आय वाले देशों को 2021 के शुरुआती कुछ महीनों में ही ये वैक्सीन देनी थी. इसमें वैक्सीन की कीमत पर भी बात थी. अधिकतम कीमत 3 डॉलर रखने की बात थी. 3 डॉलर आज के भाव से करीब 220 रुपये के बराबर है.

अक्टूबर और नवंबर तक ऐसा लगने लगा था कि ऑक्सफोर्ड की वैक्सीन आने में अब ज्यादा देर नहीं हैं. 28 नवंबर को पीएम मोदी ने पुणे में सीरम इंस्टिट्यूट का दौरा किया. पीएम मोदी चेयरमैन साइरस पूनावाला और सीईओ अदारपूनावाला से मिले. नवंबर के बाद से वैक्सीन वाली डिबेट के सेंटर सरकार भी आ गई. गरीब देशों को वैक्सीन भेजने वाले जैसे सीरम इंस्टिट्यूट के पुराने करारों की बात दब गई. जनवरी में कोविशिल्ड और कोवैक्सीन को अप्रुवल मिल गया. लेकिन अदारपूनावाला के मीडिया में बयान आए कि अप्रुवल में निर्यात ना करने की शर्त है. सिर्फ भारत सरकार को ही वैक्सीन दी जानी है. पीएम मोदी ने राष्ट्र को वैक्सीन की बधाई भी दे दी. ऐसा लगा कि अब वैक्सीन के मामले में सब कुछ मोदी सरकार के हाथ में है.

16 जनवरी को भारत में टीकाकरण शुरू हो गया. उसके 3 दिन बाद यानी 19 जनवरी की एक प्रेस रिलीज विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर मिलती है. और यहीं से आता है वैक्सीन मैत्री का ज़िक्र. इस प्रेस रिलीज में सरकार ने कहा कि पड़ोसी और साझेदार देशों से भारत में बने टीकों की मांग आ रही है. महामारी से लड़ने में भारत हर संभव मदद करेगा और 20 जनवरी से पड़ोसी देशों को वैक्सीन भेजने की बात कही. इसी प्रेस रिलीज की आखिरी लाइन है कि घरेलू आवश्यकताओं और अंतर्राष्ट्रीय मांग और दायित्वों को समायोजित किया जाएगा. इसमें थोड़ा-सा गावी और कोवैक्स का भी ज़िक्र कर दिया. वही कोवैक्स जिसका करार सीरम इंस्टिट्यूट ने किया था.

वसुधैव कुटुंबकम भारी पड़ गया?

जनवरी के बाद फरवरी और मार्च के शुरू तक लगभग हर दिन किसी ना किसी देश को भारत की वैक्सीन पहुंच रही थी. उन देशों से भारत के लिए थैंक्यू आ रहा था और सरकार इस क्रेडिट का मज़ा लूट रही थी. विदेश मंत्रालय की वेबसाइट कहती है कि अब तक लगभग 90 देशों को भारत से 6 करोड़ 63 लाख वैक्सीन के डोज़ भेजे जा चुके हैं. इसमें कोविशिल्ड और कोवैक्सीन दोनों ही शामिल हैं.

इसके बाद वैक्सीन के निर्यात पर विपक्ष ने सरकार को घेरना शुरू किया. संसद में भी सवाल पूछे. विदेश मंत्री ने कह दिया कि वैक्सीन मैत्री में कुछ भी गलत नहीं, वसुधैव कुटुंबकम तो भारत की पुरानी रीति रही है.

ये मामला सुप्रीम कोर्ट में भी गया. सरकार ने 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर वैक्सीन बाहर भेजने के फैसले को सही बताया. कहा कि जब कोई महामारी, विश्वव्यापी महामारी का रूप ले लेती है तो उसके खिलाफ तैयारी पूरी दुनिया को ध्यान में रखकर ही की जाती है. पैंडेमिक के वक्त पूरी दुनिया एक ही यूनिट होती है. दूसरा तर्क सरकार ने ये दिया कि बाकी देशों में भी हाई रिस्क वाले लोगों को टीके लगाना ज़रूरी है, ताकि संक्रमण की चेन टूट सके. और भारत में कोरोना के मामले बाहर से आने के चांस कम हो जाएं. अगर दुनिया में इस महामारी को नहीं रोका गया तो भारत भी सुरक्षित नहीं है.

हलफनामे में सरकार ने निर्यात की एक और वजह बताई थी. कहा था टीके लगाने के लिए पर्याप्त हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है और मैनपावर की भी कमी है. टीके के प्रोडक्शन और टीकाकरण में विषमता ना हो इसलिए भी निर्यात ज़रूरी था.

देश में पर्याप्त टीके थे?

हालांकि कोर्ट के बाहर सरकार लगातार कहती रही कि भारतीयों की कीमत पर विदेश में टीके नहीं भेजे गए और देश में पर्याप्त टीके हैं. सरकार ने कोवैक्स या विकासशील देशों को टीके भेजने वाले किसी करार का ज़िक्र भी खुले तौर पर कभी नहीं किया. सारा क्रेडिट सरकार खुद ही लेती रही. लेकिन अब देश में टीकों की किल्लत जगजाहिर हो चुकी है. सरकार निर्यात वाले मामले पर फंस गई तो लाइसेंस वाले क्लॉज की बात कही जाने लगी. पिछले हफ्ते बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा था कि कमर्शियल और लाइसेंस की बाध्यताओं की वजह से 84 फीसदी निर्यात हुआ है.

अगर निर्यात की ये ही वजह थी तो अब तक वैक्सीन मैत्री और वसुधैव कुटुंबकम की मिसाल क्यों दी जा रही थी. विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर कुछ आंकड़े मिलते हैं. इनके मुताबिक भारत ने लगभग 30 फीसदी वैक्सीन कोवैक्स प्रोग्राम के तहत दी हैं. 16 फीसदी दान में दी गई हैं. 54 फीसदी कमर्शियल एक्सपोर्ट है. तो क्या इस तरह से वैक्सीन बाहर भेजने को लेकर सरकार पर कोई बाध्यता थी?

भारत ने वैक्सीन का ज्यादातर निर्यात जनवरी से मार्च के बीच किया है. मार्च में भारत में कोरोना के मामले बढ़ने लगे तो निर्यात घटा दिया. जितने डोज़ हमने भारत में लगाए हैं उसका लगभग एक तिहाई निर्यात किया जा चुका है. अभी कोरोना की वजह से भारत में हालात सबसे ज़्यादा खराब हैं. वैक्सीन की सबसे ज़्यादा ज़रूरत भारत को है. इसीलिए लगता है कि शायद ये 6 करोड़ डोज़ और लगा दिए जाते तो हालात बेहतर होते. आखिर में इस तरह के फैसलों की जिम्मेदारी सरकार पर ही आती है. अगर ये वैक्सीन किसी लाइसेंसी करार की मजबूरी में निर्यात किए गए तो भी सरकार को साफ तौर पर स्वीकार करना चाहिए. पोस्टर्स लगाने वालों की गिरफ्तारियों से सवाल नहीं दबते.


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