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भारत की विदेश नीति में ये बड़ी दिक्कत छूट जा रही है!

अफगानिस्तान को लेकर भारत दुनिया के हर मंच से अपनी चिंताएं जता रहा है. क्या होना चाहिए, क्या नहीं होना चाहिए वाली बातें. आज पीएम मोदी ने संघाई सहयोग संगठन यानी SCO की वर्चुअल बैठक में हिस्सा लिया. अफगानिस्तान को लेकर पीएम मोदी ने क्या कहा, पहले वो पढ़िए, फिर आगे की बात.

“ये इस संस्था के भविष्य के बारे में सोचने के अवसर है. मेरा मानना है कि इस क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौती शांति, सुरक्षा और भरोसे की कमी से संबंधित है. इसका मूल कारण बढ़ता हुआ कट्टरपंथ है. अफगानिस्तान में हाल के घटनाक्रम ने इस चुनौती को और स्पष्ट कर दिया है. इस मुद्दे पर SCO को पहल लेकर काम करना चाहिए. यदि हम इतिहास पर नज़र डालें तो पाएंगे कि मध्य एशिया का क्षेत्र मॉडरेट और प्रोग्रेसिव कल्चर और वैल्यू का गढ़ रहा है.”

पीएम ने उग्रवाद और कट्टरता बढ़ने के खतरे पर ज़ोर दिया. SCO के सदस्य देशों में चीन, पाकिस्तान और रूस भी हैं. जिनकी भूमिका अभी तालिबान वाले अफगानिस्तान में अहम मानी जा रही है. तो जाहिर है भारत का संदेश इन देशों के लिए था. लेकिन हम ये भी जानते हैं कि इस तरह की बैठकों की चर्चाएं औपचारिकता भर ही रहती हैं. कूटनीति इन भाषणों से तय नहीं होती है. और अभी तालिबान को लेकर भारत की विदेश नीति पर कई सवाल उठाए जा रहे हैं.

अनिर्णय की स्थिति में भारत!

अफगानिस्तान में हम चाहते हैं कि वहां चीज़ें हमारे मन मुताबिक हों, या कम से कम हमारे खिलाफ तो ना जाएं. लेकिन चाहने से ही ये नहीं होगा. हमारा कोई सीधा दखल अफगानिस्तान में नहीं है. यानी हमें सहयोगियों की ज़रूरत है. इसीलिए बात विदेश नीति पर आ जाती है. पर हमारा असली सहयोगी है कौन? हम अमेरिका के साथ भी बैठक कर रहे हैं, हम रूस के साथ भी बैठक कर रहे हैं, चीन से हमारा झगड़ा चल रहा है लेकिन बात तो चीन से भी कर रहे हैं. और शायद तालिबान के मामले में भी सहयोग की बात हो रही हो. तो इनमें से कौन हमारा बड़ा सहयोगी है, भारत का पक्का दोस्त कौन है. ये सवाल पूछे जा रहे हैं, और इसलिए भारत की आलोचना भी हो रही है कि हमारी विदेश नीति उदासीन है. हम दूर से खड़े होकर देखते हैं. कुछ तय नहीं कर पाते. अफगानिस्तान में, जहां हमने सबसे ज्यादा पैसा इंवेस्ट किया, वहां भी जब सत्ता बदल गई तो हमारे हाथ में कुछ नहीं आया. और आलोचक कह रहे हैं कि भारत की विदेश नीति में गड़बड़ रही है, हम अच्छे दोस्त बना ही नहीं पाते.

पड़ोसियों से ख़राब रिश्ते

विदेश नीति में कमी निकालने वाले पड़ोसियों से भी खराब संबंध की बात कहते हैं. पड़ोसियों से भी हमारे मजबूत भरोसे वाले रिश्ते नहीं हैं. पाकिस्तान से हमारे कैसे रिश्ते हैं सबको पता ही है. चीन से भी हमारे रिश्ते अच्छे नहीं हैं. सीमा विवाद चल ही रहा है. हालांकि झगड़े के बावजूद चीन से हमारी बातचीत चलती रहती है. पहले माना जाता था कि नेपाल और भूटान तो भारत के पक्के वाले दोस्त हैं. लेकिन पिछले कुछ सालों में नेपाल के साथ भी हमारे रिश्ते अच्छे नहीं हैं. वहां भी चीन का दखल बढ़ा है. सरकार गिराने बनाने के खेल में चीन की भूमिका की खबरें हमने पढ़ीं. भूटान से हमारे बहुत अच्छे रिश्ते हैं, लेकिन भूटान की रणनीतिक अहमियत उतनी नहीं है. म्यांमांर की बात कर लीजिए. वहां आंग सान सू की पार्टी की चुनी हुई सरकार से भारत के रिश्ते ठीक थे. लेकिन फिर सेना ने तख्ता पलट कर दिया. तो वहां भी रिश्तों में कोई स्थाईत्व का भाव नहीं रहा.

बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार में भारत से अच्छी दोस्ती रही है. हालांकि पिछले साल सीएए और NRC के दौरान में जब बांग्लादेशी घुसपैठियों पर विवाद हुआ था, तो रिश्तों में थोड़ी सी खटास आई थी. लेकिन कुल मिलाकर बांग्लादेश से मामला ठीक ही है. श्रीलंका से भी अभी की सरकार में भारत की कोई गहरी दोस्ती नहीं है. कहने का मतलब ये है कि कई देशों से हमारे अच्छे रिश्ते हैं, लेकिन बहुत जरूरत के वक्त इन देशों से मदद मिलेगी, ऐसा नहीं लगता. इसलिए वो सवाल भी कई लोगों के मन में होता है कि हमारे सैन्य गठबंधन क्यों नहीं होते. इसके जवाब पर आएंगे, लेकिन पहले भारत की विदेश नीति के कुछ मूल सूत्र समझिए.

हमारी विदेश नीति

विदेश नीति का लक्ष्य क्या होता है. यही कि हम अपने संप्रभुता की रक्षा कर सकें, हमारे नागरिकों या संपत्ति की रक्षा हो सके. और आर्थिक तरक्की के लिए माहौल बना सकें. ये विदेश नीति के फंडामेंटल ऑब्जेक्टिव गिनाए जाते हैं. आज़ादी के बाद से अब तक सरकार चाहे किसी भी पार्टी की रही हो, हमारी विदेश नीति में कोई 360 डिग्री वाला बदलाव नहीं आया. और इसके मूल में होता है कि हम हमारी रणनीतिक स्वायत्ता बनी रहे. यानी स्ट्रैटजिक ऑटोनोमी. यहीं से निकलकर आती है पंथनिरपेक्ष की बात. 1950 और 60 के दशक में जब दुनिया के देश अमेरिका या सोवियत के गुट में जा रहे थे, तब हमने गुटनिरपेक्षता को बेहतर समझा. कमोबेश वही नीति बाद में भी रही. पहली बार कांग्रेस सरकार हटी और जनता पार्टी की सरकार बनी, तब भी विदेश नीति में सच्ची गुटनिरपेक्षता लाने पर ज़ोर दिया गया. और उसके बाद भी हम किसी एक गुट के साथ नहीं जोड़ गए. मकसद ये रहा कि किसी देश से एलायंस ना करके, सभी देशों से सहयोग लिया जाए और अपनी क्षमता को बढ़ाया जाए.

बात ठीक भी है. लेकिन वो कहावत है ना कि जो सबका दोस्त होता है वो किसी का दोस्त नहीं होता. तो कई मौकों पर विदेश नीति के आलोचकों ने कहा कि भारत के भी मिलिट्री एलायंस होने चाहिए थे. इस पर विदेश नीति के जानकार अतुल मिश्रा की राय सुनिए.

“सवाल रहा है कि भारत मिलिट्री एलायंस, सिक्योरिटी एलायंस क्यों नहीं करता. अक्सर ये कहा जाता है कि एलायंस की गैर मौजूदगी में भारत की इंटरनेशनल सिक्योरिटी पर नेगेटिव प्रभाव पड़ रहा है. मुझे लगता है कि इस सवाल को समझने के लिए कुछ पहलुओं पर जाना ज़रूरी है. पहला ये कि एक एलायंस आपके लिए ज़रूरी है या नहीं, इसका पॉलिटिकल एसेसमेंट करना होता है. मुझे लगता है कि पिछली और इस सरकार का ये एससमेंट है कि किसी एलायंस के बिना भी हमारी बेसिक ज़रूरतें पूरी हो रही हैं.

दूसरा मुद्दा ये कि कोई भी एलायंस अपने साथ मिलिट्री और पॉलिटिकल सीमाएं लेकर आता है. उदाहरण के तौर पर अगर आप किसी देश के साथ एक एलायंस बनानी है तो वो अमेरिका या वेस्टर्न एलायंस होगा. अब मान लीजिए कि कल को अमेरिका को भारत की धरती पर एक मिलिट्री बेस चाहिए. तो अगर ये मिलिट्री बेस बनता है तो चीन इस पर नाराज़गी व्यक्त कर सकता है और ये कह सकता है कि ये मिलिट्री बेस उनकी सुरक्षा को प्रभावित करता है. कई बार ऐसा होता है कि एलायंस देश ये दबाव डालते हैं कि आप अपने डोमेस्टिक रिकॉर्ड को दुरुस्त करिए. अगर वहां कोई कॉन्फ्लिक्ट है तो आप उसे करेक्ट करिए.”

मोदी सरकार को क्या मिला?

मोदी सरकार आने के बाद से भारत का झुकाव रूस के बजाय अमेरिका की तरफ बढ़ा है, ऐसा माना जाता है. लेकिन इस रिश्ते में भी बहुत मजबूती नहीं दिखी. अफगानिस्तान ने निकलने में अमेरिका ने सिर्फ अपने हितों का ध्यान रखा. और अमेरिका पर अक्सर आरोप लगता है कि वो अपने हितों को साधता है. अमेरिका जरूरत के हिसाब से अपने दोस्त बदल लेता है. और इसका एक ताजा उदाहरण भी है.

अमेरिका ने यूके और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर एक मिलिट्री अलायंस बनाया है- Aukus नाम है इसका. मकसद है एशिया-पेसिफिक रीजन में चीन को काउंटर करना. इसके तहत तीनों देश आपस में सैन्य सहयोग बढ़ाएंगे. ऑस्ट्रेलिया को न्यूक्लियर हथियारों से लैस पनडुब्बियां बनाने में अमेरिका मदद करेगा. इस नए सैन्य गठबंधन से अमेरिका का दोस्त फ्रांस नाराज़ है. कह रहा है कि पीठ में छुरा घोंपा गया है. असल में ऑस्ट्रेलिया ने पहले फ्रांस के साथ पनडुब्बी वाला करार किया था. लेकिन अब अमेरिका ने वो डील ले ली है. यानी अमेरिका ने पुरानी दोस्ती के बजाय अपना नया फायदा देखा. और Aukus में भारत का भी नुकसान देखा जा रहा है.

चीन को काउंटर करने के लिए QUAD नाम के संगठन का नाम आपने सुना होगा. इसमें अमेरिका और भारत के अलावा ऑस्ट्रेलिया और जापान भी हैं. QUAD की अगले हफ्ते अमेरिका में बैठक भी है. इसमें हिस्सा लेने के प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका जा रहे हैं. तो अफगानिस्तान में चीन के बढ़ते रोल के बीच QUAD देशों की मजबूत गोलबंदी की उम्मीद की जा रही थी. लेकिन उससे पहले ही अमेरिका ने एक नए अलायंस का ऐलान कर दिया. जिसमें भारत नहीं है. तो इस डेवलपमेंट को कैसे समझना चाहिए. एक्सपर्ट की राय सुनिए.

पहली बात ये कि AUKUS का ऐलान अपने आप ये साफ कर देता है कि अब एशिया पैसिफिक में एक कोल्ड वॉर की अनौपचारिक शुरुआत हो चुकी है. नेताओं के भाषण से ये साफ है कि ये कोल्ड वॉर अगले कुछ दशकों तक हमारे साथ रहेगा. अब बात ये कि AUKUS और QUAD के बीच संबंध किस तरह का है. मुझे लगता है कि ये कॉम्प्लिमेंट्री रिलेशन है. इंडो-पैसिफिक एक नया रणनीतिक भूगोल है, जिसके लिए वेस्टर्न देश और उनके पार्टनर साथ आए हैं. QUAD को इंडो-पैसिफिक के लिए एक शुरुआती प्लेटफॉर्म की तरह मानिए.

अब आखिर में ये सवाल. कि अफगानिस्तान में भारत को ज्यादा मदद कहां से मिलने की उम्मीद है. हमें रूस की तरफ देखना चाहिए, या अमेरिका या कोई और.

अफगानिस्तान को लेकर हमारे पास 4 फ्रंट हैं, जिस पर ऑपरेट करना चाहिए. पहला तो ये कि अपना स्टैंड क्लियर रखें. जैसा कि PM ने आज किया है. दूसरा- जिन देशों के साथ इंटेलिजेंस सहयोग मिल रहा है, वो हमें लेना चाहिए. रूस या अमेरिका से सहयोग मिले तो लेना चाहिए. तीसरा- इंटरनेशनल फोरम में अपने को मजबूती से रखना चाहिए. चौथा- वेट एंड वॉच की पॉलिसी को सोच-समझकर फॉलो करना चाहिए.

तो ये था विदेश नीति का पूरा गणित.


AUKUS डील से नाराज फ्रांस ने अमेरिका को क्या चेतावनी दे डाली?

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