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पकड़े गए पायलट को कितने दिनों में लौटाएगा पाकिस्तान?

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एयरफोर्स के विंग कमांडर अभिनंदन को पाकिस्तान ने कब्जे में ले लिया है. और अब पूरे भारत में अभिनंदन को छुड़ाने की बात शुरू हो गई है. और ऐसा होना स्वाभाविक भी है, क्योंकि भारत का एक पायलट दुश्मन देश के कब्जे में है. लेकिन पाकिस्तान हमारे पायलट को ज्यादा दिनों तक अपने कब्जे में नहीं रख सकता है. और इसकी वजह है अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुआ एक समझौता जिसे जिनीवा कन्वेंशंस के नाम से जाना जाता है.

क्या है ये जिनीवा कन्वेंशंस?

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पहले जिनीवा कन्वेंशन की तस्वीर.

अगर आसान भाषा में कहें तो जिनीवा कन्वेंशंस अंतरराष्ट्रीय स्तर की बैठकों की वो सीरिज है, जिसमें लड़ाई में पकड़े गए सैनिकों, दुश्मन के कब्जे में आए लड़ाई के दौरान घायल हुए सैनिकों के साथ ही लड़ाई के दौरान पकड़े गए आम नागरिकों के हितों की बात होती रही है. इसकी पहली बैठक हुई थी 1864 में. और इसकी शुरूआत करने वाले शख्स का नाम था हेनरी ड्यूनंट. हेनरी जिनीवा का एक बिजनेस मैन था, जो जून, 1859 में इटली गया था. वो वक्त था सोल्फेरिनो में लड़ाई चल रही थी. जिस दिन हेनरी वहां पहुंचा था, उस एक दिन में करीब 40,000 लोग या तो मारे गए थे या गंभीर रूप से घायल हो गए थे.

हेनरी ड्यूनंट  ने लड़ाई में घायल सिपाहियों से मुलाकात की. दुर्गति देखी तो वहां से लौट आए और किताब लिखी अ मेमोरी ऑफ सोल्फेरिनो. सुझाव दिया कि दुनिया के देशों को एक साथ आना चाहिए और लड़ाई के बाद पैदा हुए हालात से निपटने के बारे में सोचना चाहिए.

1863 में साथ आए थे 16 देश

1949 की जेनेवा कन्वेंशन की तस्वीर. (फोटो: BBC)
1949 की जिनीवा कन्वेंशन की तस्वीर. (फोटो: BBC)

इसके बाद एक कमिटी बनी और अक्टूबर, 1863 में 16 देश एक साथ आए. 12 देशों ने एक संधि पर सिग्नेचर किए और इसे नाम दिया गया पहला जिनीवा कन्वेंशन, जो लागू हुआ 1864 में. 10 फिर आया साल 1906. स्विटजरलैंड सरकार ने 35 देशों की एक मीटिंग बुलाई. मीटिंग इस बारे में थी कि अगर दो देशों के बीच लड़ाई होती है तो इस लड़ाई के दौरान घायल हुए सैनिक या फिर दुश्मन देश के हाथ पकड़े गए सैनिकों के साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए. जब पहला विश्वयुद्ध खत्म हो गया, तो ये साफ हो गया कि जिनीवा कन्वेंशंस का पालन नहीं हो रहा है. इसके बाद 1929 में कुछ और क्लॉज जोड़े गए. इस बैठक में जर्मनी भी शामिल था. लेकिन जर्मनी को इसका फायदा नहीं हुआ और नतीजे में दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हो गया. जब दूसरा विश्वयुद्ध खत्म हुआ तो नए सिरे से इस कन्वेंशंस पर बात शुरू हुई. और आखिरी ड्राफ्ट तैयार हुआ 1949 में. इस बैठक में दुनिया के कुल 194 देशों ने मिलकर युद्धबंदियों के साथ के कुछ नए नियम तय किए. इसे ही जिनीवा कन्वेंशंस या जिनीवा संधि के नाम से जाना जाता है.

क्या है इस संधि की खास बातें-

1. संधि का मकसद उन सैनिकों या आम आदमी की रक्षा करना है, जिसे युद्ध के दौरान दुश्मन देश ने पकड़ लिया है.

2. किसी भी देश का सैनिक हो, चाहे स्त्री हो या पुरुष, उसके पकड़े जाने के तुरंत बाद ये संधि लागू होती है.

3. इस संधि के अनुच्छेद 3 के तहत युद्ध के दौरान घायल होने वाले युद्धबंदी का इलाज ठीक तरीके से होना चाहिए. युद्धबंदियों के साथ हिंसा नहीं होनी चाहिए. 

4. उनके साथ किसी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए. उन्हें ठीक तरीके से खाना-पीना दिया जाएगा. खाना-पीना न देकर युद्धबंदी को परेशान नहीं किया जाएगा.

1949 के जेनेवा कन्वेंशन में कुल 194 देश शामिल हुए थे.
1949 के जिनीवा कन्वेंशंस में कुल 194 देश शामिल हुए थे.

5. दुश्मन साइड के जहाजों के लोगों को भी बचाया जाएगा. अस्पताल के जहाजों को लड़ाई के काम में इस्तेमाल नहीं होगा. 

6. पकड़े गए लोगों को डराया-धमकाया नहीं जा सकता है. उन्हें अपमानित नहीं किया जा सकता है.

7. पकड़े गए लोगों को कानूनी सुविधा देनी होगी.

8.संधि के मुताबिक अगर कोर्ट में मुकदमा चलाना है, तो वकील देना होगा.

9. युद्ध के बाद युद्धबंदियों को वापस लौटाना होगा और जितनी जल्दी संभव हो, लौटाना होगा.

10. पूछताछ के दौरान युद्धबंदियों से सिर्फ उनके नाम, सैन्य पद, नंबर और यूनिट के बारे में पूछा जा सकता है. धर्म, जाति और जन्म के बारे में पूछताछ करने की मनाही है.

जिनीवा कन्वेंशंस युद्धबंदियों के साथ मानवता की बात करता है.

11. किसी दूसरे देश के सैनिक या आम आदमी की डेड बॉडी के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं की जाएगी.

12. पकड़े गए युद्धबंदी को उनके घरवालों से मिलने दिया जाएगा.

13. युद्धबंदियों को ढाल की तरह इस्तेमाल नहीं किया जाएगा.

14. पकड़े गए धर्मगुरुओं को तत्काल छोड़ना होगा.

15. रेड क्रॉस सोसाइटी कभी भी इन युद्धबंदियों से मिल सकेगी.

जेनेवा कन्वेंशन इंटरनेशनल रेड क्रॉस सोसायटी को ये पावर देता है कि वो कभी भी युद्धबंदियों का हाल ले सकती है.
जिनीवा कन्वेंशंस इंटरनेशनल रेड क्रॉस सोसायटी को ये पावर देता है कि वो कभी भी युद्धबंदियों का हाल ले सकती है.

16. 1977 में जोड़े गए प्रोटोकॉल 1 के तहत इस संधि के तहत युद्धबंदियों को मिलने वाली सुविधाएं आम लोगों, मिलिट्री के लिए काम करने वाले लोगों और पत्रकारों पर भी लागू होंगी. 2005 में सिम्बल ऑफ रेड क्रॉस के साथ रेड क्रिस्टल को यूनिवर्सल सहायता के प्रतीक के रूप में अपनाया गया.

17. जो लोग युद्ध में शामिल नहीं रहे हैं, अगर वो भी लड़ाई के दौरान पकड़े जाते हैं तो उनके साथ ऊपर लिखी सारी शर्तें लागू रहेंगी.

18. अगर युद्धबंदी कोई बच्चा है, तो उसका ठीक से खयाल रखा जाएगा. उसकी पढ़ाई-लिखाई जारी रहेगी.

19. बच्चों से काम करवाना, आतंक में उन्हें शामिल करना, उनसे मज़दूरी करवाना या सामूहिक रूप से उन्हें दंडित करने को ये संधि प्रतिबंधित करती है.

20. युद्ध बंदी के दौरान अगर किसी बंदी की मौत हो जाती है, तो पूरे सम्मान के साथ उसका अंतिम संस्कार किया जाएगा. बॉडी के साथ किसी तरह के बायोलॉजिकल एक्सपेरिमेंट नहीं किए जाएंगे.

ये एक संधि है, जिसको पूरी दुनिया के देश मानते हैं. पाकिस्तान भी इससे अलग नहीं है, लिहाजा उसे भारत के फाइटर पायलट को रिहा करना ही होगा. और हम इतने भरोसे से ये बात इसलिए भी कह रहे हैं, क्योंकि पाकिस्तान ऐसा पहली बार नहीं कर रहा है. 1999 में जब कारगिल युद्ध हुआ था, तो उस वक्त भी एक पायलट नचिकेता पाकिस्तान के हाथों बंधक बन गए थे. सात दिनों तक दुश्मन की कैद में रहे और फिर 4 जून 1999 को पाकिस्तान ने उन्हें इंटरनेशनल कमेटी ऑफ द रेड क्रॉस को सौंप दिया. रेड क्रॉस के जरिए वो वाघा बॉर्डर से भारत आ गए. इसलिए उम्मीद है कि पाक के कब्जे में फंसे अभिनंदन भी जल्दी ही भारत लौट आएंगे.


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