Submit your post

Follow Us

मोदी सरकार के दो साल के कार्यकाल की इन पांच बड़ी घटनाओं का जनता पर क्या असर हुआ?

30 मई 2021 को मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल के 2 साल पूरे कर लिए. कोरोना संकट को देखते हुए सरकार की तरफ से इस मौके पर कोई भव्य आयोजन तो नहीं हुआ, लेकिन सरकार के मंत्रियों और बीजेपी पदाधिकारियों ने अपने कामों को सोशल मीडिया पर जरूर गिनाया. ऐसे में नजर डालते हैं उन 5 बड़े मौकों पर जो मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के मूल्यांकन के तौर पर जरूर गिने जाएंगे.

कौन से हैं वो 5 मौके?

अगर मोदी सरकार 2.0 की बात की जाए तो अब तक इन 5 बड़ी घटनाओं के आइने में दो साल के कार्यकाल को समेटा जा सकता है.

# कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35ए को हटाना
# पड़ोसी देशों से आए गैर-मुस्लिमों को नागरिकता देने वाला CAA कानून लाना
# चीन के साथ सीमा विवाद
# किसानों के लिए तीन कृषि कानून
# कोरोना संकट और मैनेजमेंट

अनुच्छेद 370 हटाना एतिहासिक कदम या भूल?

5 अगस्त, 2019. गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में जम्मू-कश्मीर से जुड़े दो संकल्प और दो बिल पेश किए. आर्टिकल 370 से जुड़े राष्ट्रपति के आदेश का जिक्र किया. शाह ने बताया कि राष्ट्रपति के आदेश से जम्मू-कश्मीर से जुड़े अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया गया है. इसके साथ ही विशेष राज्य का दर्जा छिन गया. साथ ही अनुच्छेद 35-A असंवैधानिक हो गया. अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर का अपना झंडा और संविधान होता था. अनुच्छेद 35A जम्मू-कश्मीर के बाशिंदो को राज्य में खास अधिकार देता था.

इतना ही नहीं मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर राज्य का पुनर्गठन भी किया. जम्मू-कश्मीर को राज्य की जगह दो केंद्रशासित प्रदेशों में बांट दिया गया. जम्मू-कश्मीर और लद्दाख. जम्मू-कश्मीर में विधानसभा होगी, जबकि लद्दाख में कोई विधानसभा नहीं होगी. इसी के साथ बीजेपी ने अपना वह चुनावी वादा पूरा किया, जो जनसंघ के जमाने से उसकी प्राथमिकता रहा है.

Amit Shah
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह. (तस्वीर: PTI)

पक्ष में तर्क

इस फैसले के पक्ष में कांग्रेस नेता दीपेंद्र हुड्डा ने ट्वीट कर कहा था,

‘मेरी व्यक्तिगत राय रही है कि 21वीं सदी में अनुच्छेद 370 का औचित्य नहीं है और इसको हटना चाहिए. ऐसा सिर्फ देश की अखंडता के लिए ही नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर जो हमारे देश का अभिन्न अंग है, के हित में भी है. अब सरकार की यह जिम्मेदारी है कि इसका क्रियान्वयन शांति और विश्वास के वातावरण में हो.’

एक और कांग्रेस नेता मिलिंद देवड़ा ने कहा था,

‘यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अनुच्छेद 370 को उदार बनाम रूढ़िवादी बहस में तब्दील कर दिया गया. पार्टियों को अपनी विचारधारा से अलग हटकर इस पर बहस करनी चाहिए कि भारत की संप्रभुता और संघवाद, जम्मू-कश्मीर में शांति, कश्मीरी युवाओं को नौकरी और कश्मीरी पंडितों के न्याय के लिए बेहतर क्या है.’

विपक्ष में तर्क

कांग्रेस के नेता और जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम गुलाम नबी आजाद ने इसे एक गलती बताते हुए कहा था,

‘शर्मनाक है कि आपने जम्मू-कश्मीर को एक उप-राज्यपाल बनाकर एक गैर-इकाई में बदल दिया है, ताकि आप यहां (दिल्ली) से ही वहां चपरासी और क्लर्क की भी नियुक्ति कर सकें. आप तो नया शहर देश बना रहे हैं. हिंदुस्तान के नक्शे से कश्मीर को हटा दिया है, लेकिन आज आपने कश्मीरियों का भरोसा तोड़ दिया है. कश्मीरियों ने कभी किसी को पराया नहीं माना, हिन्दुस्तान के साथ रहना स्वीकार किया था, हिन्दू लोगों के साथ रहना तय किया था, जिन्होंने जवाहरलाल नेहरू पर भरोसा किया था, सरदार पटेल पर भरोसा किया था.  

 

 

कानून के जानकार नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, हैदराबाद के वीसी फैजान मुस्तफा ने भी इसे एतिहासिक गलती बताया था.

जम्मू और कश्मीर का आर्टिकल 370 खुद कहता है कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है. अब हमने उसे ही खत्म कर दिया. लोगों को यह समझना चाहिए कि आर्टिकल 370 केंद्र सरकार को खास ताकत देता है न कि कश्मीर को. राजनेताओं और अपना हित चाहने वालों ने यह भ्रम लोगों के दिमाग में भर दिया है कि इससे कश्मीर को कुछ खास फायदा मिल रहा था. दुनिया में बहुत से ऐसे देश हैं जहां पर देशों ने अपने राज्यों या शामिल किए गए हिस्सों को खास अधिकार देकर अपने से जोड़ रखा है. भारत की केंद्र सरकार को अनुच्छेद 370 के तहत सिर्फ राष्ट्रपति के ऑर्डर से ही बहुत कुछ बदलाव करने के अधिकार थे. पहले की सरकारों ने ऐसा किया भी है. यह इतनी बड़ी एक्सरसाइज़ करने की कोई जरूरत ही नहीं थी. मेरे हिसाब से अनुच्छेद 370 खत्म करके केंद्र सरकार ने अपने ही अधिकार सीमित कर लिए हैं. इस कानून की तगड़ी परीक्षा कोर्ट में होगी.

CAA पर जमकर बवाल

10 जनवरी, 2020, देश में CAA कानून लागू हो गया. हालांकि सरकार ने अभी इसके नियम-कायदे नहीं तय किए हैं. इस कानून से पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और आस-पास के देशों में धार्मिक उत्पीड़न के कारण आए हिंदू, ईसाई, सिख, पारसी, जैन और बौद्ध धर्म के लोगों को भारत की नागरिकता दी जाएगी. वो लोग, जिन्होंने 31 दिसंबर, 2014 की निर्णायक तारीख तक भारत में प्रवेश कर लिया था. वे सभी भारत की नागरिकता के लिए आवेदन कर सकेंगे. इस एक्ट में इस्लाम धर्म मानने वालों को शामिल नहीं किया गया है. इस कानून में किए गए बदलाव को लेकर देशभर में कई महीनों तक विरोध प्रदर्शन हुए. कई जगहों पर हिंसक प्रदर्शन देखने को मिले, लेकिन सरकार पीछे नहीं हटी. बता दें कि मौजूदा क़ानून के मुताबिक़ किसी भी व्यक्ति को भारतीय नागरिकता लेने के लिए कम से कम 11 साल भारत में रहना अनिवार्य है. लेकिन इस कानून में पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों के लिए यह समयावधि 11 से घटाकर 6 साल कर दी गई है.

पक्ष में तर्क

देश के गृहमंत्री अमित शाह ने नेटवर्क18 को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि भारत में पहले भी सात बार बड़े स्तर पर नागरिकता दी गई है. उन्होंने इस मामले में भारत के विभाजन यानी 1947 के समय, बांग्लादेश निर्माण (1971), युगांडा से वापस भारत आए लोगों, श्रीलंका में गृह-युद्ध की वजह से वहां से भारत आए तमिलों को नागरिकता दिए जाने का हवाला दिया और कहा कि उस वक़्त इसका किसी ने विरोध नहीं किया और जब बीजेपी यही करना चाहती है तो उसका विरोध क्यों? गृह मंत्री का कहना था कि चूंकि इस्लामी मुल्कों में मुसलमानों पर ज़ुल्म नहीं हो सकता इसलिए बिल में मुसलमानों का नाम नहीं लिया गया है.

विपक्ष में तर्क

दिल्ली हाईकोर्ट के रिटायर्ड चीफ़ जस्टिस जस्टिस ए पी शाह ने द हिंदू अखबार में लिखे लेख में इसे एक ग्रैंड डिजाइन का हिस्सा करार दिया था. उन्होंने लिखा था,

आप पूछेंगे कि मैं किस ‘ग्रैंड डिज़ाइन’ की बात कर रहा हूं. बिल्कुल साफ़ दिख रहा है कि सीएए के ज़रिए उन लोगों को अलग-थलग किया जा रहा है जिनकी पहचान बतौर मुसलमान है. अगर आप माने लें कि यह क़ानून सिर्फ़ बाहर से आने वालों के लिए है, जैसा कि यह सरकार कह रही है, तो भी यह क़ानून ऑटोमैटिक तरीके से मुसलमान आप्रवासियों को दूसरे दर्जे पर रख रहा है. भले ही वे भी उन्हीं कारणों से चलकर भारत आए हैं जिन कारणों से कोई हिंदू या ईसाई आया है. ये कारण आर्थिक और राजनैतिक प्रताड़ना भी हो सकते हैं. अगर आप इस क़ानून की अपनी समझ को थोड़ा व्यापक करके देखें, जैसा कि सरकार खुद ही सीएए और एनआरसी को एक दूसरे से जोड़ रही है, इस क़ानून में सभी मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाए जाने की आशंका छिपी है. इस तरह यह क़ानून और यह नीति संविधान के बुनियादी सिद्धांतों को न सिर्फ़ चोट पहुंचाती है बल्कि उसे नष्ट कर सकती है. संविधान के बुनियादी सिद्धांत हैं- धर्मनिरपेक्षता, बंधुत्व और मानवता.

चीन के साथ सीमा विवादः क्या खोया-क्या पाया

भारत और चीन के बीच 3,440 किमी की सीमा का एक बड़ा हिस्सा ठीक तरह से तय नहीं है. नदियां, झीलें और पहाड़ियों का मतलब है कि बॉर्डर शिफ़्ट हो सकता है और इस वजह से कई जगहों पर दोनों देशों के सैनिक आमने-सामने आ जाते हैं. इसके चलते कई बार आपस में टकराव के हालात भी पैदा होते हैं. मई 2020 में भी नाकुला में एक मामूली झड़प हुई थी. यह जगह 5,000 मीटर से भी ज़्यादा की ऊंचाई पर है. इसके एक महीने बाद 15 जून 2020 को गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई. ऐसा बरसों बाद हुआ था कि भारत और चीन के सैनिक आमने-सामने की लड़ाई में लड़े हों. खूनी झड़प में भारत के 20 जवान शहीद हो गए थे. चीन ने आधाकारिक रूप से इस पर कुछ नहीं कहा है कि उसके कितने सैनिक हताहत हुए थे.

शुरुआत में चीन ने अपने किसी सैनिक के मारे जाने की बात से इंकार किया लेकिन बाद में माना कि उसके 5 सैनिक मारे गए हैं. रूस की सामाचार एजेंसी तास ने तो 45 चीनी सैनिकों के मारे जाने की खबर दी.

सीमा पर भले ही अभी शांति है लेकिन भारतीय सेना पूरी तरह चौकन्नी है. फिलहाल ईस्टर्न लद्दाख के दूसरी और अपने ट्रेनिंग एरिया में चीन की सेनाएं युद्धाभ्यास कर रही हैं. 29 मई 2021 को भारतीय वायुसेना के चीफ आरकेएस भदौरिया ने लेह का दौरा किया और तैयारियों की जानकारी ली है.

सरकार का तर्क

भारत सरकार की तरफ से चीन सीमा विवाद पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में बयान दिया

पैंगोंग झील के इलाक़े में चीन के साथ डिसएंगेजमेंट का समझौता हुआ है, उसके अनुसार दोनों पक्ष अपनी आगे की सैन्य तैनाती को चरणबद्ध, समन्वय और प्रामाणिक तरीक़े से हटाएंगे. मैं इस सदन को आश्वस्त करना चाहता हूं कि इस बातचीत में हमने कुछ भी खोया नहीं है. मैं सदन को यह जानकारी भी देना चाहता हूं कि अभी भी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तैनाती और पेट्रोलिंग से जुड़े कुछ विषय बचे हैं. आगे की वार्ताओं में इन पर हमारा ख़ासतौर पर ध्यान रहेगा.

17 जून 2020. पीएम मोदी ने सर्वदलीय बैठक की. सर्वदलीय बैठक के बाद पीएम मोदी ने सभी राजनीतिक दलों को आश्वस्त किया कि हमारी सेनाएं, सीमाओं की रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सर्वदलीय बैठक के बाद कहा,

न तो वहां कोई हमारी सीमा में घुसा हुआ है और न ही हमारी कोई पोस्ट किसी दूसरे के कब्जे में है. लद्दाख में हमारे 20 जांबाज शहीद हुए, लेकिन जिन्होंने भारत माता की तरफ आंख उठाकर देखा था, उन्हें वो सबक सिखाकर गए. फिलहाल भारत की सेना चीन की सेना से बातचीत कर रही है और पूरी तरह से सतर्क है.

Rajnath Singh In Ls
राजनाथ सिंह ने सीमा पर भारत-चीन तनाव को लेकर जानकारी दी. फोटो- पीटीआई

विपक्ष में तर्क

सरकार लगातार आश्वासन देती रही है कि चीन ने भारत का कोई भी हिस्सा कब्जा नहीं किया है, लेकिन एक्सपर्ट्स भारत के दावों पर सवाल खड़े कर रहे हैं. कई एक्सपर्ट्स का कहना है कि सरकार भले दावा कर रही है, लेकिन चीन की सीमा पर सब कुछ पहले जैसा नहीं है. मिसाल के तौर पर द हिन्दू अख़बार के चीन संवाददाता और भारत-चीन संबंधों पर क़िताब लिख चुके अनंत कृष्णन ने ट्विटर पर लिखा,

“दोनों देशों ने समझौता किया है. भारत फ़िंगर 8 तक गश्त कर सकेगा, जबकि चीन ने फ़िंगर 4 तक अपना वर्चस्व क़ायम रखा है. यानी दोनों देशों ने अपने क़दम पीछे खींच लिये हैं. पैंगोंग झील के दक्षिण को लेकर भारत सरकार ने जो क़दम उठाया, वो महत्वपूर्ण दिखाई दे रहा है, क्योंकि उसी की वजह से शायद दोनों पक्षों में इस समझौते पर सहमति बन पाई.”

चीन के साथ सीमा विवाद पर भारतीय रणनीति पर मुखर होकर बोलने वाले पूर्व कर्नल और रक्षा मामलों के विशेषज्ञ अजय शुक्ला ने भी यही सवाल उठाया था. उन्होंने कहा था कि

“पेंगोंग सेक्टर में सेनाओं के पीछे हटने को लेकर झूठ बोले जा रहे हैं. कुछ हथियारबंद गाड़ियों और टैंकों को पीछे लिया गया है. सैनिकों की पोज़िशन में कोई बदलाव नहीं हुआ है. चीन को फ़िंगर 4 तक पेट्रोलिंग करने का अधिकार दे दिया गया है. इसका मतलब है कि एलएसी फ़िंगर 8 से फ़िंगर 4 पर शिफ़्ट हो गयी है.”

 

 

किसानों के लिए कृषि कानून, वो ही वापस लेने की मांग पर अड़े

साल 2020, जून का महीना. मोदी सरकार कृषि सुधार से जुड़े तीन अध्यादेश लेकर आई. सितंबर में कोरोना संकट के बीच मोदी सरकार ने संसद में तीन बिल पेश किए. तीनों बिल पास होकर कानून बन गए. लेकिन इन्हें सरकार के अंदर ही सभी का समर्थन नहीं मिला. NDA में शामिल शिरोमणि अकाली दल की नेता और केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने विरोध में कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया. हरियाणा और पंजाब के किसानों सहित देश भर के कई राज्यों के किसान कानूनों के विरोध में दिल्ली के बॉर्डर तक आ गए. उनका डर है कि सरकार MSP यानी मिनिमम सपोर्ट प्राइस खत्म करने के लिए यह सब कर रही है. सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इन कानूनों को लागू करने पर रोक लगा रखी है.

इन तीन कानूनों को लेकर किसान पिछले छह महीने से आंदोलन कर रहे हैंः

# कृषि उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सरलीकरण) विधेयक 2020 – किसान अपनी उपज बेचने के लिए अपनी लोकल APMC मंडी तक सीमित नहीं रहेंगे बल्कि देशभर में कही भी फसल बेच सकेंगे.

# कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 – किसान के साथ कोई भी कंपनी करार करके कॉन्ट्रैक्ट पर खेती करवा सकेगी.

# आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक 2020 – अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल, प्‍याज़ आलू आदि को स्टोर करने की सीमा पर पाबंदी हटी. कोई भी, कितना भंडारण कर सकेगा.

Farmers Protest
किसान आंदोलन की एक तस्वीर. (फोटो- PTI)

पक्ष में तर्क

2015 में पद्मश्री से सम्मानित कृषि विशेषज्ञ अशोक गुलाटी ने तीनों कृषि कानूनों का समर्थन किया. उन्होंने कृषि क्षेत्र के लिए इसे 1991 जैसा फैसला बताया. आपको बता दें कि 1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से दुनियाभर के लिए खोल दिया गया था. इसके बाद तेज आर्थिक वृद्धि देखी गई. नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने भी इसे किसानों के हित में बताया. उन्होंने कहा कि

हम इसके बारे में लगातार पक्ष में या विरोध में तर्क दे सकते हैं. लेकिन गरीब किसान आखिर कब तक इंतजार करेगा. राज्यों के स्तर पर 70 साल में बहुत कम बदलाव हुए. बिहार जैसे राज्यों में पहले ही बदलाव हो चुका है. किसान कानूनों पर 2-3 साल पहले से चर्चा हो रही है. कानून में ऐसा कुछ भी नया नहीं हो रहा है कि डरने की जरूरत है. MSP से लेकर APMC सब कुछ बरकरार रखने का प्रावधान है. जो पहले से है, वह तो बना ही रहेगा, साथ में कुछ एडिशनल सुविधाएं दी गई हैं.

विपक्ष में तर्क

नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी किसान कानूनों को लेकर आशंका व्यक्त की. उन्होंने इसे जल्दबाजी में लिया फैसला भी बताया. इंडिया टुडे के कार्यक्रम में उन्होंने कहा था,

किसान को लगता है कि उन्हें नुकसान होगा. इसके पीछे टाइम की बात है. यह बहुत डरावना समय है. यही वजह है कि मैं फैसला लेने की टाइमिंग पर सवाल उठा रहा हूं. सब बहुत डरे हुए हैं. मैं नहीं कहता कि हर किसान इस कानून विरोध में है. लेकिन मुझे लगता है कि इस कानून में सेफगार्ड की कमी है. किसानों को लगता है कि बड़े बिजनेस ग्रुप आसपास के लोकल आढ़तियों को खत्म कर देंगे. पूरे मार्केट पर कब्जा कर लेंगे. इस डर को कानून में दूर नहीं किया गया है. यही कारण है कि किसान कहीं न कहीं डरा हुआ है. उनमें ये डर भी है कि कुछ कॉर्पोरेट इतने ताकतवर हो जाएंगे कि सरकार उनको रोक नहीं पाएगी.

कोरोना संकटः पहली लहर में उबरे, दूसरी में डूबे

साल 2020 के मार्च महीने से कोरोना ने भारत में दस्तक देना शुरू कर दिया था. जब देश में सिर्फ 500 केसेज रोज आ रहे थे तब पीएम मोदी ने लॉकडाउन की घोषणा कर दी. तारीख थी 25 मार्च 2020. भारत में कोरोना से मृत्यु दर आश्चर्यजनक रूप से काफी कम 1.5 प्रतिशत ही थी. हालांकि लॉकडाउन की वजह से दिहाड़ी मजदूरों और कामगारों ने अपने घरों की तरफ पैदल ही चलना शुरू कर दिया. सरकार के अचानक लॉकडाइन के फैसले की आलोचना भी हुई.  लॉकडाउन की वजह से अर्थव्यवस्था को बहुत नुकसान हुआ. सरकार ने 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा की. जैसे तैसे देश इस महामारी से उबरने की कोशिश कर रहा था लेकिन दूसर लहर ने दस्तक दे दी. मार्च 2021 आते-आते भारत में कोरोना संक्रमण के केसेज बढ़ने का ट्रेंड दिखाई देने लगा. अप्रैल में केसेज़ की बाढ़ आ गई. एक तरफ कोरोना के केसेज बढ़ रहे थे तो दूसरी तरह 5 राज्यों में चुनाव और हरिद्वार में बड़े धार्मिक आयोजन कुंभ की शुरुआत भी हो गई. इसने एक बड़े स्प्रेडर का काम किया. साल 2020 में हजारों केस प्रतिदिन से बढ़ कर आंकड़ा लाखों केसेज रोज़ तक पहुंचा. भारत की पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था कोरोना की दूसरी लहर के सामने चरमरा गई. लोगों को न हॉस्पिटल बेड मिले न ऑक्सीजन सिलेंडर. इसे लेकर मोदी सरकार के डिजास्टर मैनेजमेंट की काफी आलोचना भी हुई.

Corona Crisis Medicines Drugs Ivermectine Ct Scan Viral Video
कोरोना से होने वाली मौतों का आंकड़ा मई 2021 में तेजी से बढ़ा. फोटो – पीटीआई (प्रतीकात्मक तौर पर)

 

पहली लहर में तारीफ

कोरोना की पहली लहर के बाद मोदी सरकार के कोरोना मैनेजमेंट की तारीफ देखने को मिली. माइक्रोसॉफ्ट कंपनी के संस्थापक बिल गेट्स ने पीएम मोदी के कोरोना मैनेजमेंट के तरीके की तारीफ करते हुए अप्रैल 2020 में एक चिट्ठी लिखी. इसमें उन्होंने आरोग्य सेतु ऐप का भी जिक्र की. उन्होंने लिखा

‘मैं कोरोना महामारी के संक्रमण को रोकने के लिए आपके नेतृत्व के साथ-साथ आपकी और आपकी सरकार के सक्रिय कदमों की सराहना करता हूं. देश में हॉटस्पॉट चिह्नित करने और लोगों को आइसोलेशन में रखने के लिए लॉकडाउन, क्वारंटीन के साथ-साथ इस महामारी से लड़ने के लिए जरूरी हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाना सराहनीय है. आपने रिसर्च और डेवलेपमेंट के साथ-साथ डिजिटल इनोवेशन पर भी काफी जोर दिया है.’

दूसरी लहर में आलोचना

दूसरी लहर में भारत सरकार की सबसे बड़ी आलोचना दुनिया के जानेमाने मेडिकल जर्नल दि लैंसेट ने की. जर्नल ने अपने संपादकीय में लिखा कि पीएम मोदी को पिछले साल कोरोना महामारी के सफल नियंत्रण के बाद दूसरी लहर से निपटने में हुई अपनी गलतियों की जिम्मेदारी लेनी चाहिए. इसमें आगे कहा गया,

मार्च में जब कोविड-19 की दूसरी वेव में केस बढ़ने शुरू हुए तो इससे पहले ही स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ऐलान कर चुके थे कि भारत में कोविड-19 अब ख़त्म ही होने वाला है. एक्सपर्ट की तरफ से बार-बार दूसरी वेव आने की चेतावनी दी जा रही थी, लेकिन सरकार की तरफ से ऐसे संकेत आ रहे थे मानो कोरोना वायरस पर जीत हासिल कर ली गई हो. ये ग़लत आकलन किया गया कि भारत हर्ड इम्युनिटी के मुहाने पर पहुंच रहा है. जबकि ICMR के ही सेरो सर्वे में ये बात निकली कि सिर्फ 21 फीसदी लोगों में ही एंटीबॉडीज़ बनी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार महामारी को नियंत्रण करने की बजाय सोशल मीडिया से अपनी आलोचना हटवाने में ज़्यादा रुचि रख रही थी. अस्पतालों में मरीजों को ऑक्सीजन नहीं मिल रही है, वे दम तोड़ रहे हैं. मेडिकल टीम भी थक गई है, वे संक्रमित हो रहे हैं. सोशल मीडिया पर व्यवस्था से परेशान लोग मेडिकल ऑक्सीजन, बेड, वेंटिलेटर और जरूरी दवाइयों की मांग कर रहे हैं.

एक बात तो तय है कि मोदी सरकार की दूसरी पारी शुरुआत से ही कोरोना के भंवर में फंस गई. पिछली पारी में जहां सरकार के आर्थिक सुधारों पर बड़े फैसलों लिए वहीं इस बार सरकार ने अपने मेनिफेस्टो में कही बातों को पूरा करने पर फोकस रखा. फिलहाल कोरोना की दूसरी लहर से जूझ रही भारत सरकार के सामने अगली सबसे बड़ी चुनौती देश की 130 करोड़ जनता को वैक्सीनेट करने की है.


वीडियो – नेता नगरी: मोदी सरकार ने दूसरे कार्यकाल के दो साल में ऐसा क्या किया, जो नहीं करना चाहिए था?

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

कौन हो तुम

माधुरी से डायरेक्ट बोलो 'हम आपके हैं फैन'

माधुरी से डायरेक्ट बोलो 'हम आपके हैं फैन'

आज जानते हो किसका हैप्पी बड्डे है? माधुरी दीक्षित का. अपन आपका फैन मीटर जांचेंगे. ये क्विज खेलो.

जिन मीम्स को सोशल मीडिया पर शेयर कर चौड़े होते हैं, उनका इतिहास तो जान लीजिए

जिन मीम्स को सोशल मीडिया पर शेयर कर चौड़े होते हैं, उनका इतिहास तो जान लीजिए

कौन सा था वो पहला मीम जो इत्तेफाक से दुनिया में आया?

पार्टियों को चुनाव निशान के आधार पर पहचानते हैं आप?

पार्टियों को चुनाव निशान के आधार पर पहचानते हैं आप?

चुनावी माहौल में क्विज़ खेलिए और बताइए कितना स्कोर हुआ.

लगातार दो फिफ्टी मारने वाले कोहली ने अब कहां झंडे गाड़ दिए?

लगातार दो फिफ्टी मारने वाले कोहली ने अब कहां झंडे गाड़ दिए?

राहुल के साथ यहां भी गड़बड़ हो गई.

रोहित शेट्टी के ऊपर ऐसी कड़क Quiz और कहां पाओगे?

रोहित शेट्टी के ऊपर ऐसी कड़क Quiz और कहां पाओगे?

14 मार्च को बड्डे होता है. ये तो सब जानते हैं, और क्या जानते हो आके बताओ. अरे आओ तो.

आमिर पर अगर ये क्विज़ नहीं खेला तो दोगुना लगान देना पड़ेगा

आमिर पर अगर ये क्विज़ नहीं खेला तो दोगुना लगान देना पड़ेगा

म्हारा आमिर, सारुक-सलमान से कम है के?

परफेक्शनिस्ट आमिर पर क्विज़ खेलो और साबित करो कितने जाबड़ फैन हो

परफेक्शनिस्ट आमिर पर क्विज़ खेलो और साबित करो कितने जाबड़ फैन हो

आज आमिर खान का हैप्पी बड्डे है. कित्ता मालूम है उनके बारे में?

अनुपम खेर को ट्विटर और वॉट्सऐप वीडियो के अलावा भी ध्यान से देखा है तो ये क्विज खेलो

अनुपम खेर को ट्विटर और वॉट्सऐप वीडियो के अलावा भी ध्यान से देखा है तो ये क्विज खेलो

चेक करो अनुपम खेर पर अपना ज्ञान.

कहानी राहुल वैद्य की, जो हमेशा जीत से एक बिलांग पीछे रह जाते हैं

कहानी राहुल वैद्य की, जो हमेशा जीत से एक बिलांग पीछे रह जाते हैं

'इंडियन आइडल' से लेकर 'बिग बॉस' तक सोलह साल हो गए लेकिन किस्मत नहीं बदली.

गायों के बारे में कितना जानते हैं आप? ज़रा देखें तो...

गायों के बारे में कितना जानते हैं आप? ज़रा देखें तो...

कितने नंबर आए बताते जाइएगा.