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शिवराज और फडनवीस जो इलाज ढूंढ रहे हैं, वो केरल में 2007 से मौजूद है

मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में चल रहे किसान आंदोलन ने थमने से पहले वो डर पैदा किया कि इन दोनों राज्यों के साथ-साथ छत्तीसगढ़ ने भी किसानों के लिए ‘राहत’ का ऐलान कर दिया. लेकिन इन तीनों सरकारों के पैकेज किसानों को फौरी राहत से ज़्यादा कुछ दे पाएंगे, कहना मुश्किल है. सरकारें कर्ज-माफी और मुआवजे से आगे सोच ही नहीं पातीं.

कहा जाता है कि कोई स्थायी मॉडल है ही नहीं, जिससे किसानों को फायदा पहुंचे. ऐसा कहने वालों को एक हफ्ते की छुट्टी लेकर केरल जाना चाहिए. यहां पूरे 19 साल से एक स्कीम चल रही है, जिसने घड़ी की सुइयां उल्टी घुमा दी हैं. पूरे देश में किसान ज़मीन से टूटकर भूमिहीन मज़दूर बन रहे हैं. वहीं केरल में लाखों भूमिहीन मज़दूर किसान बनकर इज़्ज़त की ज़िंदगी जी रहे हैं. और ये सभी किसान औरतें हैं. हम बात कर रहे हैं केरल की कुदुंबश्री स्कीम की.

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केरल में CPM सरकार ने 1996 में ‘पीपल्स – प्लानिंग’ की शुरुआत की. इसके तहत लोगों को अपने आस-पास विकास के लिए खुद ही प्लानिंग करने का मौका दिया गया. इसी के तहत 1998 में शुरू हुआ कुदुंबश्री. इसमें ग्रामीण औरतों के छोटे-छोटे ग्रुप बनाए गए. ये ग्रुप ऐसा काम करता है, जिसका फायदा उनके इलाके को ही मिलता है. जैसे बिजली की लाइन से दूर बसे गांवों में सोलर लैंप. लेकिन कुदुंबश्री के तहत सबसे बढ़िया काम हो रहा है संघकृषि स्कीम में. 2007 में शुरू हुई संघकृषि ही वो स्कीम है, जो पूरे देश के लिए नज़ीर बन सकती है.

कैसे काम करता है संघकृषि

संघकृषि स्कीम के तहत 15-20 भूमिहीन औरतें मिलकर ज़मीन लीज़ पर लेती हैं. लीज़ लेने में मदद करती है सरकार. इस ज़मीन पर ऐसी कोई फसल उगाई जाती है, जो घर में काम आ जाए, जैसे धान. घर की ज़रूरतें पूरी करने के बाद बची हुई फसल बाज़ार में बेची जाती है. ये अपने-आप में नायाब है. केरल में ज़्यादातर नकदी फसलें उगाई जाती हैं. खाने-पीने का सामान बाहर से आयात किया जाता है. इसलिए कीमतें ज़्यादा थीं, तो संघकृषि से गरीब परिवारों की थाली में खाना आया.

रासायनिक खाद और कीटनाशक का इस्तेमाल कम से कम किया जाता है. इससे खेती की लागत कम रहती है और उपज भी ऑर्गैनिक रहती है.

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औरतों की किसान के रूप में पहचान

संघकृषि का असली असर उससे होने वाले आर्थिक फायदे में नहीं है. केरल में औरतों की स्थिति दूसरी जगहों से बेहतर है, लेकिन एक मामले में वो भी बाकी देश जैसा ही है. यहां भी किसान शब्द का मतलब औरत से कभी नहीं लगाया जाता, जबकि पूरे देश में (और केरल में भी) खेती का 60 फीसदी काम औरतें करती हैं. संघकृषि ने औरतों को किसानों के तौर पर सरकार और समाज के सामने स्थापित किया. गांव के स्तर पर ये जेंडर जस्टिस का बेहतरीन उदाहरण है.

आत्म सम्मानः घर में भी, बाहर भी

संघकृषि से होने वाली आय ने इन औरतों को इज़्ज़त के साथ-साथ आत्मसम्मान भी दिया है. केरल के देहाती इलाकों में बैंकों में सबसे ज़्यादा पैसा कुदुंबश्री से जुड़ी औरतें जमा कराती हैं. बैंक के अधिकारी उनसे तमीज़ से पेश आते हैं. अगर आपने कभी सरकारी बैंक में किसी मजदूर को काउंटर पर डांट खाते देखा होगा, तो आपको इस बात का मर्म समझ आएगा. कुंदुंबश्री से जुड़ी औरतें अब चुनाव भी लड़ने लगी हैं.

संघकृषि की औरतें खुद को स्व-सहायता समूह कहने से मना करती हैं. उनका कहना है कि स्व-सहायता बड़ा खुदगर्ज़ कॉन्सेप्ट है. संघकृषि का मंत्र पूरी कम्युनिटी की मदद करना है.

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अच्छी कमाई भी होती है

स्व-सहायता समूहों को लेकर जिस तरह की धारणा बनी हुई है, लोग अनुमान लगा लेते हैं कि संघकृषि वाली औरतें किसी तरह गुज़ारा करती होंगी. लेकिन संघकृषि और कुदुंबश्री के बाकी गुट, जो गांवों में साप्ताहिक बाज़ार लगाते हैं, उसी से होने वाली आय करोड़ों में है. और साप्ताहिक बाज़ार कुदुंबश्री को होने वाली आय के कई स्रोतों में से सिर्फ एक है.

इन दस सालों में संघकृषि से दो लाख औरतें जुड़ चुकी हैं, जिन्होंने 47,000 ग्रुप बना लिए हैं. ये लगभग हज़ार एकड़ ज़मीन पर खेती कर रही हैं. कुछ जगह औरतों ने दशकों से बंजर पड़ी ज़मीन को जोतना शुरू कर दिया है. औरतों की कामयाबी देखकर अब मर्दों के लिए कुदुंबश्री और संघकृषि बनाने की बात हो रही है. भारत के नामी कृषि पत्रकार पी. साइनाथ भी संघकृषि को एक बढ़िया पहल मानते हैं.

यहां इस बात का ज़िक्र ज़रूरी है कि संघकृषि का मॉडल एक खास तरह की खेती को सूट करता है. इसे अंग्रेज़ी में सब्सिटेंस लेवल फार्मिंग कहा जाता है. माने अपनी ज़रूरत भर के लिए खेती. हम नहीं जानते कि इससे बड़े पैमाने पर नकदी फसलों की पैदावार हो सकती है या नहीं और यदि हां, तो क्या उस मामले में भी किसानों को इतना ही फायदा होगा. लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि संघकृषि के कामयाब मॉडल से सीख लेने में कोई समस्या नहीं है.


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