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अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ेंगी तो आपकी जमा-पूंजी और जेब पर क्या होगा असर ?

एक कहावत है, ‘जब अमेरिका में छींक आती है, तो दुनिया को सर्दी लग जाती है’. अमेरिका से एक ऐसी ही छींक पिछले कुछ दिनों से आ रही है. बात जब भी वहां ब्याज दरें बढ़ाने की होती है, भारत समेत दुनिया भर के पूंजी बाजारों में हलचल मच जाती है. शेयर तो गिरते ही हैं, सोने से लेकर तेल तक के भाव सुगबुगाने लगते हैं. आइए आपको आसान भाषा में समझाते हैं कि आखिर अमेरिकी ब्याज दरों में ऐसा क्या है कि आधा या चौथाई फीसदी बढ़ने से भी आपके निवेश और बचत से लेकर रोजमर्रा के खर्चा-पानी पर काफी असर होगा.

सबसे पहले तो दुनिया की अर्थव्यवस्था में अमेरिकी दबदबे को समझिए. करीब 20 लाख करोड़ डॉलर सालाना उत्पादन वाला अमेरिका सबसे बड़ी इकॉनमी है. चीन, जापान, फ्रांस से कहीं आगे. हमसे तो छह गुना बड़ी. दुनिया का 85 फीसदी व्यापार अमेरिकी डॉलर में होता है. करीब 40 फीसदी लोन डॉलर में लिए और दिए जाते हैं. हमारे रिजर्व बैंक यानी RBI जैसे दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों के गुल्लक यानी विदेशी मुद्रा भंडार में 60 फीसदी से ज्यादा डॉलर ही होता है. ज्यादातर देश आपसी व्यापार में भी अपनी मुद्रा के बजाय डॉलर ही लेते और देते हैं. कुल मिलाकर ये कि अमेरिकी डॉलर का इस्तेमाल अमेरिका से बाहर ज्यादा होता है.

अब इतनी बड़ी इकॉनमी और डॉलर के दबदबे वाले देश में जहां ब्याज दर लगभग जीरो हो, वहां मामूली बढ़ोतरी भी बहुत मायने रखती है. बैंक, बॉन्ड और दूसरे सभी फिक्स्ड इनकम जरियों में पैसा लगाने वालों को ज्यादा रिटर्न मिलने लगता है. लोग ज्यादा निवेश करते हैं. डॉलर की डिमांड बढ़ती है, तो वह दूसरी करंसी के मुकाबले महंगा होने लगता है.

शेयर मार्केट क्यों गिर रहे?

डॉलर महंगा होगा तो इधर जो विदेशी निवेशक ( FII, FPI) भारत जैसे देशों में पैसा लगाए बैठे हैं, डॉलर को भुनाने में लग जाएंगे. उन्हें दो फायदे होते हैं. एक तो रुपये के मुकाबले मजबूत डॉलर के चलते उनकी कमाई एक्सचेंज में ही बढ़ जाएगी. और दूसरा ये कि इस पैसे को ज्यादा रिटर्न दे रहे डॉलर वाले फिक्स्ड इनकम जरियों में इनवेस्ट कर सकेंगे. यानी वे पैसा वहां लगाना चाहते हैं, जहां रिटर्न डॉलर में मिले.
नतीजतन वे शेयरों की बिकवाली शुरू करते हैं और स्टॉक मार्केट में गिरावट आने लगती है. भारतीय शेयर बाजार में भी इन विदेशी संस्थागत निवेशकों का ज्यादा पैसा लगा होता है. ये अक्सर दो-चार फीसदी मुनाफा काटकर भी निकल लेते हैं. कई बार तो आगे नुकसान का अंदेशा होते ही बिकवाली शुरू कर देते हैं. अंदाजा इस बात से लगाइए कि बीते एक साल में जब डॉलर रुपये के मुकाबले भारी रहा, विदेशी संस्थागत निवेशकों ने करीब 50,000 करोड़ रुपये शेयर मार्केट से निकाल लिए. इसमें भी करीब 40 फीसदी बिकवाली तो पिछले कुछ हफ्तों में हुई, जब अमेरिकी रिजर्व बैंक (Federal Reserve) ने कहा कि वह अपनी बॉन्ड खरीद योजना बंद करेगा. यानी मार्केट में करंसी उड़ेलने से हाथ खींचेगा. बीते गुरुवार 6 जनवरी को भी भारत सहित दुनिया भर के बाजार अचानक गिर गए. पता चला कि अमेरिकी ब्याज में बढ़ोतरी तय समय से पहले भी शुरू हो सकती है. फिलहाल अमेरिकी फेडरल रेट 0.1 फीसदी है. इसे तीन चरणों में बढ़ाकर साल के आखिर तक 0.6 से 0.9 फीसदी किए जाने का अनुमान है.

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स्टॉक मार्केट में गिरावट की सांकेतिक तस्वीर (साभार : आजतक)

आपके बैंक खाते पर असर ?

अमेरिका में ब्याज बढ़ने और डॉलर महंगा होने से विदेशी फंड या निवेशक केवल शेयर मार्केट से ही पैसा नहीं निकालते. वे यहां के बॉन्ड और दूसरी सिक्योरिटीज में भी बिकवाली करते हैं. विदेश से आने वाले पैसे की लागत बढ़ जाती है यानी देश में निवेश घटने लगता है. ऐसे में हमारा आरबीआई भी कमर कसता है और यहां भी ब्याज दरें बढ़ने लगती हैं. आरबीआई के पॉलिसी रेट बढ़ते ही बैंक में रखे आपके पैसे यानी फिक्स्ड डिपॉजिट या सेविंग अकाउंट पर ज्यादा ब्याज मिलने लगता है. लेकिन दूसरी ओर आपने जो होमलोन, ऑटोलोन या पर्सनल लोन ले रखा है, उस पर ज्यादा ब्याज चुकाना होता है. इसके उलट यानी अमेरिका में ब्याज घटने से आपकी फिक्स्ड इनकम घटने लगती है, लेकिन कर्ज पर ब्याज कम देना पड़ता है. पिछले दो साल में आपने कम ब्याज दरों के जो फायदे या नुकसान उठाए हैं, उसके पीछे अमेरिकी असर भी है. अमेरिकी सरकार और फेडरल रिजर्व ने आर्थिक सुस्ती और कोविड की चुनौतियों से निपटने के लिए ब्याज दरें लगभग जीरो फीसदी कर रखीं थीं. लेकिन अब उन्हें बढ़ाने की तैयारी चल रही है.

आपकी जेब पर असर ?

डॉलर महंगा होते ही जो चीजें बाहर से आयात होती हैं, वो महंगी होने लगती हैं. भारत अपनी जरूरत का 82 फीसदी कच्चा तेल यानी पेट्रोलियम इम्पोर्ट करता है. इससे पेट्रोल और डीजल का महंगा होना तय है. खाने का बहुत सारा तेल भी बाहर से ही आता है. उन्हें मंगाने में जो अतिरिक्त रुपया झोंकना पड़ेगा उससे सरकार की माली हालत भी पतली होगी. इसे इकॉनमी की भाषा में कहते हैं कि चालू खाते का घाटा यानी करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ेगा.

बाहर से आने वाली चीजों का मतलब केवल अमेरिका से आयात नहीं है. चीन से जो सस्ता माल आता है, उस पर भी डॉलर की गर्माहट असर दिखाती है. ऐसा इसलिए कि भारत-चीन व्यापार भी ज्यादातर डॉलर में ही होता है. तो अमेरिकी डॉलर आपकी दिवाली की लड़ियों से लेकर मोबाइल फोन तक महंगा कर सकता है.

भारत सबसे ज्यादा सोना आयात करने वाले देशों में है. देश की कुल डिमांड का करीब 85 फीसदी इम्पोर्ट होता है. जब डॉलर महंगा होगा, तो सोने की कीमत पर भी इसका असर दिखना तय है. यानी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में सोना महंगा न भी हो तो भी देश में उसकी कीमत बढ़ने लगती है. ऐसा इसलिए क्योंकि उसे मंगाने में अतिरिक्त रुपया खर्च करना पड़ता है.

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महंगे डॉलर से पेट्रोलिमय और गोल्ड का इम्पोर्ट बिल बढ़ जाता है. सांकेतिक तस्वीर (साभार:आजतक)

महंगे डॉलर के फायदे

महंगे डॉलर का हर तरफ नुकसान ही नहीं, कई फायदे भी होते हैं. देश से बाहर जाकर बिकने वाले सामान और सेवाओं पर मुनाफा बढ़ जाता है. यानी भारत से जितना कुछ निर्यात होगा, उस पर अतिरिक्त कमाई होगी. देश की आईटी और फार्मा कंपनियां सबसे ज्यादा एक्सपोर्ट करती हैं. इस हिस्से का उनका रेवेन्यू डॉलर में आता है. यही वजह है कि कई बार जब आर्थिक तंगी में दूसरी कंपनियां सैलरी काट रही होती हैं, कई आईटी कंपनियां वेतन बढ़ा रही होती हैं. इसी तरह देश के लाखों मजदूर और कर्मचारी विदेश में काम करते हैं. उनकी सैलरी तो उतनी ही रहती है, लेकिन डॉलर के महंगा होने से घर आने वाला पैसा बढ़ जाता है.


वीडियो-अपनी ही करंसी क्यों गिराती हैं सरकारें ? कमजोर रुपये के फायदे भी जानें

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