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UP के इस IAS ने कोरोना काल में दो ऐसे काम किए, जिन्होंने हजारों की जिंदगी बदल दी

24 मार्च. देश में लॉकडाउन लग गया. यूपी के एंबुलेंस ड्राइवर हड़ताल पर चले गए थे. वजह, उनकी सैलरी तीन महीने से रिलीज नहीं हुई थी. मगर वजह सिर्फ इतनी नहीं थी. वजह वही थी, जिसके डर से लोग घर से बाहर निकलने से डर रहे थे. घर में मेड ने आने से इनकार कर दिया था. दफ्तर बंद हो गए थे. वर्क फ्रॉम होम शुरू हो गया. माने कोविड 19 का डर. पर बाहर न निकलने की छूट इन एंबुलेंस ड्राइवरों, डॉक्टरों, पुलिस वालों को नहीं मिली थी. इन्हें कोरोना वॉलंटियर कहा गया. खूब तारीफ हुई. मगर डर तो सबको लगता है. एंबुलेंस ड्राइवरों को लग रहा था कि वो कोरोना पेशेंट्स से सबसे पहले  रूबरू होंगे. ऐसा ही हाल पुलिस वालों का. हर उस आदमी का हाल ऐसा था. जिसकी जिम्मेदारी इससे लड़ने की थी. वजह- उनके पास जरूरी मास्क, पीपीई किट जैसी चीजें नहीं थीं. ये देश के हर प्रदेश के हर जिले की कहानी थी.

ट्रूनेट मशीनों से कोरोना का जांच आसनी से और कम समय में हो सकेगा. (प्रतीकात्मक फोटो)
कोरोना के शुरुआती चरण में पीपीई किट व अन्य जरूरी सामान न होने पर कोरोना वॉलंटियर्स में काफी डर भी था.

यही कहानी उत्तर प्रदेश के लखीमपुर जिले की भी थी. यहां भी पूरा प्रशासनिक अमला आशंका में था. ऐसे में इनका डर कम करने का जिम्मा उठाया यहां के सीडीओ आईएएस अरविंद सिंह ने. उन्होंने एक ऑपरेशन चलाया. ‘मिशन कवच’ नाम का.

क्या है मिशन कवच?

जैसे युद्ध में आर्मी के लिए अम्युनेशंस यानी गोला-बारूद सबसे जरूरी चीज है. बिना उसके लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती. वैसे ही कोरोना के खिलाफ लड़ रहे लोगों के लिए पीपीई किट थी. इसी पीपीई किट या कह लें गोला-बारूद की पहली खेप अरविंद ने इस मिशन के जरिए मुहैया करवाईं. किया कैसे? तो जवाब खुद हमें अरविंद ने दिया. अरविंद बताते हैं कि पहले तो उन्होंने मार्केट से ये चीजें खरीदने को सोची. मगर वहां न सिर्फ ये सामान महंगा था, बल्कि उसकी क्वॉलिटी भी उतनी अच्छी नहीं थी. उनके मन में आइडिया आया कि क्यों न इसे खुद ही तैयार करवाया जाए. तो वो लग गए.

मगर ये सब इतना आसान नहीं था. अरविंद ने पीपीई किट में लगने वाले सामान और डिजाइन की जानकारी जुटानी शुरू की. इंटरनेट पर. डॉक्टरों से सलाह ली. डिजाइन तैयार की. मगर उस वक्त जितना मुश्किल पीपीई किट मिलना था, उतना ही मुश्किल इसका सामान मिलना था. सबसे बड़ी दिक्कत ‘लेमिनेटेड पॉली प्रॉपलीन’ मिलना था. वो भी लखीमपुर खीरी जैसे छोटे जिले में. खैर कानपुर, लखनऊ जैसे बड़े शहरों से ‘लेमिनेटेड पॉली प्रॉपलीन’ का इंतजाम हुआ. इसके बाद अरविंद ने ‘नेशनल रूरल लाइवीहुड मिशन’ (एनआरएलएम) से जुड़ी स्वयं सहायता समूह की पांच महिलाओं को चुना. उनको सबसे पहले पीपीई किट, मास्क आदि बनाने की ट्रेनिंग दिलवाई और फिर काम शुरू हो गया.

पहले तैयार हुई किटों पर विशेषज्ञों द्वारा बताए गए बदलाव करवा दिए गए. अंत में जो किट तैयार हुई, उसकी सब जगह तारीफ होने लगी. अब एक बात बताएं, ये काम खुद में अजूबा था. वो इसलिए क्योंकि अरविंद ने ये पीपीई किट उन महिलाओं से बनवाई थीं, जो अचार बनाने का काम करती थीं. स्किल इंडिया का असली मॉडल खड़ा कर दिखाया था.

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अचार बनाने वाली महिलाओं ने बना दी पीपीई किट.

तैयार हुई पीपीई किट में गॉगल्स, हेड गीयर, फेस शील्ड, शरीर को ढकने वाला कवर आल, शूकवर, सर्जिकल ग्लव्स, मास्क शामिल थे. इसकी कीमत 490 रुपए प्रति किट आई, जो कि देश में उपलब्ध अन्य किट की तुलना में काफी कम थी. इसमें 125 रुपए बनाने वाली महिला को मेहनताने के रूप में मिला. अरविंद कहते हैं कि इन किटों के बन जाने के बाद प्रशासनिक अमले में कॉन्फिडेंस आया. वैसे ही जैसे आर्मी को अपने पास पर्याप्त गोला-बारूद देखकर होता है.

आर्मी से ऑर्डर मिला

9 अप्रैल को अरविंद के पास एक लेटर आया. इंडियन आर्मी की मध्य कमान मुख्यालय की तरफ से. उन्होंने इन पीपीई किट्स के ऑर्डर के लिए सैंपल मांगा था. सैंपल भेजा गया. आर्मी के डॉक्टरों को ये पसंद आया. आर्मी ने तुरंत 2000 किट्स का ऑर्डर दे दिया. अरविंद ने इस ऑर्डर को पूरा करने के लिए इन पांच महिलाओं से 20 और महिलाओं को ट्रेनिंग दिलवाई. और 25 महिलाएं जोर-शोर ये काम करने लगीं. 10 दिन के अंदर ये डिलिवरी कर दी.

इंडियन आर्मी, एसएसबी और यूपी के तमाम जिलों के प्रशासनिक अमलों ने ये पीपीई किट लीं. अप्रैल खत्म होने तक ये ऑपरेशन चला. फिर इसे खत्म करने का कारण बताते हुए अरविंद कहते हैं कि तब तक ये आसानी से मिलने लगी थी, इसलिए इसे रोका गया. पहले ये आसानी से मिल नहीं रही थी और इसकी काफी जरूरत थी, इसलिए इसे शुरू किया. इस पूरी कवायद में अरविंद का मैनेजमेंट वाला दिमाग काम कर रहा था. आप कहेंगे कैसा मैनेजमेंट. हम कहेंगे आईआईएम वाला मैनेजमेंट. इसे समझने के लिए हमें अरविंद की पिछली जिंदगी में चलना पड़ेगा.

IIT से IIM और फिर UPSC

शुरू से शुरू करते हैं. अरविंद का जन्म हुआ बाबा गोरखनाथ के शहर गोरखपुर में. सीएम सिटी. अब आप कोई तार न जोड़ने लगिएगा, क्योंकि यहां सिर्फ जन्म हुआ. कर्म करने, माने स्कूलिंग करने पहुंचे वो इलाहाबाद. क्लास 12 तक आते-आते समझ आया कि फिजिक्स, केमिस्ट्री समझ आ रही है. तो करनी चाहिए इंजीनियरिंग. और इसके लिए सबके इज्जतदार जगह है आईआईटी. सो सबसे पहले फोड़ा आईआईटी. IIT बीएचयू से अरविंद ने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की. टॉपर्स में रहे. पहली जॉब लगी सैमसंग रिसर्च में. साउथ कोरिया गए रिसर्च करने. मगर वहां मन नहीं लगा.

अरविंद इसके बाद भारत लौटे और पढ़ने की प्लानिंग की. पढ़ाई मैनेजमेंट की. उसके लिए सबसे तगड़ा संस्थान कौन सा है. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट. शॉर्ट में आईआईएम. तो ये भी किला ढहाया. पहुंचे आईआईएम लखनऊ. फाइनेंस एंड स्ट्रैटजी में एमबीए किया. यहां भी टॉप मारा. फिर पकड़ी जॉब. हॉन्ग-कॉन्ग में शंघाई बैंक में काम किया. यहां पहुंच कर फिर वही दिक्कत. घर प्रेम. माता-पिता के अकेले पुत्र. विदेश सेटल नहीं होना चाहते थे. ऊपर से एक ही तरह का काम करके अरविंद का मन नहीं लग रहा था. वो काम में वेरायटी चाहते थे, जिसकी तलाश में वो आईआईटी से आईआईएम पहुंचे थे. मगर मन भरा नहीं, तो चुना अगला पड़ाव. यूपीएससी. नौकरी छोड़ लौटे भारत और शुरू कर दी तैयारी. 2015 में यूपीएससी फोड़ा. ऑल इंडिया रैंक आई 10.

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आईएएस अरविंद सिंह पहले आईआईटी और आईआईएम में पढ़ाई कर चुके हैं.

अरविंद बताते हैं कि उनसे आईएएस के इंटरव्यू में भी पूछा गया था कि वो क्यों आईएएस बनना चाहते हैं, तो उन्होंने वहां भी यही कहा था-

मुझे इस नौकरी में वैरायटी ऑफ वर्क करने को मिलेगा.

ये दो कीवर्ड नोट कर लीजिए. पहला मैनेजमेंट जो ऑपरेशन कवच में करके अरविंद अपना लोहा मनवा चुके थे. वो भी तब, जब किसी अधिकारी ने ऐसा नहीं सोचा था. अब आते हैं दूसरे कीवर्ड पर, वेरायटी ऑफ वर्क. अरविंद बताते हैं कि मेरठ में ट्रेनिंग के बाद ज्वाइंट मैजिस्ट्रेट के रूप में उनकी पहली पोस्टिंग बुलंदशहर में हुई. यहीं से उन्होंने ये वेरायटी ऑफ वर्क पर एक्सपेरिमेंट शुरू कर दिया था. वहां काफी कुछ जानने-सीखने को मिला. इसी पोस्टिंग के दौरान उनको देखने को मिला कि तहसील दिवस पर सबसे ज्यादा शिकायत गांव में चक रोड पर अवैध कब्जे की आती थी. छोटे-छोटे काश्तकारों को अपने खेत की पैमाइश कराने के लिए तहसील के चक्कर काटने पड़ रहे थे.

वहां के अनुभव को अरविंद अब लखीमपुर में अपनी पोस्टिंग में इस्तेमाल कर रहे हैं. एक नया ऑपरेशन चलाकर. ऑपरेशन चतुर्भुज. शुरुआत वो ऑपरेशन कवच के पहले ही कर चुके थे. मगर कोरोना में काम धीमा पड़ा और अब वो इसे बड़े अनोखे ढंग से इस्तेमाल कर रहे हैं. गांव की सबसे बेसिक समस्या यानी जमीन के झगड़े को खत्म करने के साथ ही कोरोना काल में लोगों को रोजगार दे रहे हैं. कैसे बताते हैं.

क्या है ये ऑपरेशन चतुर्भुज?

जैसा कि नाम बता रहा है. इस ऑपरेशन की चार भुजाएं हैं. माने चार आयाम.

# पहला- मनरेगा.
# दूसरा- लैंड डिपार्टमेंट.
# तीसरा- पुलिस और लॉ एंड ऑर्डर.
# चौथा- गांव की इकॉनमी, रोजगार.

अरविंद बताते हैं कि ये ऑपरेशन आसान नहीं था, क्योंकि मामला जमीन से जुड़ा था. जमीन माने किसानों, गांव वालों की जान. और गांव में सबसे ज्यादा विवाद भी इसी जमीन को लेकर है. वो बताते हैं कि तहसील दिवस में सबसे ज्यादा शिकायत इसी को लेकर थी कि हमारी किसी ने जमीन कब्जा ली. तो किसी का सड़क पर कब्जा है, तो किसी का गांव के तालाब की जमीन पर कब्जा. सबकी यही डिमांड कि हमारी जमीन की पैमाइश करवा दी जाए.

अरविंद बताते हैं कि गांव में सबसे ज्यादा क्राइम भी इसी जमीन के झगड़े के कारण है. इसीलिए उनके ऑपरेशन का एक आयाम लॉ एंड ऑर्डर था. वजह सही से चकबंदी का न होना. होती भी है, तो जो रास्ते छोड़े जाते हैं, तालाब की जगह छोड़ी जाती है, मैदान की जगह छोड़ी जाती है. अरविंद बताते हैं कि चकबंदी के हिसाब से हर खेत तक एक न एक रोड जरूर जानी चाहिए. मगर ये सिर्फ सीमित रह पाता है कागजों तक. वरना तो विवाद की कोई वजह ही नहीं. मगर ऐसा तो हुआ नहीं, तो आधे गांव वालों का जीवन कोर्ट-कचहरी के चक्कर में बीतता है. तो अरविंद ने इस विवाद को रोकने के लिए चलाया अपना चतुर्भुज.

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अरविंद सिंह ने ऑपरेशन चतुर्भुज के लिए गांव-गांव जाके लोगों से बात की.

सबसे पहले अरविंद ने राजस्व और चकबंदी विभाग से पूरे जिले का सघन सर्वे कराया. लखीमपुर के परसा गांव में इस सर्वे का पायलट अभियान शुरू किया. इस अभियान में पाया गया कि परसा गांव में कुल 50 किलोमीटर लंबे चक मार्ग ओर सेक्टर मार्ग ऐसे हैं, जो दस्तावेजों में तो दर्ज हैं, लेकिन मौके पर नहीं हैं. इन पर अवैध कब्जे थे. अरविंद को समझ आ गया कि बिना गांव वालों को साथ लिए इन्हें हटवाना मुमकिन नहीं है. तो उन्होंने गांव के लोगों से खुद बातचीत की. उन्हें अवैध कब्जे से हो रहे नुकसान के बारे में बताया. कब्जा हटाने के लिए प्रेरित किया. बताया कि इससे उनका क्या-क्या फायदा है. कि उनके खेत तक सड़क पहुंच जाएगी. ट्रैक्टर-ट्रॉली सीधा खेत तक जाएगा. खेत के दाम जो बढ़ेंगे, सो अलग. विवादों का टंटा अलग खत्म होगा.

लोगों को बात समझ आ गई कि बाबूजी हमारे हक की ही बात कर रहे हैं. नतीजा ये हुआ कि लोगों ने खुद ये कब्जा हटाना शुरू कर दिया. इस तरह से इस गांव में करीब 50 किलोमीटर रोड बनाने का काम शुरू हो पाया. मगर कोरोना काल में ये काम रुका. मगर ज्यादा दिन नहीं. जैसे ही सरकार की तरफ से मनरेगा के तहत काम करवाने का आदेश आया, अरविंद फिर इस काम में जुट गए. और अपने एक और आयाम पर काम कर दिया. गांव की इकॉनमी, रोजगार पर.

यूपी में सबसे ज्यादा रोजगार दिया

कोरोना के चलते गांव लौटे प्रवासियों को काम देने का खाका खींचा. वो भी सिर्फ इस एक गांव में नहीं, बल्कि पूरे जिले में. अरविंद बताते हैं कि उनकी टीम ने लखीमपुर जिले में अवैध कब्जे वाले 2,500 किलोमीटर लंबे सेक्टर मार्ग और चकमार्ग को चिह्नित कर लिया था. 21 अप्रैल को जैसे ही मनरेगा के तहत सरकार ने काम करवाने की अनुमति मिली, ऑपरेशन चतुर्भुज चालू हो गया. और इस तरह पहले ही दिन 21 अप्रैल से लखीमपुर यूपी में मनरेगा के तहत में सबसे ज्यादा रोजगार प्रदान करने वाला जिला बन गया. अब ये प्रवासी मजदूर अपने ही इलाके की सड़क, सेक्टर और चक मार्ग बना रहे थे. नरेगा के तहत इन्हें 202 रुपए रोज मजदूरी दी गई.

अरविंद कहते हैं कि बारिश से पहले हम इन्हीं प्रवासियों से जिले में 1000 से ज्यादा तालाब बनवा लेंगे. इन तालाबों के लिए भी अरविंद के पास प्लान है. वो इसके पट्टे मछली पालन करने वाले किसानों के नाम करवाएंगे, ताकि ये मेंटेन भी रहें और ज्यादा लोगों को रोजगार मिल सके.

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तालाब तैयार करने के काम में जुटे प्रवासी मजदूर व अन्य.

काम सिर्फ इन प्रवासियों को नहीं मिला, बल्कि एनआरएलएम की ‘सेल्फ हेल्प ग्रुप’ की महिलाओं को भी दिया गया. इन्हें हर बनने वाले रोड पर सीमेंट का ‘सिटिजन इंफॉर्मेशन बोर्ड’ तैयार करने का जिम्मा मिला. एक बोर्ड को तैयार करने पर महिला को 900 रुपए की आमदनी हुई.

अरविंद बताते हैं कि इन प्रयासों से लखीमपुर में एक लाख 25 हजार लोगों को मनरेगा के तहत रोजगार मिल रहा है, जो कि प्रदेश में सबसे अधिक है. इससे गांवों की लोकल इकॉनमी बढ़ी. उनके काम को सरकार से लेकर आम लोगों द्वारा सराहा जा रहा है. 5 मई को यूपी में एक शासनादेश भी आया, जिसमें अरविंद के काम को सराहा गया. बताया गया कि अकेले लखीमपुर जिला यूपी में 12 फीसदी रोजगार दे रहा है.


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