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क्या संसदीय समितियों में रहते हुए सांसद खुलेआम कंपनियों को रायशुमारी कर सकते हैं ?

सबसे पहले एक किस्सा सुनिए. हमारी यूनिवर्सिटी में मैथ्स के एक टीचर थे. उनका नाम था के.के आजाद. स्वभाव से भी बिल्कुल ‘आजाद’, लेकिन अपने सब्जेक्ट के माहिर. वह मैथ्य के तीन पेपरों में से एक पढ़ाते थे. एक बार फाइनल एग्जाम से कुछ दिन पहले उनके पास क्लास के कुछ स्टूडेंट पहुंचे. उन्हें बताया कि यूनिवर्सिटी के एक टीचर का बेटा चूंकि इस क्लास में है और वह टीचर एक पेपर बना रहे हैं. ऐसे में पता चला है कि उन्होंने अपने बेटे और उनके दोस्तों को कुछ ‘इंपॉर्टेंट सवालों’ पर ‘खास ध्यान’ देने को कहा है. आजाद सर बोले, तुम लोग चिंता मत करो मैं देख लूंगा. एग्जाम के बाद एक पेपर की कॉपियां उनके पास जांचने के लिए आईं. आजाद सर ने हर स्टूडेंट को पूरे मार्क्स दे दिए. चाहें उसने पूरा पेपर हल किया हो या नहीं. जब लोगों ने सवाल उठाए, तो बोले कि जब एक टीचर कुछ बच्चों को ‘इंपॉर्टेंट सवाल’ बता सकता है, तो क्या मैं सब बच्चों को पूरे मार्क्स नहीं दे सकता? खैर इस लफड़े में अपना तो फायदा हो गया था.

असल में यह मामला नहीं उठता अगर ‘कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ (conflict of interest) का ध्यान रखा जाता. जिस टीचर का बेटा क्लास का स्टूडेंट है, उसे कैसे एग्जाम का पेपर बनाने को कहा जा सकता है? इसे हितों का द्वंद कहते हैं. ऐसे ही सवाल ताकतवर पदों पर बैठे लोगों पर उठते रहते हैं. हाल ही में सांसदों के हितों में द्वंद का मामला सामने आया है. क्या है यह मामला और सांसदों के बारे में हितों के टकराव को लेकर नियम कायदे क्या हैं? आइए जानते हैं.

आज हम आपको ये क्यों बता रहे हैं?

भाजपा के सांसद जयंत सिन्हा पर कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट के मामले की आंच आती दिख रही है. इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक पूर्व केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा मोटी फीस की एवज में एक एंटरटेनमेंट कंपनी को अपनी सेवाएं दे सकते हैं. इसके लिए उन्होंने बीफोरयू नेटवर्क (B4U Network) के सीईओ ईशान सक्सेना को चिट्ठी भी लिखी है. सिन्हा ने 12 फरवरी को एनआरआई इन्वेस्टर अरमिंदर सिंह से मुलाकात के बाद सक्सेना को यह पत्र लिखा था. इसके मुताबिक सिन्हा ने सक्सेना की कंपनी टाइगर मीडिया के लिए अपनी सेवा देने की बात कही है. उन्होंने सक्सेना से कहा है कि वह कंपनी के लिए सही टर्म पर वित्तीय सहायता जुटाने में भी मददगार हो सकते हैं. सिन्हा ने 1 मार्च से अपनी सेवा देने की पेशकश कंपनी को की है. पत्र में सिन्हा ने अपनी सेवाओं की कीमत और बिल करने के तरीके के बारे में भी लिखा है.

आपको बता दें कि सिन्हा ने मैकिंसे एंड कंपनी के साथ 12 साल काम किया है. उन्होंने हार्वर्ड बिजनेस स्कूल, एमएस से डिस्टिंक्शन के साथ एमबीए किया है. पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय से ऊर्जा प्रबंधन और नीति में, और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली से डिस्टिंक्शन के साथ प्रौद्योगिकी स्नातक की डिग्री हासिल की है. उन्हें अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगम, वाशिंगटन डीसी के अंतर्राष्ट्रीय सलाहकार बोर्ड में सेवा करने के लिए आमंत्रित किया गया था.

बीजेपी सांसद जयंत सिन्हा.
बीजेपी सांसद जयंत सिन्हा पर कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट का मामला बनने की बात कही जा रही है.

आपको लगेगा कि इतना काबिल आदमी अपने हुनर की वजह से अगर प्राइवेट रायशुमारी कर रहा है, तो इसमें दिक्कत क्या है? कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी जैसे कई ऐसे वकील सांसद भी हैं, जो वकालत करते रहते हैं. जयंत सिन्हा की रायशुमारी करने से कौन सा पहाड़ टूट रहा है? दिक्कत की वजह बड़ी है. मौजूदा समय में जयंत सिन्हा वित्त से जुड़ी संसदीय समिति के प्रमुख हैं. ऐसी संसदीय समितियों में ही देश में कंपनियों को लेकर नियम-कायदे और टैक्स आदि पर राय-मशविरा होता है. ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि एक प्राइवेट कंपनी को राय देते वक्त सांसद जयंत सिन्हा संसदीय समिति में बैठने के दौरान मिली जानकारी का इस्तेमाल करेंगे या नहीं?

हालांकि जयंत सिन्हा को इसमें कोई बुराई नजर नहीं आती. उनका कहना है,

मैनेजमेंट कंसलटेंट के तौर पर मैं अक्सर अपनी सेवा देता रहा हूं. अभी मैं सांसद हूं, इसलिए किसी विवाद से बचने के लिए भारत के बाहर के मामलों में सिर्फ सलाहकार के तौर पर काम करता हूं. वित्तीय फर्म और लेनदेन के मामलों में मैं हाथ नहीं डालता. मेरा सारा प्रोफेशनल काम और टैक्स रेग्युलेटरी अथॉरिटी की नजर में हैं. जैसा कि हर प्रोफेशन में होता है, वैसे ही मेरे लिए भी हर क्लाइंट का मामला कॉन्फिडेंशियल है. मैं अरमिंदर सिंह को बीते 25 साल से जानता हूं. उनके साथ B4U मीडिया को लेकर कुछ बात हुई थीं. लेकिन अभी तक कुछ फाइनल नहीं हुआ है.

ऐसे मामलों में सांसद के लिए नियम-कायदे क्या हैं?

जैसे देश संविधान के हिसाब से चलता है, वैसे ही संसद भी किताबों के हिसाब से चलती है. संसद के दोनों हाउस यानी लोकसभा और राज्यसभा को चलाने के लिए नियमावली बनाई गई हैं. दोनों हाउस के सदस्य इस नियमावली का पालन करने के लिए बाध्य हैं.

राज्यसभा के लिए नियम

राज्यसभा के लिए एथिक्स कमेटी की पहली रिपोर्ट 15 दिसंबर 1999 को स्वीकार की गई. इसके साथ ही एक नियमावली रूप लेने लगी. चौथी रिपोर्ट को 20 अप्रैल 2005 में स्वीकार किया गया. इसके तहत सांसदों के लिए 14 पॉइंट की एक नियमावली बनाई गई. इसमें ‘कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ वाले एंगल का भी ध्यान रखा गया है

# अगर किसी सांसद को लगता है कि उसके व्यक्तिगत हित और पद को लेकर कोई द्वंद है, तो उसे इस तरह हल करना चाहिए जिससे कि पद और ऑफिस हित व्यक्तिगत हित से ऊपर रहे.

# सांसदों को ध्यान रखना चाहिए कि उनके परिवार और देश के हित के बीच द्वंद न पैदा हो. अगर ऐसा कभी होता है, तो उसे इस तरह से सुलझा लिया जाए कि देश का हित सर्वोपरि रहे.

# नियमावली का रूल 293 कहता है कि राज्यसभा के सभी सदस्यों के हितों का एक रजिस्टर बनाया जाए. इस रजिस्टर में मेंबर के सभी हितों के बारे में ब्योरा हो और इसे कोई भी देशवासी RTI एक्ट के जरिए देख सके. इन मदों के तहत पर्सनल इंटरेस्ट बताए जाएं.

# अगर किसी कंपनी में पैसे लेकर डायरेक्टर हैं.
# पैसा लेकर किसी भी तरह की सेवाएं दे रहे हैं.
# किसी कंपनी में बड़े शेयर होल्डर हैं.
# किसी को पैसे लेकर रायशुमारी कर रहे हैं.
# किसी संस्था के साथ व्यावसायिक तरीके से जुड़े हैं.

राज्यसभा के सदस्यों के लिए कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट को लेकर नियमावली में सीधा प्रावधान है.
राज्यसभा के सदस्यों के लिए कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट को लेकर नियमावली में सीधा प्रावधान है.

लोकसभा के नियम

राज्य सभा से अलग लोकसभा के लिए फिलहाल ऐसी कोई नियमवाली तैयार नहीं हो पाई है. हालांकि दोनों हाउस के लिए नियमावली बनाने के प्रयास एक साथ ही शुरू हुए थे. पहली बार इस तरह की नियमावली बनाने की मांग 16 मई 2000 में उठी और तब से लगातार इस बारे में मांग उठती रही है, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा सका.
5 अगस्त 2015 को रूल्स कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि राज्य सभा अपने मेंबर्स के हितों के टकराव को ध्यान रखते हुए एक रजिस्टर बना रही है. ऐसा ही रजिस्टर लोकसभा मेंबर्स के लिए भी बनाया जाना चाहिए. यह मामला भी फिलहाल ठंडे बस्ते में है.

पिछली लोकसभा में एथिक्स कमेटी के अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा कि किसी को भी लोकसभा सांसद के अनैतिक काम की शिकायत करने की छूट होनी चाहिए. इस बात को ध्यान में रखते हुए तत्कालीन स्पीकर सुमित्रा महाजन ने ऐसा नियम बनाने पर हामी भर दी थी. लेकिन इसमें एक पेंच लगा दिया. उन्होंने इस नियम के तहत शिकायत की आजादी तो हर शख्स को दी है, लेकिन इस शिकायत को तभी सुना जाएगा, जब इसे कोई मेंबर ऑफ पार्लियामेंट या सदन का सदस्य फॉरवर्ड करेगा. यह शिकायत भी एथिक्स कमेटी के पास सुनवाई के लिए तब ही जाएगी, जब इस पर स्पीकर के साइन होंगे.

यह व्यवस्था राज्यसभा की व्यवस्था से पूरी तरह से अलग है. दुनियाभर के लोकतंत्र जहां ज्यादा से ज्यादा पारदर्शी होने की तरफ काम कर रहे हैं, वहां पर आजादी के 70 साल बाद भी हम अपने सांसदों के हितों के टकराव के लिए सख्त नियमों को तरस रहे हैं.


वीडियो – कैसे काम करती हैं संसदीय समितियां, जिनमें विपक्ष के लोग भी होते हैं.

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