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बोरियत मिटाने स्कूल से भागे थे, महीनों तक सुनसान टापू में इस तरह फंसे रहे छह लड़के!

भारत से करीब 12 हज़ार किलोमीटर दूर एक बहुत छोटा-सा देश है. प्रशांत महासागर में बसा है. करीब 170 छोटे-छोटे द्वीपों से मिलकर बना है. नाम है टोंगा. क्षेत्रफल में गोवा का भी एक-चौथाई है. 2016 की काउंटिंग के हिसाब से यहां एक लाख से थोड़े ही ज्यादा लोग रहते हैं. इस वक्त टोंगा के बारे में हॉलीवुड के बड़े-बड़े स्टूडियो वाले बातें कर रहे हैं. क्यों? क्योंकि करीब 50 साल पहले यहां रहने वाले छह टीनेज लड़कों के साथ कुछ ऐसा हुआ था, जिस पर फिल्म बनने जा रही है.

दरअसल, हाल ही में ‘दी गार्जियन’ पर लेखक और इतिहासकार रटगर ब्रैगमैन का एक आर्टिकल पब्लिश हुआ था. इसमें उन्होंने एक सुनसान टापू पर 15 महीनों तक फंसे छह टोंगा के लड़कों की सच्ची कहानी बताई थी. आर्टिकल 9 मई को पब्लिश हुआ था. उसके बाद से ही हॉलीवुड के फिल्म स्टूडियो वालों के बीच इस कहानी के राइट्स खरीदने की भसड़ मच गई. ऑस्कर अवॉर्ड जीतने वाली फिल्म ’12 ईयर्स अ स्लेव’ को प्रोड्यूस करने वाला स्टूडियो न्यू रिजेंसी ने जंग जीत ली.

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1990 में बनी ‘लॉर्ड ऑफ द फ्लाइज़’ फिल्म का एक सीन. (ये फिल्म विलियम गोल्डिंग की किताब पर बनी थी)

50 साल पहले हुआ क्या था?

1951 में एक किताब आई थी- लॉर्ड ऑफ दी फ्लाइज़ (Lord of the Flies). ब्रिटिश उपन्यासकार विलियम गोल्डिंग ने इसे लिखा था. इसमें एक विमान हादसे का शिकार हो जाता है, जिसके बाद उसमें सवार कुछ लड़के एक सुनसान टापू में फंस जाते हैं. फिर किसी तरह वहां दिन काटते हैं. 1963 में इस कहानी पर एक फिल्म भी बनी. 1990 में भी एक फिल्म बनी. विलियम की ये किताब काफी फेमस हुई.

लेकिन वो एक काल्पनिक घटना थी. ब्रैगमैन के आर्टिकल वाली घटना सच है. वो विलियम की किताब की कहानी से मेल खाती है, इसलिए ब्रैगमैन ने टोंगा की इस कहानी को ‘द रियल लॉर्ड ऑफ दी फ्लाइज़’ नाम दिया.

कैसे फंस गए थे लड़के?

टोंगा की राजधानी है नुकु’आलोफा. जून 1965 की बात है. नुकु’आलोफा के एक बोर्डिंग स्कूल में पढ़ने वाले छह बच्चों ने भागने का प्लान बनाया. सबसे बड़ा 16 साल का था, सबसे छोटा 13 का. ये सभी बोर हो चुके थे, स्कूल का खाना भी पसंद नहीं था, इसलिए फिजी जो 805 किलोमीटर दूर था, वहां जाने का फैसला किया. एक मछुआरे से नाव किराए पर ली और एक शाम कुछ ज़रूरी सामान नाव में भरकर समुद्र में उतर गए.

कुछ ही देर बाद उनकी नींद लग गई. जब आंख खुली, तो देखा कि तूफान आ चुका था. उनकी नाव में पानी भी भर गया था. वो समुद्र के बीचों-बीच फंस गए थे. आठ दिन उनकी नाव समुद्र में भटकती रही. उन्हें पता ही नहीं था कि वो कहां थे. आठवें दिन उन्हें एक टापू दिखा. तब जाकर जान में जान आई. सभी लड़के वहां पहुंच गए. टापू का नाम था- अटा (Ata). टोंगा से 160 किलोमीटर की दूरी थी.

अटा सुनसान कैसे हुआ?

साल 1863 तक अटा में करीब 350 लोग रहते थे. कोलोमाइल (Kolomaile) नाम का गांव बसता था. लेकिन एक दिन एक कैप्टन का बड़ा सा जहाज आया और आधे गांव को किडनैप कर गुलामी कराने ले गया. दरअसल, पेरू की सरकार को अपने एक टापू पर काम कराने के लिए मज़दूर चाहिए थे. इसलिए पूरे प्रशांत महासागर में बड़े-बड़े जहाज प्रवासी मज़दूरों की तलाश में फैल गए. लेकिन कुछ ही समय बाद ये जहाज लोगों को किडनैप कर ज़बरन गुलाम बनाने लगे.

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लाल घेरे में देखिए टोंगा देश, भारत से 12 हज़ार किलोमीटर से भी ज्यादा दूर है. (फोटो क्रेडिट- गूगल मैप)

कैप्टन थॉमस जेम्स मेकग्रैथ, जो ऑस्ट्रेलिया में पैदा हुआ था. समुद्र में मछलियां पकड़ने का काम करता था. उसे लगा कि गुलामों का व्यापार करना बहुत फायदेमंद है. इसलिए जून 1863 में उसका जहाज अटा के किनारे पहुंचा. गांव के लोगों को व्यापार करने का लालच दिया और आधे गांव को जहाज में बैठा लिया. फिर दरवाजे और खिड़की बंद कर दीं., क्योंकि तब तक वो लोग अनजाने में कैप्टन के बंदी बन चुके थे. जहाज उन लोगों को लेकर पेरू की तरफ चला गया. इसके बाद टोंगा के राजा अटा के बाकी लोगों को यूआ द्वीप (Eua) लेकर आ गए. ये लोग यहीं पर बस गए. अटा पूरा खाली हो गया.

वापस छह लड़कों की कहानी पर

करीब 100 साल बाद अब छह लड़के भटकते हुए अटा पहुंच गए. लेकिन उन्हें पता नहीं था कि वो कहां है. मजबूरन दिन वहीं काटने थे, इसलिए लड़कों ने काम बांट लिए. खाना बनाना, सुरक्षा का काम करना, गार्डिनिंग करनाज- ये सारे कामों के लिए टाइम-टेबल बनाया. इसे कड़ाई से फॉलो करना था. इन लड़कों के दिन की सुबह और रात गाने और प्रार्थना से होती थी. एक लड़के ने लकड़ियों, नारियल की खोपड़ियों और नाव में मौजूद स्टील के तारों से एक गिटार बनाया.

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इस तस्वीर में अटा में फंसे सभी छह लड़कों की तस्वीर. (क्रेडिट- 1966 में ऑस्ट्रेलिया के ‘चैनल 7’ ने इन लड़कों पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी, उसी के स्क्रीनशॉट)

मछलियां, नारियल खाते थे. कई बार पक्षियों के खून को भी पीना पड़ता था, क्योंकि गर्मियों में पीने का पानी भी नहीं था. कुछ दिन बाद ये लोग टापू के सबसे ऊपर पहुंचे. वहां ज्वालामुखी का एक गड्ढा था. वहां उन्हें केले के पेड़ और मुर्गियां मिल गईं.

कहीं से मदद मिल जाए, इसलिए ये लड़के झाड़ियों में आग लगाते रहते थे. इसी आग की वजह से ये लड़के 15 महीनों के बाद अपने परिवार से मिल सके.

कैसे पता चला इन लड़कों के बारे में?

एक कैप्टन ने इन्हें खोजा. सितंबर 1966 में. नाम था पीटर वॉर्नर. जो अब 83 बरस के हो चुके हैं. 50 साल पहले पीटर, जो कि ऑस्ट्रेलिया के रहने वाले थे, मछली पकड़ने वाले अपनी नाव से टोंगा गए थे. पीटर को समुद्र की यात्रा करना बड़ा पसंद था. इसलिए घर लौटते वक्त उन्होंने तय रास्ते से थोड़ा अलग रास्ता पकड़ लिया. तभी उन्हें अटा द्वीप में कुछ अजीब-सा दिखा. दूरबीन से देखने पर उन्हें हरी चट्टानों पर जले हुए चिथड़े दिखे. फिर उन्हें बिना कपड़ों के एक लड़का दिखा. उसके सिर के बाल कंधों तक आ गए थे. लड़के ने समुद्र में छलांग लगाई और पीटर की नाव तक आ पहुंचा. कहा,

‘मेरा नाम स्टीफन है. हम पूरे छह लोग हैं और 15 महीनों से यहां फंसे हुए हैं.’

पीटर नाव लेकर अटा टापू पहुंचे. उन्होंने अपने टू-वे रेडियो का इस्तेमाल करके नुकु’आलोफा के अधिकारियों को कॉल किया. कहा,

‘मुझे यहां छह बच्चे मिले हैं’

इसके बाद सामने से आवाज़ आई,

‘आपने उन्हें खोज लिया! उन लड़कों को मरा समझ लिया गया था. उनका अंतिम संस्कार भी हो चुका था. ये वही हैं. ये एक चमत्कार है.’

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1966 में ऑस्ट्रेलिया के ‘चैनल 7’ ने इन लड़कों पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी, जिसमें इन सभी छहों लड़कों ने अपने-अपने रोल किए थे. उसी का स्क्रीनशॉट.

लेकिन मुसीबत कम नहीं हुई

फिर पीटर उन बच्चों को लेकर नुकु’आलोफा पहुंचे. जहां पुलिस ने उन्हें अरेस्ट कर लिया और पीटर की नाव भी जब्त कर ली. क्योंकि जिस आदमी की नाव उधार लेकर वो लड़के भागे थे, वो आज भी उन्हें खोज रहा था. उसने उन लड़कों के खिलाफ केस करने का फैसला कर लिया था. खैर, बाद में पीटर ने अपनी पहचान का इस्तेमाल करके इस बात की जानकारी एक मीडिया हाउस को दी और किसी तरह उन बच्चों को छुड़ा लिया.

कुछ दिन बाद टोंगा के राजा ने पीटर को थैंक्यू कहने बुलाया. वो वहां गए. राजा ने उन्हें थैंक्यू कहा. पीटर से बोले कि वो उनके लिए क्या कर सकते हैं. अब पीटर समुद्र की यात्रा तो करते थे, लेकिन मजबूरन उन्हें अपने पिता की कंपनी में भी काम करना पड़ता था. इसलिए उन्होंने राजा से कहा कि वो टोंगा में मछलियों का बिजनेस शुरू करना चाहते हैं. राजा ने परमिशन दे दी. सिडनी से अपना बोरिया-बिस्तर उठाकर पीटर टोंगा में बिजनेस करने चले गए. बाद में उन्होंने उन छह लड़कों को अपनी फिशिंग बोट के क्रू में शामिल कर लिया.

वो सभी लड़के अब 60 बरस के ऊपर के हो चुके हैं. इनमें से एक का नाम मानो है, जो 70 के होने वाले हैं. ब्रैगमैन ने खुद पीटर और मानो से मुलाकात की और उनकी कहानी जानी.


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