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ग्राउंड रिपोर्ट सुरेंद्रनगरः जहां 'चिल्लर करप्शन' देवीपूजकों को जीने नहीं दे रहा

सुरेंद्र नगर जिले को सौराष्ट्र का प्रवेश द्वार कहा जाता है. अहमदाबाद से लगा हुआ जिला. यहां की एक सीट है लिंबडी. यहां से सिटिंग विधायक हैं बीजेपी के किरीतसिंह राणा. वह 2002 और 2007 में बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीते. 2012 में कांग्रेस के सोमाभाई पटेल से हार गए. सोमाभाई पहले बीजेपी और कांग्रेस के टिकट पर सांसद रह चुके हैं. जब वह 2012 में विधायकी लड़े, तब सुरेंद्र नगर के सिटिंग सांसद थे. फिर भी लड़े और करीबी अंतर से जीत भी गए. फिर उन्होंने विधायक वाली सीट छोड़ भी दी. अब ये कांग्रेस आलाकमान ही बता सकता है कि जब उन्हें लोकसभा से मुक्त करना ही नहीं था, तो चुनाव क्यों लड़वाया. उपचुनाव में उनका बेटा राकेश पटेल खड़ा हुआ. इस बार किरीत सिंह ने जीत हासिल की. और अब किरीत सिंह के सामने फिर से सोमाभाई हैं. किरीत सिंह मंत्री भी रहे, मगर ये पहले की बात है.

soma
सोमाभाई पटेल.

ये तो हुआ राजनीतिक संदर्भ. अब आगे की बात. पाटीदार अनामत आंदोलन का जिक्र यहां भी खूब होता है. यहां जो पटेल हैं, उन्हें कोली पटेल कहा जाता है. सोमाभाई उसी बिरादरी से आते हैं. उधर किरीत सिंह उर्फ जीतूबा क्षत्रिय दरबार बिरादरी से आते हैं. इलाके में दोनों बिरादरियों के बीच ही वर्चस्व की लड़ाई रहती है. मगर एक समाज है, जो संख्या बल में खासा मजबूत होने के बाद भी इससे दूर है. ये हैं देवीपूजक समाज के लोग. बहुत गरीब. दिहाड़ी जीवन जीते. इस समाज के कई लोग हमें लिंबड़ी के गुदरी बाजार में मिले.

गुदरी बाज़ार.
सुरेंद्रनगर का गुदरी बाज़ार. ये एक साप्ताहिक बाज़ार है.

यह हर मंगलवार को लिंबड़ी बस स्टैंड के आगे वाली रोड पर लगता है. नाले के किनारे. नाला महज कुछ मीटर तक ढंका है. बाकी खुला है. खासा चौड़ा है. उससे सटी एक दीवार है. उसके पार कभी कॉटन प्रोसेसिंग यूनिट थी. प्राइवेट ओनरशिप वाली. अब बंद पड़ी है. कपास यहां के किसानों की मुख्य उपज है. और उसमें वह लगाता घाटा खा रहे हैं. इस बाबत हमारी बातचीत हुई रामभाई से. रामभाई की यूरिया की दुकान है. उन्होंने कपास का रेट समझाया और बाद में कई लोगों ने इसकी तस्दीक भी की. किसानों को पहले 1100 तक का भाव मिल जाता था. नरेंद्र मोदी जब मुख्यमंत्री थे, तब कहते थे कि 1500 रुपये तक मिलने चाहिए. किससे. सीसीआई से. कॉटन कॉरपरेशन ऑफ इंडिया. भारत सरकार की खरीद की व्यवस्था. मगर अब कितने मिलते हैं. 950-975 के बीच. 850 रुपये कैश मिलते हैं और बाकी खातों में आते हैं.

Video: गुजरात में देवी पूजक समाज की हालत

ये कैश का रेफरेंस महत्वपूर्ण है. क्योंकि नोटबंदी के दौर में इसके चलते किसानों को और किसानों से जुड़ा कारोबार करने वालों को खासी दिक्कत हुई. बातचीत के आखिरी में रामभाई ने एक मार्के की बात कही. जो हम लगातार सुनते रहते हैं और हर बार दुरुस्त लगती है. वह बोले, राजनेता सब एक जैसे होते हैं. बातें बहुत अच्छी करते हैं.

बातें करने के लिए हम गुदरी बाजार गए. वहां मुकेश भाई मिले. पुराने कपड़े बेचते हैं. वह और उनके जैसे दर्जनों लोग. इसीलिए इस साप्ताहिक बाजार को गुदरी बाजार कहते हैं. उन्होंने बताया कि पहचान पत्र के बावजूद कई बार पुलिस वाले गाड़ीं में बैठा ले जाते हैं. चुटणी कार्ड दिखाने पर भी नहीं छोड़ते. चुटणी यहां चुनाव को बोलते हैं. मुकेश भाई बोलते हैं कि फिर पहचान के लोग पहुंचते हैं तब शाम को पुलिस छोड़ती है. राहत बस इतनी है कि इसकी आड़ में पैसा वसूली नहीं होता. इसी बाजार में गीता बेन मिलीं. बताया कि मेरी 18 साल की बेटी है. उसका पैर खराब है. मगर उसको सरकार से कोई मदद नहीं मिली. कैसी मदद चाहिए इस देवीपूजक समाज को. प्रधानमंत्री कल्याण मेला में जो मिलता है वह चाहिए. किसी को लारी, किसी को कोई और मदद.

मुकेश भाई.
दया लाल , जिनको शिकायत है कि मंत्री ने कुछ नहीं करवाया. 

ये पटरी किनारे का बाजार है. दो रुपये की पर्ची कटती है. मगर उसके लिए कभी 10 रुपये लिए जाते हैं, कभी पांच. बड़े-बड़े नंबर्स वाले करप्शन के आदी हो चुके हम लोगों को ये चिल्लर करप्शन लगे. मगर है तो सही.

देवीपूजक समाज के इतर हमें मध्य प्रदेश के आदिवासी इलाकों के कई लोग भी मिले. वह यहां मजदूरी करने आते हैं. उनके बच्चे पढ़ाई लिखाई नहीं कर पाते. पूरे देश में यही हाल है. असंगठित क्षेत्र के मजदूरों पर ध्यान दिए जाने की सख्त जरूरत है.

जरूरत बहुत सारी चीजों की है. थोड़ी है. थोड़े की और है.


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