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जर्मनी ने हिटलर को फॉलो करने वालों के साथ क्या किया?

जर्मनी इन दिनों कोरोना से भी ख़तरनाक एक महामारी से लड़ रहा है. दुनिया की कोई दवा, कोई वैक्सीन इस बीमारी का इलाज नहीं कर सकती. इसके रोगियों ने जर्मन सेना, पुलिस और सिक्यॉरिटी सर्विसेज़ के अंदर बड़े स्तर पर घुसपैठ कर ली है. डर है कि अगर इन मरीज़ों की पहचान करके उन्हें अलग नहीं किया गया, तो वो और भी लोगों को बीमार कर सकते हैं.

इस महामारी का नाम है- नियो नात्ज़ी. यानी, हिटलर की नात्ज़ी विचारधारा के नए अनुयायी. ये नियो-नात्ज़ी इतनी तेज़ी से फैल रहे हैं कि जर्मनी को अपनी सबसे अहम सिक्यॉरिटी फोर्स की एक समूची यूनिट को भंग करना पड़ा. दो दर्ज़न से ज़्यादा पुलिस अधिकारी सस्पेंड कर दिए. और अब, सबसे लेटेस्ट ये है कि जर्मनी ने अपनी सैन्य खुफ़िया एजेंसी के मुखिया को भी निलंबित कर दिया है. ये क्या मामला है, विस्तार से बताते हैं.

Germany
लाल घेरे में जर्मनी (गूगल मैप्स)

मिलिटरी में एक ‘काउंटर इंटेलिजेंस’ विभाग होता है. इसका काम होता है, दूसरे देशों द्वारा की जा रही जासूसी को रोकना. जर्मन सेना में ये जिम्मा जिस एजेंसी के पास है, उसका नाम है MAD. इस एजेंसी की एक और जिम्मेदारी है. देश की सेना और सुरक्षा बलों के भीतर कट्टरपंथ तो नहीं बढ़ रहा, इसे मॉनिटर करने का काम भी MAD का ही है. इस एजेंसी के मुखिया थे क्रिस्टोफ़ ग्रेम. वो 2015 से ही MAD का नेतृत्व कर रहे थे. 24 सितंबर को जर्मन सरकार ने क्रिस्टोफ़ को नौकरी से निकाल दिया. फैसले के मुताबिक, क्रिस्टोफ़ अक्टूबर की शुरुआत में समय से पहले रिटायर कर दिए जाएंगे.

क्रिस्टोफ़ जैसे बड़े अधिकारी की इस तरह एकाएक छुट्टी क्यों की गई?

ये बताने के लिए हमको एक हालिया घटना का ज़िक्र करना होगा. ये घटना है 1 जुलाई, 2020 की. इस रोज़ जर्मनी की रक्षा मंत्री ‘ऐनेग्रेट क्रैम्प कैरेनबावर’ ने एक बड़ा ऐलान किया. ये ऐलान जुड़ा था जर्मनी की सबसे एलीट, सबसे प्रशिक्षित स्पेशल फोर्सेज़ KSK के साथ. KSK का पूरा नाम है- कमांडो स्पेज़ियालक्राफ़्टे. 1996 में बनाए गई इस फोर्स का मुख्य काम है, युद्ध प्रभावित देशों में फंसे जर्मन बंधकों को रिहा करवाना.

Christof Gramm
जर्मनी के सैन्य खुफ़िया एजेंसी के मुखिया थे क्रिस्टोफ़ ग्रेम (गेटी इमेजेज)

इस टॉप सीक्रेट KSK में चार यूनिट्स हैं. इन चारों में से एक यूनिट को जुलाई 2020 में भंग कर दिया गया. बाकी तीन यूनिट्स पर भी कार्रवाई की गई. उनसे कहा गया कि पुराने लोगों को निकालकर नई भर्तियां करें. अपने रिक्रूटमेंट, ट्रेनिंग और लीडरशिप के नियमों में पूरी तरह बदलाव लाएं. इस बदलाव के लिए KSK को अक्टूबर 2020 तक का समय दिया गया. ये फैसला भी लिया गया कि जब तक KSK ये बदलाव नहीं करता, तब तक उसे काम पर नहीं भेजा जाएगा. इस कार्रवाई का कारण बताते हुए रक्षामंत्री ऐनेग्रेट ने कहा-

KSK की एक यूनिट बेहद कट्टरपंथी विचारधारा को प्रश्रय दे रही थी. इसमें इतने ज़्यादा कट्टरपंथी भर गए कि इसे भंग करना पड़ा. KSK का पुनर्गठन करके हम इस एलीट कमांडो फोर्स को रीसेट होने का मौका दे रहे हैं. जर्मनी को KSK की ज़रूरत है, मगर ये अपने मौजूदा स्वरूप में काम नहीं कर सकता है. हम इसकी सफ़ाई में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे.

Annegret Kramp Karrenbauer
जर्मनी की रक्षा मंत्री ऐनेग्रेट क्रैम्प कैरेनबावर (एपी)

नियो-नात्ज़ी विचारधारा

KSK पर लिए गए इस फैसले से करीब छह हफ़्ते पहले मई 2020 में भी एक बड़ी घटना हुई थी. जांचकर्ताओं ने KSK के एक सार्जेंट मेजर रैंक के अधिकारी के घर पर छापा मारा. छापेमारी के दौरान उस अधिकारी के घर में एक सीक्रेट बंकर मिला. इसके भीतर बड़ी मात्रा में हथियार रखे थे. ये हथियार सेना के थे, जिन्हें चुराकर बंकर में छुपाया गया था. उस अधिकारी के पास नात्ज़ी विचारधारा से जुड़ी कई सामग्रियां मिलीं. पता चला कि वो हिटलर को मानता है. नियो-नात्ज़ी विचारधारा को फॉलो करता है. ये भी पता लगा कि वो और उसके कई साथी अफ़सर एक दूसरे को ‘ज़िक हाएल’ तरीके से सैल्यूट करते हैं. ये ‘ज़िक हाएल’ हिटलर द्वारा प्रचलित किया गया नात्ज़ी सैल्यूट है. आपने कई पुरानी तस्वीरों में हिटलर को इसी तरीके से हाथ आगे फैलाकर सैल्यूट करते हुए देखा होगा.

आपने यहां एक टर्म सुना- नियो नात्ज़ी. आगे बढ़ने से पहले आपको इसके बारे में थोड़ा बता देते हैं. इस विचारधारा के प्रमुख तत्व हैं-

हिटलर और उसके क्रूर नात्ज़ी जर्मनी का समर्थन.
यहूदियों से नफ़रत. उन्हें अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझना.
अल्पसंख्यकों और समलैंगिकों से नफ़रत करना.

Adolf Hitler
‘ज़िक हाएल’ हिटलर द्वारा प्रचलित किया गया नात्ज़ी सैल्यूट है. (एएफपी)

छापे से 62 किलो विस्फ़ोटक मिले

KSK के जिस सार्जेंट मेजर के घर छापेमारी हुई, वो अपनी यूनिट में नियो-नात्ज़ी विचारधारा को मानने वाला अकेला अधिकारी नहीं था. उसकी यूनिट के 20 और कमांडोज़ पर ये संदेह था. ये भी पता चला कि KSK के पास से करीब 48,000 राउंड गोलियां और 62 किलो विस्फ़ोटक पदार्थ भी गायब हैं. संदेह है कि ऐम्युनिशन गायब करने के पीछे शायद इन्हीं लोगों का हाथ हो. ये भी ख़बर आई कि जर्मनी के 600 से ज़्यादा सैनिकों पर नियो-नात्ज़ी कनेक्शन को लेकर जांच हो रही है.

ये जांच कर रही थी मिलिटरी काउंटरइंटेलिजेंस सर्विस, यानी MAD. इसी के मुखिया थे क्रिस्टोफ़ ग्रेम, जिन्हें 24 सितंबर को नौकरी से निकाल दिया गया. ख़बरों के मुताबिक, क्रिस्टोफ़ की निजी निष्ठा पर किसी को शक़ नहीं था. दिक्क़त थी उनके लीडरशिप रेक़ॉर्ड से. क्रिस्टोफ़ पिछले पांच साल से MAD के प्रमुख थे. उनपर जर्मन सेना और सिक्यॉरिटी फोर्सेज़ के भीतर बढ़ते कट्टरपंथ की मॉनिटरिंग करने का जिम्मा था. मगर वो अपनी जिम्मेदारी निभाने में नाकाम रहे. पिछले पांच सालों में जर्मन सेना के भीतर नात्ज़ी विचारधारा को मानने वालों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि आई. एक-के-बाद नियो-नात्ज़ी स्कैंडल सामने आते रहे.

इन स्कैंडल्स में तीन साल पुरानी एक घटना काफी चर्चित है. ये बात है 27 अप्रैल, 2017 की. इस रोज़ KSK की एक यूनिट ने एक लेफ़्टिनेंट के लिए रिटायरमेंट पार्टी रखी. इस पार्टी में यूनिट के लोगों ने एक-दूसरे को नात्ज़ी सैल्यूट दिया. कट्टरपंथी गाने बजाए. सुअर के कटे सिर को उछालने की प्रतियोगिता रखी गई. सुअर का सिर उछालना कट्टरपंथी प्रतीक है. यहूदी और इस्लाम में सुअर खाने की पाबंदी है. ऐसे में इन दोनों धर्मों से नफ़रत करने वाले कट्टरपंथी सुअर का सिर टॉस करके इन दोनों धर्मों के प्रति अपनी घृणा का इज़हार करते हैं.

Kommando Spezialkräfte
KSK जर्मनी की सबसे एलीट, सबसे प्रशिक्षित स्पेशल फोर्सेज़ है. (एपी)

आर्मी और सिक्यॉरिटी फोर्सेज़ में बढ़ रहे कट्टरपंथी

जर्मन सेना में कट्टरपंथियों की बढ़ती संख्या से जुड़ी और भी कई ख़बरें आईं. मसलन, अप्रैल 2017 में जांचकर्ताओं ने सेना के एक लेफ्टिनेंट को अरेस्ट किया. ये अधिकारी एक आतंकी हमले की योजना बना रहा था. इसकी प्लानिंग थी ख़ुद को सीरियन शरणार्थी बताकर टेरर अटैक करना. ताकि जर्मनी में शरणार्थियों के खिलाफ़ गुस्सा भड़के. सेना को इस अधिकारी के कट्टरपंथी झुकाव के बारे में 2014 से ही शिकायतें मिली थीं. मगर कार्रवाई करने में बहुत देर की गई. इस अफ़सर की गिरफ़्तारी के कुछ हफ़्ते बाद ही एक आर्मी बैरक से बड़ी मात्रा में नात्ज़ी सामग्रियां बरामद हुईं. इनमें हिटलर की सेना द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले हेल्मेट शामिल थे.

ऐसा नहीं कि नात्ज़ी विचारधारा के बढ़ते असर से केवल आर्मी और सिक्यॉरिटी फोर्सेज़ ही परेशान हों. इस मामले में जर्मन पुलिस का रेकॉर्ड भी परेशान करने वाला है. पिछले दिनों 16 सितंबर की ही घटना सुनिए. इस रोज़ जर्मनी ने अपने 29 पुलिस अफ़सरों को निलंबित कर दिया. इस कार्रवाई की वजह थी- पांच वॉट्सऐप ग्रुप्स. ये पुलिस अधिकारी इन्हीं वॉट्सऐप ग्रुप्स के सहारे एक-दूसरे से बातचीत करते थे. ये बातचीत सामान्य नहीं थी. इनमें नात्ज़ी विचारधारा को बढ़ावा देने वाली चीजें शेयर की जाती थीं. हिटलर और नात्ज़ी जर्मनी से जुड़े बाकी प्रतीकों की तस्वीरें साझा की जाती थीं. गैंस चेंबर में मर रहे लोगों की तस्वीरें डाली जाती थीं.

जर्मन पुलिस पर और भी कई गंभीर आरोप हैं. मसलन, जर्मनी की ऐक्ट्रेस इदिल बायदर का केस. 2019 में इदिल को कई बार जान से मारने की धमकियां मिलीं. धमकी देने वाले ने ईमेल में ‘NSU 2.0’ नाम से अपना हस्ताक्षर छोड़ा था.

Idil Baydar
ऐक्ट्रेस इदिल बायदर.

क्या है ये NSU 2.0?

ये नियो-नात्ज़ी विचारधारा से जुड़े एक संगठन ‘नैशनल सोशलिस्ट अंडरग्राउंड’ का शॉर्ट फॉर्म है. इसी संगठन ने जर्मनी के करीब 27 और सिलेब्रिटीज़ को जान से मारने की धमकियां भेजीं. तफ़्तीश में पता चला कि इन धमकियों का कनेक्शन पुलिस डिपार्टमेंट के कंप्यूटर्स से है.

साल 2000 से 2007 के बीच NSU 2.0 जर्मनी में 10 से ज़्यादा लोगों की हत्या कर चुका है. जून 2019 में इन नियो-नात्ज़ियों ने वॉल्टर लुबके नाम के एक जर्मन लीडर की उनके ही घर में घुसकर हत्या कर दी थी. लुबके की हत्या का कारण था, शरणार्थियों के प्रति उनकी हमदर्दी.

Walter Luebcke
नैशनल सोशलिस्ट अंडरग्राउंड ने जर्मन नेता वॉल्टर लुबके की हत्या कर दी थी. (एएफपी)

नात्ज़ी विचारधारा को बैन करने के बाद कैसे पनप रही विचारधारा?

हिटलर और नात्ज़ियों से जुड़े इतिहास के कारण जर्मनी हमेशा एक अपराधबोध में रहता है. ये नात्ज़ी इतिहास पिछले 75 सालों से जर्मनी के स्वभाव और उसकी सामूहिक चेतना को प्रभावित करता आ रहा है. युद्ध के बाद पैदा हुई पीढ़ियां इस इतिहास के कारण हमेशा से एक गिल्ट में रही हैं. पॉलिसी के स्तर पर भी नात्ज़ी विचारधारा से जुड़े प्रतीकों को बैन कर दिया गया. हिटलर और उससे जुड़ी विचारधारा ऐसा टैबू बन गया, जिसपर लोग बात करने से भी कतराते हैं.

मगर एक ओर जहां सार्वजनिक जीवन में इतनी हिचक, इतनी वर्जनाएं अपनाई गईं. वहीं नीचे-नीचे हिटलर और उसकी विचारधारा में यकीन रखने वाले लोगों का भी अस्तित्व बना रहा. इन्होंने अपना सीक्रेट सर्कल बना लिया. ये लोग सेना और पुलिस जैसी संस्थाओं में भी पहुंच गए. 2015 में जब चांसलर एंगेला मर्केल ने हज़ारों शरणार्थियों को जर्मनी में जगह दी, तब से इन कट्टरपंथियों की गतिविधियां भी बढ़ गईं. आज की तारीख़ में राइट विंग और नियो नात्ज़ी ग्रुप का ये विस्तार जर्मनी की सबसे बड़ी समस्या बन गया है.

Angela Merkel
जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल (एपी)

अहम संस्थाओं के भीतर हो रही एक्सट्रीम राइट विंग की इस सेंधमारी के बारे में जर्मन प्रशासन को पिछले करीब एक दशक से ख़बर थी. मगर सार्वजनिक तौर पर इसे स्वीकार करना उनके लिए अपमानजनक था. इसीलिए इस मुद्दे को लगातार दबाया जाता रहा. मगर अब जिस तरह नए-नए स्कैंडल्स सामने आ रहे हैं, उनसे स्थिति की भयावहता का अंदाज़ा लग रहा है. अब जर्मन लीडरशिप मान रही है कि उन्होंने समस्या को कम करके आंकने की ग़लती की. सरकार को समझ आ गया है कि इस मसले पर अब और चुप नहीं रहा जा सकता.


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