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गजराज राव इंटरव्यू (भाग-5): अपने किरदारों को कैसे अप्रोच करते हैं?

गजराज राव एक्टिंग कैसे करते हैं और अलग-अलग किरदार करते हुए उनका ज़ेहन कैसे काम करता है?

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Q43. ‘दिल से’ (1998) में आपका एक रोल था सीबीआई अधिकारी का. डायरेक्टर मणिरत्नम इससे पहले ‘बॉम्बे’ और ‘रोजा’ बना चुके थे.
मणिरत्नम तब बड़ा नाम था. बड़ा जलवा था उनका. हम लोग बड़े उत्साहित थे उनके साथ काम करने को लेकर. वो दरअसल बहुत कम बोलते हैं. नपा तुला. तो हमें शुरू में ही समझ आ गया था कि इंप्रोवाइजेशन को वो एंटरटेन नहीं करेंगे. कि जो स्क्रिप्ट में लिखा हुआ था, जैसा वो और उनके असिस्टेंट्स बता रहे थे वो हमको फॉलो करना था.

जैसे एक सीन था जिसमें हाथापाई होती है शाहरुख के साथ, तो उन्होंने (मणिरत्नम) आकर मुझे बोला कि – Gajraj don’t push him so hard.. ऐसा कुछ बोला, मझे धुंधला सा याद है. उनके जाने के तुरंत बाद शाहरुख ने मेरे कान में बोला – Don’t listen to him. Do what you were doing.

लेकिन वो (सीबीआई अधिकारियों के) इतने बड़े पात्र नहीं थे और उनमें कलर नहीं थे. उनके अंदर इतने आयाम नहीं थे. एक आयामी पात्र थे वो. इसमें ज्यादा कुछ अपनी ओर से करने को नहीं था. बस सधे हुए सीबीआई अधिकारी दिखना था उसमें.

'दिल से' के दृश्यों में पीयूष मिश्रा और शाहरुख खान के साथ गजराज राव.
‘दिल से’ के दृश्यों में पीयूष मिश्रा और शाहरुख खान के साथ गजराज राव.

Q44. ‘ब्लैक फ्राइडे’ (2004) में जो कैरेक्टर था दाउद फणसे उसे आपने कैसे अप्रोच किया?
क्योंकि वो बहुत clichéd (घिसा-पिटा) कैरेक्टर है न, तो मैंने उसको बहुत सहज बना दिया. बातें कर रहा है, फोन पर है. वो कैमरा के लिए एक्टिंग कर ही नहीं रहा था अगर आपने ध्यान दिया हो. उसका जो फोन पर कॉन्वर्जेशन है, उसे इंप्रोवाइज़ किया था. अनुराग (कश्यप, डायरेक्टर) ने बड़ी सह्रदयता से उसको स्वीकार किया. और जो दाऊद से मिलने वाला पूरा सीन है, उसके शीशे के पास मैं आता हूं और वो सब करता हूं, वो सारा इंप्रोवाइजेशन है क्योंकि अनुराग ने कट नहीं बोला. अनुराग ने कट नहीं बोला मैं करता रहा. उस तरह से हो गया वो.

'ब्लैक फ्राइडे' के उन दृश्यों में दाउद फणसे के किरदार में गजराज राव.
‘ब्लैक फ्राइडे’ के दृश्यों में दाउद फणसे के किरदार में गजराज राव.

Q45. और ‘नो स्मोकिंग’ (2007) में? ढींगरा साहब का छोटा सा शराबी पात्र था.
वो भी दिल्ली में मेरे देखे हुए एक पंजाबी अंकल थे जो बहुत ड्रिंक किया करते थे. पड़ोसी थे हमारे. तो उनको फॉलो किया मैंने उसके लिए.

'नो स्मोकिंग' में गजराज राव का शराबी पात्र जो जॉन अब्राहम के पात्र को तंग करता है.
‘नो स्मोकिंग’ में गजराज राव का शराबी पात्र जो जॉन अब्राहम के पात्र को तंग करता है.

Q46. ‘आमिर’ (2008) में जो विलेन का रोल था?
राजकुमार गुप्ता जब असिस्ट कर रहे थे, फर्स्ट एडी थे अनुराग के, तब उन्होंने मुझसे वायदा लिया था कि जब भी मैं फिल्म (डायरेक्ट) करूंगा तो आपको मेरी फिल्म में काम करना होगा. मैंने भी बोला था कि बिलकुल. और ऐसा ही हुआ जब स्क्रिप्ट लिखी और उनके पास साधन हुए फिल्म बनाने के तो उन्होंने अप्रोच किया. उस (किरदार) के अंदर क्या था कि उसमें ज्यादा योगदान मैं राजकुमार को देना चाहूंगा क्योंकि उन्होंने उस पूरे कैरेक्टर को अंधेरे में रखा. बहुत सारी चीजें जैसे राजकुमार बोल रहे थे मैं वैसा कर रहा था.

अगेन, क्योंकि बहुत क्लीशेड है कि वो टेरेरिस्ट ऑर्गनाइजेशन का (आदमी) है आदि. तो वो फिल्मी कम लगे. जैसे वो खाना खा रहा है तो उसके लिए .. सुबह 8 बजे सीन हुआ था और मुझे बोला गया था कि आप थोड़ा बहुत रोटी थोड़ा डुबो-डुबो कर (सीन) कर लीजिएगा, लेकिन मैंने उसमें बाकायदा पूरी उंगलियां डालकर बिरियानी खाई, पूरे अच्छे तरीके से ताकि वो नसें जो हैं दिमाग की जो उस कपाल पर दिख रही हैं वो नजर आएं.

'आमिर' का वो अनाम किरदार जो आमिर अली को ब्लैकमेल करते हुए फोन पर बम विस्फोट करने के निर्देश देता है.
‘आमिर’ का वो अनाम किरदार जो आमिर अली को ब्लैकमेल करते हुए फोन पर बम विस्फोट करने के निर्देश देता है.

Q47. इंस्पेक्टर धनीराम जो ‘तलवार’ (2015) में आप बने थे. 
जब दिल्ली में था न, तो वहां अगर आप रहते हों तो गाहे बगाहे दिल्ली पुलिस से आपकी मुलाकात हो ही जाती है. जब आप रात को लेट आ रहे होते हो और रास्ते में कहीं बैरीकेड लगे होते हैं तो अलग अलग तरह के पुलिसवालों से आप मुख़ातिब होते हो. तो ऐसे (धनीराम) ही एक पुलिसवाले थे जिनकी रेलवे कॉलोनी में मिंटो ब्रिज के पास ड्यूटी लगा करती थी महीनों तक. वो चेहरे मोहरे से भयानक नहीं थे, clumsy (बेढंगे) थे. और उनका एक्ट कुछ जो बातचीत से समझ में आता था वो ऐसा नहीं था कि वो कुछ प्लान करके किसी को रोक रहे हों, उनका गड्डमगड्ड था मामला.

मैंने कुछ हिस्सा उससे लिया. और अगेन, कि वो कैमरा के लिए एक्टिंग न करे. वो कहीं से भी ऐसा न लगे कि उसके मन में कुछ स्कीम चल रही है. वो स्कीम के तहत नहीं कर रहा है. वो है ही ऐसा. सिस्टम का हिस्सा है वो. बौड़म है वो. उसके अलावा जैसे पान खाना वगैरह, वो बात स्क्रिप्ट में थीं और विशाल जी ने बाकायदा उसे लिखा था. जब हमारी मुलाकात हुई थी, जब मैंने रोल लिया था तब मुझे बहुत क्लियर था मामला कि वो ऐसे पान खाएगा, वो सब विशाल जी का कॉन्ट्रीब्यूशन है.

'तलवार' के दृश्यों में गजराज राव के साथ अभिनेता नीरज कबी और इरफान खान.
‘तलवार’ के दृश्यों में गजराज राव के साथ अभिनेता नीरज कबी और इरफान खान.

Q48. ये या फादर (जीतू के) वाले रोल जो आप करते हैं, उनको देखने वाला यही बोलेगा कि ये एक्टर कुछ एफर्ट नहीं लगा रहा है.
मेरी कोशिश वही रहती है. स्ट्रगल वही रहती है. जहां जहां मैंने एक्टिंग की है न, वो काम हमेशा खराब हुआ है.

Q49. ‘ब्लैकमेल’ (2018) में जो प्राइवेट डिटेक्टिव वाला किरदार था, वो बहुत relaxed था. उसे कोई जल्दबाजी नहीं है. या कि मुझे एक्टिंग करनी है या मुझे ऐसे करना है
सिनेमा जो है वो डायरेक्टर का मीडियम है, आप कितना भी जोर लगा लो अगर आप अच्छी एक्टिंग नहीं कर रहे हो तो वो कट हो जाएगा. निकल जाएगा वो. बिलकुल सहज होकर करना आपके लिए बहुत जरूरी है.

Q50. डिटेक्टिव चावला की मनस्थिति कैसे पकड़ी आपने?
अगेन, वो बेवकूफ नहीं है. बहुत ही स्मार्ट आदमी है वो. वो थर्ड पर्सन में बात कर रहा है. उसमें मेरे पास सबसे बड़ा रेफरेंस था अनु मलिक का. अब अनु मलिक कभी कभी बात करते हैं न कि – अरे! अनु मलिक ने डिसाइड कर लिया है कि वो ऐसा करेगा. तो अनु मलिक ने फिर वो गाना तैयार कर लिया. वो एक बहुत क्लोजेस्ट रेफरेंस था. क्योंकि अगर वो रेफरेंस पॉइंट नहीं होता तो थर्ड पर्सन में कैसे बात करता वो बंदा. मेरे ख़याल उससे मुझे कहीं हेल्प मिली. जब अनु मलिक बात करते हैं तो कहीं पर जोक नहीं क्रैक कर रहे हैं, वो कोई मजाक नहीं कर रहे हैं, बहुत सीरियसली बोल रहे होते हैं. जो अनु मलिक को नहीं जानता है वो शायद बोलेगा कि किसकी बात हो रही है. कौन इतना टैलेंटेड म्यूजिक डायरेक्टर है. मतलब अनु मलिक जब बोल रहे होते हैं तो buffoonery (भौंडा तमाशा) नहीं हो रही होती है. ये (डिटेक्टिव, ब्लैकमेल में) जो बात कर रहा है, ये बफूनरी नहीं कर रहा है, वो बता रहा है कि ’97 परसेंट सक्सेस रेट है.’ रात में वाइफ से भी बोलता है कि ‘देख के दिया करो न यार, छह गोली दे दी उसको.’

चालवा
‘ब्लैकमेल’ में गजराज राव का चावला का किरदार जो हमेशा थर्ड पर्सन में बात करता है. साथ हैं इरफान और विभा छिब्बर के पात्र.

Q51. कौशिक जी (बधाई हो, 2018) के किरदार को लेकर ये लगता है कि आपकी जो एक नियत स्वीकार्यता है न, जो शायद फीडबैक भी मिला होगा, कि इतना अच्छा पति, इतने स्नेहिल व्यवहार वाला, इतनी मीठी मुस्कान वाला, ये सिर्फ कौशिक तो नहीं है, आप भी हैं. आप मुस्कराते हैं और कौशिक भी, दोनों स्माइल में कुछ समानताएं तो हैं. दोनों की तासीर में भी कुछ समानताएं हैं. ठीक वैसे ही जैसे पंकज त्रिपाठी हैं, उनकी अपनी मुस्कान भी ‘मसान’ और ‘निल बट्टे सन्नाटा’ जैसी फिल्मों के उनके पात्रों में दिखती है, बोलने का जो तरीका है, जो mild-mannered अंदाज है, जीभ जैसे बातों को प्रकट करती है या जो व्यवहार है. ये उनके अंदर की ही चीज है जो किरदारों में भी आती ही है.
जो भी एक्टर है, उसकी जो चाल ढाल है, जो बोलने का अंदाज है, या जो उसके हंसने का अंदाज है वो एक्टर से आप अलग नहीं कर सकते हैं. जो एक्टर की पर्सनैलिटी होती है वो उसके पात्र का हिस्सा बन जाती है.

जैसे परेश रावल भाई हैं. तो परेश भाई की जो पर्सनैलिटी है, उनका जो तंज कसने का एक तरीका है वो उनके पात्रों का हिस्सा बन जाता है. एक एक्टर जब किसी कैरेक्टर को पढ़ता है, करता है तो अपने व्यक्तित्व का कुछ हिस्सा उस पात्र को उधार देता है. क्योंकि वो देना बहुत जरूरी है. क्योंकि हर चीज का रेफरेंस, हर चीज का मोटिवेशन बाहर से मिलना मुश्किल है.

जैसे नसीर साहब हैं. नसीर साहब की जो झुंझलाहट है, वो नसीर साहब की पर्सनैलिटी का हिस्सा है. जैसे वो झुंझलाते हैं, मैंने उनका थियेटर भी देखा हुआ है, प्लेज़ भी देखे हुए हैं, वो उनके पात्रों में दिखता है चाहे वो ‘कर्मा’ (1986) हो या उनका बाकी सिनेमा है कहीं न कहीं.

लेकिन वो हर कैरेक्टर पर लागू होगा ये जरूरी नहीं. जैसे धनीराम में मुझे लगता है कि मेरी पर्सनैलिटी नहीं है. या दाउद फणसे में मेरी पर्सनैलिटी नहीं है. उसमें मुझे उधार देने की जरूरत नहीं पड़ी. लेकिन कौशिक में कह सकते हैं क्योंकि वो एक खास एज-ग्रुप का कैरेक्टर है और जो फैमिली बैकग्राउंड है मिडिल क्लास, उसमें निश्चित तौर पर मेरे जो सोचने का तरीका है, गजराज के जो सोचने का तरीका है, वो मैंने कौशिक को दिया.

क्योंकि समान सा माहौल है. वो मिडिल क्लास. रेलवे. परिवार. सास-बहू. पत्नी. बेटा. वो समान ज़ोन है. वहां पर गजराज जैसे रिएक्ट करेगा. कि गजराज की मां और गजराज की पत्नी के बीच में जब किसी बात पर अनबन होती है उसमें गजराज जैसे रिएक्ट करता है वो गजराज का देखा हुआ है. तो गजराज उसको कौशिक को उधार दे सकता है.

'बधाई हो' के जीतेंद्र कौशिक एक आदर्श पिता, पड़ोसी और पति हैं. कुछ दृश्यों में गजराज राव के साथ आयुष्मान खुराना और नीना गुप्ता.
‘बधाई हो’ के जीतेंद्र कौशिक एक आदर्श पिता, पड़ोसी और पति हैं. कुछ दृश्यों में गजराज राव के साथ आयुष्मान खुराना और नीना गुप्ता.

Q52. ये दो एक्टिंग के स्टाइल हैं. जिसमें एक ये कि – कुछ अंश तो आएगा. दूसरा डेनियल-डे-लुइस वाला स्टाइल कि – बिलकुल नहीं आएगा. हालांकि उसमें भी आता है, आएगा ही.. 
वो मुझे लगता है कैरेक्टर पर बहुत निर्भर करेगा. कि पात्र कैसा है. जैसे मनोज बाजपेयी. ‘गली गुलियां’ (2018) में अगर आप देखो तो मनोज बाजपेयी नहीं दिखते हैं. तो वो पात्र कैसा है, क्या रेंज है उस पर निर्भर करता है मेरे ख़याल से.

Q53. ‘बधाई हो’ में वो जो सीन है जिसमें सुरेखा जी (सास का पात्र) अपनी बहू का पक्ष लेती हैं पहली बार, लगता है फिल्म का सबसे ताकतवर सीन है. आप रो पड़ते हैं.
वहां से घुर्री चेंज हो जाती है न. बदलती है..

Q54. वहां उनके अभिनय की बारीकियां अवाक करती हैं, जैसे वो वेरिएशन कर रही हैं. वो प्रयास दिख नहीं रहा लेकिन अभिनय के लिहाज से समझे तो बहुत अप्रत्याशित तरीके से बात कर रही हैं. क्या वो सीन सबसे ज्यादा इमोशनल था आपके लिए करते हुए, या कोई दूसरा?
उस सीन में तो जो कुछ हो रहा था वो मैं सुरेखा दीदी के परफॉर्मेंस पर रिएक्ट कर रहा था. इनफैक्ट, इस सीन में और जो अस्पताल का सीन है आखिर में, उन दोनों में मैंने ग्लिसरीन का इस्तेमाल नहीं किया. वो अपने आप हो पा रहा था वहां पर. उसका श्रेय मैं दूंगा सुरेखा जी को. वो इतना वाइब्रेंट था, इतना उद्वेलित कर देने वाला था कि आप बरबस उनकी तरफ ही देखते हैं. उसमें जो रोना आया था, आंखों में पानी आया था वो लाया नहीं था, वो आ गया. हॉस्पिटल वाला सीन जो था उससे जो उम्मीदें थीं उस लिहाज से मुझे लगता है वो सबसे ज्यादा चैलेंजिंग था.

वो दृश्य जो 'बधाई हो' में गजराज राव को सबसे कठिन और पावरफुल लगा.
वो दृश्य जो ‘बधाई हो’ में गजराज राव को सबसे कठिन और पावरफुल लगा.

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गजराज राव इंटरव्यू Part-1: वो एक दिन जिसने जिंदगी बदल दी
गजराज राव इंटरव्यू Part-2: खुद को निराशा से बाहर कैसे निकालते हैं
गजराज राव इंटरव्यू Part-3: कोई रोल करते हुए एक्टर के सरोकार क्या होते हैं?
गजराज राव इंटरव्यू Part-4: एक्टिंग मास्टरक्लास – अभिनेताओं के लिए सबक

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