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यूपी में मनरेगा लागू करने में करोड़ों का गबन हो गया, सरकार कितनी वसूली कर पाई?

साल 2019 के अंत में चीन में पाया गया कोरोना वायरस सार्स-सीओवी-2 साल 2020 की शुरुआत में ही दुनियाभर में फैलने लगा था. भारत भी इससे अछूता नहीं रहा. इस वायरस से फैली कोविड-19 महामारी की वजह से मार्च 2020 में देश ने विस्थापन का भयावह दृश्य देखा. करोड़ों की संख्या में लोग शहरों से अपने गांवों की ओर पलायन करने के लिए मजबूर हुए. नतीजतन, देश में कोरोना के साथ-साथ बेरोजगारी का व्यापक संकट खड़ा हो गया. ऐसे में मनरेगा योजना एक संजीवनी बनकर उभरी थी. कभी इसे ‘कांग्रेस की नाकामियों का स्मारक’ बताने वाली बीजेपी भी यूपीए सरकार में लाई गई इस योजना की तारीफ कर चुकी है.

इसी संबंध में मई 2020 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से जब सवाल पूछा गया, तो उन्होंने कहा था,

‘यदि सक्षम और दूरदर्शी नेतृत्व है, तो वो हर योजना को यशस्वी बना सकता है. लेकिन यदि अक्षम और अकर्मण्य नेतृत्व होगा, तो वो अच्छी योजना को भी मिट्टी में मिला सकता है.’

हालांकि पिछले पांच सालों में यूपी में जिस तरीके से मनरेगा योजना को लागू किया गया है, उसे लेकर खुद सरकारी आंकड़े गंभीर सवाल खड़े करते हैं.

दरअसल केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय की सोशल ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक यूपी में वित्त वर्ष 2017-18 से 2021-22 के बीच मनरेगा के तहत कम से कम 26.40 करोड़ रुपये का गबन हुआ है. इसमें से 7.41 करोड़ रुपये का गबन पिछले दो सालों में हुआ है, जब कोरोना के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में ये योजना रोजगार का प्रमुख जरिया थी.

इतना ही नहीं, इस गबन राशि में से महज 33.88 लाख रुपये की वसूली हुई है. ये कुल गबन राशि का सिर्फ 1.28 फीसदी है. इस गैरकानूनी कार्य का पता चलने के बाद केवल 92 कर्मचारियों पर कार्रवाई हुई है. पिछले दो सालों में तो एक पर भी एक्शन नहीं लिया गया है.

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प्रतीकात्मक तस्वीर. (साभार-PTI)

कैसे पता चला गबन?

मनरेगा की धारा 17 में ये प्रावधान किया गया है कि किसी ग्राम पंचायत में कराए गए सभी कार्यों का सोशल ऑडिट कराया जाएगा. इस ऑडिट के जरिये ये पता लगाया जाता है कि राज्य ने जितनी राशि खर्च करने की रिपोर्ट दी है, वो जमीनी स्तर पर किए गए कार्यों से मेल खाती है या नहीं. इस प्रक्रिया के तहत आधिकारिक रिकॉर्ड्स की समीक्षा भी की जाती है.

जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सोशल ऑडिट को एक शक्तिशाली हथियार के रूप में देखा जाता है.

इसी ऑडिट के जरिये ‘वित्तीय गबन’ का पता चलता है. इसमें रिश्वत, किसी ऐसे व्यक्ति को भुगतान जो कि योजना में कार्य न करता हो, जॉब कार्ड के लिए पैसे लेना, फर्जी बिल, पहले ही किए गए कार्यों के लिए भुगतान, कॉन्ट्रैक्टर के जरिये कार्य कराना, बिना काम किए ही पेमेंट कर देना, मशीन के जरिये काम कराना जैसी इत्यादि चीजें शामिल होती हैं.

इस तरह के कार्यों में शामिल कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए मनरेगा की धारा 25 में स्पष्ट प्रावधान दिए गए हैं, लेकिन आंकड़े दर्शाते हैं कि इसका पालन नहीं किया जा रहा है.

केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के मनरेगा पोर्टल पर अपलोड की गई ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2021-22 में उत्तर प्रदेश में मनरेगा के तहत कुल 7.40 करोड़ रुपये का गबन हुआ है. हालांकि इसमें से महज 5,000 रुपये वसूले जा सके हैं. ये आंकड़े 13 जनवरी 2022 तक के हैं.

इस बीच राज्य के 75 जिलों के 59 हजार 157 ग्राम पंचायतों में से 16 हजार 453 में कम से कम एक बार ऑडिट कराया गया. जहां कुल 62 हजार 759 मामले सामने आए. इसमें वित्तीय गबन के साथ-साथ वित्तीय विचलन (फाइनेंशियल डेविएशन), प्रक्रियात्मक उल्लंघन और शिकायतें शामिल हैं. इनमें से सिर्फ 77 मामलों को बंद किया गया है, जिसमें से एक भी संतोषजनक नहीं रहा है.

इस दौरान अलीगढ़ जिले में 1.10 करोड़ रुपये, बांदा में 56.34 लाख रुपये, बस्ती में 34.96 लाख रुपये, इटावा में 71.55 लाख रुपये, वाराणसी में 12.12 लाख रुपये, उन्नाव में 35.07 लाख रुपये और पीलीभीत में 95.45 लाख रुपये के गबन के मामले सामने आए.

ऐसे मामलों को लेकर इस वित्त वर्ष में एक भी कर्मचारी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है. सिर्फ कुल 47 कर्मचारियों को वॉर्निंग देकर छोड़ दिया गया.

यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि इस वित्तीय वर्ष में सिर्फ 27.81 फीसदी ग्राम पंचायतों का ऑडिट कराया गया, इसलिए वास्तविक गबन राशि इससे ज्यादा होने की संभावना है.

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(स्रोत: मनरेगा सोशल ऑडिट रिपोर्ट)

इसी तरह वित्त वर्ष 2020-21 में 1.07 लाख रुपये गबन का मामला सामने आया था, जिसमें से एक रुपये भी वसूला नहीं जा सका है. इस वर्ष सिर्फ नौ ग्राम पंचायतों (0.02%) में सोशल ऑडिट कराया गया था.

ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2019-20 में 14.91 करोड़ रुपये का गबन हुआ था. इसमें से महज 30.5 लाख रुपये की राशि वसूली गई है, जो कि कुल गबन का सिर्फ 2.05 फीसदी है. इस दौरान 46 हजार 466 ग्राम पंचायतों में ऑडिट कराया गया था.

इस साल सबसे ज्यादा 3.97 करोड़ रुपये के गबन का मामला मऊ जिले से सामने आया था. इसके बाद सिद्धार्थ नगर में 1.03 करोड़ रुपये, बांदा में 99.50 लाख रुपये, बलिया में 47.81 लाख रुपये, चंदौली में 64.63 लाख रुपये और जालौन में 76.18 लाख रुपये के गबन का मामला सामने आया था.

सोशल ऑडिट के दौरान कुल एक लाख 92 हजार 483 मामले सामने आए, जिनमें से सिर्फ 29 हजार 681 मामलों को ही बंद किया गया है. इस बीच विभिन्न आरोपों को लेकर 26 कर्मचारियों पर कार्रवाई हुई और 12 हजार 444 को हिदायत दी गई थी. खास बात ये है कि इतनी भारी-भरकम राशि के गबन के आरोप के बावजूद सिर्फ एक एफआईआर दर्ज की गई थी.

वित्त वर्ष 2018-19 की भी ऐसी ही तस्वीर है. इसके सोशल ऑडिट के दौरान 3.57 करोड़ रुपये के गबन का मामला सामने आया. इसमें से केवल 2.71 लाख रुपये वसूले गए हैं, जो कि कुल गबन की तुलना में सिर्फ 0.76 फीसदी है. इस वर्ष 34.82 फीसदी ग्राम पंचायतों (20 हजार 633) में सोशल ऑडिट कराया गया. इस दौरान 82 हजार 333 मामले सामने आए, जिसमें से 33 हजार 116 मामलों को बंद किया गया है. तमाम अनियमितताओं को लेकर 13 कर्मचारियों को सस्पेंड किया गया, 47 को नौकरी से निकाला गया, चार लोगों पर जुर्माना लगाया गया और 16 हजार 916 कर्मचारियों को हिदायत दी गई. हालांकि इसे लेकर एक भी एफआईआर फाइल नहीं की गई.

रिपोर्ट के मुताबिक 2017-18 में मनरेगा योजना के तहत 50.34 लाख रुपये का गबन हुआ था, जिसमें से करीब 62 हजार रुपये ही वसूले गए हैं. इस दौरान सिर्फ 4.47 फीसदी गांवों (2,651) में ऑडिट कराया गया था. इस ऑडिट में सामने आए मामलों को लेकर कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई. इन अनियमितताओं को लेकर दो कर्मचारी सस्पेंड किए गए और 1,692 को चेताया गया था.

मनरेगा में काम मांगने वालों की संख्या बढ़ गई है. (फोटो-पीटीआई)
प्रतीकात्मक तस्वीर. (साभार-पीटीआई)

उत्तर प्रदेश शासन के प्रमुख सचिव ने 12 जुलाई 2019 को राज्य के जिलाधिकारियों और मुख्य विकास अधिकारियों को एक पत्र जारी कर मनरेगा में हुए गबन पर उचित कार्रवाई करने को कहा था. उन्होंने राज्य द्वारा साल 2014 में जारी एक अधिसूचना का हवाला देते हुए कहा था,

‘सोशल ऑडिट रिपोर्ट में पाई गई कमियों पर जिला कार्यक्रम समन्वयक की देख-रेख में उपायुक्त (मनरेगा), संबंधित खण्ड विकास अघिकारी/ग्राम पंचायत अधिकारी/ग्राम विकास अधिकारी एवं क्रियान्वयन एजेंसियों द्वारा सुधारात्मक कार्रवाई की जाए तथा गबन की गई अथवा अनुचित उपभोग की गई धनराशि की वसूली के लिए नियमानुसार आवश्वयक कार्रवाई की जाए.’

इस पत्र में तत्कालीन मुख्य सचिव अनुराग श्रीवास्तव ने खुद ये माना था,

‘सोशल ऑडिट एटीआर (एक्शन टेकेन रिपोर्ट) की स्थिति देखने से स्पष्ट होता है कि योजना के अंतर्गत दुर्विनियोजन (गबन) एवं वित्तीय विचलन से संबंधित धनराशि की वसूली में और अधिक प्रभावी कार्रवाई की आवश्यकता है.’

श्रीवास्तव ने कहा था कि धनराशियों का गबन करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध कार्रवाई में आपराधिक और सिविल प्रक्रिया का प्रारंभ करना या सेवा समाप्ति (नौकरी से निकालना) भी शामिल है.

क्या कहते हैं जानकार?

विशेषज्ञों का कहना है मनरेगा में वित्तीय गबन का वास्तविक आंकड़ा इससे काफी अधिक है. वे ये भी कहते हैं कि अधिकतर मामलों में कोई कार्रवाई नहीं होती है और आरोपी आसानी से छूट जा रहा है. उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में साल 2009 से मनरेगा को लेकर काम करने वालीं रिचा सिंह कहती हैं कि अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित न होने के कारण नियमित रूप से गबन हो रहा है. इस कानून को ज्यादा से ज्यादा विकेंद्रीकृत करना होगा.

दी लल्लनटॉप से बातचीत में रिचा सिंह ने कहा,

‘गबन इस तरह से होता है- मान लीजिए कि एक गांव है और वहां 100 मजदूरों का जॉब कार्ड बना हुआ है और वो काम करते हैं. किसी जगह पर काम की शुरुआत हुई. उन्होंने अपने रिकॉर्ड (मस्टर रोल) में दिखा दिया कि 100 लोग काम कर रहे हैं, लेकिन हकीकत में वहां 70 ही काम कर रहे होते हैं. इस तरह 30 लोगों का पैसा मिल बांट कर खा लिया जाता है. ऐसे 30 लोग प्रधान एवं अन्य अधिकारियों के करीबी या घर के होते हैं.’

रिचा ने आगे बताया,

‘दूसरा बड़ा तरीका ये है- मान लीजिये किसी तालाब की खुदाई होनी है. तालाब को पांच फीट गहरा करना है. लेकिन पहले से ही खुदे हुए तालाब में काम शुरू करा दिया जाता है. इस तरह हकीकत में तालाब को एकाध फीट ही खोदना होता है. लेकिन रिकॉर्ड पांच फीट गहराई का दिखा दिया जाता है और एक फीट के बदले पांच फीट खुदाई का पैसा ले लिया जाता है. नहरों की सफाई में भी यही तरीका अपनाया जाता है. इसमें प्रधान, रोजगार सेवक, सचिव सब की मिली-भगत होती है.’

उन्होंने कहा कि एक ही निर्माण कार्य को अलग-अलग जगह दिखा कर तीन-चार गुना तक पैसा निकाल लेते हैं. इसके अलावा जॉब कार्ड बनाने के लिए भी काफी रिश्वत ली जाती है.

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(स्रोत: मनरेगा सोशल ऑडिट रिपोर्ट)

इसी तरह पिछले 13 सालों से मनरेगा को लेकर वाराणसी जिले में कार्य कर रहे और सोशल ऑडिट टीम का हिस्सा रहे सुरेश राठौड़ कहते हैं,

‘योजना में अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सोशल ऑडिट एक बड़ा हथियार था, लेकिन एक तो पिछले कई सालों से सोशल ऑडिट हो नहीं रही है और अगर होती भी है तो उसमें शामिल व्यक्ति भी प्रधान-अधिकारियों से सांठ गांठ कर लेते हैं. पिछले पांच सालों के गबन का जो ये आंकड़ा आप बता रहे हैं, वो न्यूनतम है. इतना तो एक जिले में गबन हो सकता है. यदि सही तरीके से सभी ग्राम पंचायतों की सोशल ऑडिट कराई जाए, तो इसमें कई गुना बढ़ोतरी होगी.’

राठौड़ ने आगे कहा,

‘गबन की वसूली भी भ्रष्टाचार का एक जरिया बन जाता है. दरअसल ऑडिट के लिए जिन लोगों की नियुक्ति होती है, वे लोग गड़बड़ी पकड़ने के बाद आरोपियों के साथ समझौता कर लेते हैं. मैं तो दिन रात मनरेगा को लेकर काम कर रहा हूं, मुझे कभी सुनाई नहीं दिया कि कहीं गबन की वसूली हुई है.’

जानी-मानी अर्थशास्त्री और ‘आधार से किसका उद्धार?’ किताब की लेखिका रीतिका खेड़ा कहती हैं कि मनरेगा में जब से प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) को लागू किया गया है, तब से सोशल ऑडिट में काफी हद तक पैसे का हेरफेर पकड़ना मुश्किल हो गया है. उन्होंने कहा,

‘पहले मजदूरों को कैश में पैसे मिलते थे. उस समय पांच दिन के कार्य को 50 दिन का दिखाकर अतिरिक्त पैसा निकाल लिया जाता था और मजदूरों को पांच दिन का भुगतान करके बाकी पैसे अधिकारी लोग हजम कर जाते थे. अब सरकार का कहना है कि पहले इस तरह से चोरी होती थी, इसलिए अब हम सीधे उनके खाते में पैसे डाल कर रोक रहे हैं. ये कदम एक हद तक ठीक भी है. लेकिन इससे एक बड़ी समस्या भी खड़ी हो गई है.’

रीतिका ने आगे कहा,

‘इसमें क्या है कि पहले कम से कम ये था कि यदि अधिकारी पैसे खाते थे तो जांच के दौरान मजदूर ये बता देता था कि उसने पांच दिन ही काम किया है और बाकी पैसे उसे नहीं मिले हैं. लेकिन अब इस घोटाले में मजदूर को भी शामिल कर लिया गया है. मजदूर से कहा जाता है कि तुम्हारे खाते में जो अतिरिक्त पैसा आएगा, उसे हम मिल बांट लेंगे. ऐसे भी मामले सामने आए हैं, जहां मजदूर की जानकारी के बिना उसके खाते का इस्तेमाल होता है और पैसे निकाल लिए जाते है. ऐसी स्थिति में चोरी पकड़ना काफी मुश्किल हो गया है.

डीबीटी का गुणगान तो ठीक है, सरकार कह रही है कि बिचौलिए खत्म हो गए हैं, लेकिन डीबीटी में भी समस्या है. इससे काफी भ्रष्टाचार हो रहा है, लेकिन सोशल ऑडिट में ये पकड़ना काफी मुश्किल हो गया है. इसलिए इसमें नीति परिवर्तन की जरूरत है.’

क्या कहती है यूपी सरकार?

यूपी सरकार ने मनरेगा में करोड़ों रुपये के वित्तीय गबन होने की बात स्वीकार की है. जब लल्लनटॉप ने गबन की इतनी कम वसूली को लेकर सवाल किया, तो यूपी के ग्राम्य विकास विभाग के अपर आयुक्त (मनरेगा) योगेश कुमार ने बताया,

‘वसूली कार्यवाही चल रही है. पिछले पांच सालों में मनरेगा में 34 हजार 724 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं, जिसमें से करीब 26 करोड़ रुपये की वित्तीय अनियमितता का मामला सामने आया है.’

योगेश कुमार ने कहा कि वसूली कम होने की एक बड़ी वजह ये है कि जिस पर गबन होने का आरोप लगता है, वे ये दावा करते हैं कि सोशल ऑडिट टीम में तकनीकी लोग नहीं होते हैं, तो वे किस आधार पर अनियमितता का पता लगाते हैं. उन्होंने आगे कहा,

‘इसका समाधान हमने ये निकाला है कि जिला विकास अधिकारी ब्लॉक-वार एक कॉन्फ्रेंस करेगा, जहां दोनों पक्षों (सोशल ऑडिट टीम और आरोपी) को बुलाया जाएगा. इन दोनों से अपना-अपना पक्ष देने के लिए कहा जाएगा. यदि इस कार्यवाही में ये तय हो गया कि वसूली करनी है और यदि आरोपी पैसा नहीं देते हैं, तो हमने ये फैसला कराया है कि ये राशि उनकी सैलरी (15-15 फीसदी करके) से काटी जाएगी.’

ग्राम्य विकास विभाग के अधिकारी ने बताया कि सैलरी काटने की जिम्मेदारी ड्रॉइंग एंड डिस्बर्सिंग ऑफिसर (डीडीओ) की होती है. अगर वे समय पर ऐसे लोगों की सैलरी नहीं काटते हैं तो डीडीओ की सैलरी से पांच हजार रुपये काटा जाएगा. तब तक, जब तक वो रिकवरी पूरी नहीं हो जाती है. इसके साथ ही अपर आयुक्त (मनरेगा) ने दावा किया कि मनरेगा के तहत वसूली की ये प्रकिया पूरे देश में कहीं और नहीं है.

वहीं, कम ग्राम पंचायतों में सोशल ऑडिट कराने को लेकर राज्य के सोशल ऑडिट निदेशालय ने वर्ष बार अलग-अलग कारण बताए हैं. उसने कहा कि वित्त वर्ष 2017-18 में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में विभिन्न याचिकाएं दायर की गई थीं, इसलिए सोशल ऑडिट का कार्य प्रभावित हुआ. नतीजन, प्रदेश के 2962 ग्राम पंचायतों में ही ऑडिट कराई जा सकी थी. निदेशालय ने कहा,

‘वर्ष 2017-18 में उत्पन्न हुई समस्या के चलते टीमों और रिसोर्स पर्सन्स (ऐसे लोग जो ऑडिट में मदद करते) को इंगेज न किए जाने के कारण वित्तीय वर्ष 2018-19 में 20 हजार 787 ग्राम पंचायतों की ही सोशल ऑडिट कराई जा सकी.’

वित्त वर्ष 2019-20 में राज्य सरकार का प्रदर्शन अच्छा रहा था, जहां करीब 80 फीसदी ग्राम पंचायतों की ऑडिट कराई गई थी, जबकि राष्ट्रीय औसत 65 फीसदी था. सोशल ऑडिट निदेशालय ने कहा कि कोविड-19 महामारी के कारण वित्त वर्ष 2020-21 में ऑडिट नहीं कराया जा सका और आचार संहिता लगाए जाने के कारण मौजूदा वित्त वर्ष की सोशल ऑडिटिंग 10 जनवरी से रोक दी गई है.


वीडियो- जमघट: यूपी चुनाव 2022 से पहले योगी आदित्यनाथ का इंटरव्यू

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