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'अंग्रेजी मैया का दूध पियो, वही पोसती है शूद्रों को'

क्या आप जानते हैं कि भारत की पहली महिला टीचर कौन थी? नहीं जानते? हैरानी की बात है.

anita bharti18वीं सदी में वह पूरी धमक, पूरी ताकत के साथ मौजूद थीं. सबके ताने और हमले सहते हुए महिलाओं-बच्चों को पढ़ा रही थीं. फिर भी इतिहास में उनका नाम इतना धुंधला क्यों है? बहुजनवादी मानते हैं कि ऐसा उनके ‘शूद्र और स्त्री’ होने की वजह से हुआ. उनकी मांग रही है कि डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बजाय सावित्रीबाई फुले के जन्मदिन पर देश में शिक्षक दिवस मनाया जाना चाहिए. सावित्रीबाई फुले मराठी में कविताएं भी लिखती थीं. 3 जनवरी को उनका जन्मदिन है. इस मौके पर आपको उनकी कविताएं पढ़वा रहे हैं. लेखिका अनीता भारती ने इन कविताओं का संपादन किया. अनुवाद शेखर पवार और फारूक शाह का है.

आगे अनीता भारती की टिप्पणी के साथ, देश की पहली शिक्षिका सावित्रीबाई की कविताएं:


18वीं सदी में सामाजिक क्रांति की अग्रदूत सावित्रीबाई फुले अपनी पूरी प्रतिभा और ताकत के साथ मौजूद होती हैं, लेकिन किसी निगाह उन पर नहीं जाती. सवाल है इस मौन धारण, अवहेलना और उपेक्षा का कारण क्या है? क्या इसका कारण उनका शूद्र तबके में जन्म लेना और स्त्री होना माना जाए? सावित्रीबाई फुले का पूरा जीवन समाज के वंचित तबकों खासकर स्त्री और दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष और सहयोग में बीता. ज्योतिबा संग सावित्रीबाई फुले ने जब क्रूर ब्राह्मणी पेशवाराज का विरोध करते हुए, लड़कियों के लिए स्कूल खोलने से लेकर तत्कालीन समाज में व्याप्त तमाम दलित-शूद्र-स्त्री विरोधी रूढ़ियों-आडंबरों-अंधविश्वास के खिलाफ मजबूती से जंग लड़ने की ठानी.

इस जंग में दुश्मन के खिलाफ लड़ाई का एक मजबूत हथियार बना उनका खुद का रचा साहित्य जिसका उन्होंने प्रतिक्रियावादी ताकतों को जबाब देने के लिए बहुत खूबसूरती से इस्तेमाल किया. सावित्रीबाई फुले के साहित्य में उनकी कविताएं, पत्र, भाषण, लेख, पुस्तकें आदि शामिल है.

सावित्रीबाई फुले ने अपने जीवन काल में दो काव्य पुस्तकें लिखीं. पहला कविता संग्रह ‘काव्य फुले’ 1854 में छपा, तब उनकी उम्र सिर्फ 23 साल की थी. कविताओं का दूसरा किताब ‘बावनकशी सुबोधरत्नाकर’ 1991 में आया, जिसको सावित्रीबाई फुले ने अपने जीवनसाथी ज्योतिबा फुले के परिनिर्वाण प्राप्ति के बाद उनकी जीवनी के रूप में लिखा था.

18वीं और 19वीं सदी में ब्राह्मणवाद का कट्टरतम रूप अपने चरम पर था. बाबा साहेब अंबेडकर ने उस समय की हालत का वर्णन अपनी पुस्तक ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ में करते हुए कहा है- ‘पेशेवाओं के शासनकाल में, महाराष्ट्र में, इन अछूतों को उस सड़क पर चलने की आज्ञा नही थी जिस पर कोई सवर्ण हिन्दू चल रहा हो. इनके लिए आदेश था कि अपनी कलाई में या गले में काला धागा बांधे, ताकि हिन्दू इन्हें भूल से ना छू लें. पेशवाओं की राजधानी पूना में तो इन अछूतों के लिए यह आदेश था कि ये कमर में झाडू बांधकर चलें, ताकि इनके पैरों के चिन्ह झाडू से मिट जाएं और कोई हिन्दू इनके पद चिन्हों पर पैर रखकर अपवित्र न हो जाएं, अछूत अपने गले में हांडी बांधकर चले और जब थूकना हो तो उसी में थूकें, भूमि पर पड़ें हुए अछूत के थूक पर किसी हिन्दू का पैर पड़ जाने से वह अपवित्र हो जाएगा.’

ऐसे हालात में सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिला के एक छोटे से ग्राम नायगांव में हुआ.सिर्फ 9 साल की उम्र में 11 साल के ज्योतिबा संग ब्याह दी गई. केवल 17 की उम्र में ही सावित्रीबाई ने बच्चियों के एक स्कूल की अध्यापिका और प्रधानाचार्या दोनों की भूमिका को सवर्ण समाज के द्वारा उत्पन्न अड़चनों से लड़ते हुए बडी ही लगन, विश्वास और सहजता से निभाया. समता, बंधुता, मैत्री और न्याय पूर्ण समाज की ल़डाई के लिए, समाजिक क्रांति को आगे बढाने के लिए सावित्राबाई फुले ने साहित्य की रचना की.

इस अशिक्षा-अज्ञानता की वजह से ही पूरा बहुजन समाज सवर्ण हिंदुओं का गुलाम बना है. इनके पाखंड और कूटनीति के हथियार ज्योतिष, पंचाग, हस्तरेखा आदि पर व्यंग्य करती हुई सावित्री बाई फुले कहती हैं:

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सावित्रीबाई फुले जानती हैं कि शूद्र और दलितों की गरीबी का कारण क्या है. लोग समझते हैं कि ब्राह्मणवाद केवल मानसिकता नहीं, एक पूरी व्यवस्था है जिससे धर्म के पोषक तत्व देव-देवता, रीति-रिवाज, पूजा-अर्चना आदि गरीब दलित दमित जनता को अपने में काबू में रखकर उनकी तरक्की के सारे रास्ते बंद करते और उन्हें बदहाली भरे जीवन में धकेलते आए हैं.

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वे शूद्रों के दुख को, जाति के आधार पर प्रताड़ना के दुख को दो हजार साल से भी पुराना बताती हैं. सावित्रीबाई फुले इसका कारण मानती हैं कि इस धरती पर ब्राह्मणों ने खुद को स्वघोषित देवता बना लिया है.

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सावित्रीबाई फुले जानती हैं कि शूद्र और दलित खेती करेंगे तो सम्पन्न होंगे. वे सम्पन्न होंगे तो खुशहाली भरा जीवन जिएंगे और फिर ब्राह्मणों की धर्माज्ञा मानना बंद कर देंगे. इसलिए वह लिखती हैं:

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शूद्र और दलित यहां के मूलनिवासी यानी नेटिव है. आक्रामक आर्य बाहर से आए थे और उन्होंने सत्ताधारी शासकों से मिलकर यहां के भोले मूलनिवासियों को पद दलित कर दिया. लेकिन यहां के नेटिव मूलनिवासी अपने शौर्य दयालुता और प्रेम आदि जीवन मूल्यों में विश्वास रखते आए हैं. वह छत्रपति शिवाजी, महारानी ताराबाई, अंबाबाई आदि जिन्होंने समतामूलक समाज बनाने के लिए अन्याय और अत्याचार के खिलाफ लड़ाई लड़ी, उनके सामने सिर झुकाती हैं.

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शूद्र राजा बलिराजा के राज में समृद्धि है, जनता के पास काम है. वो मेहनती है. खुश है, सुखी है और खुशहाल है. एक वंचित वर्ग के शासक बलिराजा को सिर पर ताज की उपाधि देते हुए सावित्री बाई कहती हैं:

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छत्रपति शिवाजी बड़े शूरवीर योद्धा और जननायक हैं. वंचित तबके की शूद्र-अतिशूद्र जनता उन्हें अपना हमदर्द मानकर सुबह सवेरे रोज याद करती है और उनके शौर्य गान गाती है.

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आगे वे इसी कविता में कहती है कि राजा नल, द्रौपदी युधिष्ठिर आदि का गान तो केवल शास्त्र पुराणों तक ही सीमित है जबकि शिवाजी की शौर्य गाथाएं इतिहास में दर्ज हो गई है और हमेशा रहेगी.

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शूद्र-अतिशूद्र और आदिवासी समाज में स्त्रियां बहुत बहादुर और जुझारू होती है. वेकठिन से कठिन हालात में भी हार नहीं मानतीं. मुसीबत आने पर भी किसी भी मोर्चे अपने समाज के साथ खड़ी होकर अपने बच्चों को साथ ले, बराबरी से डटकर मुकाबला करती है. महारानी छत्रपति ताराबाई ऐसी ही एक बहादुरी योद्धा थी. उनकी लडाकू वीरांगना की पदवी देते हुए सावित्रीबाई फुले उन्हें शत्रु मर्दिनी, शेर की तरह दड़ाडने वाली, बिजली से भी अधिक फुर्तीली बताती हैं.

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सावित्रीबाई फुले ने इस कुचाल को समझा कि यह सवर्ण समाज कभी दलितों वंचितों और शूद्रों को पढने लिखने नही देगा इसलिए सावित्रीबाई ने सबसे ज्यादा अपनी कविताओं के माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने की अलख जगाई. उन्हें अपने सामाजिक कार्यों द्वारा अनुभव हो चुका था कि शिक्षा के बिना, खासकर अंग्रेजी शिक्षा के बिना शूद्र अतिशूद्र तथाकथित मुख्यधारा के विकास में शामिल नहीं हो सकते. इसलिए वह शूद्र अति शूद्रों को अंग्रेजी पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती हैं और ‘अंग्रेजी मैया’ जैसी कविता लिखती हैं.

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इसी तरह अपनी दूसरी कविता ‘अंग्रेजी पढ़िए’ में शूद्रो अतिशूद्रों को अपनी जीवन शिक्षा से सुधारने के लिए कहती हैं:

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धार्मिक रूढियों, अंधविश्वास और आडंबर की पोल खोलकर उनका मजाक बनाते हुए, उस पर व्यंग्य करती हुई सावित्रीबाई अपनी ‘मन्नत’ कविता में कहती हैं:

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जिस समय सावित्रीबाई का पहला कविता संग्रह ‘काव्य फुले’ आया उस समय सावित्रीबाई फुले शूद्र-अतिशूद्र लड़कियों को पढ़ा रही थीं. ज्योतिबा सावित्री ने पहला स्कूल 13 मई 1848 में पहला स्कूल खोला था और काव्यफुले 1852 में आया. जब वे पहले पहल स्कूल में पढ़ाने के लिए निकली तो वे खुद उस समय बच्ची ही थी. उनके कंधे पर ज्यादा से ज्यादा बच्चों को स्कूल तक लाना तथा उन्हें स्कूल में बना बनाए रखने की भी बात होगी. सावित्रीबाई फुले ने बहुत ही सुंदर बालगीत भी लिखे है जिसमें उन्होने खेल खेल में गाते गाते बच्चों को साफ सुथरा रहना, विद्यालय आकर पढ़ाई करने के लिए प्रेरित करना व पढाई का महत्व बताना आदि है. बच्चों के विद्यालय आने पर वे जिस तरह स्वागत करती हैं, वह उनकी शिक्षा देने की लगन को दर्शाता है –

“सुनहरे दिन का उदय हुआ
आओ प्यारे बच्चों आज
हर्ष उल्लास से तुम्हारा स्वागत करती हूं आज”

विद्या को श्रेष्ठ धन बताते हुए वह कहती हैं

विद्या ही सर्वश्रेष्ठ धन है
सभी धन-दौलत से
जिसके पास है ज्ञान का भंडार
है वो ज्ञानी जनता की नज़रो में

अपने एक अन्य बालगीत में बच्चों को समय का सदुपयोग करने की प्रेरणा देते हुए कहती है-

काम जो आज करना है, उसे करें तत्काल
दोपहर में जो कार्य करना है, उसे अभी कर लो
पल भर के बाद का सारा कार्य इसी पल कर लो.
काम पूरा हुआ या नहीं
न पूछे मौत आने से पूर्व कभी

सावित्रीबाई फुले की एक बालगीत ‘समूह’ एक लघुनाटिका के समान लगती है. इस कविता में वे पांच समझदार पाठशाला जाकर पढने वाली शिक्षित बच्चियों से पाठशाला न जाने वाली अशिक्षित बच्चियों की आपस में बातचीत व तर्क द्वारा उन्हें पाठशाला आकर पढ़ने के लिए कहती हैं तो निरक्षर बच्चियाँ जवाब देती है-

क्या धरा है पाठशाला में
क्या हमारा सिर फिरा है
फालतू कार्य में वक्त गंवाना बुरा है
चलो खेलें हमारा इसी में भला है

उन्हीं में से कुछ बच्चियां कहती हैं:

रुको जरा मां से जाकर पूछेंगे चलो सारे
खेल खूद, घर का काम या पाठशाला?

सावित्रीबाई फुले जिन स्वतंत्र विचारों की थी, उसकी झलक उनकी कविताओं में स्पष्ट रूप से मिलती है. वे लड़कियों के घर में काम करने, चौका बर्तन करने की अपेक्षा उनकी पढाई-लिखाई को बेहद जरूरी मानती थी. वह स्त्री अधिकार चेतना सम्पन्न स्त्रीवादी कवयित्री थी.

“चौका बर्तन से बहुत जरूरी है पढ़ाई
क्या तुम्हें मेरी बात समझ में आई?”

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इस लघु नाटिका जैसे गीत के अंत में पांचों बच्चियों को शिक्षा का महत्व समझ में आ जाता है और वे पढ़ने के लिए उत्सुक होते हुए कहती हैं:

‘चलो चलें पाठशाला हमें है पढ़ना
नहीं अब वक्त गंवाना है
ज्ञान विद्या प्राप्त करें चलो अब संकल्प करें
मूढ़ अज्ञानता, गरीबी गुलामी की जंजीरों को
चलो खत्म करें.’

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सावित्रीबाई फुले बेहद प्रकृति प्रेमी थी. काव्यफुले में उनकी कई सारी कविताएं प्रकृति, प्रकृति के उपहार पुष्प और प्रकृति का मनुष्य को दान आदि विषयों पर लिखी गई है. तरह-तरह के फूल, तितलियाँ, भँवरे, आदि का जिक्र वे जीवन दर्शन के साथ जोड़कर करती है. प्रकृति के अनोखे उपहार हमारे चारों ओर खिल रहे तरह-तरह के पुष्प जिनका कवयित्री सावित्रीबाई फुले अपनी कल्पना के सहारे उनकी सुंदरता, मादकता और मोहकता का वर्णन करती है वह सच में बहुत प्रभावित करने वाला है. पीली चम्पा (चाफा) पुष्प के बारे में लिखते हुए वह कहती है-

‘हल्दी रंग की
पीली चम्पा
बाग में खिली, हृदय के भीतर तक बस गई
पता न चला मन में कब घर कर गई

ऐसे ही एक अन्य कविता है ‘गुलाब का फूल’. इस कविता में सावित्रीबाई फुले गुलाब और करेन के फूल की तुलना आम आदमी और राजकुमार से करके अपनी कल्पना के जरिए सबको विस्मित कर देती है –

गुलाब का फूल और फूल कनेर का
रंग रूप दोनों का एक सा
एक आम आदमी, दूसरा राजकुमार
गुलाब की रौनक, देसी फूलों से उसकी उपमा कैसी?

तितली और फूलों की कलियां कविता में सावित्री बाई फुले की दार्शनिक दृष्टि को विस्तार दिखता है. सावित्रीबाई फुले ने स्वार्थपरता की भावना को तितली के जरिए बयान किया है:

तितली आकाश में उड़ रही है अपने सुंदर पंख लिए-
तितलियां रंग-बिरंगी मन भावन
उनकी आंखे दिलकश सतरंगी, हंसमुख
पंख मुड़े किन्तु भरे उड़ान आकाश में
उनका रंग रूप मनभावन
तितली की मनभावन अदा को देख एक कली अपने पास बुलाने की भूल कर बैठी
उड़कर पहुंची तितलियां फूलों के पास
इकट्ठा कर शहद पी डाला
मुरझा गई कलियां
इसमें चमेली के फूल पर लिखा है-
फूलों कलियों का रस चखकर
ढूंढा कहीं ओर ठिकाना
रीत है यही दुनिया की
जरूरत और पल भर के हैं रिश्ते-नाते
देख दुनिया की रीत हो जाती चकित

सावित्रीबाई फुले अपने दाम्पत्य जीवन में, अपनी आजादी में, अपने आनंद में और अपने सामाजिक काम में ज्योतिबा फुले के प्यार, स्नेह और सहयोग को हमेशा दिल में जगाएं रखती थी. 50 साल के अपने दाम्पत्य जीवन में वे ज्योतिबा के साथ हर पल, हर समय उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलती रहीं और ज्योतिबा को अपने मन के भीतर संजोए रखा. ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले जैसा प्यार, आपसी समझदारी सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा और समाज के लिए मिसाल है.

“ऐसा बोध प्राप्त होता है
ज्योतिबा के सम्पर्क में
मन के भीतर सहेजकर रखती हूं
मैं सावित्री ज्योतिबा की.

संसार का रास्ता कविता में संसार के रास्ते से अलग चलते हुए वे कहती हैं.

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ज्योतिबा सावित्री संवाद कविता सावित्रीबाई फुले ने अपने और ज्योतिबा फुले के बीच केसुबह की सैर के वक्त की प्राकृतिक सुषमा का वर्णन किया है. ज्योतिबा सावित्रीबाई से सुबह होने पर रात के दुखी होने की बात करते हैं. इस बात का सावित्रीबाई फुले जवाब देते हुए कहती हैं कि क्या रात यदि यह इच्छा करती है कि प्रकृति सूर्य बिन रहे तो उसकी इच्छा उल्लू के सामान है जो सूरज को गाली गलौज और श्राप देने की कामना करता है.

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सावित्री का तर्क सम्मत जवाब सुन ज्योतिबा कहते हैं तुम ठीक कहती हो कि सावित्री शिक्षा के कारण अंधकार छट गया है और शूद्र महार जाग गए हैं. उल्लूओं की हमेशा इच्छा होती है कि शूद्र और महार दीन दलित अज्ञानियों की तरह जीवन जिए. मुर्गे को टोकरी से ढंकने पर भी वह बांग देना नही छोडता. कोई कितना कोशिश करे एक दिन शूद्र महार जनता अपना शिक्षा का अधिकार पाकर ही रहेगी.

‘सच कहा है तुमने, छटा अंधकार
शूद्रादि महार जाग गये
दीन दलित अज्ञानी रहकर दुख सहे
पशु भांति जिए यह उल्लुओं की है इच्छा
मुर्गा टोकरी से ढका रखने पर भी
देता है बांग
और जनता को बताने, सुबह होने की बात’

कविता के अंत में सावित्री घोषणा करती हैं:

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सावित्रीबाई फुले का दूसरा काव्य संग्रह ‘बाबनकशी सुबोधरत्नाकर’ ज्योतिबा फुले की याद में लिखा गया है. यह काव्य संग्रह ज्योतिबा फुले की प्रामाणिक जीवनी के रूप में उनके परिनिर्वाण के एक साल बाद 1891 में उनको सादर समर्पण के रूप में प्रकाशित हुआ. बाबनकशी या बावन तोले यानी बावन पद, जिसमें प्रत्येक पद 5-6 पंक्तियों का है. इन बाबन पदों में सावित्रीबाई फुले ने ज्योतिबा के जीवन संघर्ष, जीवन दर्शन, और उनके सामाजिक कार्यों द्वारा उस समय शूद्रों महारो स्त्रियों की स्थिति में आए क्रांतिकारी बदलावों का बहुत सच्चाई, प्रेम और सम्मान के साथ वर्णन हुआ है. बाबनकशी सुबोधरत्नाकर के आरंभ में ही कवयित्री सावित्री बाई फुले अपना काव्य संग्रह अपने जीवन साथी ज्योतिबा फुले को समर्पित करते हुए कहती है कि अब वह इस दुनिया में ही है पर मेरे चिंतन और मन में बसे हुए है-

करती है काव्य सृजन सहज
मन की भीतर रचती हूं दोहे फिर उतारती हूं
कागज़ पर गीत
जीवन साथी ज्योतिबा को अर्पित करती हूं गीत
आदर के साथ
वे अब दुनिया में नहीं किन्तु है वे मेरे चितंन में
और मेरे मन में बसे

सावित्री ज्योतिबा फुले के बारे में सोचती हुई कहती है ज्योतिबा उनके जीवन साथी तो है ही लेकिन वे इससे ज्यादा बढकर दलित और शूद्र समाज के अंधकारों को दूर करने वाले क्रांतिसूर्य भी है. वे अपनी कविता लिखने का उद्देश्य बताती है कि वे हमेशा वंचित शोषित समाज के लिए कविता लिखना चाहती है. “प्रणाम करती हूं मैं सभी शूद्रों को मैं सावित्री मनोभाव से, हमेशा सृजन करूं मैं कविताएं उनकी उन्नति के लिए.” कहना न होगा की क्रांतिकारी सामाजिक नेत्री कवयित्री सावित्री बाई फुले के लेखकीय सरोकार बहुत बड़े है. इस समाजिक सरोकार में लिखना भी शामिल है. सावित्रीबाई फुले अपने लेखन से सामजिक कार्य और उस सामाजिक कार्य से शुद्र दलितों की पीड़ा उजागर करते हुए उनके खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देती है.

प्रसिद्ध लेखक एम. जी. माली के अनुसार ‘बावनकशी सुबोध रत्नाकर ज्योतिबा फुले की सबसे पहली प्रमाणिक, उपलब्ध जीवनी है, जिसे सावित्रीबाई फुले ने बावन पदों में काव्यात्मक शैली मं लिखा है’.’बावन कशी’ में सावित्री बाई फुले उस समय के धार्मिक पाखंड से पूर्ण समाज और उसके ठेकेदारों चेले चेलियों का वर्णन करते हुए कहती है-

यात्रा करें शिष्या, चेलियां शंकराचार्य के मेले में
पुकार करे रूढिया मूर्खता से
आचार-रीति-रिवाज का करो पालन

सावित्रीबाई फुले के अनुसार मनुस्मृति को शूद्र समाज की दुर्दशा का कारण है. इस मनुस्मति के कारण ही चार वर्णों का जहरीला निर्माण हुआ है. इसी के कारण समाज में दलित शूद्रों की स्थिति और जीवन भयानक मानसिक और सामाजिक गुलामी में बीता है. यही पुस्तक सारे विनाश की जड़ है.

“मनुस्मृति की कर रचना,
मनुचार वर्णों का जहरीला निर्माण करे
उनकी कदाचारी रूढ़ि परंपरा हमेशा चुभन भरी
स्त्री शूद्र सारे गुलामी की गुफा में बन्द
पशु की भांति शूद्र बसते हैं दड़बो में”

पेशवा राज में शूद्र और दलितों की स्थिति किसी काल्पनिक नरक की अवधारणा से भी ज्यादा भयंकर थी और उस असहनीय यातना घर की तरह थी जिसमें शूद्र और दलितों को एकदम पद दलित की स्थिति पर खड़ा कर दिया. जिसमें उनकी स्थिति पशुओं से भी खराब हो गई थी.

पेशवा ने रात पसारे, वे सत्ता, राजपाठ संभाले
शूद्र करे शूद्र हो गए भयभीत
थूक करे जमा, गले में, बंधे मटके में
रास्तों पर चलने पर लगी पाबंदी
चलो धूल भरी पगडंडी, कमर पर बांधे
झाडू से निशान मिटाकर
इतनी अधिक पेशवाओं ने खड़ी की बाधाएं
अतिशूद्र बनाकर, नीच कहकर
अपनी नीचता दिखाकर

सावित्रीबाई फुले अपने काव्य के माध्यम से पेशवाराज के जुल्मों का वर्णन करते हुए बताती है कि पेशवाराज मे शूद्रों-अतिशूद्रों के साथ उच्च वर्ग की स्त्रियों के हालात भी इतने बदतर थे कि पेशवा के बुलाने पर उसी की ऊंच जाति का निर्लज्ज पति अपनी पत्नी को यह करते हुए कि “चलो हवेली, एक सुनहरा मौका आ खड़ा हुआ है’ कहकर रावबाजी पेशवा के यहां छोड़ आया करता था.

पेशवराज के बाद अंग्रेजों के आगमन पर जब शूद्र और दलित वर्ग शिक्षा की ओर थोड़ा सा अग्रसर हुआ तो भट-ब्राह्मण दलित और शूद्रों का मज़ाक बनाते थे. उनकी इस अभद्रता के खिलाफ बोलते हुए सावित्री कहती है-

ज्ञानी बनता देख भट ब्राह्मण जले-कहे
भेड़ बकरियों को देख कैसे ईसा हांके
बरगलावे बामन झूठी है उनकी चिल्लाहट

बावन्नकशी में वे ज्योतिबा के जन्म से लेकर पालन-पोषण, शिक्षण और उनके सामाजक कार्यों का बेहद सरल और रोचक शैली में वर्णन करती है. ज्योतिबा ने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ अपनी बड़ी बहन सगुणाबाई और अपनी जीवन साथी सावित्रीबाई को भी पढ़ाया. वे कहती हैं:

“प्यासे अतिशूद्रों के लिए घर के कुएं से
पानी पिलाने और भरने की
की अनोखी शुरूआत
पढ़ाया दलितों को अपने अधिकारों का पाठ

ज्योतिबा युग चेतना के अविष्कारक हीं नहीं थे, युगदृष्टा भी थे. ज्योतिबा ने एक बच्चे को गोद लिया तथा उसे पढ़ाया लिखाया डॉक्टर बनाया और उसको भी अपने साथ सामाजिक कार्य में जोड़ा. सावित्री बाई फुले ज्योतिबा की तुलना संत तुकोबा करते हुए कहती है – “जैसे संत तुकोबा वैसे संत ज्योतिबा . क्रांतिसूर्य ज्योतिबा का सबसे बड़ा योगदान उनका शूद्र दलित जनता को लगातार शिक्षा की ओर प्रेरित करते हुए बाह्मणवाद के अस्त्र-शस्त्र के पाखंड से निपटने का रास्ता दिखाना भी है.

करते रहे बयान ज्योतिबा सच्चाई
कि अंग्रजी मां का दूध पीकर
बलवान बनो
और किया संकल्प, करते रहे प्रयास शूद्रों की
शिक्षा के संसार में सुख शान्ति समाधान के लिए

ज्योतिबा ने दुखी-जन, स्त्रियों, शुद्रों और दलितों की तरक्की, उनकी इंसानी गरिमा को बरकरार रखने, उनके ऊपर हो रहे जुल्मो सितम के खिलाफ खड़े होने, उनको सशक्त बनाने के लिए अनथक कार्य किए. यहीं कारण था और है कि दलित जनता उन्हें अपना सच्चा हितैषी मानती थी-

“यद्दपि ज्योतिबा का जन्म हुआ वहां
जिन्हें शूद्र माली के नाम से पुकारा जाता था
सच्ची दलित जनता उन्हें माली जाति का नाम,
अपना मुक्तिदाता मानते थे”

बावन्नकशी सुबोधरत्नाकर काव्य-संग्रह के अंत में सावित्री अपने लेखन की कसौटी अपनी दलित शूद्र जनता को ही बनाते हुए कहती है कि-

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वर्ण व्यवस्था के पूर्वाग्रह से ग्रसित ब्राह्मणवादी जातीय समाज के कर्ता-धर्ताओं ने सच्ची क्रांतिकारी, महान क्रांति सूर्या सावित्रीबाई फुले के इतने कामों के बाद भी उनके अमूल्य योगदान का आकलन कभी ठीक से किया ही नहीं, परंतु वह दिन अब दूर नहीं जब उनके संपूर्ण योगदान के पन्नों को एक एक करके खोल लिया जाएगा. यह हिंदी में अनुवादित काव्य संग्रह उसी किताब का एक ढंका पन्ना है जिसे अनीता भारती ने खोलकर पाठकों के समाने रखने की कोशिश की है.


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