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कभी सोचा है, बिना रंग का आसमान नीला क्यों दिखाई देता है?

28 फ़रवरी. अगर लीप इयर नहीं है तो फरवरी का आख़िरी दिन. सर चंद्रशेखर वेंकट रमन ने हमें रमन इफ़ेक्ट का सिद्धांत दिया. और इसीलिए 1999 से 28 फ़रवरी को नेशनल साइंस डे के रूप में मनाये जाने का रिवाज़ शुरू हो गया. सीवी रमन को इसी रमन इफ़ेक्ट के लिए 1930 में नोबेल प्राइज़ मिला था.

फ़िल्म आई थी रॉक ऑन. फ़रहान अख्तर लीड में था. गाना गाता था. बैंड था. मैजिक. एक गाना था – सोचा है? उसमें एक सवाल पूछा जाता है. “आसमां है नीला क्यूं, पानी गीला-गीला क्यूं, गोल क्यूं है ज़मीं…” मज़े की बात ये है कि आसमां के नीले होने की बात रॉक ऑन बनने से सालों पहले मालूम हो चुकी थी. फ़रहान अख्तर ने क्लास में ध्यान दिया होता तो ये गाना नहीं लिखते. खैर, अब सुन लें. ताकि कोई भी कन्फ्यूज़न न रहे.

सीवी रमन और लाइट स्कैटरिंग

सीवी रमन. चंद्रशेखर वेंकट रमन. भारत में साइंस के लिए नोबल प्राइज़ जीतने वाले एकमात्र शख्स. इन्होंने जो खोज की उसे रमन स्कैटरिंग (Raman Scattering) के नाम से जाना गया. हमें मालूम है कि लाइट की किरणें एक जगह से दूसरी जगह ट्रैवेल करती हैं. इनका ट्रैवेल ठीक वैसा है जैसा स्कूल से घर वापस जाते लड़कों के एक झुंड का. वो या तो एक साथ अपने-अपने घर जाते हैं. या फिर रस्ते में तितर-बितर हो जाते हैं. इन लाइट रेज़ का ट्रैवेल दो तरह से होता है. ये किरणें या तो एक सीधी रेखा में चलती जाती हैं. या फिर किसी मटीरियल के संपर्क में आने पर बिखर जाती हैं. सीधी रेखा में जाने को Light Transmission कहते हैं और उनके बिखरने को Light Scattering कहते हैं.

raman cover

स्कैटरिंग दो तरह की होती है. लेकिन इससे पहले जानते हैं कि स्कैटरिंग होती कैसे है. जब लाइट वेव किसी मैटर से टकराती है तब वो बिखरती है. मगर इसमें सारा खेल फ्रीक्वेंसी का होता है. ये ठीक वैसा है जैसा स्कूल से वापस आते लड़कों के झुंड के साथ होता है. वो लड़के वापस आते वक़्त बगल वाले स्कूल के लड़कों से मिलते हैं. ऐसे में दो केस हो सकते हैं. या तो वो उन लड़कों के संपर्क में आकर अपनी आदतें बदल लेते हैं. कोई मार-पीट सीख जाता है. कोई सिगरेट पीना शुरू कर देता है. कोई अगले की कोचिंग में जाने लगता है. या फिर उन पर उस दूसरे स्कूल के लड़कों से मुलाक़ात का कोई असर नहीं पड़ता. वो उनसे मिलता है, बिना कोई बदलाव के घर पहुंच जाता है. यही स्कैटरिंग के दो प्रकार हैं. जब रेज़ मैटर से मिलने पर अपनी फ्रीक्वेंसी में बिना किसी बदलाव के स्कैटर होती हैं, उसे रेली स्कैटरिंग (Reyleigh Scattering ) कहते हैं. लेकिन जब रेज़ मैटर से टकराने पर अपनी फ्रीक्वेंसी बदली हुई पाती हैं और स्कैटर होती हैं तो उसे रमन स्कैटरिंग (Raman Scattering) कहा जाता है. ये रमन स्कैटरिंग सीवी रमन के ही नाम पर रखा गया है.

Raman scattering

आसमां है नीला क्यूं पानी गीला गीला क्यूं?

आते हैं आसमान के नीले होने पर. हवा में ज़्यादातर नाइट्रोजन और ऑक्सीजन गैस होती है. बाकी सभी गैसों का परसेंटेज बहुत ही कम होता है. ये ऑक्सीजन और नाइट्रोजन के मॉलिक्यूल सोलर रेडियेशन को बिखेरते हैं. यानी स्कैटर होते हैं. यानी स्कैटरिंग हो रही है. स्कैटरिंग के लिए एक फ़ॉर्मूला होता है. इसमें फ्रीक्वेंसी इस्तेमाल की जाती है. हर रंग की अपनी फ्रीक्वेंसी होती है. इसलिए वो रंग दूसरे से अलग दिखता है. हमें रंग बदलता दिखता है जबकि असल में फ्रीक्वेंसी बदल रही होती है. यानी जैसे-जैसे फ्रीक्वेंसी बदलेगी, रंग बदलता है. फ़ॉर्मूले के हिसाब से फ्रीक्वेंसी जितनी ज़्यादा होगी, स्कैटरिंग उतनी ज़्यादा होगी. नीले रंग की फ्रीक्वेंसी सबसे ज़्यादा होती है. इसलिए वो सबसे ज़्यादा स्कैटर होकर हमारी आंखों तक पहुंच जाता है.

असल में आसमान का कोई भी रंग नहीं होता है. सारा खेल उन लड़कों का है जो स्कूल से झुंड बनाकर निकले थे. जिन्हें रास्ते में कुछ और लड़के मिल गए. उनमें कुछ बदलाव आये. मोहल्ले के लोग उन्हें घर पहुंचने पर जिस तरह की दशा में पाते हैं, स्कूल की छवि वैसी ही बन जाती है. और यही काम स्कैटरिंग में हो रहा होता है जिसकी वजह से आसमान नीला दिखता है. स्कूल कैसा भी हो, सारा खेल मोहल्ले के लड़के के बने इम्प्रेशन का ही होता है, इस बात को रमन जी भी न झुठला पाए.

blue sky

रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी

रमन का मेन काम ये था. और बड़े काम का था. मान लीजिये कि आपको सेब खाना है. आपके हाथ में एक सेब है. मगर क्या गारंटी है कि सेब एकदम ठीक है. वैसा ही है जैसा होना चाहिए. इसका जुगाड़ था रमन जी के पास.

रमन ने कहा कि आप सेब के सैम्पल पर लेज़र लाइट मारिये. सारी लाइट्स मैटर के साथ इंटरैक्ट करती हैं. कोई भी सतह अगर किसी रंग की दिख रही है तो वो इसलिए क्यूंकि वो उस पर्टिकुलर वेवलेंथ की रेज़ को रिफ्लेक्ट कर रही है. मगर जब किसी मैटर पर लेज़र रे फेंकी जाती है तो रमन स्कैटरिंग की वजह से कुछ रेज़ दूसरी वेवलेंथ की भी बन जाती हैं और वो रिफ्लेक्ट होती हैं. इन्हीं रिफ्लेक्ट हुई अलग वेवलेंथ को नाप कर रिकॉर्ड कर लिया जाता है. उसे ग्राफ के फॉर्म में बना लिया जाता है. दुनिया में हर अलग चीज का अलग ग्राफ बनता है. हर चीज का अपना एक आइडियल ग्राफ होता है. आप नापे हुए ग्राफ़ को आइडियल ग्राफ़ से कम्पेयर करेंगे तो रिज़ल्ट सामने आ जायेंगे.

ये वैसा ही है कि आपको किसी स्कूल में कुछ चीज़ें चाहिए. चाहिए ही चाहिए. आप अपने बेटे को किसी स्कूल में दाखिला दिलवाने ले जाते हैं. वहां उन चीज़ों को नहीं पाते हैं. इसका मतलब ये वो स्कूल नहीं है जिसमें आप अपने बेटे को पढ़ाना चाहेंगे. आप चले आते हैं. स्कूल में वो सभी चीज़ें आपको मिलती हैं तो आप उसका एडमीशन वहीं करवा देते हैं. 


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