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क्या है वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट, जिसको लेकर लोग पीएम मोदी को घेर रहे हैं?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो सोशल मीडिया पर खूब चल रहा है. इसमें वो एक मोर को खाना खिलाते हुए दिखाई दे रहे हैं. पहले आप वो वीडियो देख लीजिए:

उन्होंने एक ट्वीट भी किया, जिसमें मोर के लिए उन्होंने एक कविता पोस्ट की.

जब से ये वीडियो पोस्ट हुआ, तब से ख़बरों में है. कुछ लोग तारीफ कर रहे हैं, तो कई लोग पीएम मोदी की आलोचना कर रहे हैं. कई लोगों ने वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट का हवाला दिया कमेंट्स में. कहा इसके तहत घरों में मोर को पालना गैर-कानूनी है, तो फिर ये प्रधानमंत्री आवास पर कैसे दिख रहे हैं?

किस्से के पीछे का किस्सा

ऐसा ही मुद्दा साल 2017 में उठा था. उस समय RJD सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के आधिकारिक आवास, पटना के 10, सर्कुलर रोड पर मोर और मोरनी का एक जोड़ा लाया गया था. उस वक़्त वन और पर्यावरण विभाग की ज़िम्मेदारी लालू के बेटे तेज प्रताप यादव के पास थी. इस पर लालू यादव को घेरा गया था. कहा गया था कि घरों में मोर रखकर वो कानून की अवहेलना कर रहे हैं.

Wlp Act
वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट से एक पन्ना.

उसी साल DNA में छपी रिपोर्ट के अनुसार, पटना के जू डायरेक्टर ने इसके पीछे की वजह भी बताई थी. नन्द किशोर ने बताया था कि ये पहली बार नहीं है कि मोर रिहायशी इलाकों में शिफ्ट किए गए हैं. पटना जू में कई मोर हैं, और उनमें से कुछ मोरों को खुले इलाकों में छोड़ा जाएगा, ताकि वो आज़ादी से घूम-फिर सकें. उन्होंने ये भी कहा था कि जू के आस-पास मौजूद दूसरे घरों में भी मोर छोड़े गए हैं. इस पूरे विवाद के फौरन बाद ही खबर आई कि एक मोर के उड़ जाने के बाद दूसरे को भी संजय गांधी जैविक उद्यान भेज दिया गया.

अब पीएम मोदी के इस वीडियो के सामने आने के बाद सवाल खड़े किए जा रहे हैं.

नेता क्या कह रहे हैं

ThePrint में छपी रिपोर्ट के अनुसार, RJD सदस्य श्याम रजक ने कहा,

“जब लालूजी के घर दो मोर लाए गए थे, तब BJP ने वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट, 1972 के तहत उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी. ये कानून संसद ने पास किया है और ये सबके साथ-साथ पीएम मोदी की भी ज़िम्मेदारी है कि वो इसका पालन करें.”

इसी रिपोर्ट के मुताबिक़, BJP की स्पोक्सपर्सन रजनी रंजन पटेल ने कहा,

“लालूजी मोरों को पिंजरे में रखते थे. पीएम मोदी उन्हें एक बड़े से कैम्पस में रखते हैं, जहां वो खुले में घूम सकते हैं. मोर पीएम मोदी से लगाव महसूस करते हैं. जब वो वहां मौजूद होते हैं, तो मोर खुद उनके पास आते हैं. इसके पीछे वजह ये है कि पीएम मोदी को जंगली जीव-जंतु और प्रकृति से प्रेम है.”

क्या है वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट, 1972

भारत की संसद ने ये एक्ट सितम्बर, 1972 में पास किया था. भारत में वन्य जीवों, पक्षियों और पौधों के संरक्षण के लिए. इस एक्ट में उन जानवरों की लिस्ट भी जारी की गई थी, जिनका शिकार करना या उन्हें कैद में रखना गैरकानूनी है. इस एक्ट के जरिये वाइल्डलाइफ एडवाइजरी बोर्ड और वॉर्डन्स की नियुक्ति करने के भी नियम जारी किए गए. नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ भी इसी एक्ट के तहत गठित किया गया.

इस एक्ट में छह शेड्यूल हैं. हर शेड्यूल में शामिल जानवरों के लिए अलग अलग नियम हैं.

1. जैसे शेड्यूल एक में आने वाले सभी जानवर और पक्षी ‘इंडेंजर्ड’ श्रेणी में आते हैं. यानी इन्हें संकटग्रस्त कहा जाता है. इनका शिकार पूरी तरह से प्रतिबंधित है. इनका व्यापार या इनसे जुड़े किसी भी उत्पाद का व्यापार पूरी तरह गैर-कानूनी है. जैसे बाघ, ब्लैकबक (जिसके शिकार के आरोप में सलमान खान पर केस चल रहा है), चीता, तेंदुआ, ब्लू व्हेल, डॉल्फिन, चिंकारा इत्यादि. इन्हें पालतू जानवर के रूप में भी नहीं रखा जा सकता.

2. शेड्यूल दो में आने वाली सभी जानवरों/पक्षियों को भी ऊंचे दर्जे की सुरक्षा प्राप्त है. इनका शिकार भी प्रतिबंधित है. जैसे लंगूर, कश्मीरी लोमड़ी, उड़ने वाली गिलहरी इत्यादि.

Squirrel India Wiki
उड़ने वाली गिलहरी. (तस्वीर: विकिमीडिया)

3. इस लिस्ट में शामिल जानवरों/पक्षियों को मारना प्रतिबंधित है, जब तक कि वो किसी व्यक्ति की जान को खतरा न बन जाएं. या फिर उन्हें ऐसी बीमारी हो, जिससे वो ठीक न हो सकते हों और उनका जीना मुश्किल हो रहा हो.

4. शेड्यूल तीन और चार में वो जानवर/पक्षी आते हैं, जो संकटग्रस्त नहीं माने जाते. इनके शिकार पर भी सज़ा है, लेकिन उतनी कड़ी नहीं है, जितनी शेड्यूल एक और दो में आने वाले जानवरों/पक्षियों के लिए.

5. शेड्यूल पांच में वो जानवर/पक्षी आते हैं, जिनका शिकार किया जा सकता है. जैसे चूहे, छछूंदर, फल खाने वाले चमगादड़ इत्यादि.

6. शेड्यूल छह में वो पौधे आते हैं, जिनकी खेती नहीं की जा सकती . जैसे कुठ, पिचर प्लांट, वगैरह.

मोर किसमें आता है

मोर शेड्यूल एक के सेक्शन 2 में आने वाला पक्षी है. इस श्रेणी में आने वाले जानवरों/पक्षियों इत्यादि को घर में पालतू की तरह रखना गैर-कानूनी है. एक्ट के चैप्टर छह के सेक्शन 51 के तहत कोई भी व्यक्ति अगर इस कानून को तोड़ता हुआ पाया जाता है, तो उसे तीन साल तक की जेल या 25 हजार रुपये जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं. ये बताता है कि अगर कोई व्यक्ति दोबारा इस तरह के अपराध में पकड़ा जाता है, तो उसे कम से कम तीन साल और अधिक से अधिक सात साल तक की जेल हो सकती है. जुर्माने की लिमिट भी कम से कम 10 हजार रुपए निर्धारित की गई है.

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उड़ने वाली गिलहरी. (तस्वीर: विकिमीडिया)

यही नहीं, अगर ये अपराध किसी नेशनल पार्क या सेंक्चुअरी (अभयारण्य) में किया गया हो, तब भी सज़ा सात साल तक बढ़ाई जा सकती है. फिर चाहे व्यक्ति ने वो अपराध पहली बार ही क्यों न किया हो. अगर दूसरी बार ऐसा अपराध किया जाता है, तो जुर्माने की लिमिट कम से कम 25 हजार रुपए रखी गई है.

अगर कोई व्यक्ति संरक्षित जानवरों/पक्षियों का शिकार करने के लिए किसी हथियार का इस्तेमाल करता है, तो आर्म्स एक्ट के तहत दिया गया उसका लाइसेंस भी रद्द कर दिया जाएगा, ऐसा इस एक्ट में कहा गया है.


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