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'विव रिचर्ड्स खुश थे कि उनके लिए बुरा सपना बन चुके चन्द्रशेखर उस मैच में नहीं खेल रहे थे'

रामचंद्र गुहा ने जब 1965 में इस खेल को फॉलो करना शुरू किया था, तब विश्व क्रिकेट में भारत का कद बहुत छोटा था. देश ने तब तक विदेशी धरती पर एक भी टेस्ट मैच नहीं जीता था. कुछ 50 साल बाद जब वो बीसीसीआई में शामिल हुए, भारत इस खेल पर एकछत्र राज कर रहा था. क्रिकेट का कॉमनवेल्थ इस बदलाव की कहानी है. इस किताब के जरिये आप भारत में स्कूल, कॉलेज, क्ल, राज्य और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेले जाने वाले क्रिकेट की नस-नस से वाकिफ हो सकते हैं. ये किताब स्थानीय नायकों, प्रांतीय उस्तादों और अंतर्राष्ट्रीय सितारों की चमकदार तस्वीर पेश करती है.


उन दिनों जब भारत में 5 दिनों की टेस्ट सीरीज़ खेली जाती थी, मैच दिल्ली, बॉम्बे, मद्रास, कलकत्ता और कानपुर में खेले जाते थे. इससे होता ये था कि हर ज़ोन के पास एक मैच आता था. मगर वेस्ट इंडीज़ के खिलाफ़ इस सीरीज़ के लिए एम चिन्नास्वामी ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड से दरख्वास्त की और कानपुर का मैच बैंगलोर की झोली में आ गया.

और इस तरह से चिन्नास्वामी स्टेडियम ने इंडिया और वेस्ट इंडीज़ के बीच खेले जाने वाले पहले टेस्ट की मेज़बानी की. इंडिया की तरफ़ से एक ऐसा खिलाड़ी नहीं खेल रहा था जो बीते 8 सालों से टीम में होता ही होता था- बिशन सिंह बेदी. उन्हें क्रिकेटीय वजहों से नहीं हटाया गया था, बल्कि उन्हें इसलिए बाहर बैठना पड़ा था क्यूंकि उन्होंने एक टेलीविज़न इंटरव्यू में भारतीय क्रिकेट के कुछ नामों की आलोचना कर दी थी. उनकी जगह हरियाणा के बाएं हाथ के स्पिनर राजिन्दर गोयल को लिया गया था, लेकिन वो अन्तिम ग्यारह में जगह नहीं बना पाए.

वेस्ट इंडीज़ ने ग्रीनिज, कालीचरण और लॉयड की बैटिंग की बदौलत पहला टेस्ट मैच जीत लिया. इसके साथ ही उन्हें ऐंडी रॉबर्ट्स की गेंदबाज़ी का भी बेहतरीन साथ मिला. रॉबर्ट्स के एंटीगुआ के साथी विवियन रिचर्ड्स बल्ले से सफल नहीं रहे. वो पहली इनिंग्स में 4 और दूसरी में 3 पर आउट हुए. दोनों ही मौकों पर भगवत चन्द्रशेखर ने उन्हें वापस भेजा.

दूसरा टेस्ट दिल्ली में होना था. मैं बेसब्री से इसका इन्तज़ार कर रहा था. लेकिन इसका टिकट कहां से आता? मैंने अपने परिवार के कनेक्शन का जुगाड़ लगाकर भारतीय टीम के रिज़र्व विकेटकीपर सैयद किरमानी से सम्पर्क किया. वो उसी जगह रहते थे जहां मेरे नाना-नानी रहते थे और उसी कॉलेज में पढ़ते थे जिसमें मेरे सबसे छोटे मामा शंकर पढ़ते थे. मैच से एक शाम पहले मैं किरमानी से मिलने मेडेन्स होटल पहुंचा जहां भारतीय टीम रुकी हुई थी. उन्होंने मुझसे कहा कि उनके पास अगले दिन के टिकट नहीं थे, लेकिन उन्होंने मुझसे अगले दिन फिर आने को कहा.

ramchandra guha
रामचंद्र गुहा. (फाइल फोटो- इंडिया टुडे)

इस मैच में बेदी खेल रहे थे, लेकिन कप्तान पटौदी और उपकप्तान गावस्कर, दोनों को चोट की वजह से बाहर बैठना पड़ा. टीम में वरिष्ठता के आधार पर विकेटकीपर फ़ारुख इंजीनियर को कप्तान होना था. मैच शुरू होने से एक रोज़ पहले एक रिसेप्शन के दौरान बोर्ड के उपाध्यक्ष आरपी मेहरा ने इंजीनियर को बता भी दिया था कि वो ही अगले रोज़ इंडिया की कप्तानी करने वाले थे. लेकिन रात भर में ही ये आदेश बदल दिया गया. क्यूंकि मद्रास के एम.ए. चिदम्बरम ने उनके फ़ैसले को बदलवा दिया. तमिलनाडु से आने वाले चिदम्बरम चाहते थे कि उनकी ही ज़मीन के एस वेंकटराघवन इंडिया की कमान संभालें. चूंकि टीम में प्रसन्ना और बेदी को तो होना ही होना था, वेंकटराघवन को टीम में जगह देने के लिए विव रिचर्ड्स के लिए बुरा सपना बन चुके चन्द्रशेखर को प्लेयिंग इलेवन से हटाना पड़ा.

मैंने पहले दिन का खेल टीवी पर देखा. इंडिया 220 रनों पर आउट हो चुकी थी और दिन का खेल ख़त्म होने पर वेस्ट इंडीज़ 1 विकेट खोकर 10 रन बना चुकी थी. उस शाम मैं एक बार फिर मेडेन्स होटल गया जहां किरमानी ने मुझसे कहा कि उनके पास फिर टिकट नहीं था और मैं अगले दिन फिर जाकर तीसरे, चौथे और पांचवें दिन के टिकट के बारे में जान सकता हूं. मैं बेहद दुखी मन से वापस कॉलेज लौटा. लेकिन यहां मुझे ख़ुशी तब मिली जब मेरी क्लास के एक लड़के ने मुझे बताया कि उसके पास एक एक्स्ट्रा टिकट था जो उसके दोस्त के पापा ने दिलवाया था. उसके दोस्त के पापा एजुकेशन मिनिस्ट्री में सेक्रेटरी थे.

ये टिकट नये-नये बने आरपी मेहरा ब्लॉक का था (जीते-जागते क्रिकेट अधिकारियों के नाम पर भवनों का नाम रखने की रवायत सिर्फ़ बैंगलोर तक ही सीमित नहीं थी. चेपॉक के मद्रास स्टेडियम का नाम एम.ए. चिदम्बरम के नाम पर रखा जा चुका था). ये स्टैंड साइट-स्क्रीन के ठीक ऊपर था जहां से मैदान का सबसे अच्छा व्यू मिल रहा था. मैं खेल शुरू होने से एक घंटा पहले ही आ गया था. मैं जहाँ बैठा था, उसके ठीक नीचे इस मैच के कप्तान एस वेंकटराघवन फ़ील्डिंग प्रैक्टिस कर रहे थे. एक ग्राउंड बॉय रोलर पर काफ़ी ज़ोर से गेंदें फेंक रहा था और वेंकट उससे उछलकर आती गेंदों को लपक रहे थे. वो दाहिने, बायें, ऊपर, नीचे कूद रहे थे और गेंद उनके किसी एक हाथ में आकर थम रही थी. ये एक शानदार प्रदर्शन था जो शायद मेरे ही मुनाफ़े के लिए पेश किया जा रहा था.

जब खेल शुरू हुआ तो बेदी एक छोर से आए और सैयद आबिद अली की मीडियम पेस दूसरे छोर से. आबिद ने बड़ी आशा के साथ ग्रीनिज के सामने गेंद पटकी और ग्रीनिज ने उन्हें स्क्वायर लेग के ऊपर हुक मार दिया. मैंने ऐसा कातिलाना हुक शॉट इससे पहले कभी नहीं देखा था. जैसे कॉलेज में होता था, उससे उलट, गेंद हवा में ऊपर की ओर नहीं बल्कि मैदान के समानान्तर मारी गई थी. वो ज़मीन से 8 फ़ीट से ऊपर उठी ही नहीं. सीमा-रेखा के पार जाते हुए भी गेंद बेहद नीचे ही थी और जाकर सीमेंट की सीढ़ियों पर जा टकराई.

ग्रीनिज के साथ नाइटवॉचमैन बैटिंग कर रहा था. ये हज़रत थे बायें हाथ से धीमी गेंदें फेंकने वाले सेंट कीट्स के एलेक्वेमेडो टोनितो विले. प्रसन्ना ने इन दोनों को खेल के पहले ही घंटे में निपटाया और फिर कालीचरण और रिचर्ड्स क्रीज़ पर आ गए. कालीचरण जहां शॉट्स पर शॉट्स मार रहे थे वहीं रिचर्ड्स ने शुरुआत बेहद आराम से की. रिचर्ड्स ख़ुश थे कि चन्द्रशेखर नहीं खेल रहे थे लेकिन फिर भी वो हड़बड़ी में नहीं थे. अगले दिन अख़बारों ने दावा किया कि रिचर्ड्स ने 5 रनों के स्कोर पर वेंकट की गेंद पर कीपर को कैच दे दिया था, लेकिन उन्हें आउट नहीं दिया गया. मुझे ये कतई याद नहीं है. लेकिन हां, मैं कालीचरण के वो ख़ूबसूरत लेट कट और लेग साइड में खेली गई तमाम ग्लाइड नहीं भूला हूं.

जब कालीचरण 44 रनों पर थे, उन्होंने बेदी को मिड विकेट के ऊपर से मारना चाहा. बल्ले का ऊपरी किनारा लेकर गेंद हवा में उठ गई. सरदार चिल्लाया, “बृजेश!” उनकी आवाज़ स्टैंड्स में हम तक पहुंच गई. पटेल ने वो कैच पकड़ा और वेस्ट इंडीज़ 4 विकेट खोकर 123 रनों पर पहुंच गई. दरवाज़े तो खुल चुके थे, लेकिन उन्हें दौरे पर आई टीम के कप्तान ने आकर बन्द कर दिया.

लॉयड अपनी उस विशाल देह के साथ साक्षात् मैदान पर उतरे. उनकी मूंछ और चश्मे ने उनके सभी इरादों को पर्दे में रखा हुआ था. दिसम्बर 1974 में और उसके आस-पास वो दुनिया के सबसे ख़तरनाक बल्लेबाज़ थे. (ऑस्ट्रेलिया के बॉलर गैरी गिलमोर से पूछा गया था कि वो लॉयड को कैसे बॉलिंग करने की सोचते हैं तो उन्होंने कहा था—‘हेलमेट लगा के.’) घंटे भरे में ही उन्होंने गेम पलट के रख दिया. वेंकट को पहले पुल मारा और फिर मिड-विकेट के ऊपर छक्का जड़ा. बेदी को करारे स्क्वायर कट मारे गए, लेकिन सबसे ख़तरनाक शॉट था प्रसन्ना को मारी गई बैक-फ़ुट ड्राइव. गेंद घास के नतमस्तक तिनकों को रौंदते हुए, बाउंड्री पर पहुंची.

ओवरों के बीच लॉयड रिचर्ड्स से बात कर रहे थे. वो उस नये लड़के में हिम्मत भर रहे थे. इसके बाद रिचर्ड्स के भी हाथ खुले. उनके शॉट्स में अलग ही क्लास था. वेंकट ने आबिद को अटैक पर लगाया लेकिन रिचर्ड्स ने उन्हें ऑफ़-साइड में 2 बार बाउंड्री पहुंचाया. अम्पायर के एक बेहद बकवास फैसले पर लॉयड आउट हुए. और जब तक वो गए, पासा पलट चुका था. बेदी को छक्के के लिए ऑफ़ ड्राइव मारने के बाद एक चौके की मदद से रिचर्ड्स अपने शतक तक पहुंचे. उन्हें पहले तो अच्छी ड्राइव मारने वाले बर्नार्ड जूलियन का साथ मिला और फिर स्वीप मारने वाले कीथ बॉयस का. दिन का खेल ख़त्म होने तक वेस्ट इंडीज़ ने 6 विकेट के नुकसान पर 378 रन बना लिए थे और मैच उनकी मुट्ठी में था.

जैसा कि मैंने कहा है, मुझे 1974 में दिल्ली में खेले गए उस मैच के पहले दिन का खेल ज़्यादा कुछ याद नहीं है. मैंने वो टीवी पर देखा था. लेकिन दूसरे दिन का एक-एक मिनट मेरे ज़हन में छपा हुआ है. एक-एक कर के ग्रीनिज, लॉयड, रिचर्ड्स, बॉयस और जूलियन के मारे कुल पांच छक्के. प्रसन्ना और बेदी की कलात्मक गेंदबाज़ी. दिन भर हुई कमाल की फ़ील्डिंग और वेंकट का कैचिंग प्रैक्टिस के दौरान किया वो प्रदर्शन जिसके गवाह 2 लड़के और एक कौवा था.

इस सब के अलावा एक और बात है जो मैं कभी भी नहीं भूल पाऊंगा. ये वाकया चायकाल के दौरान का था. मैं सूसू करने के लिए नीचे उतर रहा था और कीथ बॉयस के बगल से गुज़रा. वो विलिंग्डन पवेलियन की सीढ़ियों पर खड़े बीड़ी पी रहे थे. मैंने ऊपर से नीचे तक उन्हें देखा. उन्होंने चटक सफ़ेद रंग टिप-टॉप किट पहनी हुई थी, शर्ट के बटन खुले थे, फ़ास्ट बॉलर वाले बड़े जूते पहने हुए थे और फ़ास्ट बॉलर वाला ही शरीर भी था. और वो बेहद सलीके से पकड़ी गई बीड़ी उन पर पूरी फ़ब रही थी.

पुस्तक – क्रिकेट का कॉमनवेल्थ
लेखक – रामचंद्र गुहा
अनुवाद – केतन मिश्रा
प्रकाशक – हार्पर कॉलिन्स
भाषा ‏-‎ हिंदी
मूल्य – किंडल एडिशन 339 रुपये; पेपरबैक 399 रुपये

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