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'लोग कहते थे कि हीली सुंदर है, पर स्त्री नहीं है'

‘हीली-बोन् की बत्तखें’ को हिंदी की चंद बेहतरीन कहानियों में से एक माना जाता है. सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन यानी अज्ञेय का कवि-मन इस कहानी में बहुत प्रकट है. मानवीय भावों पर उनकी पकड़ कितनी गहरी है, यह इस कहानी को पढ़ कर जाना जा सकता है. आज अज्ञेय की पुण्यतिथि है. इस मौके पर उन्हें याद करते हुए आज एक कहानी रोज़ में पेश है उनकी यह अमर-कहानी…

हीली-बोन् ने बुहारी देने का ब्रुश पिछवाड़े के बरामदे के जंगले से टेक कर रखा और पीठ सीधी करके खड़ी हो गई. उसकी थकी-थकी-सी आंखें पिछवाड़े के गीली लाल मिट्टी के काई-ढंके किंतु साफ फर्श पर टिक गईं. काई जैसे लाल मिट्टी को दीखने देकर भी एक चिकनी झिल्ली से उसे छाए हुए थी, वैसे ही हीली-बोन् की आंखों पर कुछ छा गया जिसके पीछे आंगन के चारों ओर तरतीब से सजे हुए जरेनियम के गमलों, दो रंगीन बेंत की कुर्सियों और रस्सी पर टंगे हुए तीन-चार धुले हुए कपड़ों की प्रतिच्छवि रह कर भी न रही. और, कोई और गहरे देखता तो अनुभव करता कि सहसा उसके मन पर भी कुछ शिथिल और तंद्रामय छा गया है, जिससे उसकी इंद्रियों की ग्रहण-शीलता तो ज्यों-की-त्यों रही है पर गृहीत छाप को मन तक पहुंचाने और मन को उद्वेलित करने की प्रणालियां रुद्ध हो गई हैं…

किंतु हठात् वह चेहरे का चिकना बुझा हुआ भाव खुरदरा होकर तन आया, इंद्रियां सजग हुईं, दृष्टि और चेतना केंद्रित, प्रेरणा प्रबल – हीली-बोन् के मुंह से एक हल्की-सी चीख निकली और वह बरामदे से दौड़ कर आंगन पार करके एक ओर बने हुए छोटे-से बाड़े पर पहुंची, वहां उसने बाड़े का किवाड़ खोला और फिर ठिठक गई. एक और हल्की-सी चीख उसके मुंह से निकल रही थी, पर वह अधबीच में रव-हीन होकर एक सिसकती-सी लंबी सांस बन गई.

पिछवाड़े से कुछ ऊपर की तरफ पहाड़ी रास्ता था. उस पर चढ़ते व्यक्ति ने वह अनोखी चीख सुनी और रुक गया. मुड़ कर उसने हीली-बोन् की ओर देखा. कुछ झिझका, फिर जरा बढ़ कर वाड़े के बीच में छोटे-से बांस की फाटक को ठेलता हुआ भीतर आया और विनीत भाव से बोला, ‘‘खू-ब्लाई!’’

हीली-बोन् चौंकी. ‘खू-ब्लाई’ खासिया भाषा का ‘राम-राम’ है, किंतु यह उच्चारण परदेसी है और स्वर अपरिचित – यह व्यक्ति कौन है? फिर भी खासिया जाति के सुलभ आत्म-विश्वास के साथ तुरंत संभल कर और मुस्करा कर उसने उत्तर दिया, ‘‘खू-ब्लाई!’’ और क्षण-भर रुक कर फिर कुछ प्रश्नसूचक स्वर में कहा, ‘‘आइए! आइए!’’

आगंतुक ने पूछा, ‘‘मैं आपकी कुछ मदद कर सकता हूं? अभी चलते-चलते-शायद कुछ.’’

‘‘नहीं, वह कुछ नहीं’’ – कहते-कहते हीली का चेहरा फिर उदास हो आया, ‘‘अच्छा, आइए, देखिए.’’

बाड़े की एक ओर आठ-दस बत्तखें थीं. बीचोबीच फर्श रक्त से स्याह हो रहा था और आस-पास बहुत-से पंख बिखर रहे थे. फर्श पर जहां-तहां पंजों और नाखूनों की छापें थीं.

आगंतुक ने कहा, ‘‘लोमड़ी!’’

‘‘हां. यह चौथी बार है. इतने बरसों में कभी ऐसा नहीं हुआ था. पर अब दूसरे-तीसरे दिन एक-आध बत्तख मारी जाती है और कुछ उपाय नहीं सूझता. मेरी बत्तखों पर सारे मंडल के गांव ईर्ष्या करते थे – स्वयं ‘सियेम’ के पास भी जैसे निर्णय करता हुआ बोला, ‘‘आप ढिठाई न समझें तो एक बात कहूं?’’

‘‘कहिए.’’

‘‘मैं यहां छुट्टी पर आया हूं और कुछ दिनों नाङ्-थ्लेम ठहरना चाहता हूं. शिकार का मुझे शौक है. अगर आप इजाजत दें तो मैं इस डाकू की घात में बैठूं.’’

फिर हीली की मुद्रा देखकर जल्दी से, ‘‘नहीं, मुझे कोई कष्ट नहीं होगा, मैं तो ऐसा मौका चाहता हूं. आपके पहाड़ बहुत सुंदर हैं, लेकिन लड़ाई से लौटे हुए सिपाही को छुट्टी में कुछ शगल चाहिए.’’

‘‘आप ठहरे कहां हैं?’’

‘‘बंगले में. कल आया था, पांच-छह दिन रहूंगा. सवेरे-सवेरे घूमने निकला था, इधर, ऊपर जा रहा था कि आपकी आवाज सुनी. आपका मकान बहुत साफ और सुंदर है.’’

हीली ने एक रूखी-सी मुस्कान के साथ कहा, ‘‘हां, कोई कचरा फैलानेवाला जो नहीं है! मैं यहां अकेली रहती हूं.’’

आगंतुक ने फिर हीली को सिर से पैर तक देखा. एक प्रश्न उसके चेहरे पर झलका, किंतु हीली की शालीन और अपने में सिमटी-सी मुद्रा ने जैसे उसे पूछने का साहस नहीं दिया. उसने बात बदलते हुए कहा, ‘‘तो आपकी इजाजत है न? मैं रात को बंदूक लेकर आऊंगा. अभी इधर आस-पास देख लूं कि कैसी जगह है और किधर से किधर गोली चलाई जा सकती है.’

‘‘आप शौकिया आते हैं तो जरूर आइए. मैं इधर को खुलनेवाला कमरा आपको दे सकती हूं.’’

कह कर उसने घर की ओर इशारा किया.

‘‘नहीं, नहीं मैं बरामदे में बैठ लूंगा.’’

‘‘यह कैसे हो सकता है? रात को आंधी-बारिश आती है। तभी तो मैं कुछ सुन नहीं सकी रात! वैसे आप चाहें तो बरामदे में आरामकुर्सी भी डलवा दूंगी. कमरे में सब सामान है. हीली कमरे की ओर बढ़ी, मानो कह रही हो, ‘‘देख लीजिए.’’
‘‘आपका नाम पूछ सकता हूं?’’

‘‘हीली-बोन् यिर्वा. मेरे पिता सियेम के दीवान थे.’’

‘‘मेरा नाम दयाल है— कैप्टन दयाल. फौजी इंजीनियर हूं.’’

‘‘बड़ी खुशी हुई. आइए-अंदर बैठेंगे?’’

‘‘धन्यवाद-अभी नहीं. आपकी अनुमति हो तो शाम हो आऊंगा. खू-ब्लाई.’’

हीली कुछ रुकते स्वर में बोली, ‘‘खू-ब्लाई!’’ और बरामदे में मुड़ कर खड़ी हो गई. कैप्टन दयाल बाड़े में से बाहर होकर रास्ते पर हो लिए और ऊपर चढ़ने लगे, जिधर नई धूप में चीड़ की हरियाली दुरंगी हो रही थी ओर बीच-बीच में बुरूंस के गुच्छे-गुच्छे गहरे लाल फूल मानो कह रहे थे— पहाड़ के भी हृदय है, जंगल के भी हृदय है…
*

दिन में पहाड़ की हरियाली काली दीखती है, ललाई आग-सी दीप्त, पर सांझ के आलोक में जैसे लाल ही पहले काला पड़ जाता है. हीली देख रही थी, बुरूंस के वे इक्के-दुक्के गुच्छे न जाने कहां अंधकार-लीन हो गए हैं, जबकि चीड़ के वृक्षों के आकार अभी एक-दूसरे से अलग स्पष्ट पहचाने जा सकते हैं. क्यों रंग ही पहले बुझता है, फूल ही पहले ओझल होते हैं, जबकि परिपार्श्व की एकरूपता बनी रहती है?

हीली का मन उदास होकर अपने में सिमट आया. सामने फैला हुआ नाङ्-थ्लेम का पर्वतीय सौंदर्य जैसे भाप बन कर उड़ गया, चीड़ और बुरूंस, चट्टानें, पूर्व पुरुषों और स्त्रियों की खड़ी और पड़ी स्मारक शिलाएं, घास की टीलों-सी लहरें दूर नीचे पहाड़ी नदी का ताम्र-मुकुट, मखमली चादर में रेशमी डोरे-सी झलकती हुई पगडंडी-सब मूर्त आकर पीछे हटकर तिरोहित हो गए. हीली की खुली आंखें भीतर को ही देखने लगीं— जहां भावनाएं ही साकार थीं, और अनुभूतियां ही मूर्त…

हीली के पिता उस छोटे-से मांडलिक राज्य के दीवान रहे थे. हीली तीन संतानों में सबसे बड़ी थी, और अपनी दोनों बहिनों की अपेक्षा अधिक सुंदर भी. खासियों का जाति-संगठन स्त्री-प्रधान है, सामाजिक सत्ता स्त्री के हाथ में है और वह अनुशासन में चलती नहीं, अनुशासन को चलाती है. हीली भी मानो नाङ्-थ्लेम की अधिष्ठात्री थी. ‘नाङ्क्रेम’ के नृत्योत्सव में, जब सभी मंडलों के स्त्री-पुरुष खासिया जाति के अधिदेवता नगाधिपति को बलि देते थे और उसके मर्त्य प्रतिनिधि अपने ‘सियेम’ का अभिनंदन करते थे, तब नृत्य-मंडली में हीली ही मौन-सर्वसम्मति से नेत्री हो जाती थी, और स्त्री-समुदाय उसी का अनुसरण करता हुआ झूमता था, इधर और उधर, आगे और दाएं और पीछे… नृत्य में अंग-संचालन की गति न द्रुत थी न विस्तीर्ण, लेकिन कंपन ही सही, सिहरन ही सही, वह थी तो उसके पीछे-पीछे, सारा समुद्र उसका अंग-भंगिमा के साथ लहरें लेता था…

एक नीरस-सी मुस्कान हीली के चेहरे पर दौड़ गई. वह कई बरस पहले की बात थी… अब वह चौंतीसवां वर्ष बिता रही है, उसकी दोनों बहिनें ब्याह करके अपने-अपने घर रहती हैं, पिता नहीं रहे और स्त्री-सत्ता के नियम के अनुसार – उनकी सारी संपत्ति सबसे छोटी बहिन को मिल गई.

हीली के पास है यही एक कुटिया और छोटा-सा बगीचा – देखने में आधुनिक साहबी ढंग का बंगला, किंतु उस कांच और परदों के आडंबर को संभालने वाली इमारत वास्तव में क्या है? टीन की चादर से छूता हुआ चीड़ का चौखटा, नरसल की चटाई पर गारे का पलस्तर और चारों और जरेनियम, जो गमले में लगा लो तो फूल हैं, नहीं तो निरी जंगली बूटी…

यह कैसे हुआ कि वह ‘नाङ्क्रेम’ की रानी, आज अपने चौंतीसवें वर्ष में इस कुटी के जरेनियम के गमले संवारती बैठी है, और अपने जीवन में ही नहीं, अपने सारे गांव में अकेली है?

अभिमान? स्त्री का क्या अभिमान! और अगर कहे ही तो कनिष्ठा करे जो उत्तराधिकारिणी होती है – वह तो सबसे बड़ी थी, केवल उत्तरदायिनी! हीली के ओंठ एक विद्रूप की हंसी से कुटिल हो आए. युद्ध की अशांति के इन तीन-चार वर्षों में कितने ही अपरिचित चेहरे दीखे थे, अनोखे रूप, उल्लसित, उच्छ्वसित, लोलुप, गर्वित, याचक, पाप-संकुचित, दर्पस्फीत मुद्राएं… और वह जानती थी कि इन चेहरों और मुद्राओं के साथ उसके गांव की कई स्त्रियों के सुख-दुख, तृप्ति और अशांति, वासना और वेदना, आकांक्षा और संताप उलझ गए थे, यहां तक कि वहां के वातावरण में एक पराया और दूषित तनाव आ गया था. किंतु वह उससे अछूती ही रही थी. यह नहीं कि उसने इसके लिए कुछ उद्योग किया था या कि उसे गुमान था – नहीं, यह जैसे उसके निकट कभी यथार्थ ही नहीं हुआ था.

लोग कहते थे कि हीली सुंदर है, पर स्त्री नहीं है. वह बांबी क्या, जिसमें सांप नहीं बसता? …हीली की आंखें सहसा और घनी हो आईं – नहीं, इससे आगे वह नहीं सोचना चाहती! व्यथा मार कर भी व्यथा से अन्य कुछ हो जाती है? बिना सांप की बांबी – अपरूप, अनर्थक मिट्टी का ढूह!

यद्यपि, वह याद करना चाहती तो याद करने को कुछ था – बहुत-कुछ था – प्यार उसने पाया था और उसने सोचा भी था कि…

नहीं, कुछ नहीं सोचा था. जो प्यार करता है, जो प्यार पाता है, वह क्या कुछ सोचता है? सोच सब बाद में होता है, जब सोचने को कुछ नहीं होता.

और अब वह बत्तखें पालती है. इतनी बड़ी, इतनी सुंदर बत्तखें खासिया प्रदेश में और नहीं हैं. उसे विशेष चिंता नहीं है, बत्तखों के अंडों से इस युद्धकाल में चार-पांच रुपए रोज़ की आमदनी हो जाती है, और उसका खर्च ही क्या है? वह अच्छी है, सुखी है, निश्चिंत है.

लोमड़ी… किंतु वह कुछ दिन की बात है – उनका तो उपाय करना ही होगा. वह फौजी अफसर जरूर उसे मार देगा – नहीं तो कुछ दिन बाद थेङ्क्यू के इधर आने पर वह उसे कहेगी कि तीर से मार दे या जाल लगा दे… कितनी दुष्ट होती है लोमड़ी. क्या रोज दो-एक बत्तख खा सकती है? व्यर्थ का नुकसान – सभी जंतु जरूरत से ज्यादा घेर लेते और नष्ट करते हैं.

बरामदे के काठ के फर्श पर पैरों की चाप सुन कर उसका ध्यान टूटा. कैप्टन दयाल ने एक छोटा-सा बैग नीचे रखते हुए कहा, ‘‘लीजिए, मैं आ गया.’’ और कंधे से बंदूक उतारने लगे.

‘‘आपका कमरा तैयार है. खाना खाएंगे?’’

‘‘धन्यवाद – नहीं. मैं खाना खा आया हूं. रात काटने को कुछ ले भी आया बैग में! मैं जरा देख लूं, अभी आता हूं. आपको नाहक तकलीफ दे रहा हूं लेकिन.’’

हीली ने व्यंग्यपूर्वक हंस कर कहा, ‘‘इस घर में न सही, पर खासिया घरों में अक्सर पलटनिया अफसर आते हैं – यह नहीं हो सकता कि आपको बिल्कुल मालूम न हो.’’

कैप्टन दयाल खिसिया-से गए. फिर धीरे-धीरे बोले, ‘‘नीचेवालों ने हमेशा पहाड़वालों के साथ अन्याय ही किया है. समझ लीजिए कि पातालवासी शैतान देवताओं से बदला लेना चाहते हैं!’’

‘‘हम लोग मानते हैं कि पृथ्वी और आकाश पहले एक थे – पर दोनों को जोड़नेवाली धमनी इंसान ने काट दी. तब से दोनों अलग हैं और पृथ्वी का घाव नहीं भरता.’’

‘‘ठीक तो है.’’

‘‘कैप्टन दयाल बाड़े की ओर चले गए. हीली ने भीतर आकर लैंप जलाया और बरामदे में जाकर रख दिया, फिर दूसरे कमरे में चली गई.
*

रात में दो-अढ़ाई बजे बंदूक की ‘धांय!’ सुन कर हीली जागी और उसने सुना कि बरामदे में कैप्टन दयाल कुछ खटर-पटर कर रहे हैं. शब्द से ही उसने जाना कि वह बाहर निकल गए हैं, और थोड़ी देर बाद लौट आए हैं. तब वह उठी नहीं, लोमड़ी जरूर मर गई होगी और उसे सवेरे भी देखा जा सकता है, यह सोच कर फिर सो रही.

किंतु पौ फटते-न-फटते वह फिर जागी. खासिया प्रदेश के बंगलों की दीवारें असल में तो केवल काठ के परदे ही होते हैं, हीली ने जाना कि दूसरे कमरे में कैप्टन दयाल जाने की तैयारी कर रहे हैं. तब वह भी जल्दी से उठी, आग जला कर चाय का पानी रख, मुंह-हाथ धो कर बाहर निकली.

क्षण-भर अनिश्चय के बाद वह बत्तखों के बाड़े की तरफ जाने को ही थी कि कैप्टन दयाल ने बाहर निकलते हुए कहा, ‘‘खू-ब्लाई, मिस यिर्वा, शिकार जख्मी तो हो गया पर मिला नहीं, अब खोज में जा रहा हूं.’’

‘‘अच्छा? कैसे पता लगा?’’

‘‘खून के निशानों से. जख्म गहरा ही हुआ – घसीट कर चलने के निशान साफ दीखते थे. अब तक बचा नहीं होगा – देखना यही है कि कितनी दूर गया होगा.’’

‘‘मैं भी चलूंगी. उस डाकू को देखूं तो…’’ कह कर हीली लपक कर एक बड़ी ‘डाओ’ उठा लाई और चलने को तैयार हो गई.

खून के निशान चीड़ के जंगल को छू कर एक ओर मुड़ गए, जिधर ढलाव था और आगे जरैंत की झाड़ियां, जिनके पीछे एक छोटा-सा झरना बहता था. हीली ने उसका जल कभी देखा नहीं था. केवल कल-कल शब्द ही सुना था – जरैंत का झुरमुट उसे बिलकुल छाए हुए था. निशान झुरमुट तक आकर लुप्त हो गए थे.

कैप्टन दयाल ने कहा, ‘‘इसके अंदर घुसना पड़ेगा. आप यहीं ठहरिए.’’

‘‘उधर ऊपर से शायद खुली जगह मिल जाए – वहां से पानी के साथ-साथ बढ़ा जा सकेगा.’’

यह कह कर हीली बाएं को मुड़ी, और कैप्टन दयाल साथ हो लिए.

सचमुच कुछ ऊपर जाकर झाड़ियां कुछ विरल हो गई थीं और उनके बीच में घुसने का रास्ता निकाला जा सकता था. यहां कैप्टन दयाल आगे हो लिए, अपनी बंदूक के कुंदे से झाड़ियां इधर-उधर ठेलते हुए रास्ता बनाते चले. पीछे-पीछे हीली हटाई हुई लचकीली शाखाओं के प्रत्याघात को अपनी डाओ से रोकती हुई चली.

कुछ आगे चल कर झरने का पाट चौड़ा हो गया – दोनों और ऊंचे और आगे झुके हुए करारे, जिनके ऊपर जरैंत और होली की झाड़ी इतनी घनी छाई हुई कि भीतर अंधेरा हो, परंतु पाट चौड़ा होने से मानो इस आच्छादन के बीच में एक सुरंग बन गई थी जिसमें आगे बढ़ने में विशेष असुविधा नहीं होती थी.

कैप्टन दयाल ने कहा, ‘‘यहां फिर खून के निशान हैं – शिकार पानी में से इधर घिसट कर आया है.’’

हीली ने मुंह उठाकर हवा को सूंघा, मानो सीलन और जरैंत की तीव्र गंध के ऊपर और किसी गंध को पहचान रही हो. बोली, ‘‘यहां तो जानवर की…’’

हठात् कैप्टन दयाल ने तीखे फुसफुसाते स्वर से कहा, ‘‘देखो-श्-श्!’’

ठिठकने के साथ उनकी बांह ने उठ कर हीली को भी जहां-का-तहां रोक दिया.

अंधकार में कई-एक जोड़े अंगारे-से चमक रहे थे.

हीली ने स्थिर दृष्टि से देखा. करारे में मिट्टी खोद कर बनाई हुई खोह में – या कि खोह की देहरी पर – नर-लोमड़ी का प्राणहीन आकार दुबका पड़ा था – कास के फूल के झाड़ू-सी पूंछ उसकी रानों को ढंक रही थी, जहां गोली का जख्म होगा. भीतर शिथिल-गत लोमड़ी उस शव पर झुकी खड़ी थी, शव के सिर लोमड़ी के पांवों से उलझते हुए तीन छोटे-छोटे बच्चे कुनमुना रहे थे. उस कुनमुनाने में भूख की आतुरता नहीं थी, न वे बच्चे लोमड़ी के पेट के नीचे घुसड़-पुसड़ करते हुए भी उसके थनों को ही खोज रहे थे… मां और बच्चों में किसी को ध्यान नहीं था कि गैर और दुश्मन की आंखें उस गोपन घरेलू दृश्य को देख रही हैं.

कैप्टन दयाल ने धीमे स्वर से कहा, ‘‘यह भी तो डाकू होगी.’’

हीली की ओर से कोई उत्तर नहीं मिला। उन्होंने फिर कहा, ‘‘इसे भी मार दें – तो बच्चे पाले जा सकें.’’

फिर कोई उत्तर न पाकर उन्होंने मुड़ कर देखा और अचकचा कर रह गए.
पीछे हीली नहीं थी.

थोड़ी देर बाद, कुछ प्रकृतिस्थ होकर उन्होंने कहा, ‘‘अजीब औरत है!’’ फिर थोड़ी देर वह लोमड़ी को और बच्चों को देखते रहे. तब ‘‘ऊंह, मुझे क्या!’’ कह कर वह अनमने-से मुड़े और जिधर से आए थे, उधर ही चलने लगे.
*

हीली नंगे पैर ही आई थी, पर लौटती बार उसने शब्द न करने का कोई यत्न किया हो, ऐसा वह नहीं जानती थी. झुरमुट से बाहर निकल कर वह उन्माद की तेजी से घर की ओर दौड़ी, और वहां पहुंचकर सीधी बाड़े में घुस गई. उसके तूफानी वेग से चौंक कर बत्तखें पहले तो बिखर गईं, पर जब वह एक कोने में जाकर बाड़े के सहारे टिक कर खड़ी अपलक उन्हें देखने लगी तब वे गर्दनें लंबी करके उचकती हुई-सी उसके चारों ओर जुट गईं और ‘क-क्! क-क्’ करने लगीं.

वह अधैर्य हीली को छू न सका, जैसे चेतना के बाहर से फिसल कर गिर गया. हीली शून्य दृष्टि से बत्तखों की ओर ताकती रही.

एक ढीठ बत्तख ने गरदन से उसके हाथ को ठेला. हीली ने उसी शून्य-दृष्टि से हाथ की ओर देखा. सहसा उसका हाथ कड़ा हो आया, उसकी मुट्ठी डाओ के हत्थे पर भिंच गई. दूसरे हाथ से उसने बत्तख का गला पकड़ लिया और दीवार के पास खींचते हुए डाओ के एक झटके से काट डाला.

उसी अनदेखते अचूक निश्चय से उसने दूसरी बत्तख का गला पकड़ा, भिंचे हुए दांतों से कहा :

‘‘अभागिन!’’ और उसका सिर उड़ा दिया. फिर तीसरी, फिर चौथी, पांचवीं… ग्यारह बार डाओ उठी और ‘खट्’ के शब्द के साथ बाड़े का खंभा कांपा, फिर एक बार हीली ने चारों ओर नजरें दौड़ाईं और बाहर निकल गई! बरामदे में पहुंच कर जैसे अपने को संभालने को खंभे की ओर हाथ बढ़ाया और लड़खड़ाती हुई उसी के सहारे बैठ गई.

कैप्टन दयाल ने आ कर देखा, खंभे के सहारे एक अचल मूर्ति बैठी है जिसके हाथ लथपथ हैं और पैरों के पास खून से रंगी डाओ पड़ी है. उन्होंने घबरा कर कहा, ‘‘यह क्या, मिस यिर्वा?’’ और फिर उत्तर न पाकर उसकी आंखों का जड़ विस्तार लक्ष्य करते हुए उसके कंधे पर हाथ रखते हुए, धीमे-से कहा, ‘‘क्या, हुआ, हीली?’’

हीली कंधा झटक कर, छिटक कर परे हटती हुई खड़ी हो गई और तीखेपन से थर्राती हुई आवाज से बोली, ‘‘दूर रहो, हत्यारे!’’

कैप्टन दयाल ने कुछ कहना चाहा, पर अवाक् ही रह गए, क्योंकि उन्होंने देखा, हीली की आंखों में वह निर्व्यास सूनापन घना हो आया है जो कि पर्वत का चिरंतन विजय सौंदर्य है.

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