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एक कहानी रोज़ में आज की कहानी: - दुलारी का छेका

दी लल्लनटॉप के ‘एक कहानी रोज़’ में हम आपको दुनिया-जहान की कहानियां पढ़ाते हैं. कई कहानियों को पढ़कर आप अपना प्यार भी हमें सूद समेत चुकाते हैं. बात कहानियां पढ़ने-पढ़ाने की नहीं है. बात है कि उस कहानी से हम अपने भीतर कितना बचा ले जाते हैं. चाहे वो व्यंग्य हो, कोई चुटकुला हो या अपनी प्रेमिका को कहे पनीरनुमा शब्द – कितना हम रखते हैं और कितना जाने देते हैं, ये मैटर करता है. इसीलिए हमारी कोशिश भी रहती है चक्रवृद्धि ब्याज के चक्कर में न पड़कर ऐसी कहानियां परोसी जाएं कि बचे ज़्यादा और जाए कम. बस इसी उद्देश्य ने साहित्य को परचून की दुकान बनने से बचा रखा है. बस इसी उद्देश्य ने साहित्य को परचून की दुकान बनने से बचा रखा है.

ये आखिरी लाइन दो बार गलती से नहीं छपी है, इसलिए छपी है ताकि सनद रहे! ख़ैर , बात कहानियों की हो रही है तो आप भी दीपिका पादुकोण की ‘आरक्षण’ पिच्चर वाले किरदार की तरह कह रहे होंगे – ‘सीधे पॉइंट पे आओ ना!’ तो सीधे पॉइंट पे आते हैं और बताते हैं आज की कहानी के बारे में. आज की कहानी का नाम है ‘दुलारी का छेका’ और इसे लिखा है प्रेरणा सिंह ने. लेखिका का परिचय दें तो हमारे साथ दफ्तर में काम करती हैं और जब ऑफिस खुला था तो मेरे बाएं वाली सीट पर बैठकर कीबोर्ड पीटा करती थीं. इसके अलावा बीच-बीच में टेक्स्ट पर प्रेरणा जी बहुत ख़राब जोक्स सुनाकर हमारा दिन बनाया करती हैं.

उनकी कहानी ‘दुलारी का छेका’ शादी वाले घर के माहौल और एक लड़की के अरमानों से आगे जाकर बात करती है. वो बातें जिन्हें करने पर मम्मी-चाचा डपटकर टाल दिया करते हैं. आज एक कहानी रोज़ में पढ़िए प्रेरणा की कहानी – ‘दुलारी का छेका’.

दुलारी का छेका
प्रेरणा सिंह

दोपहर से ही घर में लोगों का आना-जाना लगा हुआ था. बड़े-बड़े टोकरों में फल और खाजा-लड्डू भरे जा रहे थे. टोकरों के किनारे पीली चमकीली पन्नियां लपेटते हुए दुलाई का भाई चीख रहा था किसी छोटी बहन पर. कोने में पड़ा थान कहीं उलट ना जाए, इसकी चिंता में घुलता हुआ.

दुलारी को अभी भी याद है. उसकी पीठ का जन्मा भाई घर में यों आया, ज्यों पहलौठी का बच्चा हो. छोटी सी दुलारी बिछौने के कोने में दुबक उसे टुकुर-टुकुर देख रही थी. दादी ने पुचकारते हुए कहा था,

‘तेरी शादी में दौड़ दौड़ कर काम करने वाला आ गया है लाडो. अब तेरे बाबूजी को फिकर न होगी’.

और दुलारी फिक्क से हंस दी थी. ये आज़ादी भी एक उम्र तक नसीब होने वाली है, ये बच्चियां तब तक नहीं जानतीं जब तक एक दिन अचानक दो जोड़ी आंखें उन्हें गुस्से से घूर कर चुप न करा दें. चड्डी-बनियान में घूमती दुलारी को किसी ने न पढ़ाया कि कब समीज पहनने के बाद दुपट्टा ओढ़ लेना है. गांव के रास्तों पर चलते हुए ये अकल कई जोड़ी आंखों ने वैसे ही थमा दी उसे. जिस दिन बाजार में उसे ऑटो में बिठाते हुए पहली बार मां ने उसे किनारे धकेल दिया था, ताकि दूसरे मर्द और उसके बीच खुद दीवार बन सकें, उस दिन भी दुलारी को समझाना न पड़ा था. बस चुपचाप कोने में सिमट गई थी. अब इतने सालों बाद मां ने कदम पीछे खींचे थे. दुलारी के माथे पर पसीने की बूंदें छलक आई थीं.

जिस दिन देखौटी के लिए लड़के वाले चौक के मंदिर में आए थे, उस दिन की सुबह भी दुलारी ने ना-नुकुर की थी.

‘साये की डोरी से कमर में निशान पड़ते हैं. बाद में बड़ी जलन होती. चमड़ी सूज जाती है. हम ना पहनने के. सूट पहना दो.’

लेकिन मामी और मां ने जबरन लपेट ही तो दी थी. मरहम लगाया तो क्या, कि साड़ी दादी की है. स्वर्ग से देखेंगी. मुस्कायेंगी. उनकी दुलारी उनकी साड़ी में दिखाई जा रही. खानदानी निशानी किसी काम तो आये. दुलारी ने ओंठ चबा पहन ली. दादी के बचे-खुचे गहने मां पिछले हफ्ते ही सुनार के यहां पौढ़ा आई थीं. मंडप में लड़के वाले नाक-भौं न चढ़ा लें कहीं. पहले जैसा मेयार अब कहां इस घर का. दुआरे हाथी भले न बंधता था, लेकिन गाय-भैंसों से भरा तबेला तो था. दुलारी की मां बतातीं, जब ब्याह कर घर आई थीं तो हफ्ते भर कच्चे दूध से इसनान करवाया था घरवालों ने. हर बार बताते-बताते आंचल के कोर से आंखें पोंछ लेतीं. काजल लगाने की आदत सालों पहले छूट गई. अब फैलने का डर भी नहीं होता.

उस घर की दुलारी को कुछ तोले का हार चढ़ाने में उसकी मां गड़ी जा रही थीं. खानदानी जेवर निकालने का समय इतनी जल्दी आन पड़ेगा, किसी ने न सोचा था. अभी तो छोटी घर में थी. लड़के की बहू के लिए भी तो कुछ बचानी होगी निशानी. वरना बुढापे में गरियायेगा. इन सबके बीच घुलती दुलारी की अम्मां ने एक शब्द भी दुलारी के पिता से नहीं कहा. मालूम था, पलट कर पूछ लेंगे, गहनों के लिए इतने बरस में पैसे काहे न बचाए. कमी तो कभी न रही थी. ज़रूर घर में किसी को भस्मक रोग है.

दुलारी की मां ने किसी से न कहा, लेकिन चांदी के चार जेवर पिघलवा कर दो हार और एक झुमका बनाने को कह आई थीं. सोने का पानी चढ़वाने की बात कहते मन मसोस उठा था. लेकिन लड़के वाले इतने बुरे भी न मालूम पड़ते. एकाध गहनों का बल खा जाएंगे, ऐसी उम्मीद थी दुलारी की मां को. लड़के की मां भी तो कितने जेवर पहने आयी थीं देखौटी में. जरूर दुलारी खुश रहेगी उस घर में. हां, चांदी-सोना तो बाद में देखा जाएगा. लोगों की नज़र में तो जो चमके वो सोना. बारातियों की खातिर होगी तो चूं तक न उठाएंगे. लौट कर चाहे जितने मीन-मेख निकाल लें.

इधर दुलारी की सहेलियां उसे घेरे बैठी थीं. एक ने कहा,

‘पंडी जी ने साइत निकालते हुए कहा था, ऐसा लगन बिरलों का होता है. काहे दुलारी, जीजाजी पसंद तो आ गए?’

दुलारी का चेहरा सूखा जा रहा था. पति नाम के जीव को लेकर उसका मन अभी भी हिचकोले ही खा रहा था. इस ठौर पड़े या उस ठौर, कुछ निश्चित नहीं. पिताजी भी तो पति हैं. लेकिन कभी मां से सीधे मुंह बात न की. शादी के इतने सालों में तीन बच्चों को पालते हुए कभी दोनों के बीच कुछ वैसा न दिखा, जैसा किताबों में पढ़ा था. लोग कहते हैं, पति-पत्नी में प्रेम हो तो बच्चे पैदा होते हैं. लेकिन वो चार रुपए वाली मैगजीन, जो छोटे भैय्या के कमरे में गद्दे के नीचे पड़ी थी, उसमें तो कुछ और ही लिखा था. वैसा तो मां-पिताजी में कभी कुछ न दिखा. फिर बच्चे कैसे हो गए.

रद्दी के कागज़ पर छपी उस मैगजीन में प्रेम करने वाले लोग कमरे की कुण्डी चढ़ा लिया करते थे. प्रेम जरूर कुण्डी चढ़ाकर किया जाता होगा फिर. आगे क्या होता, पता नहीं. छुप-छुपाकर एक पन्ने से आगे कभी पढ़ न पाई थी. कोई न कोई आ जाता कमरे में. और भैय्या को शुबहा होने का खतरा मोल ले ले, इतनी हिम्मत दुलारी में थी नहीं.

दुलारी ने मन ही मन सोचा. ऐसा है तो यही सही. वो रोज़ अपने पति से कहेगी, कि मुझे तुमसे प्रेम है. और रोज़ कुण्डी चढ़ायेगी. बेशरम समझता हो तो समझता रहे, उसकी बला से. दुलारी तो प्रेम करेगी. उम्र हो गई है. अब न करेगी तो कब करेगी. उनके घर से आई उनकी तस्वीर में तो खूब दाढ़ी थी उनके. जन्मदिन पर उनको बढ़िया वाला ब्रुश गिफ्ट करेगी. दाढ़ी बनाने वाला. जिससे खूब सारा झाग बनता है. कहते हैं उसमें घोड़े की पूंछ के बाल लगते हैं. तभी महंगा होता. कोई न, मुंहदिखाई के कुछ पैसे चुपके से रख लेगी. ननदी के साथ बाजार जाने का जब मौका लगे, तब ले आएगी. ब्लेड से डर लगता, वो तोहफे में न लाएगी. काटने-चीरने वाली चीज़ों का प्रेमियों के बीच क्या काम. दाढ़ी बनाने के बाद वो दुलारी को देखेंगे. मुस्कायेंगे. और उस दिन कमरे की कुण्डी खुद चढ़ाएंगे. बिना कहे ये कहते हुए, कि मुझे भी तुमसे प्रेम है.

लड़के वालों के आने की बेला नजदीक आ रही थी. आज दुलारी को कुछ नहीं करना था. केवल तैयार होकर एक झलक दिखानी थी बस. मां ने बताया था, शायद लड़का भी साथ आए. दुलारी ने एक सहेली को पहले ही तैयार कर रखा था. मानो लाम पर भेज रही हो. कि जाए और दुआरे से देख कर अंदर खबर कर दे. अगर वो आ रहे हैं, तो पल्लू थोड़ा ऊंचा रख लेगी. नजर भर देख सकने को. भले ही कुछ पल को ही सही.

लेकिन शादी की साइत भले ही शुभ निकली हो, छेके में ऐसा कुछ न होना था. न हुआ. लड़के वाले आए, लेकिन लड़के के बिना. दुलारी ने बेमन से साड़ी की प्लेट में सेफ्टी पिन खोंसी, और सिर झुकाए बाहर चली आई. ससुरालवाले क्या कह रहे थे, उसे कुछ भनक नहीं थी.

मां ने सख्त हिदायत दे रखी थी. कोई जबरन कुछ बोलने को कहे, तभी मुंह खोलना, वरना सिर हिला देना काफी है. इससे अधिक कुछ नहीं. सास चेहरा देखने को कहे, तो आंखें न उठाना. दुल्हन की नज़र जितनी नीची रहे, उतना बेहतर. दुलारी को अपने पैरों में लगी नेलपॉलिश की चिप्पियां तक रट गई थीं. अंगूठे के नाखून में दरार आ गई है. सिलबट्टे से ठोकर खा कर. हाय! बिछुवे पहनाते हुए कोई देख न ले. शादी में नेलपॉलिश थोड़ी मोटी लगानी पड़ेगी. या एड़ी घिसने वाले पत्थर से घिसकर देख लेगी थोड़ा सा. शायद फर्क पड़ जाए.

आस-पास चल रही बातें दुलारी के कानों से टकरा कर लौट रही थीं. सास ने कब हाथों में हाथ लिया. कब अंगूठी पहनाई. कुछ याद नहीं. दुलारी के सामने दाढ़ी वाला ब्रुश घूम रहा था. कमरे की कुण्डी. भैय्या के कमरे में गद्दे के नीचे रखी मैगजीन. लड़के वाले गाड़ी में टोकरे लदवा रहे थे. पिताजी के चेहरे पर मुस्कराहट थी. बातचीत अच्छे से निपट गई लगता है.

दुलारी को मां ने कमरे में ले जाकर छोड़ दिया. साड़ी बदलनी थी. बस कुछ दिन और. फिर तो सारी उमर इसी छह गज में निकालनी है. दुलारी ने साड़ी कोने में फेंकी. अपनी समीज की बांह चढ़ाते हुए अचानक ठिठकी. जल्दी से सिर बाहर निकाला. दुपट्टा गले में अटकाया. और सीढ़ियों से ऊपर भाग गई. भैया और बाकी लोग अभी भी बाहर थे. सामान का निपटान करते हुए. उन्हें आने में देर लगेगी.

दुलारी भैय्या के कमरे में पहुंची. गद्दे के नीचे हाथ डाला, और एक बार में खींचा तो तीन-चार पतली मैगजींस बाहर आ गईं. मनोहर, सरस, लुभावन, सामने वाले पन्नों पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिख रखा था. दुलारी ने चट सारी मैगजींस मोड़ी, और अपनी समीज में छुपाकर धड़धड़ सीढ़ियां उतर गई.

अपने कमरे के गद्दे के नीचे मैगजींस रखते हुए दुलारी का दिल मानो मुंह तक आ रहा था. पहली बार शायद पहले पन्ने से आगे पढ़ पाने की उम्मीद में उसके हाथ कांप रहे थे. अपने हाथ में पहनी नवेली अंगूठी पर उसकी नज़र पड़ी. और बरबस तस्वीर का चेहरा उसके सामने घूम गया. दुलारी को इस चेहरे के लिए प्रेम सीखना था. मां न सिखाएं, मैगजीन ही सही. आस- पास दुलारी ने नज़र फेरी. सब काम में व्यस्त थे. सीने से मैगजीन को लगाए दुलारी ने एक बार लम्बी सांस ली. और कमरे की कुण्डी चढ़ा ली.


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