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DHFL की नीलामी, देसी-विदेशी कंपनियों के बीच सिर फुटौवल का कारण क्यूं बन रही?

DHFL के घोटाले और दिवालिया होने की प्रक्रिया जितनी पेचीदा थी उतनी ही पेचीदा इसकी नीलामी की प्रक्रिया होती जा रही है. ख़बर है कि अडानी के आख़िरी टाइम में लगाए गए अड़ंगे के बाद अब इसकी तीसरी बार बोली लगाई जा सकती है. आइए जानते है पूरा मामला और अभी जो हो रहा है वो भी.

# DHFL के बारे में जानिए-

DHFL. फुल फ़ॉर्म दीवान हाउसिंग फ़ाइनेंस कंपनी. ये एक नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनी है. मतलब बैंकिंग नहीं करती, लेकिन फ़ाइनेंसिंग करती है. यूं बैंक में आपके फिक्स डिपॉजिट का बीमा होता है NBFC में नहीं. इसके बदले आपको ज्यादा ब्याज दर मिलती है. NBFC से कम पूछताछ पर ही आपको लोन मिल सकता है जबकि बैंक की गाइडलाइंस बड़ी सख्त होती हैं.

तो DHFL बैंकों से लोन लेती है, और आगे जरूरतमंदों को कुछ ज्यादा ब्याज पर लोन देती है. यह काम वह हाउसिंग सेक्टर में करती है.

# क्यूं हुई दिवालिया-

DHFL में हो रही अनियमितताओं की जानकारी सबसे पहले कोबरा पोस्टने सार्वजनिक की थी. आज से लगभग 2 साल पहले 29 जनवरी, 2019 को. उस रिपोर्ट के अनुसार DHFL ने शेल कंपनियों के जरिए 31 हज़ार करोड़ रुपए से ज्यादा के घोटाले को अंजाम दिया था. हालांकि तब भी क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां नहीं जागीं और DHFL की क्रेडिट रेटिंग नहीं घटाई. यूं इंवेस्टर्स को लगा कि DHFL में ‘सब चंगा सी’.

लेकिन जैसा बड़े-बड़े जानकार कहते हैं कि, ‘आंकड़े, इश्क़ और मुश्क छुपाए नहीं छुपते’, वही DHFL केस में भी हुआ.

डीएचएफएल के प्रमोटर कपिल वधावन.
डीएचएफएल के प्रमोटर कपिल वधावन.

रिपोर्ट आने के 6 महीने बाद, जून, 2019 में DHFL अपनी उधार की किस्त चुकाने में चूक गई. पैसे के घपले को लेकर ईडी ने 19 अक्टूबर, 2019 को इस मामले की जांच शुरू की. फिर 2019 का नवंबर आते-आते पहले सरकार ने RBI को ताकत दी कि वह बैंकों को छोड़कर अन्य बड़ी वित्तीय सेवा कंपनियों को इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया के लिए नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के पास भेज सकता है. फिर RBI ने, ग्रेट पावर आने के बाद ग्रेट रिस्पॉन्सबिल्टी के साथ DHFL के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स को पद से हटा दिया और पूर्व बैंकर आर सुब्रह्मण्य कुमार को कंपनी का प्रशासक (एडमिनिस्ट्रेटर) बना दिया.

प्रशासक नियुक्त करने का मतलब ये नहीं था कि DHFL को भी यस बैंक की तरह रिवाइव किया जाना था. सुब्रह्मण्य कुमार को बाक़ायदा इनसॉल्वंसी प्रोफेशनल जैसी पावर दी गयीं. इनसॉल्वंसी प्रोफेशनल माने वो आदमी, जो कोर्ट से नियुक्त होता है. ये देखने के लिए कि कंपनी पर कितना और किसका उधार बाक़ी है. यही शख्स ये तय करता है कि बाज़ार को उसका उधार निपटाकर कंपनी अपना शटर डाउन करे.

यूं नवंबर में ही RBI ने DHFL को NCLT में भी खींच लिया. किसी कंपनी के NCLT में जाने या खींच लिए जाने से आशय ये है कि अब कंपनी दिवालिया होगी. या तो पूरी कंपनी को बेचकर या उसके एसेट्स बेचकर देनदारों का क़र्ज़ चुकाया जाएगा. पूरा तो ख़ैर क्या ही चुकाया जाएगा, जितना संभव हो पाए.

जनवरी 2020 में DHFL के प्रवर्तक कपिल वाधवान और धीरज वाधवान को गिरफ्तार किया गया था.

फ़रवरी में 20 से ज़्यादा कंपनियों ने DHFL या उसके अलग-अलग पोर्टफ़ोलियो ख़रीदने में रुचि जताई. लेकिन फिर ग्रांट थॉर्नटन की रिपोर्ट के बाद कंपनियों ने बिडिंग से या तो किनारा कर लिया या फिर अपने ऑफ़र में दिए गए अमाउंट को घटा दिया.

DHFL पर फर्जी खाते और फर्जी ब्रांच खोलने तक के आरोप लगे हैं.
DHFL पर फर्जी खाते और फर्जी ब्रांच खोलने तक के आरोप लगे हैं.

दरअसल RBI द्वारा नियुक्त सुब्रमण्यकुमार ने 98 पेज की एक रिपोर्ट दाखिल की. उसके आधार पर ग्रांट थॉर्नटन नाम की फॉरेंसिक ऑडिट एजेंसी ने जांच शुरू की. ये रिपोर्ट 27 अगस्त को ऑडिट एजेंसी ने आरबीआई की ओर से नियुक्त एडमिनिस्ट्रेटर सुब्रमण्यकुमार को सौंप दी थी. अक्टूबर, 2020 में इस रिपोर्ट की डिटेल सामने आई. पता चला कि मुंबई के बांद्रा में एक फर्जी कंपनी ने सैकड़ों फर्जी लोन अकाउंट बनाए थे, और इनमें पैसा जमा कराया था. तकरीबन 12 हजार करोड़ रुपए की कथित हेराफेरी.

ग्रांट थॉर्नटन की रिपोर्ट से उजागर हुई हेराफेरी से पहले और उसके बादभी एकाधिक हेराफेरियों का पता लगा है. मामले के तार, अखिलेश सरकार से लेकर अंडरवर्ल्ड तक जुड़े पाए गए. दी लल्लनटॉप ने भी इसपर कई स्टोरीज़ की थीं. जिनमें से दो विस्तृत रिपोर्ट्स आप यहां और यहां पढ़ सकते हैं.

# अभी क्या चल रहा है-

ऊपर हमने आपको DHFL घोटाले के बारे में बताने के दौरान ये भी बताया कि DHFL की दिवालिया प्रक्रिया चालू थी. 17 अक्टूबर, 2020 तक की समय सीमा समाप्त होने तक कुल चार कंपनियों ने बोलियां लगाई थीं.

ओकट्री और एससी लोवी ने अंतिम समय में, यानी 17 अक्टूबर को ही बोली लगाई थी. दोनों विदेशी कंपनी हैं. ओकट्री जहां यूएस की कंपनी है, वहीं एससी लोवी हॉन्गकॉन्ग बेस्ड कंपनी है. बाक़ी दो कंपनियां भारतीय थीं. एक पीरामल एंटरप्राइजेज़ और दूसरी अडानी.

इन बोलियों में से ओकट्री ने पूरी DHFL कंपनी के लिए और अडानी ने सिर्फ़ होलसेल एंड स्लम रीहैबिलिटेशन अथॉरिटी (SRA) पोर्टफोलियो के लिए बोली लगाई थी. अडानी की ही तर्ज़ पर पीरामल एंटरप्राइजेज ने भी DHFL के सिर्फ़ एक पोर्टफोलियो, ‘रिटेल’ के लिए बोली लगाई है.

दिक्कत ये थी कि ये बोलियां बहुत कम राशि की और बहुत ढेर शर्तों के साथ थी. जैसे, ओकट्री ने पूरी कंपनी के लिए 30,000 करोड़ की बोली लगाई, जिसमें से सिर्फ़ 20,000 करोड़ ही देनदारों को जाने थे. जबकि कंपनी की देनदारी है 95,000 करोड़ रुपया. इस तरह ओकट्री के रेज़ॉल्यूशन प्लान को स्वीकार कर भी लिया जाए तो भी बैंक्स को 75,000 करोड़ रुपए राईट ऑफ़ करने पड़ते यानी छोड़ने पड़ते. और शर्त ये कि अगर DHFL की बुककीपिंग में अगर 2 महीने के भीतर भी कोई और अनियमितता पाई गई तो ओकट्री डील तुरंत कैन्सल कर देगी.

इतनी कम बोलियों और इतनी ज़्यादा शर्तों से कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स (CoC) यानी, SBI और बाकी बैंक बिलकुल संतुष्ट नज़र नहीं आए. फिर से बोली लगाने को कहा. बोलियां बढ़ाने को कहा.

RBI ने जब एक बार DHFL पर अपनी क़ानूनी पकड़ बनाई तो वो मज़बूत होती चली गई.
RBI ने जब एक बार DHFL पर अपनी क़ानूनी पकड़ बनाई तो वो मज़बूत होती चली गई.

और लास्ट डेट रखी गई, 09 नवंबर, 2020. और तब पीरामल ने अपनी बोली बढ़ाकर 25,000 करोड़ रुपए कर दी. जो पहले 12,000 करोड़ रुपए थी. लेकिन अभी भी ये सिर्फ़ रिटेल पोर्टफ़ोलियो के लिए थी. ओकट्री ने सिर्फ़ 1000 करोड़ रुपए बढ़ाते हुए अब बोली 31,000 करोड़ कर दी थी. एससी लोवी, अपनी ढेर शर्तों के चलते, न पहले दौड़ में थी, न 09 नवंबर वाली बोली के बाद.

बची अडानी. जिसके चलते ये नया विवाद शुरू हुआ है. उसने भी ऊंची बोली लगाई. लेकिन अपनी पहली बोली के मुक़ाबले नहीं, ओकट्री की दूसरी बोली के मुक़ाबले. वो भी ओकेट्री की नई बोली से सिर्फ़ 250 करोड़ रुपए ज्यादा. बताने की ज़रूरत नहीं कि अबकी अडानी ने सिर्फ़ DHFL के ‘होलसेल एंड स्लम रीहैबिलिटेशन अथॉरिटी (SRA)’ वाले पोर्टफ़ोलियो के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी DHFL कंपनी के लिए बोली लगाई थी. और तीसरी बात ये कि, ये बोली लगाई 09 नवंबर की लास्ट डेट बीत जाने के बाद. दिवाली के दिन. 14 नवंबर, 2020 को.

यूं विवाद तो होना ही था, सो हुआ. बिडिंग में हिस्सा ले रही पीरामल ने-

# आपत्ति जताई कि तय सीमा बीत जाने के बाद भला कैसे कोई बोली लगा सकता है. समय सीमा बीत जाने के बाद तभी संशोधित बिडिंग पेश की जा सकती है, जबकि पहले वाले प्लान से कमिटी संतुष्ट न हो. और तब भी अगर संशोधित बिडिंग पेश किए जाने का विकल्प दिया जाए तो सबको दिया जाए.

# धमकी दी कि अगर DHFL की बोली स्वीकार की जाती है तो बाक़ी तीनों कंपनियां इस पूरी नीलामी प्रक्रिया से बाहर हो जाएंगी.

# कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने की बात भी कही.

# आशंका जताई कि बाक़ी कंपनियों की निविदाएं लीक न हो गई हों और इसकी जांच करवाने को कहा.

मिंट के अनुसार भी SBI और बाकी क्रेडिटर्स को पीरामल और ओकट्री ने एक लेटर लिखा है. जिसमें कहा गया है-

अडानी का ये रेज़ॉल्यूशन प्लान (बिड), न तो 16 सितंबर, 2016 के संशोधित ‘रिक्वेस्ट फ़ॉर रेज़ॉल्यूशन प्लान’ (RFRP) के प्रावधानों के अनुरूप है और न ही इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी बोर्ड ऑफ़ इंडिया के विनियमों के अनुरूप.

# अंततः-

वैसे आपको बता दें कि ये एक डिवेलपिंग स्टोरी है, अगर कोई नया अपडेट आता है तो दी लल्लनटॉप उससे जुड़ी सारी जानकारी भी आप तक ज़रूर पहुंचाएगी.


वीडियो देखें: क्या ‘सर्कल रेट’ और ‘मार्केट रेट’ के बीच मिलने वाली छूट रियल स्टेट में राहत लाएगी?-

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