Submit your post

Follow Us

नोटबंदी: जैसे नर्क को भी टू डेज़ थ्री नाइट का हॉलिडे पैकेज बना कर बेच दिया गया

दोस्त ग़म-ख़्वारी में मेरी सई फ़रमावेंगे क्या,
ज़ख़्म के भरते तलक नाख़ुन न बढ़ जावेंगे क्या.

ग़ालिब का शे’र है. यहां सई मतलब ‘कोशिशों’ से है. तो बात ये है कि हमदर्दी जताने के वास्ते दोस्त क्या ही कोशिशें कर लेंगे? और जितनी भी कोशिश करें, क्या वो पर्याप्त होंगी? क्यूंकि हमें तो पता ही है कि जब तक नोटबंदी वाला नासूर भरेगा. तब तलक़ GST वाले नाखून उग आएंगे. और फिर लॉकडाउन, और फिर GDP, और फिर पेट्रोल और फिर खाने का तेल, एंड दिस टेल (पूंछ भी और दास्तां भी) विल गो ऑन फ़रेवर…

आफ़्टर ऑल, बेदर्द थी ज़िंदगी, बेदर्द है.

चैप्टर वन: क्यूंकि शे’र भी कभी ग़ज़ल थी

‘दाग द फ़ायर’ टाइप के किसी 90’s के मूवी नेम की तरह ही नोटबंदी क़भी सिर्फ़ नोटबंदी नहीं कही जाएगी. वो कही जाएगी: नोटबंदी! दी मास्टरस्ट्रोक.

और जब 2,000 के नोट के साथ ये शब्द, मास्टरस्ट्रोक पहली बार मार्केट में आया तो मुझे अपने मास्टर और उसकी छड़ी की मार दफ़’अतन याद हो आई. मास्टरस्ट्रोक यू सी.

लेकिन अबकी छड़ी सरकारी थी. PSB (पब्लिक सेक्टर बेंत). और कहते हैं सरकार की छड़ी में आवाज़ नहीं होती. मतलब सरकार चाहे नीली छतरी वाला गॉड हो या पीली छतरी वाली लड़की. आवाज़ हमेशा 0 डेसीबल से कम रहेगी. हालांकि ‘लोकल पर वोकल’ वाले, डेसीबल को देसी-बल कहना पसंद करेंगे पर इन लोकल वालों के वोकल कॉर्ड्स की बात फिर कभी. अभी हम सन्नाटे की बात करेंगे. ‘मौन की बात’ करेंगे. पर 2004 से 2014 के PM का कोई रेफ़रेंस लाए बग़ैर.

हम बात करेंगे आज से कुछ सदी पहले की. ‘दरबार ए आम’ प्लेटफ़ॉर्म पर ‘क़ाफ़िया विद ज़फ़र’ नाम का शो लाइव स्ट्रीम हो रहा था. इससे ऐन पहले, क़रीब 8 बजे, ज़फ़र कुछ ऐसा कह चुके थे, जिसके बारे में दरबरियों को भनक तक न थी.

माज़ी की छोड़ो इसके बाद मुस्तकबिल में क्या था कोई न जानता था. क्यूंकि ज़फ़र की लाठी में भी जब कॉल आती थी तो वो वाइब्रेट ही हुआ करती थी. रिगंटोन का उसमें कोई विकल्प न था. बहरहाल अब 8 PM वाली बात और बोतल दोनों ख़त्म हो चुकी थी. हालांकि दरबारियों पर असर दोनों का तारी था. यूं सारे दरबारी IT सेल वालों को शबे-रोज़गार देकर शो में मिलने वाले हैंपर के लिए अपने दावेदारी पेश करने में जुट गए. ‘महफ़िल ए शमा’ सबसे पहले ग़ालिब के पास ले जाई गई. उनकी एक ग़ज़ल का शे’र जो शुरू में सुनाया था. उसी ग़ज़ल का दूसरा शे’र अर्ज़ किया उन्होंने:

हज़रत-ए-नासेह गर आवें दीदा ओ दिल फ़र्श-ए-राह
कोई मुझ को ये तो समझा दो कि समझावेंगे क्या

मतलब ये कि हुज़ूर ए आला, अगर हमारे सामने जनता आई तो दिल, जिगर, गुर्दा सब उनपर न्योछावर कर देंगे, लेकिन सवाल ये कि ये आठ बजे वाले फ़ैसले के बारे में उन्हें क्या बताएंगे.

मोमिन भी परेशान थे. पर सर के कलम और कलम के सर हो जाने के डर से जो अर्ज़ किया वो पैसिव तरीक़े से किया:

किसी का हुआ आज कल था किसी का
न है तू किसी का न होगा किसी का

शमा बेशक शर्मा गई, लेकिन बादशाह समझ गए कि ये शेर किसी ‘सोनम गुप्ता’ के लिए नहीं है और शमा को मोमिन के सामने से हटाकर अपने PR हेड के सामने रख दिया. ‘पूछेगा ख़ुदा भी तो मुकर जाएंगे’ वाले ज़ौक़ तपाक से अर्जे:

लाए जो मस्त हैं तुर्बत पे गुलाबी आंखें
और अगर कुछ नहीं दो फूल तो धर जाएंगे

बादशाह ने न तुर्बत न फूल न आंखों पर ध्यान दिया. बस गुलाबी सुना तो बिफर पड़े. फूल भी शायद हजारे वाले समझे. इधर डर के मारे शमा ने तुरंत देश-काल-परिस्थिति वाला ‘एकता कपूर’ लीप लिया और निदा फ़ाज़ली के सामने जा पहुंची. निदा, गहरी निद्रा से उठे और आनन फानन में अपना कोई पुराना शे’र चेप कर फिर से सो गए:

कभी कभी यूं भी हम ने अपने जी को बहलाया है
जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है

ज़फ़र संतुष्ट हुए और अशर्फ़ियों वाला गिफ़्ट हैंपर निदा पर फ़िदा करके विदा कहा और बिना टेलीफून के रंगून वट लिए. दरबारियों को समझ में आ गया था कि उन्हें इस 8 बजे वाले पैग़ाम के साथ क्या करना है.

तब इस स्टोरी ने तुरंत आइंस्टीन की जनरल थ्योरी ऑफ रिलैटिविटी से इंस्पीरेशन ली और टाइम-स्पेस को धता बतलाते हुए और वीरानी ख़ानदान को प्रसन्न करते हुए 2016 वाले साल के ग्यारहवें माह में पहुंच गई. बहू अब सास, वीरानी अब HR मिनिस्टर और रंगून अब यंगून हो चुका था. ये अच्छे दिनों वाला भारत था. हालांकि वेस्टरोज़ के विंटर की तरह ही भारत के अच्छे दिन भी पिछले 2-3 सीज़न से बस… आने ही वाले थे… ग़ालिब अब वॉट्सएप पर थे:

कोई उम्मीद बर नहीं आती
नयी करेंसी नज़र नहीं आती

बैंक किस मुंह से जाओगे ग़ालिब,
भीड़ तुमको नज़र नहीं आती?

और मोमिन FB पर:

रोया करेंगे आप भी पहरों इसी तरह
अटका कहीं जो आप का ATM मिरी तरह

ज़ौक़ के शौक़ ट्रेडिंग वाले थे. शराब नहीं, अब हैश उन्हें किक देती थी:

पहुँचेंगे रहगुज़र-ए-यार तलक क्यूँ कर हम
पहले जब तक न दो हज़ार हमें मिल जाएँगे

NRI बहादुर शाह ज़फ़र TVF में स्क्रिप्ट राइटिंग कर रहे थे-

बैंक-की-दराज़ से चोरे थे चार नोट,
…राइमिंग अब नई आरा!

रही बात निदा की, तो वो तो अशर्फ़ियों को नए नोटों में बदलवाने के वास्ते SBI की लाइन में लगे थे. तो बिज़ी थे. उनके लिए मोटिवेशन बाद में आने वाला था. उदय प्रकाश के किसी नॉवल के नाम सा, ‘कुणाल कामरा का सोल्जर’.

चैप्टर 2 – तुमने बदले ‘नोट’ हमसे गिन-गिन के लिए

नोटबंदी. आज जब पांच साल बाद उस युग प्रवर्तक फ़ैसले को याद करो तो सेल्स-एंड-मार्केटिंग वालों की एक लाइन याद आती है-

नर्क को भी ऐसे बेचो जैसे टू डेज़ थ्री नाइट का हॉलिडे पैकेज.

नोटबंदी कोई मूवी नहीं सैकड़ों एपिसोड वाला सोप ओपेरा था. ‘शांति’ नहीं ‘जुनून’. और अगर कोई माईथोलॉजिकल सोप ओपेरा था तो ‘रामायण’ नहीं…

…सही पकड़े हैं!

और इस सोप ओपेरा के इतने सब प्लॉट थे कि हर किसी प्लॉट का बाद में अलग से एक स्पिन ऑफ़ आ गया. एक सब प्लॉट का तो ठीक पाँचवीं बरसी को ही IPO भी. हम्म… इंट्रेस्टिंग.

इस एक कॉन्सेप्ट पर इतने जोक, मीम, जिफ़ और वरुण ग्रोवर बने कि दो पासे यदृच्छा फैंके जाने पर 7 आने की प्रायिकता कम होगी, मेरे किसी ब्रांड न्यू नोटबंदी जोक पर ‘अनु मलिक’ या ‘प्रीतम’ मुहर लगने की ज़्यादा. इसलिए मुझे ये स्टोरी लिखनी कम और डिलीट ज़्यादा करनी पड़ रही है. क्यूंकि कनाडा की कमजोर क्रिकेट टीम को दो AB डिविलिर्स देने जैसा कोई ग़ैर ज़िम्मेदाराना काम मेरे लेखन के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता. वैसे,

I too have a 2000 Rupee joke, but you won’t ‘get’ it.

इसलिए कोई जोक नहीं. हां ज़ौक़ था सो वो भी अब ट्विटर पर है. और एक शम्मा थी. दलील-ए-सहर. सो वो भी निदा के पास है. तो अब बातें थोड़ी सीरियस टोन पर. लेकिन रुकिए, स्टोरी के सिपिया कलर पर माइग्रेट करने से पहले सोचिए जब उनवान ही ‘नोटबंदी’ है तो इसपर आप कितना ही सीरियस हो लेंगे. सीरियस होने तलक फनी बोन्स न बढ़ जावेंगे क्या? ओके, नो मोर ट्विंकल खन्ना, अक्षय कुमार, कनाडा जोक्स.

पॉइंट ये है कि हर काम को ग्रैंड तरीक़े से सेलिब्रेट करने वाली ‘सरकार विद ऑरेंज अंब्रेला’ इस एक मास्टर स्ट्रोक पर चुप क्यूं है? साल-दर-साल. बेशक सरकार की छड़ी कितनी ही मौन हो पर PR तो गोया पाँचजन्य हुआ करता है. डोन्ट वरी इंफ़ोसिस, आपको अपनी बनाई वेबसाइट की RSS फ़ीड देखने की ज़रूरत नहीं. मैं तो कृष्ण के शंख की उपमा ला रहा था जिसकी आवाज़ चहूं दिशाओं को गुंजायमान करती थी.

तो फिर PR को PR ही क्यूं रहने दिया गया, कोई नाम क्यूं न दिया? नॉट डेट कि सरकार, गुलज़ार है. पर अपनी हर स्कीम और देश की हर सिटी का नया नाम रखने की सरकार की चाहत को कौन नहीं जानता. इसलिए अबकी थोड़ी क्यूरोसिटी थी. मुझे लगता है कि गोल को डिफ़ेंड करने के चलते टीम के ग्यारह के ग्यारह खिलाड़ी गोलकीपर बन चुके थे. और इन सबने गोल बचाने के बदले गोल पोस्ट ही बदल देना उचित समझा. पिछले पांच सालों में इतने गोल-पोस्ट बदले कि प्लेग्राउंड रेरा के बाद का रियल स्टेट हो गया. इधर सत्तर मिनट ख़त्म होने से पहले ही शाहरुख़ तीजा रंग बन गए. उधर ड्रिंक्स ब्रेक में क्रेड का विज्ञापन चलने लगा:

Every-time you pay your credit card bills on CRED, you earn cred coins. Now it’s as crazy as imagining Government acting for citizens.

चैप्टर 3 – सोनम गुप्ता, डेमोक्रेसी है

इंटर में मैं स्टेटिस्टिक्स को स्टेटिक्स बोला करता था. स्टेटिस्टिक्स बोले तो सांख्यिकी और स्टेटिक्स बोले तो स्थिति विज्ञान, कोई चीज़ अगर स्थिर है तो क्यूं है. लगता है सरकार के लिए भी स्टेटिस्टिक्स और स्टेटिक्स में कोई ख़ास अंतर नहीं है. इनके सारे आंकड़े स्टेटिक, बोले तो स्थिर बने हुए हैं. और अगर स्टेटिस्टिक्स की स्टेटिक, ग़लती से डायनेमिक हो जाए तो वो भी साउथवर्ड. इन्हें कोई बताओ कि दिल्ली, मुंबई और न्यूयॉर्क के साउथ में अमीरी है, ग्राफ़ के साउथ में नहीं. सर जी, वहां ज़ीरो से गहरी खाई है. जिसने 70+ सालों से हमारी वाट लगाई है. और माय गोव, आपके लिए सिल्वर लाइनिंग वाली बात ये कि, आपसे पहले वालों ने भी. फ़्रॉम ग़रीबी हटाओ टू फ़ील गुड, ऑल्वेज़ ऑन यॉर सर्विस.

बहरहाल मनोज तिवारी के विपक्ष में लड़े इस कंटेंडर, स्टेटिस्टिक्स के हिसाब से नोटबंदी के बाद 99.90 प्रतिशत से ज़्यादा पुराने नोट बैंकों के पास वापस आ गए थे. लेकिन फिर दुनिया के हर इंसान के DNA में भी तो 99.90 प्रतिशत की समानता है. सिर्फ़ 00.10 प्रतिशत के चलते एक औरत दूसरी औरत से अलग होती है. (हालांकि all men are same). ऐसे ही 00.10 प्रतिशत के चलते देश में कितना बड़ा परिवर्तन आया इसकी किसी को भनक तक नहीं लगी. सरकार को ही लग जाती तो इस आज के शुभ दिन को ‘वर्ल्ड पिंक डे’ या ‘PM ऑन 8 PM डे’ की तरह धूम-धाम से मनाया जाता. दिवाली के पटाखे तो बचे ही थे और AQI का ग्राफ़ भी साउथवर्ड डायरेक्शन में ज़ा रहा था.

वैसे इन्हीं 00.10 प्रतिशत में मेरे भी 3,000 रुपये गिनिए. जो नोटबंदी के फ़ायदों की तरह ही डिस्कवर न हो पाए और जब तक होते तब तक नेपाल तक में बैन हो गए. तब मैं भी एक दिन का पाब्लो एस्कोबार बन गया और बार के बाहर जल रही बोनफ़ायर में उन्हें स्वाहा कर दिया- इदम डिमोनेटाईज़ेशनम, इदम न ममः

काश नोटबंदी भी 99 साल की लीज़ में होती तो मैं अपनी इस जाएदाद को अपने नाती-पोतों के नाम कर सकता.

वैसे नोटबंदी के बाद दो चीज़ें हैं जिन्होंने नॉर्थ की तरफ़ कूच किया. डेनेरीस टार्गैरियन और मनी सरक्यूलेशन. 4 नवंबर 2016 को साढ़े 17 लाख के क़रीब नोट सरक्यूलेशन में थे. और इस साल यानी 2021 का अक्टूबर बीतते-बीतते ये संख्या 29 लाख के क़रीब पहुंच चुकी है. और अल्ताफ़ रजा के ‘ये साल दूसरा है’ को ‘टॉक टू माय हैंड’ वाले अश्लील, आई मीन राजनैतिक इशारे कर रही है.

अंत में आतंकवाद वाले गोल पोस्ट की बात करें तो सरकार ने सोचा कि आतंकवाद फैलाने वालों के हाथ नहीं काटते, काटते हैं उनकी मनी सप्लाई चेन. और सरकार की इसी सोच के इर्द-गिर्द बाहुबली की स्क्रिप्ट बुनी गई. बाहुबली सुपरहिट रही सबको पता है. आतंकवाद का क्या हुआ, हू केयर्स. कटप्पा ने बाहुबली को क्यूं मारा सबको पता है, नोटबंदी के फ़ायदे? हू केयर्स.

इधर ‘स्वच्छ भारत अभियान’ चला रहा देश ‘जादू की भक्ति’ के बाद कह रहा था, ‘बस कर पगले रुलाएगा क्या?’ और उधर-

तभी सरकार के माइंड में GST आई. ओ पारा पोपा पोरा पो…

# चैप्टर 4 – और अंत में पैरोडी

# नोटबंदी के दौरान-

मेरे लॉकर में छुपे नोट मैं जलाता कैसे
ग्रीड में डूबे हुए नोट मैं जलाता कैसे
इन्हीं हाथों से लिए नोट मैं जलाता कैसे

जिनको टैक्स की उगाही से बचाए रखा
जिनको इक उम्र फ़ाल्स सीलिंग में छुपाये रखा
दिया जिनको, उन्हें बेईमान बनाए रखा
मेरे लॉकर में छुपे नोट मैं जलाता कैसे

सिक्योरिटी फीचर मुझे थे ज्ञात आर.बी.आई. की तरह
बिखरे थे घर के कोने कोने में वाई-फाई की तरह
नोटबंदी आई हो गोया तबाही की तरह
मेरे लॉकर में छुपे नोट मैं जलाता कैसे

मैंने दुनियां की निगाहों से जो बचाकर लिए
हरेक फ़ाइल, हरेक काम, हर सिफारिश के लिए
कभी दिन में तो कभी रात को उठकर के गिने
मेरे लॉकर में छुपे नोट मैं जलाता कैसे

ग्रीड में डूबे हुए नोट मैं जलाता कैसे
इन्हीं हाथों से लिए नोट मैं जलाता कैसे

# क़रीब पांच साल बाद-

भाई भक्तो, रे भाई भक्तो, अब चाहोगे कितना ‘मोर’?
नाज़ुक-नाज़ुक मेरी इकॉनमी, माइनस ट्वेंटी फोर.

डर लागे क्या होगा, पीछे कोई डोर खुला होगा,
छोटी पॉकेट, छेद बड़ा, और उसपे चालीस चोर.
भाई भक्तो, रे भाई भक्तो, अब चाहोगे कितना ‘मोर’?
नींद में कबसे सोए पड़े, कब होगी तुमरी भोर?

महंगाई जब छाये, होश तेरा क्यूं उड़ जाएं,
आई न देखो और गाओ, कोई माज़ी का फोकलोर.
हो, भाई भक्तो, रे भाई भक्तो, अब चाहोगे कितना ‘मोर’?
हां जी, हां जी, हमें पता है, पकड़ी है किसने डोर.

जाने कहां से तुम आते, फेक फैक्ट्स ही दिखलाते
छाए हुए वॉट्सएप पे ऐसे, जैसे मंदी चारों ओर
हो, भाई भक्तो, रे भाई भक्तो, अब चाहोगे कितना ‘मोर’?
ना जी, ना जी, मेरी हिमाकत? तुमपे किसका ज़ोर.

भाई भक्तो, रे भाई भक्तो, अब चाहोगे कितना ‘मोर’?
नाज़ुक-नाज़ुक मेरी इकॉनमी, माइनस ट्वेंटी फोर.


खर्चा-पानी देखें: IPO बूम को लेकर इस रिपोर्ट ने बड़ा खुलासा किया-

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

कौन हो तुम

'द्रविड़ ने बहुत नाजुक शब्दों से मुझे धराशायी कर दिया था'

'द्रविड़ ने बहुत नाजुक शब्दों से मुझे धराशायी कर दिया था'

रामचंद्र गुहा की किताब 'क्रिकेट का कॉमनवेल्थ' के कुछ अंश.

पहले स्पाइडरमैन टोबी मैग्वायर की कहानी, जिनका सबसे हिट रोल उनके लिए शाप बन गया

पहले स्पाइडरमैन टोबी मैग्वायर की कहानी, जिनका सबसे हिट रोल उनके लिए शाप बन गया

शुद्ध और असली स्पाइडरमैन टोबी मैग्वायर करियर ग्राफ़ बाद में गिरता ही चला गया.

10 साल पहले भी शाहरुख़ का समीर वानखेड़े से सामना हुआ था, समीर ने ठोका था तगड़ा जुर्माना

10 साल पहले भी शाहरुख़ का समीर वानखेड़े से सामना हुआ था, समीर ने ठोका था तगड़ा जुर्माना

जगह थी मुंबई एयरपोर्ट. अब दस साल बाद फिर से दोनों का नाम एक साथ सुर्ख़ियों में है.

'स्क्विड गेम' के प्लेयर नंबर 199 'अली' की कहानी, जिनके इंडियन होने ने सीरीज़ में एक्स्ट्रा मज़ा दिया

'स्क्विड गेम' के प्लेयर नंबर 199 'अली' की कहानी, जिनके इंडियन होने ने सीरीज़ में एक्स्ट्रा मज़ा दिया

अली का रोल करने वाले इंडियन एक्टर अनुपम त्रिपाठी का सलमान-शाहरुख़ कनेक्शन क्या है?

IPL का कित्ता ज्ञान है, ये क़्विज़ खेलकर चेक कल्लो!

IPL का कित्ता ज्ञान है, ये क़्विज़ खेलकर चेक कल्लो!

ईमानदारी से स्कोर भी बताते जाना. हम इंतज़ार करेंगे.

'मनी हाइस्ट' वाले प्रोफेसर की पूरी कहानी, जिनकी पत्नी ने कहा था, 'कभी फेमस नहीं हो पाओगे'

'मनी हाइस्ट' वाले प्रोफेसर की पूरी कहानी, जिनकी पत्नी ने कहा था, 'कभी फेमस नहीं हो पाओगे'

अलवारो मोर्टे ने वेटर तक का काम किया हुआ है. और एक वक्त तो ऐसा था कि बकौल उनके कैंसर से जान जाने वाली थी.

एक्टर शरत सक्सेना की कहानी, जिन्होंने 71 साल की उम्र में ज़बरदस्त बॉडी बनाकर सबको चौंका दिया

एक्टर शरत सक्सेना की कहानी, जिन्होंने 71 साल की उम्र में ज़बरदस्त बॉडी बनाकर सबको चौंका दिया

हीरो बनने आए शरत सक्सेना कैसे गुंडे का चमचा बनने पर मजबूर हुए?

'भीगे होंठ तेरे' वाले कुणाल गांजावाला आजकल कहाँ हैं?

'भीगे होंठ तेरे' वाले कुणाल गांजावाला आजकल कहाँ हैं?

एक वक़्त इंडस्ट्री में टॉप पर थे कुणाल और उनके गाने पार्टियों की जान हुआ करते थे.

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

IPL स्कैंडल, मॉडल्स के आरोप, अंडरवर्ल्ड कनेक्शंस के आरोप, एक्स वाइफ के इल्ज़ाम सब हैं इस कहानी में.

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रेन्सन की कहानी, जहां भी गए तहलका मचा दिया.