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चिन्नास्वामी स्टेडियम में हुई वो घटना जो आज भी इंडिया-पाकिस्तान WC मैच की सबसे करारी याद है

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सत्य व्यास लिक्खाड़ हैं. बनारस टॉकीज़ और दिल्ली दरबार जैसे उपन्यास लिख चुके हैं. लेटेस्ट वाले का नाम है 84. बेस्टसेलर वाला मामला है. कहीं नौकरी भी करते हैं लेकिन उसके बारे में ज़्यादा बात नहीं करते. लल्लनटॉप के दोस्त हैं. क्रिकेट का कीड़ा है. कहते हैं कि जानकार नहीं हैं बस यादें बहुत हैं शेयर करने को. ढूंढ-ढूंढ के वहां से किस्से लाते हैं जहां न रवि पहुंचा है और न कवि. सुना रहे हैं साल 1996 में खेले गए वर्ल्ड कप का किस्सा. इंडिया और पाकिस्तान के मैच से. 


 

23 साल बीत चुके हैं. 23 साल इतने होते हैं कि 9 मार्च 1996 को पैदा हुई जमात आज का भविष्य लिख रही है. 23 सालों में हुए झगड़ों की बात न भी करूं और सौहार्द पर ही रहूं तो भी कहूंगा कि कई ट्रेनें चल चुकी हैं. शांति वार्ताएं हो चुकी हैं और शांति की राह पर युद्धबंदी भी लौटाए गये हैं. दोनों देशों से हास्य कलाकार आवागमन करते हुए अपने हिस्से का फ़न पेश करते ही रहे हैं.

मगर 9 मार्च 1996 को बेंगलुरु के चिन्नास्वामी स्टेडियम की शाम में हुई घटना आज भी हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों सरहदों के बाहम सभी जीवंत जहनों में किसी शिलालेख की भांति उकेरी हुई है, जो न मिटती है, न ही उसपर वक्त की परत ही जमने पाती है.

हुआ क्या था? एक छोटा सा झगड़ा! एक वाक युद्ध! एक क्षणिक आवेश! नहीं, बात इससे कहीं ज़्यादा गहरी थी. बात जिसकी जड़ें भूत में छिपी हुई थीं. बात जिसमें आन का प्रश्न था. बात जिसमें हिन्दुस्तानी ध्वज की बेइज्जती का दर्द था. बात यह भी थी कि सन 1989 के बाद दोनों देशों को भारत की धरती पर यह पहला मैच खेलना था.

सो मैच शुरू हुआ. बंगलुरु के चिन्नास्वामी स्टेडियम में. 55 हजार लोगों की भीड़ ऐसी कि दर्शकों के सिर और चायपत्ती के दानों में कोई अंतर न दिखे. अंपायरों की मानें तो शोर ऐसा कि यदि निर्णय सही दे दिये गए हों तो अम्पायरों को भगवान घोषित कर ही दिया जाना चाहिए. और तनाव ऐसा कि दोनों देशों के अखबारों में हृदयाघात की खबर आए तो मुस्कुराते हुए पन्ने पलट कर कहें- बेचारे मूर्ख!

पाकिस्तान की ओर से गड़बड़ी मैच प्रारम्भ होने से पहले ही शुरू हो गयी थी. 8 मार्च की शाम तक सचिन का तोड़ ढूंढ लेने वाले कप्तान वसीम अकरम मैच की सुबह रहस्यमयी ढंग से टखने की चोट की वजह से अंतिम ग्यारह से बाहर हो गए. कप्तानी सौंपी गयी आमिर सोहेल को. अग्रेसिव और फ्लेमबॉयंट आमिर सोहेल को. हालांकि उस रोज टीम में तीन कप्तान थे. जावेद मियादाद अपनी अलग ही खलीफ़ाई दिखा रहे थे. सलीम मालिक अपने साले एजाज अहमद के साथ किस ओर से खेल रहे थे यह पता लगाना भी मुश्किल था. बाकी खिलाड़ियों के साथ आमिर सोहेल मैदान में उतरे थे.

मैच में जडेजा ने 25 गेंदों में 45 रन बनाए. आख़िरी ओवर्स का तूफ़ान.
मैच में जडेजा ने 25 गेंदों में 45 रन बनाए. आख़िरी ओवर्स का तूफ़ान.

आमिर सोहेल. बक़ौल खुद, क्रिकेट एंजॉय नहीं करते थे. वह क्रिकेट जीते थे और मरते भी थे. इस दर्जा, इस कदर कि 1992 वर्ल्ड कप फ़ाइनल में जब वसीम अकरम की गेंद पर इयान बॉथम विकेट के पीछे कैच होकर जाने लगे तो उनके सामने जाकर आमिर सोहेल चिल्लाये- Who is coming to bat next? your Mother-in–law?

किस्सा कोताह, भारत-पाकिस्तान मैच आमिर सोहेल के लिए जीने मरने का भी नहीं सिर्फ और सिर्फ जीतने का ही प्रश्न था और उन्होंने यह भारत के 287 रन के जवाब में आकर बल्लेबाज़ी करते हुए जता भी दिया था. तब 287 रन का स्कोर काफी विशाल माना जाता था. एक तरह से अजेय भी. मगर पाकिस्तानी पारी के पहले दस ओवर खत्म होते-होते लग गया था कि यह स्कोर तो 45वें ओवर तक भी नहीं जाएगा. आमिर सोहेल और सईद अनवर ने दस ओवर में 84 रन जोड़ दिये थे. तब आठ के औसत ने रन बनाना पागलपन की झोंक ही था और दोनों सलामी बल्लेबाज पागलों की तरह ही खेल रहे थे.

ग्यारहवें ओवर में जब श्रीनाथ ने सईद अनवर को आउट किया तो कप्तान आमिर सोहेल की रणनीति के अनुसार जावेद मियादाद को आना था. वह मैदान में खड़े उन्हीं का इंतजार भी कर रहे थे. मगर मैदान के बाहर जो भी रणनीति चल रही थी, उसके अनुसार बल्लेबाज़ी करने आए एजाज़ अहमद. आमिर निराश हुए. इसलिए नहीं कि एजाज़ से उन्हें उम्मीदें नहीं थीं. एजाज़ तो बल्कि पाकिस्तान के डॉन ब्रेडमेन कि उपाधि से विभूषित खिलाड़ी थे. निराशा उन्हें अपनी रणनीति के टूटने से हुई. मगर उन्होने इस निराशा को अपने खेल पर 14 वें ओवर तक हावी नहीं होने दिया और स्कोर 105 के ऊपर ले गए.

आमिर सोहेल आपको देखते हुए.
आमिर सोहेल आपको देखते हुए.

निर्णायक ओवर अब आया. 15वां ओवर. वेंकटेश प्रसाद का ओवर. वेंकी का यह घरेलू मैदान था. घरेलू मैदान तो खेल रहे तीनों ही मुख्य गेंदबाजों का ही था. मगर वेंकी बाकी दोनों गेंबाजों से अपेक्षाकृत कम अनुभवी थे सो उन्हें घरेलू मैदान पर खुद को ज्यादा साबित करना था.
चौदहवें ओवर की एक गेंद पर आमिर सोहेल बुरी तरह बीट हुए. दर्शक चिल्ला उठे. इस दर्जा कि तब के विश्वकप विजेता पाकिस्तानी कप्तान और अब के पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान को कहना पड़ा- ‘आमिर बड़े ही अप्रत्याशित खिलाड़ी हैं. कब बीट हो जाये और कब चौका जड़ दें पता नहीं चलता.’

आमिर सचमुच अप्रत्याशित खिलाड़ी थे. उन्होने अगली ही गेंद पर चौका जड़ कर पूरे स्टेडियम को मौनव्रत पर भेज दिया. ऐसा कि कहावत ‘सुई गिरे तो बम की आवाज होती है’ उसी क्षण चरितार्थ हुई. गेंद गोली की रफ्तार से कवर्स की ओर गयी और ऑस्कर और वीज़ा कार्ड के बोर्ड के ठीक बीच में टकरा कर ठहर गयी. मगर आमिर सोहेल नहीं ठहरे. वह आगे आए. पहले बल्ले से गेंद की ओर इशारा किया और फिर बाएं हाथ की तर्जनी से वेंकेटेश को यूं चेतावनी दी जैसे कहना चाह रहे हों कि फिर वहीं मारूंगा. यहां तक सब ठीक था. पाकिस्तान खेल में भी था और इस मुठभेड़ के बाद 1-0 से आगे भी था. गलती इसके बाद भारतीय दिमाग पढ़ने में हुई.

आमिर सोहेल ने अपनी तासीर के अनुसार यह सोच लिया कि इतना भड़काने के बाद वेंकी अगली गेंद बाउंसर ही डालेंगे. यहीं उनसे चूक हुई. एक शांत चित्त भारतीय दिमाग पढ़ पाने की चूक. वेंकेटेश प्रसाद ने ठीक उसी रफ़्तार से ठीक उसी गेंद की रेप्लिका डाल दी. आमिर की सोच में भी यह रणनीति नहीं थी. उन्होने गेंद को बाउंसर के लिहाज से ही घुमाया. बल्ला गेंद के ऊपर से तैर गया. गेंद आमिर सोहेल का ऑफ स्टम्प ले उड़ी. वेंकेटेश प्रसाद ने ठीक उसी तरह उन्हें पवेलियन का रास्ता दिखाया मगर कुछ कहते हुए. अंग्रेज़ी में कहे गए उनके वो शब्द यहां लिखना मुनासिब नहीं ही होगा. फिर भी बात कुछ ऐसी तो थी ही कि लौटते हुए भी आमिर ने उसकी शिकायत अंपायर डेविड शेफ़र्ड से की. वेंकटेश प्रसाद अपना काम कर चुके थे.

डेविड शेफ़र्ड की नसीहतें सुनने के लिए तजुर्बेकार कप्तान मुहम्मद अज़हरुद्दीन थे ही. वह अपने चिर-परिचित अंदाज में सिर एक ओर झुकाये हुए नसीहत घोंटते रहे. डेविड जब इसी नसीहत को लेकर वेंकी के पास पहुंचे और इससे पहले कि वेंकी को अपनी बात पूरी सुना पाते पवेलियन से दौड़ते हुए सलिल अंकोला आ गए. एक ही लंबाई के दोनों खिलाड़ियों ने हाइ-फ़ाइव किया तो अंपायर शेफ़र्ड समझ गए कि इन्हें समझाना फ़िजूल है. वह फिर कप्तान अज़हर की ओर बढ़ गये.

भारत अपनी रफ्तार से जीत की ओर बढ़ गया. इस बात के बाईस वर्षों बाद आमिर ने एक साक्षात्कार में कहा कि आक्रामक होने की यह रणनीति उन्हें जावेद मियादाद ने ही सिखायी थी. जावेद मियादाद – उनकी कहानी फिर कभी.

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