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कोरोना डायरीज़: नोटबंदी, जीएसटी, कोरोना से बर्बाद हो रहे इस व्यापारी के ग़ुस्से को देख डर लगेगा

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धीरज दहिया

नाम – धीरज दहिया

काम – छोटा-मोटा व्यापारी

गाम – नाहरी, जिला सोनीपत, हरियाणा

कोरोना में मैं क्या कर रहा हूं? क्या करना है, भाई जी. लुट-पिट के बैठे हैं. एक पैग बनाया है. देखो, माइंड मत करना. पर अभी ज़रूरी है. कोरोना से तो बाद में मरेंगे. अभी तो ये है कि कहीं टेंशन से दिमाग की नस ना फट जाए. पूरे देश में घणे हैं मेरे जैसे, जिनको हार्ट अटैक आने वाला होगा.

पूरी जवानी कई खटेबों में पैर दिए रखा. फिर सब छोड़कर सोचा कि मछली फार्म खोलूं. भाई जी, एक साल डिस्ट्रिक्ट ऑफिस के चक्कर काटकर गोड्डे (घुटने) गल गए मेरे. कभी कुछ, कभी कुछ. ये कागज़, वो कागज़. आज मैडम नहीं हैं. आज फलाने सर नहीं हैं. अब इलेक्शन आ गए. थक-हार कर नया काम सोचा. अब पतले होने के प्रोडक्ट की सेलिंग करते हैं . अपना नेचुरल प्रोडक्ट है. मैन्युफैक्चरर से माल उठा लाते हैं. फिर उसके इश्तिहार का, मार्केटिंग का, सेल्स का. वो सब अपना है. ऑर्डर आते हैं फ़ोन पर. हम कूरियर करवा देते हैं.

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लेकिन कोरोना ने करवा दिया अब सबकुछ बंद. अपना तो काम ऐसा है नहीं कि ‘वर्क फ्रॉम होम’ हो जाए. आज 21 दिन का लॉकडाउन और कर दिया. ऊपर से ऐसा कुछ कह रहे हैं कि रजिस्टर्ड कंपनियों को तनख्वाह भी देनी पड़ेगी सब एम्पलॉयी को. भाई जी, इतने बड़े धन्ना सेठ तो हम हैं नहीं, कि आवला-बावला पैसा हो. कुछ कमाते हैं, तो आगे कुछ देते हैं. अब कहां से दे देंगे सैलरी? कमाई इक्कनी नहीं, और हर महीने ये दो लाख का ‘जूत’ लगेगा अलग. 21 दिन की तो अब कही है, जून तक भी ये हालात रह जाएं, तो कोई बड़ी बात नहीं है. मैं तो 7-8 लाख नीचे आ जाऊंगा. अब देखो, कुछ हम जैसे छोटे व्यापारी के लिए भी किया जाए तो. वर्ना कंपनी को ताला लगाना पड़ेगा. और क्या करें? 3-4 महीने बाद बर्बाद होकर ताला लगाने से बढ़िया है कि अभी लगा दो. कुछ गलत कह रहा हूं, तो बताओ.

इन नेता की तो ज़रा सी लगती है. फरमान पास कर देते हैं सीधा. सबसे ज़्यादा कौन मरता है? मिडिल क्लास आदमी. कभी कह दी कि नोट बदलवाओ. गरीब के पास तो इतने हज़ार, दो हज़ार के नोट थे नहीं. अंबानी, टाटा, बिड़ला कोई लाइन में लगा हुआ मैंने देखा नहीं. अपना धंधा ऐसा मंदा हुआ उसके बाद, कि क्या बताऊं. थोड़ा संभले थे, तो फिर जीएसटी का पंगा फंस गया. अब ये कोरोना और लॉकडाउन. ये भाईसाब हैं जो, अपने मैन्युफैक्चरर, किलकारी मार के रोने लग रहे थे. लोगों को तो ये लगता है कि फैक्ट्री लगा रखी है. पता नहीं कितना बड़ा साहूकार होगा. पर इतना कुछ कहां बचता है भाई जी.

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सूक्ष्म-लघु-मध्यम उद्योग को बहुत जोखिम झेलने पड़ते हैं.

अमीर बर्बाद होते हैं, तो सरकार वो कर देती है. क्या कहते हैं, एनपीए, मतलब कर्जा माफ़. ऊपर से इनकी कंपनी में रुपया डाल देती है. उसमें भी बिना हमारी गलती के सारा बर्डन हम जैसों के ऊपर. आप खुद देख लो, ये पीएमसी. बैंक, और यस बैंक में आम लोगों की जो ऐसी-तैसी हुई है. और अब ये एलआईसी और एसबीआई का भी डोबा डोब दे, तो कोई ताज्जुब नहीं. जिस हिसाब से चल रहे हैं.

एक नेता गरीबों का मसीहा बना बैठा है. दूसरा अमीरों से गले मिलता है. हम मिडिल क्लास का कौन है, भाई जी. कुछ मेहनत कर के दो ‘रपिए’ कमा लेते हैं. 7-8 लोगों को रोज़गार दे देते हैं. अपना टैक्स भर देते हैं. कोई गुनाह करते हैं क्या. और देखो, इन नेता के ऊपर कैसे लोग आपस में एक-दूसरे का सिर फोड़ने को तैयार बैठे हैं आज के टाइम में.

असल में गलती म्हारे पै या होगी, कि बाबू की बात ना सुनी. कहया करता कि धीरज, पढ़ाई कर के सरकारी नौकरी का पेपर पास कर ले. अफसर ना, किते क्लर्क, चपड़ासी लाग ज्या. कहीं प्राइवेट में देख ले. ये बिजनेस विजनेस हमारे जैसे मिडिल क्लास के लिए ना होता. अब उसी का भुगत रहे हैं. अपना तो बस राम रखवाला है.

अरे नहीं, रामजी भी अब तो म्हारा बैरी हो रया है. मार्च के महीने में ओले पड़ रहे हैं. आप जैसे बारिश का एन्जॉय लेते हो बालकनी में बैठ कर. चाय के साथ गर्मा-गरम पकौड़े खाकर. हमारे जैसों के खेतों की वो बिरान माटी हुई है, जो नहीं हो कभी. कल एक भाई से बात हो रही थी. बोला कि इस बार फसल की कटाई ना करवाऊं. कटाई के रपिए भी क्यों ख़राब करे. खेत में ही बहा देंगे. एक बाळ में भी गेहूं का दाना नहीं बचा हुआ. मेरे डेढ़ किल्ले का भी ऐसा ही नाश मरा हुआ है.

Corona Diaries Wheat Crops Destroyed
बारिश और ओले पड़ने की वजह से ख़राब हुई फसल

भाई जी, मिडिल क्लास में हो अगर, एक तो बिजनेस मत कर लेना. दूसरा खेती मत कर लेना. कुछ सांग ना है. बेइज़्ज़त होना है बस. अब तो गांधी वाली बात है. अपना चरखा कातो भाई. घर में एक गाय-भैंस हो, चक्की हो, और ठेका (गेहूं स्टोर करने की टंकी). खेत में थोड़ी बहुत अपनी शुद्ध सब्ज़ी-अनाज उगा लो, उगाओ तो. फिर किसी से लेना एक, ना देना दो. बहुत ज़्यादा रपिया नहीं, पर अपना ठीक काम चाल ज्या. फिर जहां जो आग लागती हो, लागती रहवै. कम से कम आप सेफ रहोगे.

# कोट –

एक नेता गरीबों का मसीहा बना बैठा है. दूसरा अमीरों से गले मिलता है. हम मिडिल क्लास का कौन है, भाई जी.


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कोरोना डायरीज: इटली के गांव से ये भारतीय, लॉकडाउन पर क्या कह रहे हैं-

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