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कोरोना डायरीज़: उस लड़के की आपबीती जो 23 कोरोना पेशेंट्स के गांव में रह रहा है

दीपक
दीपक

नाम- दीपक

काम- तार बनाने की कंपनी में वर्कर, क़तर में  

जगह- पंजवार

 

मेरे गांव के 23 लोगों को कोरोना है. जिस लड़के से कोरोना फैला है वह भी विदेश से आया है. लोग उसको दोष दे रहे हैं. मुझसे भी तुलना कर रहे हैं उसकी. तुलना करने की जरुरत नही है. सबकी अपनी समझ है. प्रशासन और उसकी सबकी जिम्मेदारी है.

मैं 21 मार्च को दिल्ला आ गया था. दिल्ली एयरपोर्ट पर आठ घंटा रखा गया. थर्मल स्कैनिंग की गई. कहा गया कि घर जा के क्वारंटीन हो जाना. उन्होंने ही सिवान प्रशासन को सूचित किया था. मैं 22 मार्च को घर आ गया था. सबसे मिलने का मन तो था लेकिन मैंने खुद को क्वारंटीन कर लिया. फिर 29 मार्च को मुझे सिवान ले जाया गया. मैं वहां 5 अप्रैल तक था. फिर घर आ गया.

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मैं कतर में काम करता हूं. तीन महीने का कॉन्ट्रैक्ट था. मुझे आना ही था. वहां भी कोरोना का काफी सुनाई देने लगा. इसलिए मैं आ गया. हमें फ्लाइट में ही एक फॉर्म दिया गया. दिल्ली उतर कर सब चेक हुआ और वो फॉर्म लिया उन्होंने और मुहर लगा कर छोड़ दिया. हिदायत दी कि वापस जाकर घर पर क्वारंटीन रहना है.

फिर मैं दिल्ली बस अड्डे पर आ गया. रेलवे स्टेशन पर तो नो एंट्री का बोर्ड लगा दिया गया था. कैसे-कैसे बस मिली ये तो मैं ही जानता हूं. बस गोरखपुर आयी और फिर वहां से अगले दिन, 23 मार्च को मैं घर आ सका. लेकिन तबतक मैंने सोच लिया था कि क्या करना है. मैंने घर आते ही सबको कहा कि मुझे 14 दिन यहीं बाहर रहना है. मैंने अपने लिये साबुन, बाल्टी, बिस्तर वगैरह मंगवाया. कुछ चीजें मैंने रास्ते में खरीद ली थीं. जरुरत भर सामान के साथ मैं बाहर ही क्वारंटीन हो गया. तब से यहीं हूं.

घर के बाहर जहां दीपक क्वारंटीन हैं.
घर का बारामदा, जहां दीपक क्वारंटीन हैं.

इस बीच 29 मार्च को मुझे प्रशासन की तरफ से सिवान लाया गया. वहां मेरा सैंपल लिया गया. और मुझे क्वारंटीन कर दिया गया. एक डीएवी कॉलेज है. उसी में. मैं वहीं था. एक कमरे में चार लोगों के रहने की व्यवस्था थी लेकिन दो ही लोग थे. ठीक ठाक अरेंजमेंट था. फिर मुझे पांच तारीख की शाम को लेटर दिया गया जिसमें लिखा था कि अभी अगले 14 दिनों तक मुझे रहना चाहिए. मैं घर आकर फिर से क्वारंटीन हूं. आज 26 दिन हो गया. दो तीन दिन की और बात है. घर वाले समझदार हैं. घर में मां को छोड़ कर सब पढ़े लिखे हैं. छोटा भाई तो मुझसे भी जिम्मेदार है. तेज है पढ़ने में. उसने सपोर्ट किया. बहन है, वह भी समझती है.

पूरे गांव में पुलिस का पहरा है, ड्रोन से निगरानी की जा रही है.
पूरे गांव में पुलिस का पहरा है, ड्रोन से निगरानी की जा रही है.

हां, जबसे आया हूं पत्नी को देखा भी नहीं हूं. पिछले साल जुलाई में शादी हुई थी. फोन पर बात करता हूं. गांव का तो होता ही है कि महिलाएं बाहर नहीं आती हैं. पापा रहते हैं बाहर तो वह आती नहीं है. लेकिन कुछ दिनों की बात है. मेरे चलते मेरे पूरे परिवार को दिक्कत हो यह मैं नहीं चाहूंगा. कोई नहीं चाहेगा. अब वही लड़का गलती किया है. अगर वह पढ़ा लिखा नहीं है तो क्या कर सकते हैं लेकिन अगर पढ़ लिख कर फिर ऐसा कर रहा है तब तो नासमझी है. और देखिए कितनी प्रॉब्लम हो रही. पूरे गांव को लोग क्या-क्या कह रहे हैं.

कोट

हमारा गांव बहुत जिम्मेदार गांव है. इसका देश भर में नाम है. सब ठीक हो जाएगा. बस थोड़ा सा संयम से काम लेना होगा.


कोरोना डायरीज. अलग अलग लोगों की आपबीती. जगबीती. ताकि हम पढ़ें. संवेदनशील और समझदार हों. ये अकेले की लड़ाई नहीं है. इसलिए अनुभव साझा करना जरूरी है. आपका भी कोई खास एक्सपीरियंस है. तस्वीर या वीडियो है. तो हमें भेजें. 

corona.diaries.LT@gmail.com  



वीडियो देखें: सीवान के पंजवार जैसा गांव आपने बिहार में देखा नहीं होगा

 

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