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कैंपस किस्सा: जब एक लड़की से हुई बदतमीज़ी के विरोध में सैकड़ों स्टूडेंट्स ने लाठी खाई

बनारस. यहां का एक टापू है बीएचयू. टापू इसलिए कि यहां के पढ़निहारों के लिए यह शहर, घाट और गोदौलिया बन कर रह जाता है. ठीक वैसे ही शहर के लोगों के लिए यह ‘पहले जईसन नांही रह गयल हौ बी.एच.यू.’ (पहले जैसा नहीं रहा बीएचयू) बन कर. इसका हिस्सा बने हम 2016 में.

आते ही ‘भैया प्रणाम… कैसे हैं?’ की आदत पड़ गयी. धीरे-धीरे माहौल मिलने लगा. परिचय हुआ. चार लोग जानने लगे. फिर शौक लगा कवितायी का. यूनिवर्सिटी में एक बार कविता करने का शौक ना लगे तो फिर घर लौट जाना चाहिए दोस्तों. खैर, सेमेस्टर और 1300 एकड़ के इस मायाजाल को समझते-समझते साल भर बीत गया. एकदम इतने ही हल्के से निकल गया. जितना हल्के से जिक्र किया हमने. इसी बीच जुलाई 2017 आ गयी और ‘भैया प्रणाम… कैसे हैं?.’ कहने वाले भी आ गये. हमने भी परंपरा आगे बढ़ा ली. प्रणाम स्वीकार करने लगे. लेकिन इस सब के बीच कुछ ऐसा होना तय था जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी.

यह तस्वीर तब अमित मीरा सिंह ने उतारी थी.
बायीं  तरफ पहले दिन स्टूडेंट्स की भीड़ और दूसरी तरफ एक स्टूडेंट. तख्ती लिए. यह तस्वीर तब अमित मीरा सिंह ने उतारी थी.

20 सितंबर 2017 को हमारी जानने वाली एक जूनियर के साथ चौराहे पर बदतमीजी की गयी. मामले ने रात भर में इतना जोर पकड़ लिया कि 21 सितंबर की सुबह ‘सिंह द्वार’ (बी. एच. यू. मेन गेट) पर हज़ारों लड़कियां आ गयीं थीं. वो तीन दिन रहीं. लड़के-लड़कियां तीनों दिन जमे रहे. आखिरी दिन लाठीचार्ज हुआ. हम सब भौंचक थे कि ये क्या हो गया.

हम भी गए. यह सब कुछ पहली बार था. और फिर यह सबकुछ थोड़ा पर्सनल भी था. खैर, हम सब को शाम से ही इतना आभास हो गया था कि लाठीचार्ज होने वाला है. सितंबर की शाम थी. थोड़ा सर्द और उतना ही गर्म. मेन गेट की चौखट पर लड़के- लड़कियां. यह उनकी तीसरी शाम थी. 23 सितंबर की शाम. किसी के हाथ में तख्त थे किसी के हाथ में पानी की बोतलें. खाली बोतलों में कंकड़ डाल कर नारों के साथ रिदम बैठाते लड़के और अपने-अपने हिस्से का नारा लगा कर चुप हो जा रही लड़कियां. बगल से गुजरती ऐम्बुलेंस और गाड़ीयों की चिल्ल पों. धूप थी कि जाने का नाम नहीं लेती थी. लेकिन पहले दिन से ही सबने दिन-रात बैठे रहना चुना था.

ये पहले दिन(21 सितंबर ) के शाम की तस्वीर है. तस्वीर- अमित मीरा सिंह.
ये पहले दिन  (21 सितंबर ) के शाम की तस्वीर है. तस्वीर- अमित मीरा सिंह.

…और जब लाठीचार्ज हुआ

ये शाम तो लाठियों के नाम होनी थी. सामने सड़क पर हेलमेट पहने, बन्दूकें खोंसे पुलिस थी. आज उन्हें लाठियां भाजनी थीं. और फिर शाम के साढ़े सात बजे. दो-तीन सूचनाओं के बाद वो आगे बढे़ और सामने आ गये. इतने सामने कि उनकी पलकें देखी जा सकें. वो किसी से नजरें नही मिला रहे थे. सबको देखते और बस सड़क पर लाठियां ठोकते. सिपाहियों को साहेब के आदेश का इंतजार था और साहेब को किसी खुराफात का. सब कुछ पहले से तय जान पड़ता था.

और तभी बारूदी गंध ने नारों को शोर में बदल दिया और वहां मौजूद छात्रों को भीड़ में. रौशन हुए रस्ते पर दौड़ लगाती पुलिस को आभास नही था कि शोर ऐसा होगा. सब बेतरतीब हो गए. चीखे. और उठ कर खड़े हो गए. मामला प्रेजेंट टेंस में आ गया. अब लाठियां चलनी हैं. स्टूडेंट्स ने लाठियों का सामना करना चुना है और उनके साहस को गांधी का सहारा है. सिपाहियों के सामने आकाश मे उछाले गए नारे हैं और कारतूस कमर में बिहंस रही. उठती मुट्ठीयों में नन्हें बच्चों सा तनाव है. नारों में बांकपन है और आवाज में लय.

लाठीचार्ज के ठीक पहले की तस्वीर. साभार वही- अमित मीरा सिंह
लाठीचार्ज के ठीक पहले की तस्वीर. साभार वही- अमित मीरा सिंह.

मंजर यूं समझ लीजिए कि पेड़ पर बैठी चिड़िया ने पंख हिलाया और एक बार चूं कह कर घोंसले में चली गई गोया उसे आभास हो कि बार-बार एक ही बात बोलने पर वह नारा बन सकती है. लाठियां चल चूकी हैं. एक दूसरे की तरफ भागते लड़के-लड़कियां बेतरतीब हुए जा रहे हैं. उनके पांव में मछलियों सी घबराहट है. सांस फेफड़ों से ले रहे. बिना दिशा सोचे बस कैंपस में भाग रहे. हेलमेट के भीतर की आंखों का हाल नहीं पता. लेकिन भाग रहे पढ़निहारों की आंखें लाल हो गयी हैं. चिड़िया ने घोंसले से निकल कर झांक लिया है. अबकी वह बच्चों को सुरक्षित करने भीतर गई है. पत्थरों ने हवा से चुनौती ले ली है. जैकेटों में गर्म हवा जा तो रही है मगर लाठियों के सहारे से निकल भी जा रही.

लाठीचार्ज के ठीक बाद की तस्वीर. साभार फिर से - अमित मीरा सिंह
लाठीचार्ज के ठीक बाद की तस्वीर. साभार फिर से – अमित मीरा सिंह

क्या हासिल है लाठी का?

प्रदर्शनों में साहस की उपयोगिता भीड़ तय करती है और बंदूकों की प्रशासन. साहस के रास्ते पर आवागमन शुरु हो जाए तो इंसानों के पथ पर रंगरुट दौड़ने लगते हैं. अनुरोध कब हिदायत और हिदायत कब आदेश बन जाता है इसे वर्दियां ही समझ पाती हैं. सिर के पास से पीछे खींच कर तानी गई लाठियों में जितनी ताकत आ पाती है. उससे बहुत कम हौसले में उसके सामने रहा जा सकता है. हवा में चलायी गईं गोलियों के साथ निकला धुआं, सामने खड़े लोगों के सीने में गुबार भरता है.

स्लोगन अमर रहे. तस्वीर- अमित मीरा सिंह.
स्लोगन अमर रहे. तस्वीर- अमित मीरा सिंह.

बीते कुछ दिनों में लाठीचार्ज आम हो गया है और पुलिस खास. कभी किसानों पर खीस निपोरती पुलिस तो कभी प्रवासी मजदूरों पर लाठियां भांजती. किसी तस्वीर में तनी उंगली और चढ़ी भौहें पुलिस को उसके शांति और सेवा को याद करा रहे होते हैं. तो किसी तस्वीर में पुलिस पर ही चलाए गए पत्थर कानून को ललकार रहे होते हैं. यह सबकुछ दिमाग में आते ही रुक जाता है. एक तस्वीर बनती है और बनी रह जाती है. एक दूसरे पर गिरते पड़ते लोग. खून से सना माथा. लाठी ताने पुलिसवाला. उंगली दिखाता प्रदर्शनकारी. सब कुछ बोलता दिखाई पड़ता है.

नयी तरह की पुलिस आयी थी. सब पहली बार देखा था हमने. तस्वीर- अमित मिरा सिंह
नयी तरह की पुलिस आयी थी. सब पहली बार देखा था हमने. तस्वीर- अमित मीरा सिंह

…और फिर दौर बीत जाता है

एक झोंके के बाद लाठी ताने रंगरुट कहीं खप जाता है. और मुट्ठी तानने वाला भी समय के हाथों गढ़ा जाने लगता है. किसी लाठीचार्ज की तस्वीर खिंच जाती है और समय के साथ छूट भी जाती है. बचा रहता है सिर्फ एक फ्रेम. फ्रेम जिसमें एक खाकी वाला, एक प्रदर्शनकारी और एक लाठी, हाथ उठाए इतिहास में नाम लिखाने के लिए खड़े रहते हैं. इसी फ्रेम के बदौलत पीढ़ियां आंदोलनों को अपने मन में जिंदा रखती हैं.

कोई रिटायर्ड पुलिस वाला अपने बच्चों को लाठीचार्ज की कहानी सुनाता है और कोई मां या पिता अपने आंदोलनों की गाथा कह कर अघाया महसूस करते हैं. दोनों कहानियों के विजेता अपने हिसाब से तय होते हैं. लेकिन कहानी खत्म होने के बाद का मंजर दोनों के ज़हन में तैर जाता है.

लाठीचार्ज के बाद सब दौड़ रहे हैं और अफरातफरी के बाद खाली हुई जगह लोकतंत्र शब्द के मात्रा विहीन उच्चारण जैसी लगती है. एक-एक पैर की कई चप्पलें नीरीह सा आकाश ताकती हैं. ईंट के कोर घिस गए हैं, वह अब अगली बार सटीक लगेंगे. कांच की किरचों में सूरज की रोशनी चमक रही. आंखें जमीन पर टिकती हैं तो फौरन ही चौंध जाना चाहती हैं. यह मंजर बताए नहीं बनता.

ना तो आंदोलनकारी पिता या मां इसे कह पाते हैं और ना ही रिटायर्ड पुलिसकर्मी. दोनों बस यह सोचते हुए अपने अतीत में खो जाते हैं. उनका वो अतीत हमारा वर्तमान है जिसमें दौड़ कर हांफ गए दोनों पक्ष अब इंसान जान पड़ते हैं. पुलिस हेलमेट सहेजती है और थाने लौट जाती है. डाल पर चिड़िया आ कर फिर लौट जाती है. नारे हवाओं हैं. पुलिस ने शांति से सेवा देकर न्याय कर दिया है.

खैर, लॉकडाउन में जब सब कुछ बंद है तो शांत पड़े उस गेट की तस्वीर देखिए, जो बीते कई आंदोलन का मजबूत स्तंभ रहा है. यह बीएचयू परिसर में स्थित महिला महाविद्यालय का मुख्य द्वार है.

 

यह MMV गेट की आज (20 मई 2020) की तस्वीर है. साभार- अर्पित.
यह  MMV गेट की  20 मई 2020 की तस्वीर है. साभार- अर्पित.

कैंपस किस्सा. दी लल्लनटॉप की खास सीरीज. जिसमें हम बात करते अपने कैंपस की. उन किस्सों की, कहानियों की जो कैंपस छूट जाने के बाद भी हमारे साथ बने रहते हैं. अगर आप भी अपने कैंपस से जुड़ी यादें हमारे साथ शेयर करना चाहते हैं तो लिख भेजिए YUVA.LALLANTOP@GMAIL.COM पर. साथ में अपना नाम पता और कॉन्टैक्ट नंबर भी जरूर लिखें.


 वीडियो देखें:  लाठीचार्ज के बाद क्या हो रहा है BHU हॉस्टल में 

 

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