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क्या रफाल बनाने वाली कंपनी भारत को चूना लगा रही है?

पिछले कुछ दिनों में रफाल ने अच्छे कारणों से खबरें बनाना शुरू ही किया था कि कैग की एक रिपोर्ट ने उसे फिर विवादों के बीच खड़ा कर दिया है. मॉनसून सत्र का एक फायदा ये भी होता है कि इस दौरान नियंत्रक-महालेखा परीक्षक माने CAG की रिपोर्ट संसद के पटल पर रखी जाती हैं. ऐसी ही एक रिपोर्ट में रफाल खरीद सौदे का उदाहरण देकर भारत सरकार की रक्षा खरीद नीति को कटघरे में खड़ा किया गया है.

प्रधानमंत्री मोदी रफाल को बहुत पसंद करते हैं. खुद फ्रांस जाकर ऐलान किया था कि 36 जेट लिए जाएंगे. सवाल उठे, तो सरकार और सरकार के समर्थकों ने कहा कि सेना के साथ-साथ अर्थव्यवस्था को मज़बूती मिले, इसका भी इंतज़ाम किया गया है. तब ऐसी क्या चूक हो गई कि देश के सबसे बड़े, या यूं कहें कि दूसरे सबसे बड़े चौकीदार ने इसे अनियमितताओं के नमूने के रूप में पेश किया. तसल्ली से समझेंगे.

ऑफसेट कमिटमेंट क्या होता है?

इतनी बात शुरुआत में ही समझ लीजिए कि कैग ने रफाल खरीद पर अलग से रिपोर्ट पेश नहीं की है. कैग ने रक्षा खरीद पर टिप्पणी की है. खास तौर पर ऑफसेट कमिटमेंट पर. तो पहले यही समझ लीजिए कि ये ऑफसेट कमिटमेंट क्या होता है. मान लीजिए आपको अपने घर के लिए हफ्तेभर की सब्ज़ी खरीदनी है. तो आप झोला और बटुआ लेकर बाज़ार पहुंचेंगे. अब खरीदारी करने के दो तरीके हैं. एक तो ये कि जो पैसे मांगे जाएं, वो देते चलें. दूसरा तरीका हुआ मोलभाव वाला. जहां आप कोशिश करते हैं कि ऐसा सौदा किया जाए, जिसमें ज़्यादा से ज़्यादा फायदा हो. अब सब्ज़ी वाला हमेशा पैसे कम करने को राज़ी हो, ये ज़रूरी नहीं. तो आप दुकानदार से कह देते हैं कि अच्छा तुम्हारे ही यहां से सब्ज़ी लेंगे, भाव भी जो तुम कहोगे, वही लगेगा, लेकिन तुम्हें धनिया हमें मुफ्त में देना होगा. और झोला भी तुम घर तक पहुंचाओगे. दुकानदार हां कर देता है. उसे उसका दाम मिला और आपको धनिया. साथ में घर पहुंच सेवा.

राफेल लड़ाकू विमान. पिछले 10 साल से इस विमान को लेकर भारत में खूब हल्ला हुआ है.
रफाल लड़ाकू विमान. पिछले 10 साल से इस विमान को लेकर भारत में खूब हल्ला हुआ है.

यहां मुख्य सौदा है सब्ज़ी का. जो धनिया और घर पहुंच सेवा आपको मिली है, वो है ऑफसेट कमिटमेंट. हथियारों की खरीद भी सरकारें इसी तरह करती हैं. चूंकि ये बहुत महंगे होते हैं, तो सरकारें कोशिश करती हैं कि हथियार बेचने वाले से कोई ऑफसेट कमिटमेंट लिया जाए. ये कई तरह से किया जा सकता है. कभी कोई चीज़ मुफ्त मिलती है, तो कभी कोई कौशल या तकनीक ली जाती है. कभी वेंडर से कहा जाता है कि तुम हमारे यहां कारखाना लगा दो. उसमें लोकल लोगों को नौकरी दो. एक तरीका एक हाथ से ले, एक हाथ से दे वाला भी है. कि हम तुमसे जेट खरीदेंगे, तुम हमसे टैंक खरीदो. ऐसे अनगिनत तरीके हैं, हमने ज़्यादा चर्चित तरीकों के उदाहरण दिए हैं.

ऑफसेट पूरा न होने से नुकसान क्या है?

तो कैग की जिस रिपोर्ट पर बवाल हुआ है, वो ये बताने की कोशिश कर रही है कि भारत रक्षा खरीद कर तो रहा है, लेकिन उसका 100 फीसदी फायदा उसे नहीं हो रहा. क्योंकि वेंडर ऑफसेट कमिटमेंट पूरा ही नहीं कर रहे. अब आप पूछ सकते हैं कि भैया हम तो सब्जी ही लेने गए थे. धनिया न भी मिले, तो कोई बात नहीं. और हम झोला भी खुद ले आएंगे. तो ऑफसेट कमिटमेंट अधूरा भी रह गया, तो कौन-सा आसमान गिर जाएगा. अपना रफाल तो वैसे भी आ ही रहा है. तो इसका जवाब ये है कि ऑफसेट कमिटमेंट पूरा न होने से कई तरह के नुकसान होते है-

पैसे का नुकसान

ऑफसेट कमिटमेंट पूरा करने के लिए वेंडर को पैसा खर्च करना पड़ता है. अब वो दानी कर्ण की परंपरा से तो आता नहीं कि परोपकार करे, वो तो हथियारों का व्यापारी है. तो वो सौदे की रकम को थोड़ा बढ़ा देता है. कि जब धनिया भी देना है, झोला भी ले जाना है, तो बैंगन का दाम 10 नहीं 12 रुपए पाव लगाया जाएगा. इसीलिए जब ऑफसेट कमिटमेंट पूरा नहीं होता, तो हम मुफ्त की सेवा से वंचित नहीं रहते. हमारे हाथ से वो चीज़ छूट जाती है, जिसका पैसा हम दूसरे रास्ते से दे चुके हैं. Stockholm International Peace Research Institute (SIPRI) के मुताबिक 2015-2019 के बीच भारत दुनिया में हथियारों का दूसरा सबसे बड़ा आयातक था. अब भी तीसरे से चौथे नंबर झूलता रहता है. इस हिसाब से अंदाज़ा लगाइए कि अगर हम थोड़ा-थोड़ा पैसा भी अगर हर ऑफसेट कमिटमेंट पर खोते जाएं, तो वो कुल मिलाकर कितने बड़े नुकसान में तब्दील होगा.

राफेल की खरीद को लेकर लगाए गए विपक्ष के आरोपों पर रक्षा मंत्रालय को बार-बार सफाई देनी पड़ी थी. (सांकेतिक फोटो)
रफाल की खरीद को लेकर लगाए गए विपक्ष के आरोपों पर रक्षा मंत्रालय को बार-बार सफाई देनी पड़ी थी. (सांकेतिक फोटो)

तकनीक का नुकसान

रक्षा बाज़ार में सब कुछ पैसे के मोल नहीं बिकता. कटिंग एज तकनीक (माने सबसे धांसू वाली तकनीक) अमूमन देश किसी को नहीं देते. मिसाल के लिए अमेरिका ने F22 रैप्टर आजतक किसी देश को नहीं बेचा. ये स्टेल्थ तकनीक वाला लड़ाकू विमान है, जो 2005 से अमेरिकी वायुसेना में है. इसके बाद आया F 35 अमेरिका दुनियाभर को बेच रहा है. लेकिन F 22 कभी किसी और के हाथ नहीं लगा. ऐसी तकनीक को हासिल करने का एक तरीका है ऑफसेट कमिटमेंट के रूप में इसकी मांग करना. रफाल सौदे की आलोचना इसी संदर्भ में हुई है, जिसकी बात हम आगे करेंगे.

रोज़गार और कौशल का नुकसान

बेरोज़गारी पर अलग से लेक्चर की ज़रूरत तो नहीं है. तो सीधे कौशल की बात करते हैं. हम सदियों तक हथियार खरीदते ही नहीं रहना चाहते. हम चाहते हैं कि हमारे यहां के इंजीनियर और कामगार वो अनुभव हासिल करें, जिससे ये हथियार देश में ही बनाए जा सकें. ऑफसेट कमिटमेंट्स में होने वाला निवेश अमूमन इसी तरह का फायदा पहुंचाता है. ये हाथ से गया, तो हथियार खरीदने का चक्र तोड़ने में लगने वाला समय बढ़ जाएगा.

कैग की रिपोर्ट में क्या है? 

अब आप जान गए हैं कि ऑफसेट कमिंटमेंट क्या होता है और उसके पूरे न होने से देश को क्या नुकसान पहुंचता है. तो अब आपको बताते हैं कि कैग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा क्या है, जिससे आप समझें कि मुल्क को कितना चूना लगने का खतरा मंडरा रहा है. कैग ने अपनी रिपोर्ट 23 सितंबर, 2020 को संसद को सौंपी. इसमें कैग ने कहा है कि विदेशी वेंडर हथियारों का ठेका पाने के लिए ऑफसेट के रूप में कई वादे करते हैं, लेकिन इन्हें पूरा करने में सुस्ती दिखाते हैं. इस दावे की पुष्टि के लिए कैग ने दिया रफाल खरीद सौदे का उदाहरण.

कैग ने कहा कि रफाल सौदे में हिस्सा लेने वाली दासौ एविएशन और MBDA ने वादा किया था कि ऑफसेट कमिटमेंट का 30 फीसदी वो डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइज़ेशन DRDO को ”हाई टेक्नोलॉजी” देकर पूरा करेंगे. DRDO स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस माने लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट के लिए कावेरी इंजन बनाने में मदद चाहता था. लेकिन आज तक वेंडर ने ये तकनीक DRDO को नहीं दी.

कैग ने कहा है कि विदेशी वेंडर हथियारों का ठेका पाने के लिए ऑफसेट के रूप में कई वादे करते हैं, लेकिन इन्हें पूरा करने में सुस्ती दिखाते हैं. इस दावे की पुष्टि के लिए कैग ने दिया रफाल खरीद सौदे का उदाहरण दिया है. (फाइल फोटो)
कैग ने कहा है कि विदेशी वेंडर हथियारों का ठेका पाने के लिए ऑफसेट के रूप में कई वादे करते हैं, लेकिन इन्हें पूरा करने में सुस्ती दिखाते हैं. इस दावे की पुष्टि के लिए कैग ने दिया रफाल खरीद सौदे का उदाहरण दिया है. (फाइल फोटो)

आप जानते ही हैं कि DRDO ने तेजस के लिए देश में ही कावेरी नाम से इंजन बनाने की बहुत कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली. हारकर तेजस में जनरल इलेक्ट्रिक माने GE का इंजन लगाया गया, जो कि एक अमेरिकी कंपनी है.

विपक्ष ने लगाए थे ये आरोप

इससे पहले अगस्त के आखिरी हफ्ते में खबरें आई थीं कि कैग रफाल सौदे में ऑफसेट डील्स की ऑडिट नहीं करेगा. इसके बाद राहुल गांधी समेत विपक्ष ने सरकार को निशाने पर लिया था. लेकिन इसका जवाब देते हुए वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि ऑफसेट डील्स पर कैग की रिपोर्ट संसद में पेश की जाएगी, और तब सब सामने आ जाएगा. वैसे कैग ने जो बयान जारी किया है, उससे ये साफ नहीं हुआ कि उसकी रिपोर्ट में 50 परसेंट ऑफसेट क्लॉज़ की समीक्षा की गई थी कि नहीं. दरअसल, तकरीबन 60 हज़ार करोड़ के रफाल सौदे में शर्त थी कि आधी रकम का निवेश भारत में होगा. विपक्ष ने आरोप लगाया था कि इसका सबसे ज़्यादा फायदा अनिल अंबानी को होगा. इसे लेकर विपक्ष ने प्रधानमंत्री मोदी और अनिल अंबानी के बीच नज़दीकी के आरोप भी लगाए थे.

2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने राफेल खरीद में घोटाले का आरोप लगाते हुए इसे मुद्दा बनाया था. (फाइल फोटो)
2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने राफेल खरीद में घोटाले का आरोप लगाते हुए इसे मुद्दा बनाया था. (फाइल फोटो)

और क्या है कैग की रिपोर्ट में?

खैर, कैग की रिपोर्ट पर लौटते हैं. कैग ने कहा कि 2005 से लेकर मार्च 2018 तक 46 ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट साइन किए गए, जिनकी कुल कीमत थी 66 हज़ार 427 करोड़. इनमें से 19 हज़ार 223 करोड़ के कॉन्ट्रैक्ट दिसंबर 2019 तक पूरे हो जाने चाहिए थे. लेकिन सिर्फ 11 हज़ार 396 हज़ार करोड़ के कॉन्ट्रैक्ट ही पूरे हुए. माने 41 फीसदी कॉन्ट्रैक्ट्स में देरी हुई. इसके अलावा जो कॉन्ट्रैक्ट पूरे भी हुए, उनमें से सिर्फ 48 फीसदी माने 5 हज़ार 457 करोड़ के कॉन्ट्रैक्ट्स ही मंत्रालय ने ऑफसेट के रूप में स्वीकार किए. होता ये है कि कंपनी काम करने के बाद सरकार को बताती है कि हमने ऑफसेट वाला वादा पूरा किया. फिर सरकार इस दावे की पुष्टि करती है. तो सरकार के हिसाब से जाएं, तो 19 हज़ार करोड़ का काम होना था, लेकिन हुआ सिर्फ साढ़े पांच हज़ार करोड़ का. गिनती में कंफ्यूज़ मत हो जाइएगा. एक हज़ार करोड़ वो रकम है, जिसमें भारत ने चंद्रयान भेज दिया था. और पैसे बचा लिए थे. तो सोचिए हम कितने पीछे चल रहे हैं.

राफेल विमानों का पहला बेड़ा 29 जुलाई को भारत पहुंचा.
रफाल विमानों का पहला बेड़ा 29 जुलाई को भारत पहुंचा.

‘ऑफसेट नीति उद्देश्य पूरा नहीं कर पाई’

और बात सिर्फ कॉन्ट्रैक्ट पूरा करने में देरी की नहीं है. भारत सरकार 2005 में ऑफसेट नीति लेकर आई थी. इसके मुताबिक, 300 करोड़ से बड़े किसी भी सौदे में विदेशी वेंडर को कम से कम 30 फीसदी रकम भारत के रक्षा या एयरोस्पेस सेक्टर में लगानी होगी. इसके लिए विदेशी कंपनी को भारत में एक पार्टनर खोजना होता है. वो ऑफसेट कमिटमेंट पूरा करने के लिए पैसा लगाने के साथ साथ भारतीय कंपनियों को तकनीक भी दे सकते हैं.

कैग ने पाया कि ऑफसेट कमिटमेंट के लिए विदेशी कंपनियां तकनीक देने से लगातार हिचक रही हैं. कैग के मुताबिक, एक भी वेंडर ने हाई टेक्नोलॉजी भारत को नहीं दी. 90 फीसदी पैसा सीधा किसी सामान या सेवा की खरीद में लगा दिया जाता है. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश माने FDI का हाल तो और बुरा है. अब तक सिर्फ 3.5 फीसदी ऑफसेट कमिटमेंट रक्षा क्षेत्र में FDI के ज़रिए आए. इन्हीं सारी बातों को आधार बनाकर कैग ने कहा है कि ऑफसेट नीति अपने उद्देश्य पूरे नहीं कर पाई है और रक्षा मंत्रालय को इस नीति और इसके अमल पर दोबारा विचार करना चाहिए.


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