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'मेरी बीवी पागल हो चुकी है, कहती है मैं उसका हत्यारा हूं'

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लेखक के बारे में

अरविंद दास
अरविंद दास

अरविंद दास ने मीडिया पर 90 के दौर में बाजार के असर पर पीएचडी की है. जेएनयू से. देश विदेश घूमे हैं. पेशे से पत्रकार हैं. करण थापर के साथ जुड़े हैं. दो जर्मन प्रोफेसर के साथ ‘रिलिजन पॉलिटिक्स एंड मीडिया’ लिखी है. अरविंद की किताब ‘हिंदी में समाचार’ काफी चर्चित रही है. अब उनकी नई पुस्तक आर रही है – बेख़ुदी में खोया शहर [एक पत्रकार के नोट्स].


किताब के बारे में

बेख़ुदी में खोया शहर वैचारिक लेखन में बहुआयामी है. ‘ग्लोबल’ और ‘लोकल’ की इस घुमक्कड़ी में जहां कुछ पहचाने चेहरे हैं, वहीं कुछ अनजाने राही. संक्षेप में, किताब लेख-टिप्पणी-ब्लॉग का संग्रह है. देश-विदेश की घुमक्कड़ी, समकालीन मीडिया, संस्कृति और राजनीति के बारे में लेखक ने अपने अनुभव को आत्मीय अंदाज और सहज भाषा में लिखा है. इसमें एक पत्रकार और शोधार्थी का अनुभव घुला-मिला है. इसी पुस्तक के कुछ अंश इस पोस्ट के माध्यम से हम अपने दी लल्लनटॉप के पाठकों को पढ़वा रहे हैं –

किताब


सपनों का समंदर

शाम हो रही है और थोड़ी बूंदा बांदी भी. समंदर के किनारे करीब डेढ़ किलोमीटर में फैले, साफ-सुथरे गॉल फेस पर प्रेमी जोड़े दुनिया से बेखबर छाता हाथ में लिए खुद में मशगूल हैं.

ज़मीज़ा कहती है कि समंदर की लहरें आपको अपनी ओर खींचती है. वे कराची की हैं और लहरों से उनका पुराना वास्ता है. मैं उनकी बातों पर यकीन करता हूं.

मुझे करुत्तम्मा और परीकुट्टी की याद हो आई.

स्कूल के दिनों में जब पहली बार तकषी शिवशंकर पिल्लई का कालजयी उपन्यास चेम्मीन (मछुआरे) पढ़ा था तब मन समंदर देखने को मचल उठा था. करुत्तम्मा और परीकुट्टी का रोमांस हमें अपना लग रहा था. तब पढ़ कर खूब रोया था.
मछुआरे और उनके जीवन को तो हमने देखा था, पर समंदर और उसकी आबो-हवा से हम अपरिचित रहे.

उत्तरी बिहार के हमारे आंगन में नदी बहती थी. कमला-बलान, कोसी, गंडक, गंगा का पानी पीते और संग खेलते हम बड़े हुए पर समंदर हमारे सपनों में पलता रहा.

कोलंबो - 1

कोलंबो के जिस गॉल फेस होटल में मैं रुका हूं वह एक ऐतिहासिक धरोहर है. करीब 150 साल पुराना. कभी चेखव, यूरी गैगरिन, नेहरु जैसे लोग यहां रुके थे. आज की रात मैं भी यहीं हूं, लेकिन इतिहास हमें कहां याद रखेगा!

बहरहाल, इस होटल का बरामदा सीधे लगभग समंदर में जाके खुलता है. बस दस फर्लांग की दूरी पर समंदर का अपार साम्राज्य.

मछलियों की गंध और लहरें मुझे छूती निकल जाती है. यूं तो मैं मछली नहीं खाता पर बचपन से ही मछली की गंध अच्छी लगती रही है. घर में यात्रा से पहले मछली देखना शुभ माना जाता था.

सामने ठेले पर तला हुआ झींगा (फ्राइड प्रॉन) बेचने वाला वृद्ध मुंह बिचका कर इस बारिश को कोस रहा है.

अब बारिश तेज़ हो रही है. मेरे पास छाता नहीं है, इसलिए बारिश से बचने के लिए मैं किसी तरह उस ठेले की आड़ में खड़ा हो गया. बूढ़े व्यक्ति ने ठेले के ऊपर लगे पन्नी को और खोल दिया है. उसकी भाषा मैं नहीं समझ पता, न वह मेरी.

मैंने बस मुस्कुरा दिया.

कोलंबो - श्रीलंका
कोलंबो – श्रीलंका

अभी मानसून नहीं आया है, पर लोग कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन का ये असर है. पिछले दो-तीन दिनों से यहां काफी बारिश हो रही है.

रात ढल गई है. पर बारिश से समंदर की नींद में कोई खलल नहीं पड़ता. दरअसल उसे नींद आती ही कहां है! कभी खरगोश के शावक की तरह कोई झक सफेद गुच्छा मेरी ओर लंबी छलांगे लगाता दिखता है, तो कभी बूढ़ी दादी की तरह किसी बच्चे पर कुपित.

बाहर कोलंबो की सड़कों पर कार, बसों, और टुक-टुक के हल्के शोर के बीच एक ठहराव है. लोगों के मुस्कुराते चेहरे पर विषाद झलकता है.

उत्तरी श्रीलंका में एलटीटीई और सरकार के बीच 25 साल चला खूनी संघर्ष खत्म हो गया, पर कोलंबो की फिज़ा में उदासी अब भी छाई है. लोग युद्ध के बारे में बात नहीं करना चाहते.

शहर की सड़कों पर शांति भले दिखे पर समंदर की लहरों में शोर है. मेरी खिड़की से भी समंदर झांक रहा है. लहरों की झंझावात और चीख मुझे सुनाई दे रही है. मैंने एसी बंद कर दिया है, खिड़की खुली छोड़ दी है और सोने की कोशिश कर रहा हूं.

मार्क्स का राजनीतिक दर्शन मर चुका है

यहां बर्फ़ की चादर धीरे-धीरे सिमट रही है. कहीं-कहीं घास पर बर्फ़ का चकत्ता ऐसे दिखता है मानो धुनिया ने रूई धुन कर इधर-उधर फैला रखी हो.

सबेरे टिपटिप बारिश हो रही थी. भीगते-भागते, पहाड़ियों को पार करते, विश्वविद्यालय की कैफ़ेटेरिया पहुंचे मुश्किल से एक-दो मिनट हुए होंगे कि मेरे कानों में आवाज़ आई, ‘आर यू मिस्टर कुमार?’ आंखे उठाई, सामने वे खड़े थे. मैंने देखा, घड़ी की सुई आठ बज कर 30 मिनट पर ठहरी हुई है.

मैंने जैसे ही आहिस्ते से अपने बैग से कैमरा निकाल कर मेज पर रखा उन्होंने पूछा, क्या आप मेरी तस्वीर लेंगे, इसे छापेंगे! कोई बात नहीं..

अपनी कमीज़ के कॉलर को ठीक करते हुए उन्होंने कहा… अब शायद ठीक रहेगा और मुस्कुरा दिया.

फिर अचानक जैसे कुछ याद करते हुए उन्होंने पूछा ‘आर यू ए सांइटिस्ट ऑर जर्नलिस्ट?’

जर्मनी की एक और तस्वीर
जर्मनी की एक और तस्वीर

‘असल में मैं उन लोगों में से नहीं हूं जो घुमना पसंद करते हैं और शायद इस वजह से ज्यादा गोरा हूं. 35 वर्ष पहले मैं भारत गया था फिर नहीं जा पाया.’ कुछ सफाई देते हुए उन्होंने कहा.

जिगन विश्वविद्यालय, जर्मनी में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के प्रोफ़ेसर युरगेन बेल्लर्स के साथ हमारी बातचीत का यह अवांतर प्रसंग था:

यहां तो अब मार्क्स का राजनीतिक दर्शन मर चुका है. हां, छात्र संघों में अब भी मार्क्स की धमक सुनाई पड़ेगी आपको. विश्वविद्यालयों में ज्यादातर प्रोफ़ेसर परंपरागत रूप से मार्क्सवादी नहीं है, वे ‘लेफ्ट-लिबरल’ हैं. अब उनका सारा ज़ोर पर्यावरण मुद्दों और सेक्स के मामले में होने वाले भेदभाव की मार्क्सवादी विवेचन पर है.

जब मैं विश्वविद्यालय का छात्र था तब ऐसा नहीं था. 60 के दशक का दौर अलग था…सब तरफ छात्रों के अंदर असंतोष और विद्रोह था. मैं भी कट्टर मार्क्सवादी था लेकिन अब पूरी तरह से बदल चुका हूं… मैं अब एक कंजरवेटिव हूं. लेकिन मेरा मामला ‘टिपिकल’ नहीं है.

सीगन - जर्मनी
जिगन – जर्मनी

मैंने समाजवादी जर्मनी में कट्टरता को झेली है. मैं पश्चिमी जर्मनी का हूं और मेरी बीवी पूर्वी जर्मनी से ताल्लुक रखती है. वह वहां से भाग कर पश्चिमी जर्मनी आना चाहती थी. उसे जेल में क़ैद कर दिया गया. वहां उसे दो-तीन साल बंदी बना कर रखा गया, फिर उन्होंने उसे नौकरी और अन्य सुविधाएं देकर वहां के समाज में सामंजस्य के साथ रखने की कोशिश की. लेकिन जब उन्हें लगा कि ऐसा संभव नहीं है तो फिर उसे छोड़ दिया गया.
इन बातों की चर्चा आज कोई नहीं करता.

मेरी बीवी पागल हो चुकी है. मैं उससे नहीं मिलता. वह कहती है कि मैं उसका हत्यारा हूं…क़ैद में बंद रहने का खामियाजा उसे अब भुगतना पड़ा है (लेट कांसिक्वेंसेज ऑफ़ प्रिज़न)…

फिर जैसे कहीं कोई खयाल आया और वे कह उठे, ‘इट्स फ़ेट…यू मस्ट लिव इट…’. मैं भी उनकी बातचीत में कहीं खो गया था, जैसे सोते से जाग कर कहा, ‘यस, यस…’


बेख़ुदी में खोया शहर - एक पत्रकार के नोट्स
बेख़ुदी में खोया शहर – एक पत्रकार के नोट्स

किताब: बेख़ुदी में खोया शहर – एक पत्रकार के नोट्स
लेखक: अरविंद दास
प्रकाशक: अनुज्ञा बुक्स, नई दिल्ली
उपलब्धता: अमेज़न (शीघ्र प्रकाश्य)
पृष्ठ: 192 (हार्डबाउंड)
मूल्य: 375 रुपए


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