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इस बिल के पारित होने से सरकारी बीमा कंपनियों के निजीकरण का रास्ता खुला

संसद के इस सत्र में लोकसभा में अब तक 9 बिल पारित किए गए हैं. इन बिलों में से एक है ‘सामान्य बीमा व्यवसाय (राष्ट्रीयकरण) संशोधन विधेयक, 2021’. इस बिल को 30 जुलाई, 2021 को लोकसभा में पेश किया गया था. 2 अगस्त को इसे पारित किया गया. ये विधेयक सामान्य बीमा व्यवसाय (राष्ट्रीयकरण) ऐक्ट, 1972 का संशोधन है. इसके तहत सरकारी बीमा कंपनियों में प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी को 49 प्रतिशत से अधिक बढ़ा दिया गया है. हालांकि, वित्त मंत्री निर्माला सीतारमण ने अब तक ये साफ़ नहीं किया है कि इस संशोधन के तहत किस कंपनी में कितना निजीकरण किया जाएगा. बहरहाल, आइए समझते हैं कि पुराने कानून में क्या बदलाव किए गए हैं.

क्या है सामान्य बीमा व्यवसाय (राष्ट्रीयकरण) ऐक्ट?

विधेयक के प्रावधानों को समझने से पहले सामान्य बीमा व्यवसाय (राष्ट्रीयकरण) ऐक्ट, 1972 को जानना ज़रूरी है. इस ऐक्ट के तहत भारत में जीवन बीमा के अलावा बाक़ी सभी तरह के बीमा करने वाली निजी कंपनियों का राष्ट्रीयकरण किया गया था. 1972 के ऐक्ट की वजह से भारतीय सामान्य बीमा निगम (General Insurance Corporation) की स्थापना हुई थी. इस ऐक्ट के तहत जीआईसी को चार सहायक कंपनियों में पुनर्गठित किया गया था.

1) नेशनल इंश्योरेंस
2) न्यू इंडिया एश्योरेंस
3) ओरिएंटल इंश्योरेंस, और
4) यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस.

लेकिन साल 2002 में इन चारों कंपनियों के संचालन की भूमिका जीआईसी से केंद्र सरकार ने छीन ली. इसके लिए 1972 के ऐक्ट में संशोधन किया गया था. 2002 के इस संशोधन के बाद ये चारों स्वतंत्र कंपनियां बन गईं. इसके साथ एक और संशोधन इस ऐक्ट में किया गया था. इसमें कहा गया था कि किसी भी कंपनी में भारत सरकार की हिस्सेदारी कम से कम 51 प्रतिशत होगी.

संशोधन क्या हैं?

अब नए विधेयक के जरिए पुराने अधिनियम में फिर बदलाव किए गए हैं. लोकसभा में पारित हुए बिल में 3 संशोधन किए गए हैं.

1) पहले संशोधन के तहत अधिनियम की धारा 10B को हटाया गया है. क्या था 10B? 10B के मुताबिक़, इन कंपनियों में केंद्र सरकार की कम से कम 51 प्रतिशत हिस्सेदारी होनी चाहिए थी. अब सरकार अपनी हिस्सेदारी 51 प्रतिशत से कम कर सकती है और प्राइवेट हिस्सेदारी बढ़ा सकती है.

2) दूसरा संशोधन है धारा 24B का ऐक्ट में जोड़ा जाना. इसके तहत कंपनियों में भारत सरकार की हिस्सेदारी कम होते ही उनकी आंतरिक गतिविधियों पर उसका कंट्रोल नहीं रहेगा. इससे सरकार इनमें से किसी भी कंपनी में अधिकांश निदेशकों को नियुक्त नहीं कर पाएगी. इसके प्रबंधन या नीतिगत निर्णय लेने का अधिकार भी सरकार से छिन जाएगा. इतना ही नहीं, सरकार को इस संशोधन से इन कंपनियों के कर्मचारियों की सेवा के नियम और शर्तें भी बदलने का अधिकार नहीं रहेगा.

3) तीसरा संशोधन है नई धारा 31 A का जोड़ा जाना. जिसके तहत निदेशकों की ज़िम्मेदारी बदल जाएंगी. जैसे की अगर कोई निदेशक पूर्णकालिक नहीं है, तो वो सिर्फ़ कुछ ही चीजों के लिए उत्तरदायी होगा. फ़र्ज़ करिए की कंपनी को कोई फ़ैसला लेने के लिए वोट करना हो, उसमें सारे निदेशकों के वोट को गिना जाएगा. लेकिन कंपनी या किसी फ़ैसले के संचालन में आई दिक्कत या कमियां या नुक़सान के ज़िम्मेदार सिर्फ़ पूर्णकालिक सदस्य ही होंगे. जो भी ग़ैर-पूर्णकालिक निदेशक होंगे, उनकी जवाबदेही सीमित रहेगी. आसान भाषा में कहें तो उन्हें एक्सपर्ट के तौर पर इस्तेमाल किया जाएगा और केवल मताधिकार दिया जाएगा. लेकिन उनकी जवाबदेही एक पूर्णकालिक निदेशक के मुक़ाबले बहुत कम होगी.


वीडियो- मोदी सरकार ने बिना चर्चा मॉनसून सत्र में कौनसे 5 नए कानून बनाए? 

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