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जब इस औरत का गैंग रेप हुआ, तब उसके पेट में पांच महीने का बच्चा था.

सुप्रीम कोर्ट ने 23 अक्टूबर को बिलकिस बानो केस में सख्त टिप्पणी की. कोर्ट ने गुजरात सरकार से साफ तौर पर पूछा है कि जिन लोगों को इस मामले में सजा मिली है, उनमें डॉक्टर और पुलिसवाले भी हैं. ऐसे में उन्हें काम पर कैसे रखा गया है. इसके अलावा कोर्ट ने मुआवजे के लिए बिलकिस बानो को अलग से याचिका दायर करने के लिए भी कहा है, जिसपर चार हफ्ते के बाद सुनवाई होगी.  इससे पहले इसी साल चार मई को बॉम्बे हाईकोर्ट ने बिलकिस बानो केस में फैसला सुनाया था. कोर्ट ने 11 दोषियों की अपील खारिज करते हुए निचली अदालत का फैसला बरकरार रखा है. 2008 में जब निचली अदालत ने इस केस में अपना फैसला सुनाया तो यह आजादी के बाद पहली मर्तबा था कि दंगों से जुड़े हुए किसी भी बलात्कार के मुकदमें में सजा हुई थी. जानिए इस बहुचर्चित केस के पीछे की कहानी. 

साल 2002 की बात है. फरवरी की 27वीं तारीख थी. गुजरात के गोधरा स्टेशन पर खड़ी साबरमती एक्सप्रेस का डिब्बा नंबर एस-6 उपद्रवियों ने आग के हवाले कर दिया. इसके बाद देखते ही देखते आग ने 3 और डब्बों को अपनी जद में लिया. अयोध्या से आ रही इस ट्रेन में सवार 59 कारसेवक इस आग में झुलस कर मर गए. लेकिन ये आग यहीं रुकने वाली नहीं थी. देखते ही देखते पूरा गुजरात जलने लगा.

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बुरा दौर था. हालात हर बीतते घंटे के साथ बिगड़ रहे थे. गोधरा की घटना को 4 दिन बीते थे. तारीख थी 3 मार्च. एक परिवार था. जिसके लिए अब अपने घर पर रहना संभव नहीं रह गया था. उसने अपना सामान एक ट्रक पर लादा और बड़े भी भरे मन से अपना गांव छोड़ दिया. ट्रक में जरूरी चीजों के अलावा 17 लोग भी थे. वो इस जगह से जल्द से जल्द निकल जाना चाहते थे. आस-पास के इलाके से लगातार बुरी-बुरी खबरें आ रही थीं.

एक परिवार था जो इस सब से बच निकलना चाहता था

दाहोद जिले में एक छोटा सा गांव है राधिकापुर. यहां कई लोग काफी देर से किसी के आने का इंतजार कर रहे थे. उनके हाथों में हथियार थे. जैसे ही ट्रक राधिकापुर पहुंचा, इसे घेर लिया गया. देखते ही देखते 14 लोगों को मार डाला गया. पीछे बचे तीन लोगों में एक 19 साल की औरत थी. पेट में पांच महीने का बच्चा था. उसने अपनी दो साल की बच्ची सहेला की हत्या होते देखा.

इस औरत ने सोचा था कि अब उसका मरना भी तय है. लेकिन जो उसके साथ हुआ, वो इससे भी बुरा था. पांच महीने गर्भवती औरत का रेप उन लोगों ने किया जो ‘धर्म’ की रक्षा के लिए जान देने की कसमें खा रहे थे. गैंग रेप करने के बाद उन्होंने औरत को मरा समझ कर छोड़ दिया और वहां से फरार हो गए.

उस औरत का नाम था बिलकिस बानो. तीन घंटे के बाद जब वो होश में आईं, तो वो पहले वाली बिलकिस नहीं थीं. वो खुद बताती हैं,

“मैं एकदम नंगी थी. मेरे चारों तरफ मेरे परिवार के लोगों की लाशें बिखरी पड़ी थीं. पहले तो मैं डर गई. मैंने चारों तरफ देखा. मैं कोई कपड़ा खोज रही थी ताकि कुछ पहन सकूं. आखिर में मुझे अपना पेटीकोट मिल गया. मैंने उसी से अपना बदन ढका और पास के पहाड़ों में जाकर छुप गई.”

एक अनपढ़ औरत की लड़ाई

बिलकिस को आखर का ज्ञान नहीं है. लेकिन हिम्मत है. वो अपनी शिकायत ले कर स्थानीय पुलिस स्टेशन गईं. वहां पर पहले तो केस ही दर्ज करने से इनकार कर दिया गया. इसके बाद जब दर्ज भी हुआ तो पुलिस ने मैजिस्ट्रेट के सामने बिलकिस के बयान को असंगत करार दिया. इसके बाद मैजिस्ट्रेट ने इस केस को बंद कर दिया. तारीख थी 25 मार्च 2003.

बिलकिस को पता था कि लड़ाई लंबी चलेगी. उन्होंने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में अपील दायर की. सुप्रीम कोर्ट में पेटीशन डाली. दिसंबर 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई जांच के आदेश दिए.

हालांकि यह बिलकिस की पहली जीत थी, लेकिन मुश्किलें अब शुरू होने वाली थीं. शिकायत दायर करने के बाद से उन्हें 2 साल में 20घर बदलने पड़े. एक रेप पीड़िता अब अपराधियों सा जीवन बिताने पर मजबूर थी. बीबीसी को दिए गए इंटरव्यू में उनके पति याकूब कहते हैं,

“हमने 12 साल इधर-उधर घूम कर किसी तरह से अपनी जान बचाकर काटे हैं.”

सीबीआई ने मामले की जांच के दौरान नीमखेड़ा तालुका से न केवल 12 व्यक्तियों को गिरफ्तार किया था, बल्कि 3 मार्च 2002 को भीड़ के हाथों कत्ल हुए लोगों के शवों को बरामद करने के लिए पन्नीवेल के जंगलों में खुदाई भी करवाई थी. इस कार्रवाई में सीबीआई चार लोगों के कंकाल बरामद करने में सफल रही थी.

बिलकिस बानो (फोटो: इंडियन एक्सप्रेस)
बिलकिस बानो (फोटो: इंडियन एक्सप्रेस)

लगातार आ रही धकामियों से परेशान हो कर 2004 में बिलकिस एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर पहुंचीं. उनका कहना था कि उन्हें गुजरात की अदालतों में न्याय मिलने की कोई उम्मीद नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने उनकी मांग को जायज मानते हुए अगस्त2004 में मामले को मुंबई की अदालत में शिफ्ट कर दिया.

चार साल बाद निचली अदालत ने अपना फैसला सुनाया. 18 आरोपियों में से 11 को हत्या और बलात्कार के जुर्म में दोषी पाया गया और उम्रकैद की सजा सुनाई गई. छह आरोपी पुलिस वालों में से एक को सबूतों के साथ छेड़छाड़ का दोषी माना गया. ये जनवरी2008 की बात है.

सीबीआई इस फैसले से संतुष्ट नहीं थी और इसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की. एजेंसी तीन आरोपियों राधेश्याम नाई, जसवंत नाई और शैलेश भट्ट के लिए फांसी की मांग कर रही थी. 20 हजार रुपए के जुर्माने पर छोड़ दिए गए पुलिसकर्मियों और मेडिकल स्टाफ के खिलाफ भी अपील दायर की गई.

अब बॉम्बे हाईकोर्ट ने 11 दोषियों की अपील को खारिज करते हुए निचली अदालत का फैसला बरकरार रखा है. सीबीआई ने इस केस में चार को फांसी की सजा दी जाने की मांग की थी. हाईकोर्ट ने सीबीआई की अपील को भी ठुकरा दिया है. हालांकि इस घटना को 15 साल बीत गए हैं लेकिन बिलकिस का कहना है कि वो इस फैसले के बाद जिंदगी की नई शुरुआत कर पाएंगी. उनका कहना है कि नागरिक, औरत और मां के तौर पर मेरे हक बेरहमी से कुचले गए. इस फैसले से न्यायपालिका में भरोसा बहाल हुआ है. इस फैसले ने मेरी सच्चाई का मान रखा है.


वीडियो में देखें आरुषि हत्याकांड पर हाई कोर्ट का फैसला

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