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कहानी इमरान खान की पार्टी के पूर्व विधायक की, जो भारत में शरण मांग रहा है

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बलदेव कुमार. पाकिस्तान के पूर्व विधायक हैं. अपने परिवार की हिफाज़त के लिए उन्हें अपना सब कुछ छोड़ना पड़ा है. अपना घर, अपनी ज़मीन और अपना देश. बलदेव पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) से जुड़े थे. माने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी. बलदेव सोमवार यानी 9 सितंबर, 2019 को अपने परिवार के साथ भारत पहुंचे. कहा कि अब कभी वापस नहीं जाना चाहते. वह भारत में राजनैतिक शरण मांग रहे हैं. क्योंकि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर ज़्यादतियां हो रही हैं. बकौल बलदेव, पाकिस्तान में हिंदू और सिख हर रोज़ कत्ल किए जा रहे हैं.

बलदेव पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों, माने हिंदू, सिख, ईसाई और बौद्ध लोगों पर होने वाले अत्याचार की बात कर रहे हैं. बलदेव की अपनी कहानी बताती है कि पाकिस्तान में सिस्टम किस तरह अल्पसंख्यकों की तरफ पीठ किए रहता है. वहां के चुनाव नियमों को ही ले लें. गैर मुस्लिमों और महिलाओं के लिए नेशनल और प्रांतीय असेंबलियों में एक तय संख्या में सीटें आरक्षित हैं. लेकिन इनका फैसला खुले चुनाव से न होकर इस बात से होता है कि कोई पार्टी कितनी सामान्य सीटें जीतती है. जो पार्टी ज़्यादा सामान्य सीटें जीतेगी, उसे ही ज़्यादा आरक्षित सीटें मिलेंगी. ये एक अजीब तरह का proportional representation यानी आनुपातिक प्रतिनिधित्व का सिस्टम है.

खैर, चुनाव से पहले पार्टियां सीटों के लिए अपनी एक प्रायोरिटी लिस्ट पाकिस्तान के चुनाव आयोग को देती हैं. सामान्य सीटों की संख्या के आधार पर पार्टी के लिए जितनी आरक्षित सीटें पार्टी को मिलती हैं, उन्हें इसी प्रायोरिटी लिस्ट के उम्मीदवारों से भरा जाता है. 2013 के चुनाव में खैबर पख्तूनख्वा की असेंबली के लिए चुनाव हुए. खैबर पख्तूनख्वा ही वो इलाका है जिसे अतीत में नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस (NWFP) कहा जाता था. इसकी असेंबली में तीन सीटें गैर मुस्लिमों के लिए आरक्षित थीं, जिनके लिए PTI ने चार नामों की प्रायोरिटी लिस्ट के साथ पर्चा भरा. ये नाम थे – सोरण सिंह, बलदेव कुमार, रवि कुमार और वज़ीर ज़ादा. चुनाव नतीजे आए तो PTI को एक गैर मुस्लिम आरक्षित सीट मिली. पार्टी की तरफ से लिस्ट में पहले नंबर पर रखे गए सोरण सिंह बारीकोट के विधायक हो गए.

सोरण सिंह, जिनकी तहरीक-ए-तालीबान ने 2016 में गोली मारकर हत्या कर दी थी.
सोरण सिंह, जिनकी तहरीक-ए-तालीबान ने 2016 में गोली मारकर हत्या कर दी थी. फोटो- Dawn

#गोलियों से भून दिए गए सोरण सिंह

सोरण सिंह पाकिस्तान में सिख अधिकारों के लिए काम कर रहे थे. पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा कमेटी के मेंबर रहे सोरण सिंह पेशे से डॉक्टर भी थे और न्यूज़ एंकर भी. 2011 में वो इमरान खान की पीटीआई से जुड़े और 2013 में बारीकोट के विधायक होने के बाद उन्हें अल्पसंख्यक मामलों के लिए खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री का विशेष सहायक भी बनाया गया. फिर आया 22 अप्रैल, 2016. सोरण सिंह अपने गृह ज़िले बुनेर में थे. टहलते हुए लौटकर घर पहुंचने ही वाले थे कि अंजान हमलावरों ने उन्हें गोलियों से भून दिया. एक गोली उनके सिर में लगी और उनकी तुरंत मौत हो गई. हमले की ज़िम्मेदारी ली तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान ने. पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के लिए काम करने वालों पर ये पहला जानलेवा हमला नहीं था. पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या को कौन भुला सकता है.

सोरण सिंह की हत्या के बाद एक और अजीबोगरीब नियम सामने आया. पाकिस्तान के संविधान का अनुच्छेद 224 (6) कहता है कि महिला और गैर मुस्लिमों के लिए आरक्षित सीटों पर विधायक की मौत हो जाए या किसी वजह से उसे पद से हटना पड़े, तो सीट पार्टी के पास ही रहेगी. पार्टी की दी प्रायोरिटी लिस्ट में जो अगला नाम होगा, वो विधायक बन जाएगा. पीटीआई की लिस्ट में सोरण सिंह के बाद नाम था बलदेव कुमार का. चुनाव आयोग ने बलदेव कुमार को बारीकोट विधायक घोषित कर दिया.

#मुशर्रफ राज में दबा दी गई अल्पसंख्यकों की आवाज़

पाकिस्तान में पहले सेपरेट इलेक्टोरेट वाला सिस्टम था. इसमें अल्पसंख्यक आरक्षित सीटों पर सीधे चुनाव होते थे. इन सीटों पर चुनाव में सिर्फ गैर मुस्लिम लोग वोट डाल सकते थे. लेकिन मुशर्रफ के राज में सब बदल गया. 2002 में मुशर्रफ पाकिस्तान का संविधान बदलने के लिए लीगल फ्रेमवर्क ऑर्डर 2002 लाए. संविधान के साथ-साथ चुनाव के नियम भी बदले – कॉन्डक्ट ऑफ जनरल इलेक्शन्स ऑर्डर 2002 के ज़रिए. इसी के तहत महिलाओं और गैर मुस्लिमों के लिए आरक्षित सीटों पर नॉमिनेशन का खेल शुरू हुआ. इस अजीबोगरीब व्यवस्था ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की आवाज़ को और दबा दिया.

बड़ी सामान्य सी बात है. प्रायोरिटी लिस्ट में वही लोग शामिल हो सकते हैं जो पार्टी के सुर से सुर मिलाएं. अगर वो अपने समाज के अधिकारों के लिए पार्टी लाइन से थोड़ा भी भटकें तो पार्टियां उन्हें कभी अपनी लिस्ट में शामिल नहीं करेंगी. इस नियम का नुकसान ये है कि सड़क पर चाहे जितनी ज़्यादती हो, पाकिस्तान की संसद और विधानसभाओं में अल्पसंख्यक अधिकारों की बात कभी पार्टी लाइन से बाहर जा ही नहीं पाती.

#36 घंटे के विधायक – बलदेव कुमार

सोरण सिंह की मौत के बाद मिली विधायकी बलदेव के पास महज़ डेढ़ दिन रही. विधायक घोषित होने के 36 घंटे बाद पुलिस ने उन्हें सोरण सिंह की हत्या के शक में गिरफ्तार कर लिया. आरोप लगा कि बलदेव खुद विधायक बनना चाहते थे इसीलिए उन्होंने सोरण सिंह को मरवाया. यहीं से बलदेव कुमार के लिए मुसीबतें शुरू हुईं. खैबर पख्तूनख्वा विधानसभा में सरकार और विपक्ष एक हो गए और इमरान खान सरकार से पाकिस्तान में चुनाव के नियम बदलने को कहने लगे. वो किसी तरह बलदेव को असेंबली का सदस्य बनने से रोकना चाहते थे. पाकिस्तान के चुनाव आयोग ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि बलदेव अभी अरोपी हैं, अपराधी नहीं. इसलिए उन्हें विधायक चुना गया है. लेकिन असेंबली के सदस्यों ने उन्हें शपथ नहीं लेने दी. पीटीआई ने उन्हें पार्टी से बेदखल कर दिया.

बलदेव ने कहा कि उन्हें इस केस में फंसाया जा रहा है. लेकिन उन्हें जेल भेज दिया गया और बारीकोट की सीट फिर खाली हो गई. 2018 में बलदेव सबूतों के अभाव में बरी हुए. जब मामले में बुनेर की आतंक विरोधी अदालत ने फैसला पढ़ा, तब खैबर पख्तूनख्वा की प्रांतीय असेंबली के पास 48 घंटे का कार्यकाल बाकी था. लेकिन ये घंटे बीते और बलदेव विधायक की शपथ नहीं ही ले पाए.

लेकिन बलदेव की किस्मत को एक बार और पलटी खानी थी. असेंबली का एक ज़रूरी काम बकाया रह गया था. फेडरली एडमिनिस्टर्ड ट्राइबल एरिया (FATA)के इलाके को खैबर पख्तूनख्वा में मिलाना था जिसके लिए संविधान संशोधन बिल पर चर्चा होनी थी. बलदेव के बरी होने के एक महीने बाद रविवार के दिन असेंबली का सत्र बुलाया गया. तारीख थी 27 मई, 2018. इस सत्र के लिए बलदेव भी पहुंचे और तब जाकर वो विधायक पद की शपथ ले पाए. बलदेव ने इस दिन प्रेस से कहा कि वो पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए बिल लाना चाहते हैं.

बलदेव सिंह का आईडेंटिटी कार्ड
बलदेव सिंह का आईडेंटिटी कार्ड

 

लेकिन ये उम्मीद और उत्साह ज़्यादा दिन नहीं रहा. बलदेव ने इंडिया टुडे से बातचीत में कहा कि पाकिस्तान में राज्य और दूसरे संगठन (नॉन स्टेट एक्टर्स) द्वारा अल्पसंख्यकों पर अत्याचार का लंबा इतिहास रहा है. जब 2018 में इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने तो अल्पसंख्यकों को बड़ी उम्मीदें थी. क्योंकि इमरान ‘नया पाकिस्तान’ बनाने की बात करते थे. लेकिन बलदेव आज मानते हैं कि आईएसआई और पाकिस्तानी सेना के इशारे पर चलने वाले इमरान खान पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों को बचाने में नाकाम रहे हैं. निराशा के इसी माहौल में बलदेव ने अपनी पत्नी और दोनों बच्चों को भारत भेज दिया. 11 अगस्त, 2019 माने ईद के दिन बलदेव खुद तीन महीने का वीज़ा लेकर भारत आ गए.

#बलदेव कुमार का भारत से रिश्ता

लुधियाना में एक जगह है खन्ना नाम से. यहीं की भावना से 2007 में बलदेव ने शादी की थी. उन दिनों बलदेव स्वात ज़िले में पार्षद होते थे. बलदेव और भावना के दो बच्चे हैं. 11 साल का बेटा और 10 साल की बेटी जो अपने पिता की तरह पाकिस्तानी नागरिक हैं. लेकिन भावना आज भी भारतीय नागरिक हैं. बलदेव का परिवार फिलहाल खन्ना के समराला मार्ग पर मॉडल टाउन में रह रहा है. बलदेव ने यहां दो कमरों का एक मकान किराए से लिया है. अपना सब कुछ पीछे छोड़ आए बलदेव अब कभी पाकिस्तान वापस नहीं जाना चाहते. उन्होंने 10 सितंबर को प्रेस से कहा कि वो भारत सरकार से राजनैतिक शरण मांगते हैं. साथ ही ये उम्मीद भी जताई कि प्रधानमंत्री मोदी उन्हें भारत में शरण दे देंगे.

#किस बात का डर है बलदेव को

बलदेव ने इंडिया टुडे से कहा कि अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी किए जाने के बाद से पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार बढ़े हैं. बलदेव पाकिस्तान के ननकाना साहिब वाली घटना का ज़िक्र करते हैं. यहां हाल ही में एक सिख धर्मगुरु की बेटी को अगवा करके जबरन धर्मपरिवर्तन कराया गया था. आरोप है कि अगवा करने वालों ने लड़की को इसलिए मुसलमान बनाया कि उसकी एक मुसलमान आदमी से शादी हो सके. मामले में पाकिस्तान की भद्द पिटने के बाद प्रशासन हरकत में आया. पाकिस्तान के पंजाब के गवर्नर चौधरी मुहम्मद सरवर लाहौर में लड़की से मिले और उसे अपने परिवार के पास लौट जाने को कहा. लेकिन लड़की ने जान का खतरा बताया और घर नहीं लौटी. बलदेव सवाल कर रहे हैं कि जब पाकिस्तानम में धर्मगुरुओं की नहीं सुनी जा रही तो मेरी कौन सुनेगा?

बलदेव कुमार को शरण देने पर विचार उनकी तरफ से आधिकारिक आवेदन मिलने के बाद होगा. उसके साथ या उसके बिना भी उनके भारत में रहने पर कोई प्रश्न नहीं है. रही बात उन्हें नागरिकता या राजनैतिक शरण देने की, तो सरकार फिलहाल इस सवाल से बचना चाहेगी.


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