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ये है असम में पुलिस और गांववालों के बीच हिंसा के पीछे की असली वजह

23 सितंबर की शाम को एक दिल दहलाने वाला एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ. एक कैमरामैन जमीन पर घायल पड़े शख्स के ऊपर छलांग लगा लगाकर कूद रहा है. आसपास पुलिस है लेकिन उसे कोई डर नहीं है. पता चला कि वीडियो असम (Assam) का है. यहां पुलिस और स्थानीय लोगों के बीच हिंसक झड़प हुई थी. ये वीडियो उसी दौरान का है. हिंसा और इस अमानवीय वीडियो के सामने आने के बाद विपक्ष से लेकर मानवाधिकार संगठनों तक ने गुस्सा जताया है. आनन-फानन में कैमरामैन को गिरफ्तार कर लिया गया है. लेकिन अभी भी इलाके में तनाव बना हुआ है. आखिर क्यों हो रहा है असम में ये बवाल और इसके पीछे की कहानी क्या है, आइए जानते हैं.

सामूहिक खेती का प्लान बना झगड़े की वजह

23 सितंबर को जो वीडियो वायरल हुआ, वो असम के दरांग जिले के ढोलपुर गोरुखुटी क्षेत्र की घटना का है. इस घटना की पृष्ठभूमि में असम सरकार का एक अतिक्रमण हटाओ अभियान है. इस अभियान को लेकर सोमवार 20 सितंबर से ही तनाव बना हुआ था. हालांकि असम के सीएम हिमंत बिस्व सरमा इसे लेकर काफी उत्साहित थे. उन्होंने 20 सितंबर को अतिक्रमण हटाओ अभियान की तस्वीरें ट्वीट करते हुए कहा कि,

“अवैध अतिक्रमण के खिलाफ मुहिम जारी है. मैं खुश हूं कि दरांग प्रशासन और पुलिस ने सिपझार की 4500 बीघा जमीन पर बने 800 घरों, 4 अवैध धार्मिक ढांचों और एक निजी संस्थान को ध्वस्त कर अतिक्रमण खत्म किया है. 7 जून को मैंने धोलपुर के शिवमंदिर के पास अवैध रूप से अतिक्रमित रिवर लाइन एरिया का दौरा किया था. मैंने मंदिर के मैनेजमेंट और स्थानीय लोगों को मणिकुट (पूजाघर) स्थापित करने, गेस्ट हाउस और चारदीवारी बनाने का आश्वासन दिया था. इस बेदखली का मकसद अतिक्रमण हटाकर सामुदायिक खेती शुरू करना है.”

दरांग के एसपी सुशांत बिस्व सरमा ने तब अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस को बताया था कि सुबह 9 से शाम 4 बजे तक अतिक्रमण हटाने का अभियान धौलपुर के गांवों में चलाया गया. उन्होंने कहा था कि

“यहां सभी लोग अतिक्रमण करके बसे थे और लगभग सभी को बिना विरोध के हटा दिया गया है. बस दो गांव हैं जहां ज्यादातर घर मुस्लिम और बंगाली मूल के हैं.”

बता दें कि एसपी सुशांत बिस्व सरमा राज्य के सीएम हिमंत बिस्व सरमा के भाई हैं. 23 सितंबर की घटना के बाद असम कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भूपेन कुमार बोरा ने कहा,

“जब से हिमंत बिस्व सरमा असम के मुख्यमंत्री बने हैं, तब से हर काम में लगभग पुलिस को बहुत ताकत दी गई है. पुलिस भी हर स्थिति से निपटने के लिए गोलियों का सहारा ले रही है. यह नागरिकों के लिए चिंता का विषय है. पुलिस चाहती तो लोगों को पकड़कर ले जा सकती थी. लेकिन मुख्यमंत्री ने आदेश दिया है कि किसी को भी गोली मारो. दरांग के एसपी मुख्यमंत्री के भाई हैं. बड़ा भाई सीएम है, छोटा भाई एसपी है तो क्या जिसे चाहेंगे, उसे गोली मारेंगे?”

बीजेपी का चुनावी वादा

बीजेपी ने चुनाव के दौरान सरकारी जमीनों को खाली कराने का वादा किया था. दूसरे टर्म में चुने जाने के बाद अब उसे ही अमली जामा पहनाया जा रहा है. द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, बीजेपी ने विधानसभा चुनाव में वादा किया था सरकारी जमीन पर से ‘अतिक्रमणकारियों’ को हटाया जाएगा, और ‘भूमिहीन मूल निवासियों’ को वो जमीन दी जाएगी. जून में इसी तरह का एक्शन सोनीपुर के जमघुरीहाट और होजाई में भी किया गया था. वहां कुल मिलाकर 95 परिवारों को हटाया गया था. सिपझार में जिस जमीन को खाली कराने पर अब विवाद हुआ है, उसका असम सरकार करोड़ों रुपए के ‘गरुखूटी प्रोजेक्ट’ के लिए इस्तेमाल करना चाहती है. ये प्रोजेक्ट सरकार के 2021-22 के स्टेट बजट का हिस्सा है. यहां पर जमीन खाली कराने के बाद असम के मूल युवाओं को कृषि कार्य के लिए दी जाएगी. इसमें गिर गाय को पालने की योजना भी शामिल है.

यहां पहले चल चुका अभियान

ऐसा नहीं है कि दरांग पहली जगह है, जहां इस तरह का अभियान चलाया जा रहा है. इससे पहले भी लोगों को उनकी जगहों से विस्थापित किया गया है. पहले जहां ये अभियान चला, उसमें से ये कुछ जगहें हैं-

17 मई, 2021 – 25 परिवारों को शोणितपुर जिले से हटाया गया.
6 जून, 2021 – 74 परिवारों को हजोई जिले से हटाया गया.
7 जून, 2021 – 49 परिवारों को दरांग से हटाया गया. इनमें से ज्यादातर मुस्लिम परिवार हैं.
7 अगस्त, 2021 – 61 परिवारों को धुबरी जिले से निकाला गया.
20 सितंबर, 2021 – तकरीबन 200 परिवारों को दरांग जिले से हटाया गया.

किस नियम के तहत इन्हें हटाया जा रहा है?

इस कवायद का आधार असम की बनाई लैंड पॉलिसी में मिलता है. असम सरकार ने साल 2019 में एक लैंड पॉलिसी बनाई थी. इसमें परमानेंट छार इलाके को असम के मूल निवासियों को देने का प्रावधान किया गया है. छार इलाका वो जगह होती है जहां कुछ महीनों तक नदी का पानी भरा रहता है लेकिन फिर वो जगह खाली हो जाती है. इस वजह से यह जगह काफी उपजाऊ होती है. इस लैंड पॉलिसी में ऐसी उपजाऊ जमीन की पैमाइश और सर्वे की बात है. पॉलिसी में कहा गया है कि ऐसी जगहों की पहचान करके असम के मूल निवासियों को ये जमीन खेती और पशुपालन के लिए उपलब्ध कराई जाएगी. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इस पूरी कसरत में सबसे बड़ा पेच ये है कि अभी यही तय नहीं है कि असम का मूल निवासी किसे माना जाए. छार के जिन इलाकों की बात हो रही है, वहां पर ज्यादातर मुस्लिम आबादी और बांग्लादेश से आए हिंदू रहते हैं.

Assam Land Policy 2019
असम सरकार लोगों को हटाने के लिए 2019 में लाई लैंड पॉलिसी के नियम-कायदों का इस्तेमाल कर रही है.

बिना पुनर्वास हटाने का विरोध

फिलहाल 20 सितंबर को जब ये अतिक्रमण हटाओ अभियान शुरू हुआ, तभी से इसका विरोध हो रहा है. विपक्ष और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की तरफ से ये आपत्ति आई कि बिना पुनर्वास प्लान के इतने लोगों को कैसे हटाया जा सकता है. इंडियन एक्सप्रेस ने स्थानीय निवासियों के हवाले से दावा किया है कि सरकार ने उनकी कोई मदद नहीं की है. उन्हें नदी के पास के इलाके में जाना पड़ा है. अब प्रशासन इन लोगों से और दूर जाने के लिए कह रहा है. घर से निकाले गए लोग पूछ रहे हैं कि अब वो जाएं कहां. इस अभियान के दौरान मौके पर मौजूद रहे एक सोशल एक्टिविस्ट सद्दाम हुसैन ने 20 सितंबर को इंडियन एक्सप्रेस को बताया था कि

“पिछली रात से लगातार बारिश और तेज हवा जारी है. छोटे बच्चे और महिलाओं का बुरा हाल है. कुछ लोगों को तो एक रात पहले ही घर छोड़ने का नोटिस मिला है. कुछ को तो नोटिस भी नहीं मिला.”

जब इस नोटिस के बारे में अखबार ने दरांग के डीसी प्रभाति थाओसेन से पूछा तो उन्होंने कहा कि लोगों के पास बहुत टाइम था. उन्होंने बताया कि

“जून में ही इलाके में खेतीबाड़ी के प्रोजेक्ट के लिए कमेटी बना दी गई थी. हमें इस इलाके को सामूहिक खेती को उपलब्ध कराने के लिए कहा गया था. ऐसे में उनके पास बहुत वक्त था. मानवीय आधार पर जो हो सकेगा, प्रशासन करेगा. विस्थापित लोगों को शौच के लिए जगह, पानी और मेडिकल सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी.”

हालांकि जब मंगलवार 21 सितंबर को ऑल असम माइनॉरिटी स्टूडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष रिजाउल करीम ने उस जगह का दौरा किया तो कुछ औऱ ही हकीकत बयां की. उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कई आरोप लगाए. दावा किया कि

“वहां पर कोई मेडिकल टीम नहीं है. न वहां पानी है, न टॉयलेट. सिर ढकने के लिए कोई जगह तक नहीं है. ये बहुत अमानवीय है. हम एग्रिकल्चर प्रोजेक्ट के खिलाफ नहीं हैं. हमने इसे लेकर सीएम के साथ कई बार मीटिंग भी की हैं. हम सिर्फ उचित पुनर्वास चाहते हैं. लेकिन ये मानवाधिकारों का हनन है. एक खास समुदाय को निशाना बनाया गया है.”

असम कांग्रेस के अध्यक्ष भूपेन कुमार बोरा ने भी सरकार की निंदा करते हुए इसे अमानवीय बताया. उन्होंने कहा कि कोरोना महामारी को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भी बेदखल करने के खिलाफ निर्देश दिया था, फिर भी हिमंत बिस्व सरमा की सरकार लोगों को बेदखल कर रही है. ये लोग 1970 से यहां रह रहे थे. लोगों को हटाने से पहले उनके लिए वैकल्पिक आवास की व्यवस्था करनी चाहिए थी. भूपेन बोरा ने आरोप लगाया कि 2016 के बाद से भाजपा सरकार यहां लगातार लोगों को प्रताड़ित कर रही है. ये सरकार सिर्फ गोली की ताकत पर शासन करना जानती है. 20 सितंबर को दरांग में अतिक्रमण हटाने के अभियान को लेकर असम के बारपेटा से कांग्रेस सांसद अब्दुल खलीक ने हाई कोर्ट का ऑर्डर ट्वीट किया. लिखा कि

“कोविड 19 संकट के चलते चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली गुवाहाटी हाईकोर्ट की फुल बेंच ने व्यवस्था दी है कि बेदखली के कोर्ट के आदेश की तामील अभी रोक दी जाए. मैं बिना उचित पुनर्वास की व्यवस्था के इस बेदखली की निंदा करता हूं. दरांग में लोगों को इस तरह से निकालना अमानवीय है.”

 

अखिल गोगोई के रायजोर दल ने भी इस अभियान का विरोध किया है. उनका कहना है कि कृषि क्रांति के नाम पर उन गरीबों को हटाया जा रहा है, जो पुश्तों से इस जमीन पर रह रहे हैं और खेती कर रहे हैं. ये कैसी क्रांति है?

दरांग में 23 सितंबर को हुआ क्या था?

असम पुलिस की टीम 23 सितंबर को ढोलपुर बाज़ार पहुंची थी. जैसे ही पुलिस यहां पहुंची, लोग उसके ख़िलाफ नारेबाजी करने लगे. देखते-देखते बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा हो गए. स्थिति बिगड़ गई. भारी हंगामे के बीच लोगों और पुलिस के बीच हाथापाई शुरू हो गई. कई पुलिसकर्मी घायल हो गए. पुलिस ने फायरिंग कर दी. इसमें 2 लोगों की मौत हो गई. इंडिया टुडे ने मौके पर मौजूद एक शख्स शकूर अली के हवाले से लिखा है कि,

“जब ये घटना हुई, मैं वहीं पर था. सुरक्षाबल लोगों को हटाने के लिए धौलपुर 1 और धौलपुर 3 गांवों में गए थे. इसी दौरान लोगों ने पत्थर चलाने शुरू कर दिए. कुछ लोगों ने सुरक्षाबलों पर हमला भी किया.”

सरकार के एक सूत्र के हवाले से इंडिया टुडे ने लिखा है कि,

“यहां की 25 हजार एकड़ जमीन पर करीब 3000 परिवारों ने कब्जा कर रखा है. सरकार सिपझार की उपजाऊ जमीन पर खेती करना चाहती है. इस इलाके में 5 हजार साल पुराना एक शिव मंदिर भी है. उस पर भी अतिक्रमण कर लिया गया है. असम सरकार ने कमेटी बनाकर सामूहिक खेती का ये फैसला लिया है. इसमें कब्जा करने वालों को भी बुलाया गया था. कानून के तहत भूमिहीन 2 एकड़ जमीन ले सकता है लेकिन ‘अतिक्रमणकारी’ इससे संतुष्ट नहीं थे. दो दिनों से जमीन खाली कराने का प्रोसेस काफी अच्छा चल रहा था. एक हजार एकड़ जमीन आराम से खाली हो गई. लेकिन 23 सितंबर को कुछ लोगों ने पत्थर और हथियारों से हमला कर दिया. फोटो जर्नलिस्ट पर भी भाले से हमला किया गया.”

असम के वायरल वीडियो में दिख रहा है कि पुलिस की तरफ दौड़ते हुए कुछ लोग आते हैं. उनमें से एक व्यक्ति को पुलिसवाले घेरकर पीटने लगते हैं. उसी दौरान उसे गोली लगती है. वो अचेत होकर गिर जाता है. उसके बाद भी कुछ पुलिसकर्मियों और एक कैमरामैन उसे पीटता रहता है. पुलिस कैमरामैन को दूर हटाने की कोशिश करती है. लेकिन वो बार-बार वापस आता है और कूद-कूदकर घायल को पीटता है.

वीडियो वायरल होने के बाद पता चला कि कैमरामैन का नाम बिजय शंकर बनिया है. असम के स्पेशल डीजीपी जीपी सिंह (लॉ एंड ऑर्डर) ने देर रात ट्विटर पर जानकारी दी कि कैमरामैन को गिरफ्तार कर लिया गया है.

अब दरांग में क्या हालात हैं?

असम के दरांग जिले में 23 सितंबर की घटना के बाद तनाव का माहौल है. इलाके में भारी संख्या में पुलिस फोर्स की तैनाती की गई है. बलुआघाट इलाके में पुलिस और अद्धसैनिक बलों ने कैंप बना लिए हैं. और लगातार निगरानी रखी जा रही है. हालात को देखते हुए राज्य सरकार ने घटना की जांच गुवाहाटी हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज से करवाने की घोषणा की है.


वीडियो – असम के GIMT कॉलेज को इस लड़की के शॉर्ट्स पहनने से क्या दिक्कत हो गई?

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