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आंध्र प्रदेश की फ़ैक्टरी में जो स्टायरीन गैस निकली, वो कितना नुक़सान पहुंचा सकती है?

आंध्र प्रदेश में LG के पॉलीमर प्लांट से गैस के रिसाव की घटना धीरे-धीरे बड़ी होती जा रही है. 11 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है. सैकड़ों की संख्या में लोग घायल हैं. बीमार हैं. बेहोशी में हैं. अधिकारी आशंका जता रहे हैं कि मरने वालों का आंकड़ा और ऊपर जाएगा. 

लेकिन यहीं पर एक सवाल है. विजाग में कब क्या कैसे हुआ? क्यों हुआ? उस फ़ैक्टरी में ऐसा क्या होता था, जिस वजह से इतनी विषाक्त गैस निकली. सब जानिए. 

Vizag gas leak: Gas valve malfunction, subsequent valve burst triggered accident; 8 dead, 200 hospitalised
LG ने कहा है कि स्थिति नियंत्रण में है. 11 लोगों की मौत हो चुकी है. (AP)

विशाखापटनम के बाहरी इलाक़े में मौजूद गोपालपटनम. यहां पर LG का पॉलीमर प्लांट है. लॉकडाउन की वजह से बहुत दिनों से प्लांट में काम धाम बंद था. आज यानी 7 मई की भोर में प्लांट को फिर से शुरू करने के लिए मज़दूर पहुंचे. प्लांट में से गैस का रिसाव होने लगा. लोगों की सांसें उखड़ने लगीं. बेहोश होने लगे. शहर के किंग जॉर्ज अस्पताल में पीड़ित भर्ती हैं. घायलों में सबसे ज़्यादा बच्चे और महिलाएँ हैं. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी आंध्र प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार को भी नोटिस भेज दिया है. और इधर केंद्र सरकार NDRF और राज्य सरकार के साथ मिलकर लगातार स्थिति को मॉनिटर कर रही है. रिसाव तो बंद हो चुका है. NDRF के DG SN प्रधान ने एक स्टेटमेण्ट के माध्यम से बताया है,

“रिसाव अब एकदम कम है. जब तक ये एकदम ख़त्म नहीं हो जाता, तब तक NDRF की टीमें वहां मौजूद रहेंगी.”

कैसा है LG का पॉलीमर प्लांट?

साल 1961. हिंदुस्तान पॉलीमर ने पालीस्टाइरीन और इससे जुड़े दूसरे प्रोडक्ट बनाने के लिए विजाग में प्लांट लगाया. साल 1978. यूनाइटेड ब्रूअरी के अधीन आने वाली मक्डॉवेल एंड कम्पनी में इसका विलय हो गया.

LG Polymers की वही फ़ैक्टरी जहां गैस जा रिसाव हुआ (PTI)

और आख़िर में साल 1997 में दक्षिणी कोरिया की कम्पनी LG केम ने ख़रीद लिया. नाम बदलकर रख दिया LG पॉलीमर. इस प्लांट में बहुत तरह के पालीस्टाइरीन के प्रोडक्ट बनाए जाते हैं. साथ में इंजीनियरिंग में उपयोग में आने वाले प्लास्टिक के प्रोडक्ट भी. अब आप सोच रहे होंगे कि ये पॉलीस्टायरीन क्या होता है? कैफ़े में जिस सफ़ेद वाले कप में चाय या कॉफ़ी मिलती है, या फ्रिज को पैकिंग से निकालिए तो चारों तरफ़ एक परत होती है, ये होता है पॉलीस्टायरीन. 

किस गैस का रिसाव हुआ?

स्टायरीन गैस का. LG पॉलीमर के एक अधिकारी ने इंडियन एक्सप्रेस के साथ बातचीत में बताया है कि स्टोरेज टैंक में 1800 टन से भी ज़्यादा स्टायरीन गैस मौजूद थी. बहुत दिनों तक पड़ा रहने के कारण, इस्तेमाल में न आने के कारण और तापमान में परिवर्तन होने के कारण केमिकल बदलाव हुए. इस वजह से गैस रिसने लगी. फिर भी, पुख़्ता कारणों की जांच की जा रही है.

रिसाव के बाद अपने बच्चे को अस्पताल लेकर भागता एक व्यक्ति (PTI)

स्टायरीन की भाप को ही स्टायरीन गैस कहा जाता है. फिलहाल ये पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि मरने वाले स्टायरीन गैस शरीर में जाने के चलते मरे हैं या फिर स्टायरीन के किसी बायप्रोडक्ट के चलते. क्योंकि अधिकारी भी कह रहे हैं कि स्टायरीन गैस में कुछ बदलाव हो गए थे. विशाखापटनम के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार मीणा ने कहा है कि स्टायरीन गैस जानलेवा नहीं होती. जान जाने का खतरा तभी पैदा होता है जब स्टायरीन बड़ी मात्रा में शरीर के अंदर पहुंचे. यानी किसी न किसी रूप में स्टायरीन गैस ज़िम्मेदार मानी जा रही है. 

कैसे हुआ गैस का रिसाव?

जिस समय पॉलीमर प्लांट को खोले जाने की तैयारी हो रही थी, उस समय स्टायरीन के टैंक को भी चेक किया जा रहा था. बिज़नेस टुडे से बातचीत में एक सीनियर अधिकारी ने बताया,

“जिस वाल्व से गैस टैंकर को कंट्रोल किया जाता है, उसे ठीक से संचालित नहीं किया गया. लिहाज़ा वो फट पड़ा. और गैस हर जगह रिसने लगी.”

कई मीडिया रिपोर्ट्स में अधिकारियों के दावे हैं कि चेकिंग करते समय गैस के टैंक से रिसाव शुरू हुआ, जो तीन किलोमीटर के इलाक़े में फैल गया. 

रिसाव के बाद क्या हुआ?

प्लांट के इर्द गिर्द तकरीबन 5 किलोमीटर के इलाके में दुर्गंध फैल गई थी. चूंकि रिसाव के वक्त लोग सो रहे थे, इसीलिए कई लोगों को बहुत बाद में इसका पता चला. जब तक पुलिस प्लांट के आसपास के इलाकों में लाउड स्पीकर पर गीला कपड़ा मुंह पर रखने और इलाका खाली करने का ऐलान करने लगी तब तक कई लोग बेहोश हो चुके थे. लोगों को सुरक्षित जगहों पर ले जाने के लिए पुलिस ने कई घरों के दरवाज़े तोड़े. प्लांट के पास ही सिम्हचलम रेलवे स्टेशन है. यहां के स्टाफ की तबीयत भी बिगड़ी जिसके बाद दोपहर 12 बजे तक रेल यातायात रोक दिया गया. इसके चलते 9 श्रमिक स्पेशल ट्रेनों पर असर पड़ा. गैस का रिसाव अब नियंत्रण में है, लेकिन ख़त्म नहीं. प्रशासन अब भी लोगों से कह रहा है कि वे चेहरे और मुँह पर गेला कपड़ा रखकर रहें, जिससे वातावरण में मौजूद गैस की वजह से उन्हें दिक़्क़त न हो. घायलों के बाद में AIIMS के डायरेक्टर रणदीप गुलेरिया ने कहा है कि स्टायरीन इतनी भयानक गैस नहीं है. कुछ दिनों बाद ये गैस शरीर से निकल जाएगी. और प्रभाव भी ख़त्म हो जाएगा. 

क्या सवाल उठते हैं?

सबसे पहले सवाल प्लांट के आसपास मौजूद गाँववालों के हैं. और वाजिब भी हैं. पूछते हैं,

“क्या LG पॉलीमर अपने प्लांट में कोई इमरजेंसी सायरन जैसी चीज़ इंस्टॉल नहीं कर सकता था? जिससे रिसाव होने पर लोगों को सूचित किया जा सके. लोग अपने-अपने सुरक्षित ठिकानों की ओर भाग सकें?”

और भी कुछ सवाल हैं :

> क्या LG पॉलीमर के वैज्ञानिकों और केमिकल इंजीनियरों को इस बात का अंदेशा नहीं था कि 1800 टन गैस लम्बे समय तक पड़े रहने और तापमान में परिवर्तन के कारण बदल सकती है? और इतने प्रेशर के साथ लीक हो सकती है?

> जब लॉकडाउन के समय फ़ैक्टरी बंद की गयी, तो क्या उस समय या लॉकडाउन के दरम्यान एक बार भी स्टायरीन गैस की टंकी की जांच नहीं की गयी? स्टायरीन गैस किस स्थिति में है, ये आख़िरी बार कब देखा गया?

> स्टायरीन टैंक, उसके वाल्व और दूसरे ज़रूरी हिस्सों का आख़िरी बार क्वालिटी टेस्ट कब किया गया था? कितने-कितने दिनों पर ये जांच की जाती रही है? 

> क्या हाल के दिनों में कभी ऐसी स्थितियों से निबटने के तरीक़े बताने और उनकी जानकारी देने के लिए किसी क़िस्म की मॉक ड्रिल प्लांट में आयोजित की गयी थी?

> जिस समय घटना घटी, उस समय प्लांट के अंदर कितने कर्मचारी थे?

> क्या आसपास की ग्राम पंचायतों / नगर पालिका / रहवासी संघों को लिखित में सूचित किया गया था कि प्लांट में किस तरह के रसायनों का इस्तेमाल होता है, इनसे बचने के उपाय क्या हैं?

> लीकेज की स्थिति में फैक्ट्री प्रोटोकॉल क्या है? क्या इसका पालन हुआ?

> रिसाव कब शुरू हुआ?

> प्रशासन को सूचना कब दी गई?

> स्टायरीन रिसाव के बाद उसे न्यूट्रलाइज़ करने के लिए लगने वाले एजेंट/ रसायन प्लांट में थे? इनकी मात्रा कितनी थी?

हमने ये सवाल LG से भी पूछे हैं. जवाब आए तो बतायेंगे. कुछ भी ख़बर आती है तो वो भी बतायेंगे. लेकिन कई सौ लोग हैं. जो सोए थे. तब उनपर गैस ने एक जोर हमला किया. और 11 लोगों की ज़िंदगी छीनकर ले गयी.


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