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कौन हैं अमेरिका के 'घोस्ट सोल्जर्स' जिन पर हर साल करीब 20 अरब रुपये का खर्च किये गए?

अगर साल 2021 की सबसे बड़ी राजनैतिक घटनाओं की कोई लिस्ट बनी, तो उसमें अफ़गानिस्तान पर तालिबान के क़ब्ज़े की कहानी सबसे ऊपर होगी. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ‘वॉर ऑन टेरर’ के लिए इकट्ठा हुई नाटो सेना को ‘दुनिया का सबसे महान सैन्य समूह’ कहते थे. फिर एक दिन ये महानता अचानक से चूक गई. क़बीलों में रहने वाले कुछ हथियारबंद लोग आए और उन्होंने पूरा महल बिखेर दिया.

29 फ़रवरी 2020. क़तर की राजधानी दोहा में अमेरिका और तालिबान के बीच समझौता हुआ. इसमें तय हुआ कि अमेरिका अगले 14 महीनों के भीतर अपने सभी सैनिकों को निकाल लेगा. इसके अलावा, अमेरिका ने हवाई हमले बंद करने और अफ़ग़ानिस्तान के घरेलू मामलों में दखल न देने की बात भी कही.

मई 2021 में 14 महीनों वाली डेडलाइन ख़त्म हो गई. फिर अमेरिका ने समय-सीमा बढ़ा दी. बोले कि हम 9/11 हमले की 20वीं बरसी के दिन अफ़ग़ानिस्तान से निकलने की प्रक्रिया पूरी करेंगे.

उस समय तक तालिबान अपने गढ़ में बैठकर डेडलाइन ख़त्म होने का इंतज़ार कर रहा था. जैसे ही डेडलाइन खत्म हुई, उसने काबुल पर क़ब्‍ज़े का कैंपेन शुरू कर दिया. तालिबान ने नाटो सेनाओं पर हमले की बजाय अफ़ग़ान आर्मी और आम नागरिकों को निशाना बनाना शुरू किया.

अमेरिका पहले से ही तालिबान से समझौता करके बैठा था. उसका फ़ोकस अपने सैनिकों को सुरक्षित निकालने पर था. वो तालिबान को रोकने के लिए तैयार नहीं हुआ. अमेरिका का कहना था कि ये तालिबान और अफ़ग़ान सरकार के बीच की बात है. वे आपस में सुलझें. हमने अरबों-खरबों खर्च कर साढ़े तीन लाख सैनिकों की फौज़ तैयार कर दी है.

तालिबान के 40-50 हज़ार नौसिखिये लड़ाकों की तुलना में ये संख्या काफी बड़ी थी. अफ़ग़ान सेना के पास लड़ाई के अत्याधुनिक साजो-सामान थे. उन्हें दुनिया की सबसे बेहतरीन सेनाओं से प्रशिक्षण मिला था. काग़ज़ों पर ये सेना तालिबान से टक्कर लेने का पूरा दम-खम रखती थी. लेकिन जब बात धरातल पर उतरी तो वहां कुछ भी नहीं था.

कुछ अपवादों को छोड़कर तालिबान को कहीं पर चुनौती नहीं मिली. अफ़ग़ानिस्तान के प्रांत एक-एक कर उसकी झोली में गिरते चले गए. अगस्त महीने की शुरुआत में अमेरिकी एजेंसियों ने एक अनुमान पेश किया. इसमें उन्होंने कहा था कि राजधानी काबुल पर तालिबान के क़ब्ज़े में 90 दिनों का वक़्त लग सकता है. असल में क्या हुआ? तालिबान ने रिपोर्ट आने के दो हफ़्ते के भीतर काबुल पर क़ब्ज़ा कर लिया.

आज के दिन हम ये सब चर्चा क्यों कर रहे हैं?

इसकी वजह है, एक इंटरव्यू. ख़ालिद पयेंदा अफ़ग़ानिस्तान के वित्तमंत्री थे. अशरफ़ ग़नी की सरकार में. पयेंदा को जनवरी 2021 में वित्त मंत्रालय सौंपा गया था. उन्होंने 10 अगस्त 2021 को अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया. इस्तीफ़ा देने के तुरंत बाद वो अफ़ग़ानिस्तान छोड़कर निकल गए. इसके पांच दिनों के भीतर ही तालिबान ने काबुल पर क़ब्ज़ा कर लिया था. राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी तालिबान की फरारी ने तालिबान का काम आसान कर दिया.

ख़ालिद पयेंदा इन दिनों अमेरिका में रह रहे हैं. वो छोटी-मोटी नौकरी के सहारे अपना गुजारा चला रहे हैं. 10 नवंबर 2021 को उन्होंने बीबीसी से बात की. इस बातचीत में उन्होंने कई चौंकाने वाले खुलासे किए. मसलन, किस तरह से मिलिटरी कमांडर्स के लालच ने अफ़ग़ानिस्तान को बर्बाद कर दिया? ‘घोस्ट सोल्ज़र्स’ या फ़र्ज़ी सैनिकों का दायरा कितना बड़ा था? तालिबान के कैंपेन के बीच अशरफ़ ग़नी क्या कर रहे थे? आदि.

साल 2008. अमेरिका की संसद ने अफ़ग़ानिस्तान में चल रहे पुनर्निर्माण की समीक्षा के लिए एक पोस्ट क्रिएट किया गया. नाम रखा गया, स्पेशल इंस्पेक्टर जनरल फ़ॉर अफ़ग़ानिस्तान रि-कंस्ट्रक्शन (SIGAR) ‘सिगार’. इसका काम था, अफ़ग़ानिस्तान में खर्च हो रहे अमेरिकी फ़ंडिंग की स्वतंत्र और निष्पक्ष रिपोर्ट देना.

अप्रैल 2016 की एक रिपोर्ट में सिगार ने दर्ज़ किया कि काग़ज़ी रेकॉर्ड और वास्तविकता में ज़मीन-आसमान का अंतर है. जब मिनिस्ट्री के काग़ज़ों में दर्ज़ नामों की गिनती की गई तो कुछ और ही कहानी सामने आई. पता चला कि अफ़ग़ान पुलिस फ़ोर्स के 20 प्रतिशत और बॉर्डर फ़ोर्स के 13 प्रतिशत नामों का कोई अता-पता ही नहीं है. ये फ़र्ज़ीवाड़ा 2006 से चल रहा था.

सिगार ने लिखा था,

ना तो अमेरिका और ना ही उसके अफ़ग़ान सहयोगी अफ़ग़ान पुलिस और सैनिकों की असली संख्या के बारे में जानते हैं. उन्हें ये तक पता नहीं है कि कितने ड्यूटी के लिए उपलब्ध हैं. इन हालात में आपकी कार्रवाई करने की क्षमता का अंदाज़ा लगाना नामुमकिन है.

सबसे बेहतरीन सेनापति भी अपना काम तब तक ठीक से नहीं कर सकता, जब तक कि उसे ये पता न हो कि उसके पास कितने सैनिक हैं और उनकी कार्यक्षमता क्या है.

अगस्त 2021 की एक रिपोर्ट में सिगार ने दावा किया कि अज्ञात सैनिकों को वेतन देने में अमेरिका ने हर साल लगभग 20 अरब रुपये गंवाया. इन अज्ञात सैनिकों को ‘घोस्ट सोल्ज़र्स’ का नाम दिया गया है. यानी ये ऐसे सैनिक होते हैं, जो असल में होते ही नहीं. बस इनका नाम मिलिटरी के वेतन वाले दस्तावेज़ में बना रहता है. इनके हिस्से का वेतन मिलिटरी कमांडर या कोई और ताक़तवर शख़्स खा रहा होता है.

सिगार की रिपोर्ट के बाद घोस्ट सोल्ज़र्स के ख़िलाफ़ अभियान चलाया गया. इसमें लगभग 42 हज़ार नामों को रेकॉर्ड से निकाला गया. उम्मीद जताई जा रही थी कि इससे हालात बदलेंगे. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. समस्या बरकरार रही. और, अंतत: वही हुआ, जिसकी आशंका जताई जा रही थी. यानी तालिबान की आसान जीत. इसके पीछे की वजह क्या थी?

तालिबान के क़ब्ज़े के बाद संभवत: पहली बार अशरफ़ ग़नी सरकार के किसी बड़े अधिकारी ने अपना मुंह खोला है. ख़ालिद पयेंदा सत्ता-प्रतिष्ठान में शामिल रहे. उन्होंने ग़नी सरकार के अंतिम दिनों को क़रीब से देखा है. पयेंदा सरकारी भ्रष्टाचार के भी गवाह रहे.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि घोस्ट सोल्ज़र्स को लेकर जो रिपोर्ट आ रहीं थी, हक़ीक़त उससे कहीं अधिक बदतर थी. पयेंदा दावा करते हैं कि ड्यूटी पर मौज़ूद सैनिकों की संख्या को छह से सात गुणा बढ़ाकर बताया जा रहा था. असलियत में अफ़ग़ान आर्मी के पास 40 से 50 हज़ार लोग ही थे. काग़ज़ों पर जिस जगह एक हज़ार सैनिक तैनात थे, असल में वहां 30 से 35 लोग ही होते थे.

तो बाकी के सैनिक कहां गए?

– पयेंदा ने बताया कि कई फ़ील्ड कमांडर्स ऐसे थे, जो हमेशा सैनिकों की संख्या बढ़ा-चढ़ाकर बताते थे. वे कॉन्ट्रैक्टर्स के साथ मिलकर एक्स्ट्रा पैसों और राशन का ग़बन कर लेते थे.

– एक समय के बाद अफ़ग़ान सेना ने मृत सैनिकों का आंकड़ा देना बंद कर दिया था. कमांडर्स मरने वाले सैनिकों का बैंक कार्ड सरेंडर नहीं करते थे. उनके नाम पर पैसा आता रहता और वे मालामाल होते रहते थे. इस चोरी में मिलिटरी लीडर्स से लेकर गवर्नर और मंत्री तक शामिल थे.

– कुछ मिलिटरी कमांडर्स इतने भ्रष्ट थे कि वे दोनों तरफ़ से पैसा खाते थे. सरकार से भी और तालिबान से भी. जब से अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान को छोड़ने का ऐलान किया, तब से उन्हें ये लगने लगा था कि ये सरकार छह महीने से अधिक नहीं चलेगी. उन्हें तालिबान ने भरोसा दिलाया था कि सरकार गिरने के बाद उनकी नौकरी बरकरार रहेगी. इस लालच में उन्होंने तालिबान को चुनौती देना ही छोड़ दिया.

– जो सैनिक असल में ड्यूटी पर आते थे, उन्हें समय पर सैलरी ही नहीं मिलती थी. द गार्डियन की एक रिपोर्ट में अफ़ग़ान सेना के पोस्ट की सच्चाई बताई गई थी. सैनिकों को कभी ढंग का खाना तक नहीं मिलता था. एक सैनिक ने आटे के लिए अपना मशीनगन तालिबान को बेच दिया था.

जब पयेंदा को वित्तमंत्री बनाया गया, उन्हें राजस्व बढ़ाने की ज़िम्मेदारी दी गई थी. उन्हें पता चला कि बॉर्डर कस्टम से आने वाला अधिकांश पैसा सरकारी खज़ाने में नहीं पहुंच रहा है. जब पयेंदा ने ज़ोर डाला तो कस्टम अधिकारी उनके पास एक ऑफ़र लेकर पहुंच गए. उन्होंने कहा, काहे लोड लेते हैं! ये सरकार नहीं चलने वाली. ऐसा करते हैं हम और आप फ़िफ़्टी-फ़िफ़्टी कर लेते हैं.

पयेंदा ने ये भी कहा कि ये सच है कि देशभक्त लोगों की कोई कमी नहीं थी. ऐसे लोग भी थे जो अपना सब कुछ गंवाकर आज़ाद और उदार अफ़ग़ानिस्तान के सपने को साकार करना चाहते थे. लेकिन फिर उनका मन भी उचट गया. उन्हें ये लगने लगा कि वे कुछ नहीं कर पाएंगे. इस हम्माम में सब नंगे हैं. भ्रष्टाचार की नदी ऊपर से नीचे की तरह बह रही है. ये इसी तरह चलता रहेगा.

जब तालिबान आगे बढ़ रहा था, उस समय राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी क्या कर रहे थे?

पयेंदा के मुताबिक, उस समय अशरफ़ ग़नी ऐसी चीज़ों में व्यस्त थे, जहां उन्हें नहीं होना चाहिए था. जैसे, ग़नी वेतन के मसले पर उलझे हुए थे. वो वेंडर्स के पैसों को लेकर झगड़ रहे थे. एक समय के बाद ग़नी ने अपने क़रीबी लोगों पर भरोसा करना छोड़ दिया था. ग़नी बौरा गए थे. वो छोटी-छोटी बातों पर अफ़सरों को बर्ख़ास्त करने लगे थे. ग़नी असली समस्या पर ध्यान देना भूल गए थे.

जब पयेंदा से ये पूछा गया कि क्या उन्हें किसी बात का अफ़सोस है?

उन्होंने कहा कि हमने अफ़ग़ानिस्तान को बेहतर मुल्क़ बनाने का मौका खो दिया. ये मुद्दा नहीं है कि मैं भ्रष्ट था या नहीं. लेकिन मैं उसी भ्रष्ट सिस्टम का हिस्सा था, जिसने अपने लोगों को मझधार में छोड़ दिया.

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