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अमेरिका-चीन ट्रेड वॉर में WTO अमेरिका के खिलाफ़ क्यों गया?

दो साल पहले चीन ने अमेरिका के खिलाफ़ एक शिकायत दर्ज करवाई थी. ये शिकायत सही पाई गई है. इस मामले में फैसला सुनाते हुए एक अंतरराष्ट्रीय संगठन ने चीन का पक्ष लिया. संगठन ने कहा कि अमेरिका ने न केवल चीन के साथ ग़लत किया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय नियम भी तोड़े. ये फैसला उस संगठन ने सुनाया है, जिसमें चीन की एंट्री को कभी ख़ुद अमेरिका ने सपोर्ट किया था. ये क्या मामला है, विस्तार से बताते हैं आपको.

इस ख़बर की शुरुआत करते हैं एक दो साल पुराने ट्वीट से. तारीख़ थी- 4 दिसंबर, 2018. इस रोज़ अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने एक ट्वीट किया. इसमें लिखा था-

आई अम अ टैरिफ मैन. इस वक़्त हम टैरिफ लगाकर अरबों रुपये हासिल कर रहे हैं. चलिए, अमेरिका को फिर से अमीर बनाएं.

टैरिफ़ मैन क्या होता है?

इस ट्वीट में ट्रंप ने ख़ुद को टैरिफ़ मैन बताया. जैसे, सुपरमैन, बैटमैन, स्पाइडरमैन. वैसे ही ट्रंप ने कहा, मैं टैरिफ़ मैन. टैरिफ़ क्या होता है? टैरिफ मतलब होता है, इम्पोर्ट होकर आने वाले सामान पर चुकाई जानी वाली चुंगी. ये इम्पोर्ट मतलब एक मैन्चुफैक्चर को विदेशी बाज़ार में पहुंचने के लिए जो टैक्स देना पड़ता है, वही कहलाता है टैरिफ़. सोशल मीडिया ने ट्रंप के इस ‘टैरिफ मैन’ पर ख़ूब चुटकुले बनाए. मगर सवाल है कि ट्रंप ने ख़ुद को ये नाम दिया क्यों था?

इसकी वजह थी दुनिया के दो सबसे बड़े देशों के बीच चल रही एक ख़ास लड़ाई. इसका नाम था- ट्रेड वॉर. यानी, व्यापारिक युद्ध. ये ट्रेड वॉर था अमेरिका और चीन के बीच. इस ट्रेड वॉर की कहानी सुनाने से पहले थोड़ा अतीत में चलते हैं. चीन आज जिस रंग-ढंग में है, उसकी शुरुआत हुई 80 और 90 के दशक में. उसके सैन्य और आर्थिक विस्तार का क़िस्सा इन्हीं 20 सालों में शुरू हुआ. ग्लोबल इकॉनमी में शायद ही किसी दूसरे देश ने इतनी तेज़ी से तरक्की की होगी कभी. इस तरक्की को समझने के लिए कुछ आंकड़े देखिए.

1. 1977 में चीन का कुल विदेशी व्यापार करीब डेढ़ लाख करोड़ रुपये का था. साल 2000 में ये बढ़कर हो गया लगभग 35 लाख करोड़ रुपया.
2. 1995 तक दुनिया के टॉप 10 व्यापारिक देशों में शुमार
3. 90 के दशक में अमेरिका के बाद सबसे ज़्यादा विदेशी निवेश चीन में
4. साल 2000 तक दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना चीन

मगर चीन को अपनी ग्रोथ और बढ़ानी थी. अपने बेहतर आर्थिक भविष्य के लिए उसकी नज़र गई एक अंतरराष्ट्रीय संगठन पर. इस संगठन का नाम है- वर्ल्ड ट्रे़ड ऑर्गनाइज़ेशन. शॉर्ट में, WTO. ये एक ग्लोबल व्यापारिक संस्था है. जैसे इंटरनैशनल क्रिकेट में ICC नियम बनाता है, वैसे ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नियम-क़ायदे बनाता है WTO. ये अपने सदस्य देशों के बीच के व्यापारिक झगड़ों में रेफरी का भी काम करता है.

Donald Trump
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप. (एपी)

चीन क्यों WTO जॉइन करना चाहता था?

WTO जॉइन करने के पीछे चीन की मुख्य मंशा थी, ज़्यादा-से-ज़्यादा देशों के साथ व्यापार करना. बदले में उसे भी अपनी इकॉनमी को बाहरी देशों के लिए ज़्यादा खोलना था. वहां इंटरनैशनल कॉम्पिटिशन को फलने-फूलने देना था.

WTO में चीन की सदस्यता का समर्थन किया अमेरिका ने. अमेरिका का सोचना था कि WTO में शामिल हो जाने पर चीन में तब्दीली आएगी. वो अपने कम्यूनिस्ट मॉडल से हटकर लिबरल मॉडल पर शिफ़्ट हो जाएगा. अपने व्यापारिक हितों के चलते अनुशासन में रहेगा. एक लाइन में कहें, तो अमेरिका को लगता था कि फ्री ट्रेड से लोकतंत्र के लिए रास्ता बनेगा चीन में. अमेरिकी राष्ट्रपति बहुत समय से यही सोचते आ रहे थे. मसलन, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश ने 1991 के अपने एक भाषण में कहा था-

अगर हम चीन की जनता के साथ संपर्क बढ़ाने और चीन के साथ व्यापार बढ़ाने की पॉलिसी बनाएं, तो हम चीन के अंदर लोकतांत्रिक बदलाव के लिए माहौल बना सकते हैं. दुनिया में ऐसा कोई देश नहीं, जो विदेशी सामान तो आयात करे, मगर विदेशी विचारों को अपनी सीमा में घुसने से रोक दे. चीन में भी लोकतंत्र का आना तय है.

George Bush
अमेरिकी के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश. (एपी)

चीन को सदस्यता मिलने के बाद अमेरिका को क्या दिक्कत हुई?

अमेरिकी की कोशिशों के चलते साल 2001 में चीन को WTO की सदस्यता मिल गई. इससे चीन का व्यापार और बढ़ा. उसके सामान दुनिया के कोने-कोने तक पहुंच गए. शुरुआत में अमेरिका को चीन के इस विस्तार से कोई ख़ास परेशानी नहीं थी. उसके लिए चीन एक सस्ते कारखाने की तरह था. मगर फिर 2010 में आकर चीजें बदलने लगीं. इसकी वजह थी, चीन की आक्रामकता और उसका सैन्य विस्तार.

South China Sea
साउथ चाइना सी. (गूगल मैप्स)

चीन साउथ चाइना सी जैसे बेहद अहम समुद्री क्षेत्रों में अमेरिका को धमका रहा था. वो अमेरिका की ही तरह विदेशों में सैन्य ठिकाने बना रहा था. ऊपर से चीन के इकॉनमिक ग्रोथ की रफ़्तार अमेरिका की कल्पना से कहीं ज़्यादा निकली. 2010 में चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया. एशिया, यूरोप, अफ्रीका और साउथ अमेरिका में निर्यात के मामले में भी वो अमेरिका से आगे आ रहा था. मतलब एक विकासशील देश ने दशकों से सुपरपावर रहे अमेरिका को सबसे तगड़ी चुनौती दे दी थी.

इन सब वजहों से अमेरिका और चीन के बीच तनाव बढ़ने लगा. फिर जब 2015 में चीन अपनी महत्वाकांक्षी योजना ‘बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव’ लाया, तब अमेरिका की चिंता और बढ़ गई. ये BRI क्या है? एक लाइन में समझिए, तो ये चीन का अति विशाल व्यापारिक नेटवर्क है. इसके मार्फ़त चीन कम समय और कम लागत में अपना सामान दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचा सकेगा. इस ग्लोबल सप्लाई चेन में 138 देश चीन के साथ जुड़ चुके हैं. मतलब आधी से ज़्यादा दुनिया का व्यापारिक हित चीन के साथ जुड़ गया है. इस हित को प्रभाव के बैरोमीटर पर मापिए, तो ज़ाहिर है चीन अमेरिका पर भारी पड़ रहा है.

Belt And Road Initiative
चीन के लिए बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव अतिमहत्वपूर्ण योजना है.

आपको ये पूरा संदर्भ बताने के बाद अब लौटते हैं ट्रंप पर

नवंबर 2016 के चुनाव में जीतकर राष्ट्रपति बने डॉनल्ड ट्रंप. उनका नारा था- अमेरिका फर्स्ट. माने अमेरिकी हित सर्वोपरि हैं. ट्रंप की इस अमेरिका फर्स्ट पॉलिसी के निशाने पर था चीन. ट्रंप का मानना था कि चीन लंबे समय से अमेरिका का फ़ायदा उठाता आया है. वो अमेरिका से इम्पोर्ट कम करता है और एक्सपोर्ट ज़्यादा करता है. इसके कारण एक तो अमेरिका को व्यापारिक घाटा हो रहा है. दूसरा, अमेरिका की उत्पादन क्षमता भी घट गई है. अमेरिका विदेशी सामानों पर निर्भर हो गया है. ट्रंप के मुताबिक, इन सारी समस्याओं का इलाज था- टैरिफ़. माने अमेरिकी बाज़ारों में आ रहे विदेशी सामानों पर टैक्स बढ़ाओ. ताकि अमेरिकी बाज़ार में विदेशी सामान महंगा हो जाए. इससे अमेरिका के लोग अपने घरेलू उत्पादों को तरजीह देने लगेंगे.

Xi Jinping
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग. (एपी)

इसी के तहत ट्रंप प्रशासन ने चीन से आने वाले प्रॉडक्ट्स पर टैरिफ बढ़ा दिया. इसकी शुरुआत हुई जुलाई 2018 में. फिर अगस्त और सितंबर 2018 में और भी कई चीनी उत्पादों पर टैरिफ़ बढ़ाए गए. चीन ने भी टैरिफ़ का जवाब टैरिफ़ से दिया. फिर मई और जून 2019 में भी ट्रंप ने कई नए टैरिफ़ लाद दिए चीन पर. इसके बाद दोनों देशों में बातचीत शुरू हुई. इस बातचीत का नतीजा निकला जनवरी 2020 में. 15 जनवरी को अमेरिका और चीन के बीच एक समझौता हुआ. इसमें चीन ने वादा किया कि वो 2017 के मुकाबले 200 बिलियन डॉलर ज़्यादा का अमेरिकी सामान आयात करेगा. बदले में अमेरिका ने चीनी उत्पादों पर लगाए गए कुछ टैरिफ़ वापस ले लिए. मगर ये समझौता इस ट्रेड वॉर का ठोस समाधान नहीं निकाल सका.

आप पूछ सकते हैं कि ये सब हम आज क्यों बता रहे हैं आपको?

इसलिए बता रहे हैं कि ट्रंप द्वारा शुरू किए गए इस टैरिफ़ वॉर में WTO से एक बड़ी अपडेट आई है. ट्रंप ने जुलाई 2018 में जब चीनी प्रॉडक्ट्स पर टैरिफ़ बढ़ाए, तो चीन ने इसकी शिकायत WTO में की. इसी शिकायत पर WTO के एक पैनल ने 15 सितंबर को अपना फैसला दिया. इसमें कहा गया कि 2018 में चीन पर टैरिफ़ लगाकर अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक नियमों का उल्लंघन किया है.

Wto Judgment Us China
15 सितंबर को WTO का फैसला आया है.

WTO के इस फैसले की अमेरिका ने आलोचना की. इस फैसले पर अमेरिकी सरकार ने जो कहा, उसका सारांश बता देते हैं आपको-

ट्रंप प्रशासन पिछले चार साल से जो कहता आया था, इस रिपोर्ट ने उसपर मुहर लगा दी. साबित कर दिया कि WTO चीन के ख़तरनाक तौर-तरीकों से निपटने के लायक नहीं है. ट्रंप प्रशासन चीन को WTO के बहाने अमेरिकी कामगारों, कारोबारियों और किसानों का फ़ायदा नहीं उठाने देगा.

अब अमेरिका क्या करेगा?

इस मामले पर WTO को अपना जवाब देने के लिए अमेरिका के पास 60 दिनों का समय है. अगर इस मियाद में अमेरिका जवाब नहीं देता, तो क्या होगा? कुछ नहीं होगा. इसलिए कि अमेरिका पहले ही WTO में खेल कर चुका है. कैसे? देखिए, व्यापारिक विवाद के मामले देखने के लिए WTO में एक ख़ास पैनल होता है. जब कोई देश किसी दूसरे देश के खिलाफ़ शिकायत लेकर WTO में जाता है, तो यही पैनल मामले की सुनवाई करता है. मगर इस सुनवाई के लिए पैनल में कम-से-कम सात सदस्य होने चाहिए. इन सदस्यों का एक तय कार्यकाल होता है. किसी सदस्य का कार्यकाल पूरा हो जाने के बाद पैनल में उसकी जगह नए मेंबर को लाया जाता है. ट्रंप प्रशासन ने यहीं पर खेल किया.

अमेरिका के पास सदस्यों की भर्ती प्रक्रिया को प्रभावित करने की पावर है. इसी के सहारे उसने इस पैनल में नए सदस्यों की भर्ती का रास्ता ब्लॉक कर दिया. इस वजह से दिसंबर 2019 तक पैनल में केवल तीन लोग बचे रह गए. मगर इस माइनॉरिटी पैनल के सुनाए फैसले का कोई व्यावहारिक महत्व नहीं है. यानी अमेरिका ने WTO को पूरी तरह लाचार बना दिया है. उसने WTO से उसकी प्रासंगिकता ही छीन ली है.

Wto
वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाइजेशन.

हमने आपको बताया था कि WTO में चीन की एंट्री को अमेरिका ने सपोर्ट किया था. अब इसी अमेरिका में कई लोग इसपर अफ़सोस करते हैं. WTO में विकासशील देशों को कई सहूलियतें मिलती हैं. चीन को भी विकासशील होने का बहुत फ़ायदा मिला. ट्रंप समेत अमेरिका के कई इसे चीन को मिलने वाला बेजा फ़ायदा बताते हैं. हालांकि ट्रंप इस मामले में भारत को भी निशाना बनाते रहे हैं. फरवरी 2020 में उन्होंने डिवेलपिंग देशों की अमेरिकी लिस्ट से भारत को हटा दिया था. इसकी वजह से इंडियन एक्सपोर्टर्स को अमेरिका के साथ कारोबार में मिलने वाली कई छूटें भी ख़त्म हो गईं.

अमेरिका और चीन, दोनों एक-दूसरे के साथ आगे नहीं बढ़ना चाहते. दोनों सोचते हैं, एक-दूसरे को गिराकर ही बेहतर भविष्य मिलेगा. मगर ग्लोबलाइज़ेशन के दौर में ऐसा मुमकिन नहीं है. दोनों के इस तनाव का असर पूरी जियोपॉलिटिक्स पर पड़ रहा है. दुनिया पहले से ज़्यादा अस्थिर और असुरक्षित हो गई है. खेमेबाज़ियां बढ़ गई हैं. ये नए कोल्ड वॉर जैसी स्थिति है.


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