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मुस्लिमों की मुताह प्रथा, जिसमें अय्याशी के लिए कॉन्ट्रैक्ट शादी का सहारा लिया जाता है

ट्रिपल तलाक़ पर पाबंदी के बाद सुप्रीम कोर्ट कुछ और मुस्लिम प्रथाओं की प्रासंगिकता चेक करने के मूड में है. इनको चुनौती देनेवाली याचिकाओं पर विचार करने का सुप्रीम कोर्ट ने मन बना लिया है. अश्विनी उपाध्याय, नफीसा ख़ान, समीना बेगम सहित चार लोगों की याचिकाओं को पांच जजों की संविधान पीठ देखेगी. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस भी भेज दिया है. ये प्रथाएं हैं बहुविवाह, हलाला, मुताह निकाह और मिस्यार निकाह.

आज अपन इसी पर बात करेंगे कि ये प्रथाएं हैं क्या! और किस तरह से ये मुस्लिम समाज में औरतों की स्थिति पर असर डालती हैं.

# बहुविवाह, कभी ज़रूरत अब जहालत

एक से ज़्यादा शादियों का चलन इस्लाम के उदय के वक़्त से मौजूद है. हालांकि उस वक़्त इसका मकसद पुरुषों की ऐय्याशियों को एंडोर्स करना नहीं, बल्कि कुछ और था. वो दौर ऐसा था, जब कबीलाई संस्कृति का बोलबाला था. आए दिन इलाकाई वर्चस्व की लड़ाइयां होती रहती थीं. ज़ाहिर है, ख़ूनख़राबा आम बात थी. इफरात में मर्द बिरादरी हलाक़ हुआ करती थी. आए दिन कोई न कोई जंग छिड़ जाती थी और बड़ी संख्या में लोग मारे जाते थे. यूं मारे गए लोगों के बीवी, बच्चे बेसहारा हो जाते थे. एक से ज़्यादा शादियों की इजाज़त होने के पीछे उन लावारिसों को छत मयस्सर करवाने की भावना ही प्रबल थी. हमारे समाज में स्त्री बड़ी संख्या में आज भी पुरुषों पर आश्रित है. उस दौर में तो और भी बुरा हाल था इस फ्रंट पर. यूं बहुविवाह के ज़रिए स्त्रियों को एक आसरा मिल जाता था, जो कि उस दौर में सबसे बड़ी ज़रूरत थी.

पैगम्बर मुहम्मद के समय हुई जंग-ए-बद्र की एक पेंटिंग.
पैगम्बर मुहम्मद के समय हुई जंग-ए-बद्र की एक पेंटिंग.

वक़्त बदलता रहा. हालात बदलते रहे. प्रथा नहीं बदली. अब बहुविवाह स्त्रियों के लिए राहत नहीं, अज़ाब है. बिना किसी आधिकारिक सेपरेशन के मुस्लिम मर्द चार शादियां तक कर सकते हैं. जो स्त्रियों के बेसिक अधिकारों में लगा हुआ पलीता है. आज एक से ज़्यादा शादियां न सिर्फ पुरुषों की ज़िंदगी रंगीन करने का ज़रिया है, बल्कि स्त्रियों पर दबाव बनाए रखने में भी सहायक है.

बहुविवाह की इजाज़त कुरआन भी देता है. लेकिन शर्तों के साथ. सबसे ज़रूरी शर्त है कि आप अपनी सारी बीवियों से समान बर्ताव का वादा करें. और वादाखिलाफी तो इंसानी फितरत है ही. सो बहुविवाह में नाइंसाफियों का बोलबाला रहता है. कुरआन की इजाज़त के बावजूद ऐसा नहीं है कि तमाम मुस्लिम मुल्क इसकी इजाज़त देते हैं. तुर्की, अज़रबैजान और ट्यूनीशिया जैसे मुल्कों में एक से ज़्यादा शादियों की कानूनन मनाही है.

तुर्की की सुलतान अहमद मस्जिद.
तुर्की की सुलतान अहमद मस्जिद.

कुछ मुल्कों में, जिनमें भारत भी शामिल है, महिलाओं के पास ये ऑप्शन रहता है कि वो अपने निकाहनामे में मर्द के दूसरी शादी न करने का प्रावधान रखे. हालांकि ये प्रैक्टिस में नहीं दिखाई देता.

ईरान और पाकिस्तान में पहली पत्नी से इजाज़त के बिना दूसरी शादी नहीं की जा सकती. तो मलेशिया जैसे मुल्क में पहली पत्नी और सरकारी मान्यताप्राप्त धर्मगुरु दोनों से परमिशन लेनी पड़ती है.

बहरहाल, आज की तारीख में बहुविवाह यकीनन एक खामखा ढोए जानेवाली प्रथा है, जिसका मर्द पूरी तरह से ग़लत फायदा उठाते हैं.

# हलाला का कलंक

हलाला यकीनन इस्लाम के माथे पर लगा सबसे बदनुमा दाग है. ये प्रथा ये तथ्य रेखांकित करती है कि औरतों की हैसियत मर्द की प्रॉपर्टी बनकर रहने तक ही सीमित है. बहुत समय से इस्लाम के अंदर से इस प्रथा को पूरी तरह उखाड़ फेंकने की बात चल रही है. पर अफ़सोस यही है कि ऐसी आवाज़ों का संख्याबल अभी कमज़ोर ही है. हलाला न सिर्फ अमानवीय प्रथा है, बल्कि स्त्रियों का सर्वोच्च अपमान भी है.

हलाला की नौबत तभी आती है, जब कोई कपल तलाक़ लेने के बाद फिर से शादी करने का ख्वाहिशमंद हो. भले ही दोनों मर्ज़ी से फिर साथ रहना चाहते हो, कीमत सिर्फ औरत को चुकानी पड़ती है. हलाला में दोबारा उसी शख्स से शादी करने के लिए एक ख़ास प्रक्रिया से गुज़रना पड़ता है. प्रक्रिया बहुत बोरिंग शब्द है. इससे वो ध्वनि नहीं निकलती, जिससे औरत के साथ होने वाले घिनौनेपन को सही-सही ढंग से बयान किया जा सके.

इस विषय पर साहित्य भी रचा गया है.
इस विषय पर साहित्य भी रचा गया है.

हलाला का केस कुछ यूं समझिए. मान लीजिए सलीम और सलमा शादीशुदा कपल है. किसी वजह से उनमें तलाक हुआ. थोड़े समय बाद उन्हें फिर से एक साथ रहने का मन हुआ. अब वो फिर से शादी करना चाहते हैं. आप सोचेंगे कि क्या दिक्कत है! शौक से करें. लेकिन नहीं, इतना आसान नहीं है. सलीम और सलमा सीधे-सीधे शादी नहीं कर सकते. सलमा को हलाला से गुज़रना होगा.

उन दोनों की दोबारा शादी तभी हो सकती है, जब सलमा किसी और आदमी से निकाह करके उससे भी तलाक ले ले. और हां, सिर्फ कागज़ी निकाह नहीं मान्य होगा. पति-पत्नी के सारे कर्तव्य उन्हें निभाने होंगे. सीधे कहा जाए तो सेक्स करना मैन्डेटरी है. उसके बिना हलाला पूरा नहीं होगा. शरीर-संबंध स्थापित करने के बाद दूसरा पति – अपनी मर्ज़ी से – तलाक़ देगा. उसी के बाद सलमा और सलीम का निकाह मुमकिन है.

आपने ऐसा केस फिल्म ‘निकाह’ में भी देखा होगा.

औरत के दिल के अरमां वाकई आसुओं में बह जाते हैं.
औरत के दिल के अरमां वाकई आसुओं में बह जाते हैं.

इस एकतरफा अज़ाब जैसी सज़ा के पीछे एक कमज़ोर सा तर्क है. ऐसा, जिससे समाज के पूरी तरह पुरुषवादी होने पर ही मोहर लगती है. तलाक को इस्लाम में नापसंदीदा काम करार दिया गया है. एक्सट्रीम कंडीशन में ही तलाक देने की इजाज़त है. तलाक को खेल न समझा जाए इसलिए हलाला वजूद में आया. इसके पीछे आईडिया ये था कि पत्नी को एक रात के लिए ही सही किसी और के साथ शेयर करने के ख़याल से मुस्लिम मर्द डरा करेगा. ज़ाहिर है छोटी-छोटी बातों में तलाक़ की नौबत नहीं आएगी. बज़ाहिर ये बात लॉजिकल भले ही लगती हो, है भयानक तौर से महिला विरोधी. इससे यही बात उभरकर सामने आती है कि धर्म को औरत की भावनाओं से कोई सरोकार नहीं है. वो सिर्फ मर्द की सुविधा देखता है.

कोई हैरानी नहीं कि इस ज़लील प्रथा का मुखर विरोध दुनिया भर में होता आया है.

# मुताह निकाह: कॉन्ट्रैक्ट मैरिज या कानूनी वेश्यावृति?

‘मुताह’ का शाब्दिक अर्थ है ‘आनंद’, ‘मज़ा’, ‘प्लेजर’. इसी एक बात से ये पता चलता है कि मुताह शादी का कितना वाहियात रूप है. महज़ मज़े के लिए शादी. इस्लाम में वेश्यावृत्ति हराम है. जिस्म बेचने या खरीदने पर पाबंदी है. निकाह के अलावा किसी भी तरह का शरीरसंबंध ‘जिनाह’ माना जाता है. सिंपल शब्दों में अवैध संबंध, व्यभिचार. ऐसे में मुताह निकाह और कुछ नहीं, मज़हब की हदों में रहते हुए बदफैली करने का उपाय ही प्रतीत होता है.

मुताह निकाह को आसानी से समझा जाए तो ये एक कॉन्ट्रैक्ट मैरिज है. इसमें एक तयशुदा समय के लिए, मेहर की एक मोटी रकम तय करके निकाह होता है. मेहर एडवांस में पे होता है. अनुबंध तीन दिन से लेकर कितने ही वक्फे का हो सकता है. एक बार मियाद तय होने के बाद उसे बदला नहीं जा सकता. मुताह का कॉन्ट्रैक्ट शाब्दिक या लिखित किसी भी रूप में हो सकता है. निकाह के वक़्त दोनों लोगों को ये घोषित करना होता है कि ये एक मुताह निकाह है और वो इसकी तमाम शर्तों से वाकिफ हैं. ये मुख्य रूप से शिया मुसलमानों में प्रचलित प्रथा है.

मुस्लिम निकाहनामे का एक नमूना.
मुस्लिम निकाहनामे का एक नमूना.

मुताह निकाह की कुछ शर्तें होती है. जैसे:

# लड़की पवित्र हो. 
# उसका मुस्लिम होना ज़रूरी है. या कम से कम अहले किताब हो.
# वो पहले से शादीशुदा न हो.
# व्यभिचार में लिप्त न हो.
# नाबालिग़ न हो.

दिलचस्प बात ये कि तमाम शर्तें औरतों के लिए है. मर्द किसी भी उम्र का, किसी भी रंग-रूप का, खेला खाया या कुंवारा एलिजिबल है. तयशुदा कॉन्ट्रैक्ट की अवधि ख़त्म होने के बाद मुताह निकाह समाप्त हो जाता है. इसके बाद भी औरत को छुट्टी नहीं है. उसे इद्दत पूरी करनी पड़ती है.

इद्दत चार महीने दस दिन की उस मियाद का नाम है, जिसमें औरत एकांतवास में, किसी भी मर्द की छाया से परे समय गुज़ारती है. उसके बाद ही वो किसी और से शादी के लिए लायक बन सकती है. मुताह निकाह की इस्लामिक स्कॉलर भी आलोचना करते रहे हैं. वो इसे हवसपरस्ती का ही कानूनी तरीका मानते हैं. मुताह निकाह की आलोचना एक और वजह से भी होती है. वो है इस निकाह के नतीजे में पैदा हुए बच्चों का सामाजिक स्टेटस. बिना जायज़ निकाह के पैदा हुए बच्चों की सामाजिक स्वीकार्यता का रेट बहुत कम है. ऐसे बच्चे जीवन भर एहसासेकमतरी से जूझते रहते हैं.

मुताह निकाह यकीनन एक शर्मसार करनेवाली प्रथा है. इसकी मुखालफत करती तमाम आवाज़ों की हौसलाअफज़ाई होनी चाहिए.

# निकाह मिस्यार: शियाओं को सुन्नियों का जवाब

शियाओं में प्रचलित मुताह निकाह को सुन्नी मुसलमान हिकारत की नज़र से देखते हैं. सख्त नापसंद करते हैं. जो नहीं बताते, वो ये कि उनके यहां भी इससे मिलती जुलती एक योजना है. जिसका नाम निकाह मिस्यार है. मुताह और मिस्यार में कुछ प्रावधान बिल्कुल मिलते-जुलते हैं.

मिस्यार निकाह का एक मतलब प्रवासी निकाह भी बताया जाता है. इसमें आदमी-औरत की शादी तो होती है लेकिन कुछ बेसिक चीज़ों की अनिवार्यता नहीं होती. एक नॉर्मल शादी का अभिन्न अंग माने जाते कुछ अधिकार छोड़ दिए जाते हैं.

मिस्यार निकाह में साथ रहना ज़रूरी नहीं होता. दोनों अपनी-अपनी जगह रहकर शादी में बने रह सकते हैं. सिर्फ ज़रूरत भर की मेल-मुलाक़ात काफी है. आप समझ ही रहे होंगे कि हम क्या कह रहे हैं. इसके अलावा पत्नी अपने घरखर्चे के पैसे का अधिकार त्यागती है, तो पति पत्नी से हाउसकीपिंग करवाने के अधिकार पर पानी छोड़ता है.

मुताह और मिस्यार निकाह में अरबी समाज की शिरकत सबसे ज़्यादा है. प्रतीकात्मक इमेज.
मुताह और मिस्यार निकाह में अरबी समाज की शिरकत सबसे ज़्यादा है. प्रतीकात्मक इमेज.

सुन्नी समाज मिस्यार निकाह की हिमायत में ये तर्क देता है कि ये व्यभिचार टालने में बड़ा सहायक है. लोग ‘जिनाह’ किए बगैर सेक्सुअल रिलेशनशिप में मुब्तिला रह सकते हैं. एक हद तक ये बात सही भी है. एक तरह से ये लिव-इन रिलेशनशिप का ही अल्ट्रा मॉडर्न संस्करण लगता है, जहां साथ रहना भी ज़रूरी नहीं. इसमें कोई टाइम फ्रेम भी नहीं होता. मिस्यार निकाह जब तक दोनों की मर्ज़ी हो, जारी रह सकता है.

हालांकि इस शादी में भी वो तमाम खामियां हैं जो मुताह निकाह में हैं. इसमें भी दुष्परिणाम सिर्फ औरत को ही भुगतने होते हैं. मर्द आसानी से मूव ऑन कर जाता है. सामजिक स्वीकार्यता का बड़ा मसला औरत तमाम ज़िंदगी फेस करती रहती है.

सुप्रीम कोर्ट की दखलअंदाज़ी के बाद ये उम्मीद बंध रही है कि इनमें से कुछेक प्रथाएं बंद करने की तरफ कुछ तो कदम बढ़ेंगे. ये ज़रूरी भी है. इनमें से कुछ प्रथाएं बेहद गैरज़रूरी हैं, तो कुछ मनुष्यता पर कलंक. जितनी जल्दी मुस्लिम कौम इनसे छुटकारा पा लें, बेहतर है.


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