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कैसे चुना जाता है CBI का प्रमुख; PM, CJI और विपक्ष के नेता का क्या रोल होता है?

CBI यानी सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन. हिन्दी में कहें तो केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो. देश की सबसे बड़ी केंद्रीय जांच एजेंसी है. 1941 में CBI को ‘स्पेशल पुलिस इस्टैब्लिशमेंट’ के नाम से स्थापित किया गया. क्यों? देश की डोमेस्टिक सिक्योरिटी या घरेलू सुरक्षा के लिए. 1 अप्रैल, 1963 को इसका नाम बदलकर सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन कर दिया गया. तब इसका काम घूसखोरी और सरकारी भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करना था. बाद में इसकी शक्तियों का दायरा बढ़ाया गया. इसमें भ्रष्टाचार के अलावा संगीन अपराध भी जोड़े गए.

आज CBI की बात क्यों? क्योंकि CBI डायरेक्टर की नियुक्ति से जुड़ी खबर आई है. हाई पावर कमेटी 24 मई को मीटिंग करने जा रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, नेता विपक्ष और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश इस मीटिंग में शामिल होंगे.

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सीबीआई मुख्यालय की पुरानी बिल्डिंग 

CBI डायरेक्टर ऋषि कुमार शुक्ला 2 फरवरी को रिटायर हो गए थे. तब सरकार ने नए डायरेक्टर की नियुक्ति करने के बजाय प्रवीण सिन्हा को अंतरिम डायरेक्टर नियुक्त किया था. CBI डायरेक्टर की स्थाई नियुक्ति को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा था कि CBI के स्थायी डायरेक्टर की नियुक्ति के लिए 2 मई से पहले चयन समिति की बैठक बुलाई जाए. इसके जवाब में केंद्र सरकार की ओर से कहा गया कि ये संभव नहीं है. नेता विपक्ष अधीर रंजन चौधरी 2 मई से पहले मीटिंग में भाग नहीं ले पाएंगे. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में 16 मई को सुनवाई होनी है. उससे पहले खबर आई है कि CBI डायरेक्टर की नियुक्ति के लिए हाई पावर कमेटी 24 मई को मीटिंग करेगी.

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CBI डायरेक्टर ऋषि कुमार शुक्ला 2 फरवरी को रिटायर हो गए थे.

इस स्टोरी में हम बात करेंगे कि CBI डायरेक्टर कैसे चुना जाता है? इस बार इस पोस्ट के लिए लाइन में कौन-कौन हैं? और CBI को लेकर हुए विवाद क्या-क्या रहे हैं.

कैसे होती है CBI डायरेक्टर की नियुक्ति?

निदेशक CBI का प्रमुख होता है, जो कि DGP यानी डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस रैंक का अधिकारी होता है. लोकपाल अधिनियम कानून बनने से पहले दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट (DSPE) ऐक्ट, 1946 के तहत CBI डायरेक्टर की नियुक्ति होती थी. इसके तहत केंद्र सरकार CBI निदेशक की नियुक्ति के लिए कमेटी का गठन करती थी. इस कमेटी में एक अध्यक्ष और चार सदस्य होते थे. कमेटी के अध्यक्ष केंद्रीय विजिलेंस कमिश्रनर (CVC) होते थे. सदस्यों में विजिलेंस कमिश्रनर, गृह मंत्रालय के सचिव, कैबिनेट सचिवालय में समन्वय और लोक शिकायत के सचिव होते थे. ये कमेटी नामों पर विचार करती थी. भ्रष्टाचार विरोधी मामलों की जांच में अनुभव, वरिष्ठता और ईमानदारी पूर्वक सेवा के आधार पर कैंडिडेट्स की स्क्रूटनी की जाती.  इसके बाद कमेटी केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट भेजती थी. इसके बाद केंद्र सरकार इन नामों में से किसी एक को CBI डायरेक्टर के पद पर नियुक्त करती थी.

CBI के पूर्व निदेशक एपी सिंह ने राज्यसभा टीवी से बातचीत में बताया था,

पहले CBI डायरेक्टर की नियुक्ति की प्रक्रिया यह थी कि CVC, दो VC, सेक्रेटरी पर्सनल और होम सेक्रेटरी कुल पांच लोग बैठकर संभावित नामों पर चर्चा करते थे. इसमें से तीन नामों की सिफारिश सरकार से करते थे. जिन तीन नामों की सिफारिश की जाती थी, सरकार उसमें से किसी एक को नियुक्त कर सकती थी.

2014 के बाद क्या बदला?

ये 2014 से पहले की प्रक्रिया थी. लोकपाल एक्ट आने के बाद यह पूरी प्रक्रिया बदल गई. लोकपाल कानून में निर्धारित नियमों के तहत केंद्र सरकार CBI प्रमुख की नियुक्ति करती है. इस कानून के मुताबिक, CBI डायरेक्टर की नियुक्ति एक उच्च स्तरीय कमेटी करती है. इस कमेटी के सदस्य प्रधानमंत्री, चीफ़ जस्टिस ऑफ इंडिया और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष होते हैं.

अगर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया कमेटी में हिस्सा नहीं ले पा रहे हैं तो वो सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को अपनी जगह भेज सकते हैं. अगर लोकसभा में विपक्ष का नेता नहीं है तो सदन में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता मीटिंग में भाग ले सकते हैं.

CBI का दायरा बढ़ा तो इसने संगीन अपराध से जुड़े मामलों की भी जांच करनी शुरू की. सांकेतिक फोटो: India Today
सीबीआई का डायरेक्टर ही तय करता है कि किस केस की जांच कौन सा अधिकारी करेगा. (सांकेतिक तस्वीर)

CBI डायरेक्टर को चुने जाने की प्रक्रिया गृह मंत्रालय से शुरू होती है. गृह मंत्रालय इस मामले में आईपीएस अधिकारियों की एक लिस्ट बनाता है. ये लिस्ट किसी जांच में अनुभव और वरिष्ठता के आधार पर तैयार की जाती है. ऐसे अधिकारियों की लिस्ट तैयार होने के बाद उसे कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग को भेज दिया जाता है. इसके बाद अनुभव, वरिष्ठता और भ्रष्टाचार के मामलों की जांच में अनुभव के आधार पर एक फाइनल लिस्ट बनाई जाती है. सर्च कमेटी इन नामों पर चर्चा करती है और अपनी सिफ़ारिशों को भेजती है. इसके बाद कमेटी नाम पर मुहर लगाती है.

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CBI का मेन ऑफिस दिल्ली में है.

दो साल का होता है कार्यकाल

लोकपाल कानून के मुताबिक CBI निदेशक का कार्यकाल दो साल के लिए तय किया गया है. प्रधानमंत्री, चीफ़ जस्टिस ऑफ इंडिया और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की कमेटी की सिफारिशों के बिना सरकार CBI निदेशक का कार्यकाल कम नहीं कर सकती है. CBI निदेशक को हटाने का फैसला भी तीन सदस्यों की टीम ही कर सकती है. CBI निदेशक को हटाने के लिए ‘कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग’ को हाई लेवल कमेटी के पास मामला ले जाना पड़ता है.

किस-किस का नाम चल रहा है?

इंडिया टुडे ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि CBI डायरेक्टर की पोस्ट के लिए 1984, 1985 और 1986 बैच के IPS अधिकारियों के नामों पर विचार चल रहा है. राकेश अस्थाना, वाईसी मोदी और सुबोध जायसवाल अगले CBI निदेशक के पद की दावेदारी में सबसे आगे बताए जा रहे हैं.

# 1984 बैच के वाईसी मोदी, जो इस समय नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) प्रमुख के पद पर तैनात हैं. उनका नाम लिस्ट में है.
# 1984 बैच के ही राकेश अस्थाना भी इस लिस्ट में शामिल हैं, जो इस समय बीएसएफ महानिदेशक के पद पर तैनात हैं.
# 1985 बैच के महाराष्ट्र काडर के वरिष्ठ आईपीएस सुबोध जायसवाल DG CISF की पोस्ट पर तैनात हैं. उनका भी नाम चल रहा है.
# 1986 बैच के उत्तराखंड काडर के एमए गणपति का नाम भी लिस्ट में शामिल है जो केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर तैनात हैं.
#1985 बैच के उत्तर प्रदेश पुलिस के प्रमुख यानी DGP एचसी अवस्थी का नाम भी है.

CBI में सबसे बड़ा विवाद

बात अक्टूबर 2018 की बात है. 15 अक्टूबर को CBI ने रिश्वतखोरी का एक मामला दर्ज किया. तत्कालीन स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ साज़िश करने और रिश्वत लेने के आरोप लगाये. जांच रुकवाने के लिए अस्थाना पर तीन करोड़ रिश्वत लेने के आरोप लगे. 22 अक्टूबर को CBI ने उप-पुलिस अधीक्षक देवेंद्र कुमार को जांच से जुड़े सरकारी दस्तावेज़ों में हेरफेर के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया. एजेंसी ने कहा कि ये हेरफेर CBI के स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के रिश्वत लेने के आरोप से जुड़ा है.

CBI के पूर्व स्पेशल डायरेक्ट राकेश अस्थाना CBI के तत्कालीन डायरेक्टर आलोक वर्मा से झगड़े को लेकर चर्चा में आए थे. फोटो: India Today
CBI के पूर्व स्पेशल डायरेक्ट राकेश अस्थाना CBI के तत्कालीन डायरेक्टर आलोक वर्मा से झगड़े को लेकर चर्चा में आए थे. फोटो: India Today

इस बीच राकेश अस्थाना ने डायरेक्टर आलोक वर्मा के ख़िलाफ़ हरियाणा में एक ज़मीन के सौदे में गड़बड़ी करने और भ्रष्टाचार के दूसरे कथित मामलों की शिक़ायत की. मुख्य सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) और कैबिनेट सेक्रेटरी को चिट्ठी लिखकर. राकेश अस्थाना ने ये आरोप लगाया है कि आलोक वर्मा ने भी सतीश बाबू से दो करोड़ रुपये की रिश्वत ली थी.

23 अक्टूबर को रात 9 बजे CBI के डायरेक्टर आलोक वर्मा ने एक आदेश जारी कर स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना से सारी ज़िम्मेदारियां वापस ले लीं. उसी रात भारत सरकार ने राकेश अस्थाना के साथ CBI के डायरेक्टर आलोक वर्मा को भी छुट्टी पर भेज दिया गया. आलोक वर्मा सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए. केस चला. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने CBI निदेशक के तौर पर आलोक वर्मा की नियुक्ति को बहाल कर दिया था. लेकिन सरकार ने उन्हें पद से हटा दिया था. इसके बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया था.

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CBI के तत्कालीन डायरेक्टर आलोक वर्मा.

वहीं राकेश अस्थाना के मामले में CBI कथित भ्रष्टाचार में लिप्त होने का कोई सबूत नहीं ढूंढ पाई और आखिरकार उन्हें क्लीन चिट दे दी गई. भ्रष्टाचार के एक एक अन्य मामले में अस्थाना को 2019 में क्लीन चिट मिल चुकी है जिसके बाद उन्हें बीएसएफ का डीजी बनाया गया था. एक बार फिर इस बात की चर्चा है कि वो CBI के निदेशक बन सकते हैं.

चलते चलते

# CBI के पहले डायरेक्टर डीपी कोहली थे.

# CBI राइट टू इन्फॉर्मेशन ऐक्ट, RTI के दायरे से बाहर है.

# CBI ने कुछ हाईप्रोफाइल केस की जांच की है या कर रही है. इनमें आरुषि हत्याकांड, शारदा चिटफंड घोटाला, मध्य प्रदेश व्यापमं घोटाला, अगस्ता वेस्टलैंड, इशरत जहां एनकाउंटर केस, बाबरी विध्वंस केस, सत्यम घोटाला, INX मीडिया मामला.

# सुप्रीम कोर्ट की CBI को लेकर टिप्पणी बहुत चर्चित रही थी, जिसमें उसे ‘पिंजड़े में कैद तोता’ बताया गया था. आरोप लगते रहे हैं कि कोई भी सत्ताधारी पार्टी कई बात राजनीतिक हितों के लिए विपक्षियों के ख़िलाफ़ CBI का इस्तेमाल करती है.


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