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थोड़े दिन में अक्षय कुमार कहेंगे, 'ये वाला जांघिया पहनोगे, तभी देशभक्त कहलाओगे तुम'

महंगाई बहुत बढ़ गई है. चीजों के दाम आज यहां, तो कल वहां. कई लोगों के लिए रोटी के लिए प्याज का टुकड़ा जुटाना भी मुश्किल है. खुदरा में एक किलो प्याज की कीमत 50-60 रुपये है. मगर एक चीज है, जो दिनोदिन सस्ती होती जा रही है. देशभक्ति. अभी 105 रुपये लीटर बिक रही है बाजार में. कई ऑनलाइन शॉपिंग साइट्स पर तो 83 रुपये लीटर भी मिल रही है. फॉर्चून तेल है. अडानी कंपनी का. मात्र तेल नहीं है ये. इसका जो तरल है, उसकी बूंद-बूंद में देशभक्ति है. आप चाहें, तो ‘फॉर्चून तेल = देशभक्ति’ भी कह सकते हैं. फॉर्चून तेल कहिए कि देशभक्ति, बात तो बराबर है. वैसे ही, जैसे अक्षय कुमार कहिए या देशभक्त कुमार, बात तो बराबर है.

अक्षय कुमार के नए ऐड का एक सीन. हमारा मानना है कि अक्षय और आमिर या किसी और कलाकार की इस तरह तुलना नहीं होनी चाहिए. मगर सोशल मीडिया पर अक्षय कुमार का नाम लेकर बाकी कई कलाकारों को निशाना बनाया जाता है. उनकी तुलना की जाती है.
अक्षय कुमार के नए ऐड का एक सीन. सोशल मीडिया पर अक्षय कुमार की फिल्मों का उदाहरण देकर कई दूसरे कलाकारों को निशाना बनाया जाता है.

कभी टाइल्स में देशभक्ति, कभी टॉइलेट क्लीनर में देशभक्ति
अद्भुत चीज है ये बाजारवाद. एक समय था. आजादी से पहले का. तब हम आजादी के लिए लड़ रहे थे. तब लोगों में देश से मुहब्बत पैदा करने के तरीके खोजे जाते थे. कोई ऐसी चीज खोजी जाती थी, जो देश को एक धागे में बांध सके. अब बाजार को देखिए. चुटकी में क्विंटल-क्विंटल देशभक्ति पैदा कर देती है. कारखाने के अंदर. देशभक्ति का कोई इकलौता चेहरा भी नहीं. इसके कई चेहरे हैं. वो ‘पानी रे पानी तेरा रंग कैसा, जिसमें मिला दो लागे उस जैसा’ टाइप. कभी ये सब्जी में डाला जाने वाला तेल बन जाता है. कभी घर की फर्श पर लगाया जाने वाला टाइल्स. इसके बहाने बाजार में अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का खेल शुरू हो गया है. देशद्रोही सामानों की भरमार है. इनके बीच कुछ गिनती की चीजें हैं, जो सर्टिफाइड देशभक्त हैं. इस ‘देशभक्ति युग’ को सबसे अच्छे से निचोड़ रहे हैं अक्षय कुमार. अब वो देशभक्ति के नीचे बात ही नहीं करते. जो फिल्म करो, उसमें देशभक्ति. जो विज्ञापन करो, उसमें देशभक्ति. मुझे लगता है कि जैसे पौधों के अंदर प्रकाश संश्लेषण की क्रिया होती है. पोषण के लिए. वैसा ही कुछ अक्षय कुमार के अंदर भी हो रहा है. उनका सिस्टम देशभक्ति के अलावा किसी और चीज पर रिस्पॉन्ड नहीं कर रहा.

बिजनस ने देशभक्ति को बीच बाजार खड़ा कर दिया है. उसके नाम पर लोगों की भावनाओं को सहलाया जाता है. उन्हें चिकोटी काटी जाती है. इतनी मशक्कत बस प्रॉडक्ट बेचने के लिए हो रही है.
बिजनस ने देशभक्ति को बीच बाजार खड़ा कर दिया है. उसके नाम पर लोगों की भावनाओं को सहलाया जाता है. उन्हें चिकोटी काटी जाती है. इतनी मशक्कत बस प्रॉडक्ट बेचने के लिए हो रही है.

अब तेल में देशभक्ति लेकर आए हैं अक्षय कुमार
अभी एक-दो दिन पहले अक्षय का एक नया विज्ञापन देखा. फॉर्चून तेल का. इसमें अक्षय सैनिकों से घिरे हैं. बात हो रही है. हंसी-मजाक हो रहा है. बातों-बातों में अक्षय पूछते हैं कि उन लोगों को घर की कौन सी बात सबसे ज्यादा याद आती है? सैनिक कहते हैं, घर का खाना. फिर अक्षय अपने ‘राजीव भाटिया’ अवतार में ऐप्रन पहनकर रसोई में पहुंचते हैं. खाना बनाते हैं. पीछे से गाना चलता है. आलू-मेथी, दाल, बैंगन. पूड़ियां. और भी कुछ-कुछ. फिर सैनिक खाते हैं. उंगलियां चाट-चाटकर. कहते हैं, बड़े साल बाद इतने स्वाद का खाना खाया. एक सैनिक कहता है: घर सा स्वाद है आपके खाने में सर. अक्षय जवाब देते हैं:

घर का स्वाद तो होना ही था. आपके घर से जो हूं. जैसे 130 करोड़ और हैं.

ये अक्षय का नया देशभक्ति प्रॉडक्ट है. इसके बारे में एक ट्वीट भी किया उन्होंने. ट्वीट में फॉर्चून तेल के सहारे भारतीय सैनिकों को सलाम करने की बात लिखी. इससे पहले उनका वो ‘कजारिया टाइल्स’ वाला ऐड आया था. अब भी आता है. इसमें अक्षय कहते हैं:

जी-जान लगा देते हैं कुछ लोग, अपनी मिट्टी की हिफाजत के लिए. इसके सम्मान के लिए. एक पहचान के लिए. संस्कारों और विरासत के लिए. एक धुन सवार रहती है इन लोगों पर, देश को बुलंदियों पर पहुंचाने के लिए. दरअसल ये लोग फर्ज निभाते हैं. अपनी मिट्टी के लिए. ऐसा ही एक फर्ज हम भी निभाते हैं. देश की मिट्टी से बनी टाइल्स से देश को बनाते हैं.

बाकी टाइल्स कंपनियां क्या विदेश की मिट्टी से बनाती हैं टाइल्स!
आप सोचिए. ये ऐड कितना बकवास है. कजारिया टाइल्स अगर देश की मिट्टी से बनता है, तो क्या बाकी टाइल्स कंपनियां विदेश से मंगवाई गई मिट्टी से टाइल्स बनाती हैं? एक और बात. टाइल्स खरीदते समय मैं किस बात का ध्यान रखूं? मजबूती, कीमत, डिजाइन ये सब जरूरी चीजें छोड़कर बस कजारिया ऐड की फालतू बकैती याद रखूं. टाइल्स बेचने के लिए देशभक्ति की आड़ लेना कजारिया कंपनी और अक्षय कुमार की मजबूरी हो सकती है. मगर टाइल्स खरीदने वाले के लिए ये किस काम की?

अक्षय कुमार एकाएक से 'लार्जर देन लाइफ' बनाए जाने लगे हैं. इसमें सबसे बड़ा हाथ देशभक्ति के उस ओवरडोज का है, जो वो लगातार अपने काम के माध्यम से हमारे सामने परोस रहे हैं.
अक्षय कुमार एकाएक से ‘लार्जर देन लाइफ’ बनाए जाने लगे हैं. इसमें सबसे बड़ा हाथ देशभक्ति के उस ओवरडोज का है, जो वो लगातार अपने काम के माध्यम से हमारे सामने परोस रहे हैं.

एक ट्रेंड को जी भरकर चूसने में पुराने उस्ताद रहे हैं अक्षय कुमार
मुझे नहीं पता कि बाजार में आए इस देशभक्ति ज्वार को अक्षय के पास ही क्यों ठौर मिलती है? क्या ये बस एक संयोग है कि पिछले कुछ समय से अक्षय कुमार बस एक लकीर पकड़कर आगे बढ़ रहे हैं. देशभक्ति. वैसे एक जैसी लीक पर चलते रहने की उनकी पुरानी आदत है. एक वक्त में वो ‘खिलाड़ी’ कुमार हुआ करते थे. एक्शन फिल्में करते रहते थे. खिलाड़ी नाम वाली कितनी फिल्में आईं उनकी. वजह? खिलाड़ी का चल जाना. एक बार मालूम चल गया कि ये फॉर्म्युला बिक रहा है. फिर उसी को भुनाने में लग गए. फिर कॉमेडी का दौर आया. इस दौर में अक्षय की कमोबेश सारी फिल्में कॉमेडी हुआ करती थीं. अक्षय फिर उसी राह पर हैं. उन्हें पता है कि देशभक्ति का चलन है. वो अपने मुनाफे के लिए देशभक्ति का ये चलन कैश कर रहे हैं. जितना निचोड़ सकते हैं, निचोड़ रहे हैं. ‘खिलाड़ी’ कुमार से ‘देशभक्ति’ कुमार में तब्दील हो गए हैं.

आजकल सेना और देशभक्ति पर जाकर सारे तर्क खत्म हो जाते हैं. ये शब्द पूज्यनीय से बन गए हैं. इन्हें लेकर किसी भी किस्म के तर्क की भी गुंजाइश नहीं बची है जैसे.
आजकल सेना और देशभक्ति पर जाकर सारे तर्क खत्म हो जाते हैं. ये शब्द पूज्यनीय से बन गए हैं. इन्हें लेकर किसी भी किस्म के तर्क की भी गुंजाइश नहीं बची है जैसे.

अक्षय कुमार तो भारत के नागरिक भी नहीं हैं
अक्षय का ये देशभक्ति ओवरडोज चुभने लगा है. इसकी वजह है कि हमें बाजार का खेल पता है. बाजार किसी आदर्श पर नहीं चलता. बाजार का बस एक यार है. मुनाफा. मकसद है, अपनी दुकानदारी चलाना. दुकान तब चलेगी, जब माल बिकेगा. तो जिस उपाय से माल बिके और मुनाफा आए, वो ही सही है. वरना ऐसे कैसे हो सकता है कि जो इंसान हर हमेशा देशभक्ति की रट लगाकर हमारे अंदर देशभक्ति पैदा करने की कोशिश कर रहा है, वो दरअसल हमारे यहां का है ही नहीं. बाहरी है. अक्षय कुमार भारतीय तो हैं नहीं. कनाडा के नागरिक हैं. उन्होंने कनाडा को भारत के ऊपर तवज्जो दी. वहां की नागरिकता ले ली. उनका एक वीडियो भी है. जिसमें वो बुढ़ापे के लिए संजोए गए अपने अरमान बताते हैं. कहते हैं, फिल्मों से रिटायर होने के बाद कनाडा जाकर बसना चाहेंगे.

फिल्म और ऐड करके अक्षय कुमार को देशभक्ति का सर्टिफिकेट मिल गया!
एक बार आमिर खान की पत्नी किरण राव ने कह दिया था. कि उन्हें भारत में डर लगता है. आमिर खान भयंकर ट्रोल हो गए थे. वो जिस प्रॉडक्ट का प्रचार करते थे, लोग उसका बहिष्कार करने लगे. वो ही लोग कभी अक्षय से नहीं पूछते. कि तुम क्यों भारत छोड़कर कहीं और बसना चाहते हो? कि जिस देश का नाम ले-लेकर तुम इतना कमा रहे हो, उसी देश को ठुकराकर किसी और देश की नागरिकता कैसे ले ली तुमने? अक्षय कुमार के दोहरेपन पर उनसे सवाल क्यों नहीं किया जाता. ये तो अजीब स्थिति है. फिल्म और ऐड करके वो पैसा और देशभक्त छवि, दोनों कमा रहे हैं. वो भी बिना लागत के. हींग लगे न फिटकिरी, रंग चोखो आए. लोग पर्दे के अक्षय कुमार और असली कुमार का अंतर नहीं समझ रहे. दोनों मिलकर एक हो गए हैं. उनका अभिनय और उनके किरदार ही उनकी असलियत समझ ली गई है.

फलां प्रॉडक्ट देशभक्त है, तो बाकी के प्रॉडक्ट देशद्रोही हैं?
देशभक्ति को बाजार में उतारने से कोई दिक्कत नहीं मुझे. न किसी को होनी चाहिए. भावना जगाकर मुनाफा करना पुराना वसूल रहा है. दिक्कत इस बात से है कि इस एक इंसान के साथ देशभक्ति का नत्थी हो जाना. ऐसे ही, जैसे देशभक्ति के नाम पर बेचे जाने वाले सामानों को देशभक्ति का सर्टिफिकेट दे दिया जाता है. अगर फॉर्चून तेल खुद को सैनिकों के साथ जोड़कर देशभक्त बनता है, तो क्या इसका ये मतलब निकाला जाए कि बाकी तेल देशभक्त नहीं हैं? अगर देशभक्त नहीं हैं, तो क्या हैं? देशद्रोही? देशभक्ति और देश का भला करने के नाम पर बेचे जाने वाले सभी सामानों के मामले में ये सवाल किया जाना चाहिए. अगर फलां ब्रैंड का च्यवनप्राश खरीदना ‘देशभक्ति’ है, तो क्या बाकी कंपनियों के च्यवनप्राश देशद्रोही हैं? क्या फलां कंपनी के साबुन से नहाकर मैं देशभक्त बन जाऊंगी? क्या फलां कंपनी के टॉइलेट क्लीनर से अपना कमोड साफ करके मैं देशभक्त बन जाऊंगी? इससे पहले जब मैं कोई और ब्रैंड इस्तेमाल कर रही थी, तब क्या मैं देशद्रोही थी? क्या वो सारे लोग जो कोई और ब्रैंड इस्तेमाल करते हैं, देशद्रोही हैं? बता दूं कि बाकी कंपनियों में भी लोग नौकरी पाते हैं. वो कंपनियां भी टैक्स जमा करती हैं. देश को उनकी भी जरूरत है.

तो फिर जब ये देशभक्त प्रॉडक्ट नहीं आए थे, तब क्या हालत थी
मान लीजिए कि मेरे पिता, जो कि एक भारतीय हैं, डाबर में काम करते हैं. मेरे परिवार की सारी जरूरतें इसी कमाई से पूरी होती हैं. फिर एक दिन पतंजलि ने आकर बताया कि उसके अलावा सारी कंपनियां चोर हैं. माने, डाबर भी चोर है. अकेली पतंजलि ही देशभक्त कंपनी है. देश का भला चाहती है. तो क्या इतने सालों तक डाबर के यहां काम करने वाले मेरे पिता और उनकी कमाई पर पलने वाला मेरा परिवार देशद्रोह की कमाई खा रहा था? एक बात और ध्यान में रखी जानी चाहिए. वो ये कि जिस वक्त अक्षय कुमार अपने फायदे के लिए देशभक्ति के नाम का सहारा ले रहे हैं, उस वक्त देश में देशभक्त और देशद्रोही के नाम पर जमकर फर्जीवाड़ा हो रहा है. देशभक्ति के मानक बनाए जा रहे हैं. देशभक्ति का सर्टिफिकेट बांटा जा रहा है. ये किया तो देशभक्त हो, ये नहीं किया तो देशद्रोही है. इतने संवेदनशील मुद्दे का इतना सरलीकरण कर लिया गया था.

जब तेल और साबुन में देशभक्ति घुसाई जा सकती है, तो जांघिया और बनियान में क्यों नहीं?
जब तेल और साबुन में देशभक्ति घुसाई जा सकती है, तो जांघिया और बनियान में क्यों नहीं?

जब तेल और टाइल्स में देशभक्ति घुस सकती है, तो जांघिया के ऐड में क्यों नहीं
अक्षय कुमार का ये ‘विराट छवि निर्माण’ अखरता है. वो कलाकार हैं. बिजनसमैन हैं. कला के धंधे में है. उनके पास एक लंबी-चौड़ी पीआर टीम है. वो अक्षय को चर्चित होने और ज्यादा से ज्यादा खबरों में बने रहने के गुर बताती है. और इसके बदले पैसा पाती है. अक्षय की फिल्मों और विज्ञापनों को भी इसी रंग में देखा जाना चाहिए. वो सैनिक नहीं हैं. सैनिक का किरदार निभाते हैं. वो सच में हाफिज सईद को नहीं पकड़कर लाए थे. फिल्म की कहानी थी बस वो. फिल्मों और विज्ञापनों में दिखाए गए उनके देशभक्त किरदार को भी बस बाजार और धंधे की नजर से देखा जाना चाहिए. फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए अक्षय ने बहुत दम लगाया है. हर दौर में अलग चीजें आजमाई हैं. जब जो चला, तब वो किया. ये उनका देशभक्ति पीरियड है. ये और चाहे जो भी हो, देशभक्ति तो कतई नहीं है. हां, अक्षय कुमार के जिक्र से एक बात और याद आई. उनका ‘डॉलर’ अंडरवेयर का ऐड. सोच रही हूं, उसमें देशभक्ति कैसे डालेंगे? कैसे कहेंगे कि बस डॉलर जांघिया और बनियान पहनने वाला ही देशभक्त कहलाएगा? इसमें क्या गलत है? जब तेल और टाइल्स में देशभक्ति बिक सकती है, तो जांघिया के ऐड में क्यों नहीं घुस सकती? बाजार तो बाजार है.


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