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इंजेक्शन में दवा के साथ अगर हवा भरी हो तो मरीज़ मर जाता है, मगर कैसे?

डॉक्टर और नर्सों को भगवान का रूप कहा जाता है. और वो हैं भी. लेकिन कई बार इन्हीं स्टेथो वाले भगवानों पर मरीजों के इलाज में लापरवाही से लेकर अंगों की तस्करी तक के गंभीर आरोप लगते रहे हैं.

अबकी ऐसी ही एक ख़बर अमेरिका के टेक्सस प्रांत से आई है. टेक्सस में एक शहर है टाइलर. न्यूयॉर्क टाइम्स की एक ख़बर के मुताबिक़, 20 अक्टूबर को यहां की एक कोर्ट ने एक शख्स को चार मरीजों की हत्या का दोषी करार दिया. विलियम डेविस नाम का ये आदमी टाइलर शहर में स्थित क्रिस्टस मदर फ्रांसेस हॉस्पिटल (Christus Mother Frances Hospital) में बतौर नर्स काम करता था. 2017-18 में हार्ट सर्जरी के बाद कॉम्प्लिकेशन झेल रहे 7 मरीजों को इस अस्पताल में भर्ती कराया गया. डेविस ने चुपके से इन मरीजों की नसों में इंजेक्शन के जरिये हवा इंजेक्ट कर दी. जिसके चलते उनमें से 4 मरीजों की मौत हो गई. 2018 के इस मामले में विलियम डेविस को दोषी मानते हुए अदालत ने सज़ा मुक़र्रर करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है.

तो अब सवाल ये उठता है कि इंजेक्शन से हवा इंजेक्ट करना कैसे किसी की मौत का कारण बनता है? इसका उत्तर हमने जानने की कोशिश की. चलिए आपके साथ शेयर करते हैं.

# धमनियों में हवा पहुंचने से कैसे हो जाती है मौत?

छोटी-मोटी बीमारियों में खाने वाली टैबलेट्स और लिक्विड सिरप से काम चल जाता है. दवाई पाचन तंत्र के जरिये अवशोषित हो जाती है और मरीज़ को आराम मिल जाता है. लेकिन कई बार गंभीर बीमारियों में मरीज़ या तो दवाई खाने की स्थिति में नहीं होता या दवाई का असर तत्काल चाहिए होता है. तब ज़रूरत होती है इंजेक्शन के थ्रू दवाई देने की. आम बोलचाल में इंजेक्शन को टीका भी कहते हैं. आपको मालूम ही होगा छोटे बच्चों को जन्म के तुरंत बाद से लेकर आगे के महीनों में तमाम तरह के टीके लगाए जाते हैं. बीसीजी, चिकनपॉक्स, टिटनेस, एंटी रेबीज़ वगैरह.

लेकिन इंजेक्शन लगाना, देखने में जितना आसान लगता है, उतना है नहीं. ज़रा सी चूक मरीज़ के लिए जान का जोखिम साबित हो सकती है. कैसे? ये समझने के लिए पहले ये जानना होगा कि इंजेक्शन लगाने के तरीके कितने हैं. और किस टाइप का इंजेक्शन कहां लगता है.

पहला टाइप है सबक्यूटेनियस इंजेक्शन (Subcutaneous Injection).  ये इंजेक्शन मसल्स और स्किन के बीच के टिशूज़ में दिए जाते हैं. कह सकते हैं कि मांसपेशी और त्वचा के बीच के मांस में. इसीलिये इनकी नीडल यानी सुई बहुत छोटी होती है, माने दवाई ज्यादा अन्दर इंजेक्ट नहीं की जाती. किसी को इन्सुलिन का इंजेक्शन लेते हुए आपने अगर देखा हो,  तो पेट में नाभि के पास की स्किन को उंगलियों से हल्का खींच कर इन्सुलिन इंजेक्ट की जाती है. हालांकि जांघ के बाहरी हिस्से और कंधे से नीचे बाजू के बाहरी हिस्से में भी ये इंजेक्शन दिए जा सकते हैं.

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पेट में सबक्यूटेनियस इंजेक्शन दिया जाता है (फोटो इंडिया टुडे)

दूसरा टाइप है इंट्रामस्क्युलर इंजेक्शन यानी IM. कूल्हे और बाजू के मांसल हिस्से में ये इंजेक्शन दिए जाते हैं. सुई थोड़ी बड़ी रहती है ताकि मांसपेशी में गहराई तक जा सके. हालांकि ये टीके भी सीधे किसी नस में नहीं दिए जाते लेकिन इनके लिए कूल्हे और बाजू की मसल्स का चुनाव इसीलिये किया जाता है, क्यूंकि इन दोनों जगहों पर ब्लड वेसेल्स यानी रक्त नलिकाओं की संख्या ज्यादा होती है. दवाई इंजेक्ट होने के बाद इन्हीं वेसेल्स के जरिये पूरे शरीर में प्रवाहित होती है. कोरोना का टीका भी इसी तरह दिया जाता है.

कोविड का टीका इंट्रामस्क्युलर यानी IM ही लगाते हैं. (सोर्स - इंडिया टुडे फ़ाइल फोटो)
कोविड का टीका इंट्रामस्क्युलर यानी IM ही लगाते हैं. (सोर्स – इंडिया टुडे फ़ाइल फोटो)

तीसरा है इंट्राडर्मल इंजेक्शन. ये इंजेक्शन स्किन की दूसरी लेयर यानी ‘डर्मिस’ में दिए जाते हैं. आपको कौन सी एलर्जी है, ये पता लगाने के लिए पैथोलॉजी वाले इसी तरीके से इंजेक्शन देते हैं. इसके अलावा भी कई बीमारियों के टीके इसी तरीके से दिए जाते हैं.

चौथा है डिपॉट इंजेक्शन. सुई लगाने के इस तरीके में त्वचा की ऊपरी परत में इस तरह से दवाई डाली जाती है कि दवाई की एक गांठ सी बन जाती है, इस दवाई को आस-पास के टिशूज़ धीरे-धीरे एब्सॉर्ब कर लेते हैं.

दवाई इंजेक्ट करने के लिए आख़िरी और सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला तरीका है इंट्रावीनस इंजेक्शन यानी IV. इस तरह के इंजेक्शन सीधे नस में दिए जाते हैं. ताकि दवाई इंजेक्ट होने के बाद ब्लड फ्लो के साथ शरीर में जल्दी प्रवाहित हो सके और मरीज़ को तत्काल आराम हो जाए. किसी को ब्लड , प्लाज्मा या प्लेटलेट्स चढ़ानी हों या ग्लूकोज़ या सलाइन वाटर के जरिये दवाई सीधे नसों में पहुंचानी हों, इसके लिए जो विगो इंजेक्ट की जाती हैं वो भी इंट्रावीनस यानी IV ही लगाई जाती हैं. माने सीधा नस में.

ब्लड डोनेट करने के लिए भी विगो इंट्रावेनस इंजेक्ट की जाती है.
ब्लड डोनेट करने के लिए भी विगो इंट्रावेनस इंजेक्ट की जाती है.

ये तो थे इंजेक्शन लगाने के तरीके. जिसके लिए नर्सिंग स्टाफ से लेकर डॉक्टर्स तक को ट्रेनिंग की ज़रूरत पड़ती है. लेकिन इन सभी तरीकों में तमाम जोखिम भी शामिल होते हैं. इंजेक्शन सही तरह से न लगे, पोजीशन सही न हो, तो गांठ बन सकती है, घाव हो सकता है, सड़न हो सकती है. सावधानी ये भी रखनी पड़ती है कि कौन सी दवाई किस तरीके से इंजेक्ट करनी है. मसलन कोविड का टीका बाकी वैक्सीन की ही तरह IM यानी इंट्रामस्क्युलर ही लगाया जाता है. कई बार मेडिकल प्रैक्टिशनर नीडल बॉडी में इन्सर्ट करने के बाद सीरिंज का पिस्टन हल्का सा बाहर खींचकर ये देखते हैं कि ब्लड तो नहीं आ रहा. ऐसा इसलिए कि जो इंजेक्शन इंट्रामस्क्युलर इंजेक्ट करना था वो कहीं किसी नस में तो नहीं चला गया.

एयर एम्बॉलिस्म (Air Embolism) यानी ख़तरा-ए-जान-

इंजेक्शन लगाने में तमाम रिस्क हमने आपको बता दिए. लेकिन सबसे बड़ा रिस्क है, इंजेक्शन के साथ एयर बबल के इंजेक्ट हो जाने का. यानी एयर एम्बॉलिस्म का. इस मामले में डॉक्टर्स बहुत सतर्क रहते हैं. वरना ये मरीज़ की मौत का कारण बन सकता है. कभी किसी मरीज़ को इंजेक्शन लगते देखा हो (भले ही वो IV हो या IM), गौर करिएगा. डॉक्टर सबसे पहले दवाई को बायल (वो कांच या प्लास्टिक की शीशी जिसमें दवा रहती है) से सीरिंज में खींचकर भरता है. ऐसे में कई बार दवाई के साथ-साथ कुछ एयर भी सीरिंज में दाखिल हो जाती है.

सीरिंज भरते वक़्त नीडल, शीशी के ज्यादा अन्दर नहीं डाली जाती, ताकि दवाई के साथ बायल की एयर न आ जाए
सीरिंज भरते वक़्त नीडल, शीशी के ज्यादा अन्दर नहीं डाली जाती, ताकि दवाई के साथ बायल की एयर न आ जाए

इसलिए डॉक्टर नीडल को बायल से निकालकर सिरिंज का पिस्टन धीरे-धीरे वापस दबाता है. किसलिए? ताकि हवा का एक कतरा भी सिरिंज में न रह जाए. आपने देखा होगा कई बार ऐसा करने की कोशिश में कुछ दवाई भी नीडल से बाहर निकल जाती है. ये दवाई का थोड़ा-बहुत नुकसान फिर भी ठीक है लेकिन मरीज़ के शरीर में हवा जाना, माने उसकी जान से समझौता.  ऐसे में डॉक्टर नीडल को मरीज़ के बदन में चुभोने (Pierce) से पहले बार-बार ये पुख्ता करता है कि सिरिंज से लेकर नीडल तक कहीं कोई एयर बबल तो नहीं है. इसके अलावा कई बार सुई लगाने वाला उसकी नीडल को भी कैरम की गोट की तरह दो तीन बार स्ट्राइक करता है, जिससे छोटे-छोटे एयर बबल भी निकल जाएँ.

हवा निकालने के लिए पिस्टन दबाया जाता है. (फोटो सोर्स - इंडिया टुडे)
हवा निकालने के लिए पिस्टन दबाया जाता है. (फोटो सोर्स – इंडिया टुडे)

हवा शरीर में जाकर क्या करती है?

‘एयर एम्बॉलिस्म’ यानी शरीर की नसों में हवा पहुंच जाने की कई वजहें हो सकती हैं. अमेरिका की मेडिकल इंस्टिट्यूट्स की नेशनल लाइब्रेरी के एक जर्नल के मुताबिक़ लगभग अस्सी फ़ीसद ब्रेन सर्जरीज में एयर एम्बॉलिस्म इन्वॉल्व होती है, हालांकि डॉक्टर सर्जरी के दौरान ही इसे डायग्नोज़ कर लेते हैं और ज़रूरी ट्रीटमेंट दे दिया जाता है. कई बार एक्सीडेंट या लंग्स की किसी सर्जरी के दौरान भी हवा, नसों यानी वेन्स या आर्टरी तक पहुंच जाती है, इसके अलावा नसों में डाले गए कैथेटर के रास्ते या ओरल सेक्स के दौरान वेजाइना से होकर भी हवा नसों में चली जाती है. गर्भवती महिलाओं को इसका खतरा ज्यादा रहता है.

ज्यादातर केसेज में डॉक्टर्स को पता रहता है कि इस एयर एम्बॉलिस्म की वजह क्या है, ऐसे में मरीज़ की हालत बिगड़े, इससे पहले उपचार कर दिया जाता है और मरीज़ की जान बच जाती है.

शुरू में जो ख़बर हमने आपको बताई है. उसमें तो हत्या के ही इरादे से इंजेक्शन के थ्रू हवा इंजेक्ट की गयी. ऐसे मामले में मरीज़ को बचा पाना मुश्किल हो जाता है. 37 साल के विलियम डेविस के मामले में सुनवाई करने वाले जज कायली हैन ने कहा कि उसने मरीजों को अपने एन्जॉयमेंट के लिए मार दिया. डेविस चुपके से मरीजों के कमरे में घुसा और मरीजों की नसों में हवा भरके इंजेक्शन लगा दिया. ब्रेन सर्जरी के बाद कंप्लीकेशंस के चलते भर्ती हुए इन मरीजों की हालत सुधर रही थी. लेकिन डेविस की करतूत की वजह से उन्हें एयर एम्बॉलिस्म हो गया. हवा दिमाग तक पहुँच चुकी थी. जब तक डॉक्टर समझ पाते, घंटे भर के अन्दर ही एक मरीज़ को ब्रेन स्ट्रोक हो गया और उसकी मौत हो गयी और बाद में इसी तरह तीन और मरीजों की भी जान चली गयी.

दरअसल एयर एम्बॉलिस्म के चलते नसों में एयर-ब्लॉक बन जाता है, फिर ये ब्लॉक दिमाग, फेफड़े या हार्ट तक पहुंच जाता है. अगर हार्ट तक पहुंचा तो हार्ट अटैक से और अगर दिमाग तक पहुंचा तो ब्रेन स्ट्रोक से मरीज़ की मौत हो जाती है. स्कूबा डाइविंग करने वाले लोगों में भी एयर एम्बॉलिस्म की वजह से ही सांस लेने में दिक्कत होती है. सिर चकराने लगता है.

एयर एबोलिस्म से ब्रेन स्ट्रोक के मामले सबसे ज्यादा हैं
एयर एबोलिस्म से ब्रेन स्ट्रोक के मामले सबसे ज्यादा हैं

हालांकि काफ़ी मामलों में शुरुआती लक्षण दिखते ही अगर मेडिकल ऐड मिल जाए तो मरीज़ की जान बचाना संभव है लेकिन जान-बूझकर किसी को मारने के इरादे से ऐसा किया जाए तो जब तक एयर एम्बॉलिस्म पकड़ में आयेगी, मरीज़ क्रिटिकल हो चुका होगा. मेडिकल प्रैक्टिशनर, चाहे डिग्री वाले हों या झोलाछाप, आमतौर पर जान-बूझकर ऐसा नहीं करते. लेकिन अगर डेविस जैसा कोई सैडिस्ट केयरटेकर है तो ये ह्त्या का आसान तरीका साबित हो सकता है. ऐसे में आपको कभी भी कोई वैक्सीन लेने की ज़रूरत पड़े तो ये पक्का कर लीजिये कि वैक्सीन से भरे हुए इंजेक्शन में वैक्सीन के अलावा झाग या हवा जैसा कुछ तो नहीं है. अगर आपको नर्सिंग स्टाफ़ इस मामले में जल्दबाजी करता हुआ लगे तो फ़ौरन टोकिये. पहाड़ों के दुर्गम रास्तों में तभी तो लिखा होता है, ‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी.’


ये स्टोरी हमारे साथ इंटर्नशिप कर रहे शिवेंद्र ने लिखी है.


पिछला वीडियो देखें-  सेहत: क्या है SIDS जिसमें बिना कारण हो जाती है बच्चों की मौत?

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