Submit your post

Follow Us

अफगानिस्तान चीट शीट पार्ट-3 : बरसों पहले ही पड़ चुकी थी 9/11 हमले की नींव

अफगानिस्तान (Afghanistan) की चीट शीट के दूसरे हिस्से में आपने जाना कि अमेरिका (America) ने मुजाहिदीनों की कैसे जमकर मदद की. उसका परिणाम ये हुआ कि सोवियत रूस को उल्टे पांव लौटना पड़ा. अफगानिस्तान की धरती से एक बार फिर विदेशी ताकत के पांव उखड़ गए थे. लंबे वक्त के बाद अफगानिस्तान में शांति की उम्मीद जगी थी. लेकिन इस शांति के पीछे एक जलज़ला पनप रहा था. जो अमेरिका के अफगानिस्तान में एंट्री की पटकथा तैयार कर रहा था. अफगानिस्तान चीट शीट के तीसरे और आखिरी हिस्से में आइए जानते हैं खूंखार तालिबान और 9/11 की उस घटना के बारे में, जिसके बाद दुनिया में सबकुछ बदल गया.

अगर आपने अफगानिस्तान चीट शीट पार्ट-1 और पार्ट-2 नहीं पढ़ा है, तो यहां पढ़ लीजिए-

अफगानिस्तान चीट शीट पार्ट-1: जब कंधार मौर्य साम्राज्य का हिस्सा था और बौद्ध मठों से पटा पड़ा था.
अफगानिस्तान चीट शीट पार्ट-2: वो साम्राज्य जो आए थे राज करने, लेकिन कब्रगाह बन गए

तालिबान की कहानी

सोवियत के जाने के बाद भी मुजाहिदीनों में संघर्ष चल रहा था. उन्होंने काबुल पर क़ब्ज़े की लड़ाई जारी रखी. 1994 में तालिबान (Taliban) का गठन हुआ. गठन के तकरीबन साथ-ही-साथ हुई एक स्थानीय घटना ने इस ग्रुप को अपनी पहचान बनाने का बड़ा मौका भी दे दिया. हुआ ये कि संगीसर शहर के पास एक महिला की किडनैपिंग हुई. उसके साथ कई बार रेप किया गया. इस अपराध के पीछे हाथ था एक स्थानीय वॉर लॉर्ड का. उमर और उसके ग्रुप ने आरोपी को पकड़ा, उसकी हत्या की और लाश को एक टैंक से लटका दिया. इस क्रूर घटना ने तालिबानी लड़ाकों को अगल-बगल के इलाकों में पहचान दिला दी. इसके बाद इस संगठन ने बड़े स्तर पर भर्ती शुरू की. इनके निशाने पर थे, दीनी तालीम ले रहे छात्र. उमर इन छात्रों से कहता कि इस्लाम ख़तरे में है. लोग शैतानियत के साथ खड़े हो गए हैं. सरे बाज़ार लोगों की इज्ज़त उतारी जा रही है. जब इस्लाम ही ख़तरे में हो, तो केवल पढ़ाई करने से कुछ फ़ायदा नहीं होगा. इस्लाम के मुताबिक समाज बनाने के लिए इस्लाम के ही छात्रों को आगे आना होगा.

ऐसे ही प्रॉपेगैंडा भाषणों के सहारे उमर ने कई छात्रों का ब्रेनवॉश करके उन्हें तालिबान के साथ जोड़ लिया. उमर को लड़ने के लिए लड़ाके मिल गए थे. अब उसे ज़रूरत थी हथियारों की. ये हथियार कहां से आए? कंधार प्रांत की सीमा पर बसा एक शहर है, स्पिन बुलदाक. सितंबर 1994 में मुल्ला उमर के नेतृत्व में करीब 200 तालिबानी लड़ाकों ने स्पिन बुलदाक पर कब्ज़ा कर लिया.

ये जीत तालिबान के लिए जीवनरेखा साबित हुई. कैसे? स्पिन बुलदाक शहर के पास कुछ पहाड़ी गुफ़ाएं हैं. इन गुफ़ाओं के भीतर सोवियत के जमाने का एक बड़ा हथियार डिपो था. तालिबान ने यहां रखे हथियार लूट लिए. इन लूटे हुए हथियारों की मदद से तालिबान ने कंधार पर हमला किया. 1994 का साल ख़त्म होते-होते तालिबान समूचे कंधार पर हुकूमत करने लगा. इसी कंधार में उसने ‘अमीर उल-मोमिनीन’ की पदवी धारण की. अमीर उल-मोमिनीन का मतलब होता है, इस्लाम में आस्था रखने वालों का लीडर.

कंधार में मिली इस बड़ी जीत ने तालिबान के लिए आगे के रास्ते खोल दिए. वो पड़ोसी देश पाकिस्तान की भी नज़र में आया. पाकिस्तानी सेना और ISI अफ़गानिस्तान में अपने हित सुनिश्चित करने का ज़रिया खोज रही थी. उसे तालिबान में पोटेंशियल दिखा. पाकिस्तान को लगा कि अगर वो तालिबान की मदद करके उसे जिता दे, तो अफ़गानिस्तान में एक फ्रेंडली गवर्नमेंट आ जाएगी. तालिबान सत्ता में आकर पाकिस्तानी हितों का ध्यान रखेगा. साथ ही, भारत-विरोधी उसके अजेंडे को भी सपोर्ट करेगा.

इसी मंशा से पाकिस्तानी आर्मी और ISI ने तालिबान को मदद देनी शुरू की. उसे पैसा दिया. हथियार दिए. और इसी मदद के सहारे सितंबर 1996 में तालिबान ने काबुल को भी जीत लिया. तालिबान ने सोवियत संघ के खिलाफ साथ लड़े अहमद शाह मसूद को भी अपने साथ आने का ऑफ़र दिया. अहमद शाह मसूद ने साफ़ मना कर दिया. वो तालिबानी कट्टरपंथ के ख़िलाफ़ थे. जब 1996 में अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का क़ब्ज़ा हुआ तो मसूद को काबुल छोड़ना पड़ा. उन्होंने अगले पांच सालों तक तालिबान का मुक़ाबला किया. जब तालिबान पूरे अफ़ग़ानिस्तान में बेलगाम घूम रहा था. मसूद ने अपना गढ़ बचाए रखा.

Taliban
सोवियत के छोड़े गए हथियारों पर क़ब्ज़ा करके तालिबान ने अपनी ताकत बढ़ाई थी.

9/11 की पूरी कहानी

वैसे तो अमेरिका पर हुए सबसे बड़े आतंकवादी हमले की कहानी 11 सितंबर 2001 से शुरू होती है, लेकिन इसकी जड़ें अफगानिस्तान तक जाती हैं. हम आपको थोड़ा पीछे ले चलते हैं. बात 1980 के दशक की है. अमेरिका अफगानिस्तान में मुजाहिदीन का समर्थन कर रहा था. रूस के खिलाफ उन्हें एके 47 और स्टिंगर मिसाइलों से लैस कर रहा था. तब अमेरिका को ये एक स्मार्ट सामरिक कदम महसूस हुआ. इस पूरी स्ट्रैटिजी में वो एक गणित लगाना भूल गया. अमेरिका जिन मुजाहिदीनों का साथ दे रहा था, उसमें अफगान ही नहीं अरब और दूसरे देशों से आए लड़ाके भी थे, जो सिर्फ एक धर्म युद्ध लड़ने के लिए अफगानिस्तान में मौजूद थे. फ़रवरी 1989 में सोवियत रूस की अफगानिस्तान से अपमानजनक सैन्य वापसी के साथ वह युद्ध ख़त्म हो गया. लेकिन धर्म का युद्ध लड़ने वाले लड़ाके तो कयामत तक लड़ने की कसम खा चुके थे.

अरब का एक ऐसा ही लड़ाका था ओसामा बिन लादेन. उसने अल-कायदा नाम का संगठन बनाया. और दुनिया भर में इस्लाम को आहत करने वालों के खिलाफ युद्ध छेड़ने का ऐलान कर दिया. अमेरिकी खुफिया एजेंसी इस खतरे को भांप ही नहीं पाईं. अमेरिका ने अफगानिस्तान से पल्ला झाड़ लिया और दूसरे मिशन पर निकल पड़ा. अमेरिका का ऐसा ही एक मिशन था इराक से सद्दाम हुसैन को उखाड़ फेंकना. ईरान के साथ बढ़ते तनाव के चलते मिडिल ईस्ट में अपनी पकड़ मजबूत बनाने के लिए उसे ऐसा करना जरूरी लग रहा था.

इराक में सद्दाम हुसैन का निरंकुश शासन जरूर था, लेकिन उसे लेकर ऐसा कोई सबूत नहीं था कि उसे बेदखल किया जा सके. इस बीच सद्दाम ने एक हिमाकत करते हुए 2 अगस्त 1990 में कुवैत पर हमला कर दिया. जॉर्ज बुश सीनियर वाले अमेरिका को मौके की तलाश थी. उसने संयुक्त राष्ट्र संघ में माहौल बनाया कि इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि इराक के पास WMD मतलब वीपन ऑफ मास डिस्ट्रक्शन मौजूद हैं. कहने का मतलब ये कि इराक ने ऐसे हथियार जमा कर रखे हैं जिससे पूरी विश्व बिरादरी को खतरा हो सकता है. इसके लिए अमेरिका ने कई खुफिया रिपोर्ट्स का हवाला दिया. 17 जनवरी 1991 में 35 देशों की मिली-जुली सेना ने इराक पर हमला बोल दिया. एक महीने में सद्दाम के शासन को जमींदोज़ कर दिया गया. हालांकि WMD नहीं मिले. अमेरिका ने सद्दाम हुसैन को गिरफ्तार करवा लिया. बाद में उन पर केस चला और उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया.

30 दिसंबर, 2006. इसी दिन सुबह के वक्त इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन को फाांसी दी गई थी. सद्दाम की लाश उसके गांव में बने एक मकबरे के अंदर दफना दी गई. इराकी फौज और ISIS की लड़ाई में ये मकबरा टूट-फूट गया. लाश भी गायब हो गई. अब इसके पीछे कई तरह की बातें हो रही हैं. कुछ कह रहे हैं कि सद्दाम की बेटी चुपके से एक प्लेन लेकर आई और अपने पिता का कंकाल निकालकर जॉर्डन ले गई.
30 दिसंबर, 2006 को सुबह के वक्त इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन को फाांसी दी गई. सद्दाम की लाश उसके गांव में बने एक मकबरे के अंदर दफना दी गई. इराकी फौज और ISIS की लड़ाई में ये मकबरा टूट-फूट गया. लाश भी गायब हो गई. अब इसके पीछे कई तरह की बातें होती हैं. कुछ कहते हैं कि सद्दाम की बेटी चुपके से एक प्लेन लेकर आई और अपने पिता का कंकाल निकालकर जॉर्डन ले गई.

इस पूरे घटनाक्रम का फायदा अमेरिका के साथ-साथ अल-कायदा को हुआ. अब तक अल-कायदा का अमेरिका को इस्लाम के खिलाफ दिखाने का नैरेटिव फिट नहीं बैठ रहा था. लेकिन इस घटना के बाद अल-कायदा अपने काडर को यह समझाने में कामयाब रहा कि इस्लाम का असल दुश्मन अमेरिका है. इसके साथ ही अमेरिका के खिलाफ जेहाद का प्लान परवान चढ़ने लगा.

फिर आया 11 सितंबर 2001 का दिन. संयुक्त राज्य अमेरिका पर ताबड़तोड़ आत्मघाती हमले का दिन. सुबह सवेरे 19 अल कायदा आतंकवादियों ने 4 यात्री विमानों को हाईजैक किया. उनमें से दो विमानों को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के नाम से मशहूर न्यूयॉर्क शहर के ट्विन टावर्स के साथ टकरा दिया. इससे विमानों पर सवार सभी लोग और बिल्डिंग में मौजूद तमाम लोग मारे गए. दोनों विशालकाय इमारतें 2 घंटे के अंदर ढह गईं. यहां तक कि उनके पास वाली इमारतें भी तबाह हो गईं. हाईजैकर्स ने तीसरे विमान को वाशिंगटन डी.सी. के बाहर आर्लिंगटन, वर्जीनिया में पेंटागन की बिल्डिंग से टकरा दिया था. पेंटागन में अमेरिकी सेना का मुख्यालय है. इन हमलों में लगभग 3,000 लोग मारे गए जिसमें 19 हाईजैकर भी शामिल थे. यह हमला कितना बड़ा था, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस हमले में लगी आग को बुझाने में लगभग 100 दिन का समय लगा था. हमले में ट्विन टावर्स में 90 से ज्यादा देशों के नागरिक मारे गए थे.

उस वक्त अमेरिका के राष्ट्रपति थे जॉर्ज बुश जूनियर. उन्हीं जॉर्ज बुश के बेटे जिन्होंने इराक में WMD होने की बात कह कर हमला बोलने का माहौल बनाया गया था. अमेरिका 9/11 हमले से बुरी तरह झुंझला गया. अमेरिकी राष्ट्रपति का बयान आया कि इस युद्ध में या तो आप हमारे साथ हैं या हमारे खिलाफ. इस गुस्से में अमेरिका वही गलती करने जा रहा था जो ब्रिटेन और सोवियत संघ पहले ही कर चुके थे. और वो थी अफगानिस्तान में एंट्री.

तस्वीर 9/11 की है. लेकिन आगे जिस हमले की बात हम स्टोरी में करेंगे वो होगा इन टावर्स में 1993 में हुआ हमला.
तस्वीर 9/11 की है. जब अमेरिका में न्यू यॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर से 2 यात्री विमान टकराए. इसके अलावा 2 और विमान हाईजैक करके जमींदोज़ किए गए. इस हमले की जिम्मेदारी अल-कायदा की तरफ से ओसामा बिन लादेन ने ली.

वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के बारे में एक रोचक बात और जान लीजिए. ये इस बिल्डिंग पर पहला आतंकी हमला नहीं था. 26 फरवरी, 1993 को, रामज़ी यूसुफ़ नाम का एक आतंकी अपने जॉर्डेनियन साथी आयद इस्माइल के साथ एक ट्रक में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर आया. ट्रक को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के बेसमेंट में पार्क कर दिया. ट्रक में विस्फोटक भरा हुआ था. यूसुफ़ ने इस विस्फोटक को एक्टिवेट किया और पैदल बाहर की ओर भाग गया. 12 मिनट बाद, दिन के 12 बजकर 17 मिनट पर विस्फोट हुआ. धमाके को सुनकर शुरुआत में लोगों को लगा कि शायद ट्रांसफ़ॉर्मर फटा है. धुआं 92 मंजिल तक पहुंच गया. बत्ती गुल हो गई. लिफ्टें बंद हो गईं. इससे भगदड़ मची और 6 लोगों की जान चली गई. बाद में जांच एजेंसियों ने पाया कि अगर इस विस्फोटक को नींव के पास रखा जाता तो बहुत बड़ा हादसा हो सकता था. विस्फोट के कुछ घंटों बाद यूसुफ़ पाकिस्तान भाग गया था. फिर 7 फ़रवरी, 1995 को पाकिस्तान के इस्लामाबाद शहर में पकड़ा गया. 8 जनवरी, 1998 को अमेरिका की अदालत ने उसे 1993 के हमलों का दोषी मानते हुए 240 वर्षों की सज़ा सुनाई.

अफगानिस्तान में अमेरिका की एंट्री और अब

असल में 9/11 को अमेरिका पर दोहरा हमला हुआ था. एक तो उसकी धरती पर पहली बार ऐसा आतंकी तांडव मचा, दूसरे उसकी वर्ल्ड पावर की इमेज पर भी बट्टा लग गया. अमेरिका पर आतंकी हमले के बाद अल-कायदा चीफ ओसामा बिन लादेन ने इसकी जिम्मेदारी ले ली थी. लेकिन अमेरिका के लिए ये हालात कुछ अजीब बन गए थे. अब तक उसने जो युद्ध लड़े थे, वो किसी देश के खिलाफ थे. लेकिन इस बार वो ‘वॉर ऑन टेररिज्म’ लड़ने जा रहा था. उसके निशाने पर कोई मुल्क नहीं बल्कि एक आतंकी संगठन अल-कायदा और उसका सरगना ओसामा बिन लादेन था. अमेरिका को खबर मिली कि ओसामा बिन लादेन का ठिकाना अफगानिस्तान में है. उसने अफगानिस्तान में मौजूद तत्कालीन तालिबान सरकार से ओसामा बिन लादेन को उसे सौंपने को कहा. लेकिन तालिबान इसके लिए राज़ी नहीं हुआ.

अमेरिका पर 9/11 हमले से पहले अल-कायदा ने एक और बड़ा दांव खेल दिया था. 11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर आतंकी हमले से दो दिन पहले यानी 9 सितंबर 2001 को उसने एक फिदायीन हमला करवाकर अहमद शाह मसूद की हत्या करवा दी. अहमद शाह मसूद लगातार अफगानिस्तान में सत्ता पर काबिज तालिबान के खिलाफ लड़ रहे थे. नॉर्दन अलायंस के जरिए मोर्चा खोले हुए थे. ओसामा बिन लादेन को पता था कि अगर मसूद जिंदा रहे तो अमेरिका फिर से रूस के खिलाफ खेला गया मुजाहिदीन वाला खेल आजमा सकता है. मसूद के मरने से अफगानिस्तान की धरती पर अमेरिका के लिए मदद की गुंजाइश पूरी तरह खत्म हो चुकी थी.

अहमद शाह मसूद
नॉदर्न अलायन्स के नेता अहमद शाह मसूद को अल-कायदा ने 9/11 हमले के ठीक पहले ही एक फिदायीन हमले में मरवा दिया .

अब अमेरिका के पास अफगानिस्तान की धरती पर अपने सैनिक भेजने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था. साल 2001 में अमेरिकी सेना ने अफगानिस्तान की धरती पर कदम रखा. उसके बाद की घटनाएं टाइमलाइन से समझिए.

6 दिसंबर 2001: तालिबान राजधानी काबुल से भाग गया. उसी वक्त अमेरिका ने हामिद करजई को अंतरिम सरकार का नेतृत्व करने के लिए नियुक्त किया. नाटो ने अपने अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा सहायता बलों को तैनात करना शुरू कर दिया.

2004: एक नई प्रणाली के तहत अफगानिस्तान का पहला चुनाव 9 अक्टूबर, 2004 को हुआ. इसमें 70 प्रतिशत मतदान हुआ. करजई को 55 फीसदी वोट मिले. लेकिन इसी वक्त तालिबान दक्षिण और पूर्व में फिर से संगठित हो गया और विद्रोह करना शुरू कर दिया.

2008-2011: तालिबान के हमले बढ़े तो 2008 में अमेरिकी कमांड ने और सैनिकों की मांग की. इस बीच हुए राष्ट्रपति चुनावों में बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी के आरोप लगे. कम मतदान हुआ. उधर तालिबान के हमले जारी रहे. हालांकि हामिद करजई एक बार फिर से 20 अगस्त, 2009 को राष्ट्रपति चुने गए.

2009 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अमेरिकी सैनिकों की संख्या को दोगुना कर 68,000 कर दिया. ओबामा ने अफगानिस्तान युद्ध को समाप्त करने की प्रतिज्ञा पर अभियान चलाया. हालांकि वह ऐसा कभी कर नहीं पाए.

2010 में अमेरिकी सैनिकों की संख्या अफगानिस्तान में लगभग 1 लाख तक पहुंच गई.

2011 : वो दिन आया जिसका अमेरिका को बरसों से इंतजार था. 2 मई, 2011 को पाकिस्तान में अमेरिकी स्पेशल फोर्स ने ओसामा बिन लादेन को मार गिराया.

Osama Bin Laden
9/11 हमलों के लिए जिम्मेदार आतंकी संगठन अल-क़ायदा के मुखिया ओसामा बिन लादेन को अमेरिका ने 2011 में मार गिराया. (तस्वीर: एपी)

2012: ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के साथ ही अमेरिका का मिशन पूरा हुआ. अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने अफगानिस्तान से सेना वापसी शुरू कराई.

2014: नाटो सेनाओं ने भी वापसी शुरू की. जून 2014 में, अशरफ गनी राष्ट्रपति चुने गए. दिसंबर में, नाटो ने अपने 13 साल लंबे लड़ाकू मिशन को समाप्त कर दिया. लेकिन अफगान सेना को ट्रेनिंग देने का काम जारी रखा. इसके लिए अपने सैनिक अफगानिस्तान में छोड़ दिए. इसके बाद तालिबान ने ताकतवर होना शुरू किया.

2020: अशरफ गनी फिर से 18 फरवरी, 2020 को प्रेसिडेंट चुने गए. हालांकि जीत के दावे को उनके प्रतिद्वंद्वी और पूर्व मंत्री अब्दुल्ला अब्दुल्ला ने खारिज कर दिया. अब्दुल्ला अपनी समानांतर सरकार बनाने की कसम खाते रहे.

29 फरवरी 2020: राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने तालिबान के साथ दोहा में एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए. इसके तहत सभी विदेशी सेनाओं के मई 2021 तक अफगानिस्तान छोड़ने की बात कही गई. बशर्ते विद्रोही काबुल के साथ बातचीत शुरू करें और अन्य सुरक्षा गारंटी देने का वादा करें.

कतर की राजधानी दोहा के एक होटल में Taliban प्रतिनिधि दल का प्रमुख अब्दुल सलाम हनाफी (दाईं तरफ) दूसरी तालिबान सदस्यों के साथ. (फोटो: एएफपी)
कतर की राजधानी दोहा के एक होटल में Taliban प्रतिनिधि दल का प्रमुख अब्दुल सलाम हनाफी (दाईं तरफ) दूसरे तालिबान सदस्यों के साथ. (फोटो: एएफपी)

1 मई, 2021: अमेरिका और नाटो ने अपने 9,500 सैनिकों को वापस बुलाना शुरू किया. इनमें से 2,500 अमेरिकी सैनिक थे. मई में अमेरिकी सैनिक कंधार एयरबेस से हट गए.

2 जुलाई 2021: सबसे बड़े सैन्य ठिकाने बगराम एयरबेस को अफगान सेनाओं को सौंप दिया गया. नए राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा कि 9/11 हमले की 20वीं बरसी से पहले ही 31 अगस्त तक अमेरिकी सैनिकों की वापसी पूरी कर ली जाएगी.

15 अगस्त 2021: दोहा में किए गए अपने वादे से उलट तालिबान ने अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर जबरन कब्जा कर लिया. कारण ये बताया कि कानून-व्यवस्था बरकरार रखने के लिए ऐसा करना जरूरी हो गया था. इसी दिन खबर आई कि अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी देश छोड़कर फरार हो गए हैं.

17 अगस्त 2021: तालिबान ने पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस की और वादा किया कि किसी को परेशान नहीं किया जाएगा. इसके बावजूद लोग काबुल एयरपोर्ट पर टूट पड़े. लोग किसी भी तरह अफगानिस्तान छोड़ना चाहते थे. अमेरिकी एयरफोर्स के जहाज में लटक लटककर देश छोड़ने की तस्वीरें वायरल हुईं.

30 अगस्त 2021: अमेरिका ने अफगानिस्तान छोड़ने की डेडलाइन 31 अगस्त रखी थी लेकिन 30 अगस्त की आधी रात को ही सभी अमेरिकी सैनिक वापस चले गए.

7 सितंबर 2021: तालिबान 2.0 की सरकार की घोषणा हुई. मुल्ला मोहम्मद हसन अखुंद अंतरिम प्रधानमंत्री बनाए गए. गृहमंत्री बनाया गया दुनिया भर की टेरर लिस्ट में शामिल सिराजुद्दीन हक्कानी को. तालिबान की नई कैबिनेट में कितने घोषित आतंकी है, ये आप खबरों में पढ़ ही चुके होंगे.


वीडियो – तालिबान ने गर्भवती महिला पुलिस अधिकारी की परिवार के सामने बेरहमी से हत्या की

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

कौन हो तुम

'मनी हाइस्ट' वाले प्रोफेसर की पूरी कहानी, जिनकी पत्नी ने कहा था, 'कभी फेमस नहीं हो पाओगे'

अलवारो मोर्टे ने वेटर तक का काम किया हुआ है. और एक वक्त तो ऐसा था कि बकौल उनके कैंसर से जान जाने वाली थी.

एक्टर शरत सक्सेना की कहानी, जिन्होंने 71 साल की उम्र में ज़बरदस्त बॉडी बनाकर सबको चौंका दिया

हीरो बनने आए शरत सक्सेना कैसे गुंडे का चमचा बनने पर मजबूर हुए?

'भीगे होंठ तेरे' वाले कुणाल गांजावाला आजकल कहाँ हैं?

एक वक़्त इंडस्ट्री में टॉप पर थे कुणाल और उनके गाने पार्टियों की जान हुआ करते थे.

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

IPL स्कैंडल, मॉडल्स के आरोप, अंडरवर्ल्ड कनेक्शंस के आरोप, एक्स वाइफ के इल्ज़ाम सब हैं इस कहानी में.

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रेन्सन की कहानी, जहां भी गए तहलका मचा दिया.

'सिंघम' IPS से तमिलनाडु BJP के सबसे युवा अध्यक्ष बने अन्नामलाई की कहानी

पहला चुनाव हार गए थे, बीजेपी ने राज्य की जिम्मेदारी सौंपी है.

'तड़प-तड़प के' जैसा प्रेमियों का ब्रेकअप एंथम देने वाले सिंगर के के आजकल कहां हैं?

उनके गाए 'पल' गाने के बगैर आज भी किसी कॉलेज का फेयरवेल पूरा नहीं होता.

कर लिया योगा? अब क्विज खेलने से होगा

आन्हां, ऐसे नहीं कि योग बस किए, दिखाना पड़ेगा कि बुद्धिबल कित्ता बढ़ा.

तमिल जनता आखिर क्यों कर रही है 'फैमिली मैन-2' का विरोध, क्या है LTTE की पूरी कहानी?

जब ट्रेलर आया था, तबसे लगातार विरोध जारी है.

माधुरी से डायरेक्ट बोलो 'हम आपके हैं फैन'

आज जानते हो किसका हैप्पी बड्डे है? माधुरी दीक्षित का. अपन आपका फैन मीटर जांचेंगे. ये क्विज खेलो.