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वो शख्स जिसे अपनी पसंद से सेक्स पार्टनर चुनने को नहीं मिलता, वो गुलाम है

स्कूल की 12वीं क्लास. या फिर कॉलेज का पहला साल. ये दर्जे टीनएज में पढ़े जाते हैं. टीनएज. जिसे ‘कच्ची उम्र’ भी कह दिया जाता है. लेकिन तुम्हारे माता-पिता मन बना लेते हैं. ‘सही समय’ आ चुका होता है.

और फिर लाल रंग (या सफेद) तुम्हें ढंग लेता है. तुम सोचती हो कि काश कोई ये सब रोक दे. लेकिन कोई नहीं रोकेगा. तुम 18 साल के हो चुकी हो. ये पूरी तरह कानूनी है. मुख्यमंत्रियों ने तो पब्लिक का पैसा लगाकर एक फंड भी बना दिया है. ये फंड इसी दिन के लिए है. ताकि तुम्हारे माता-पिता इसे कपड़े, खाने और तुम्हारे दूल्हे पर खर्च कर सकें.

तुम एक अजनबी के साथ अकेले कमरे में बंद कर दी जाओगी. क्योंकि तुम 18 साल हो चुकी हो. इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम ‘हां’ कहती हो, या ‘न’ या फिर ‘अभी नहीं’. ज़्यादा संभावना इसी बात की है कि वो लड़का तुम्हारी उम्र का भी न हो. कानून के मुताबिक लड़के की उम्र शादी के समय कम से कम 21 होनी चाहिए. मतलब वो तुमसे बड़ा होना चाहिए. इस बात को तवज्जो नहीं दी जाती कि शादी करने वाले शरीर और मन से, जीवन के अनुभवों से एक बराबर हों.

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बचपन से ही हमें एक गुलामी भरे सिस्टम के लिए तैयार किया जाता है.

इस सब को कोई नहीं रोकता. न पुलिस, न अदालतें. मुख्यमंत्री जी का तो कहना ही क्या. तुम 18 साल की लड़की हो – और पूरी दुनिया चलाने के लिए फिट हो. तुम खाना बनाओगी, सफ़ाई करोगी, पानी भरोगी. तुमसे उम्मीद की जाती है कि तुम अपना सारा काम घर में रह कर ही कर लो. सरकारें तुम्हारे शरीर को घर से बाहर बर्दाश्त नहीं कर पातीं. घबरा जाती हैं.

18 की उम्र में तुमसे उम्मीद की जाती है कि तुम बच्चे पैदा करो. उन्हें स्वस्थ रखो और एक समझदार नागरिक बनाओ. उम्मीद इस बात की भी की जाती है कि तुम इस पूरी प्रक्रिया के बीच में न मरो.

हां, 22 की उम्र में तुम दुनिया छोड़ सकती हो!

13 साल की उम्र में तुम खाना छोड़ सकती हो. ये सब गैरकानूनी नहीं है. 18 साल की उम्र में तुमसे ये उम्मीद की जाती है कि तुम्हें मानव, नागरिक और लोकतांत्रिक अधिकारों की पूरी समझ हो. 25 साल की उम्र में तुम संसद में एंट्री ले सकती हो. देश चलाने वाले कानून बना सकती हो. जब आप संविधान को बनाए रखने के लिए शपथ लेते हैं, तो आशा की जाती है कि आप इन सब कामों के लायक हों.

सांकेतिक तस्वीर
कई माता-पिता अपनी बेटी को इमोशनल ब्लैकमेल करके उसकी शादी किसी अजनबी से कर देते हैं.

लेकिन 25 की उम्र में तुम्हें इतना समझदार नहीं माना जाता कि तुम चुन सको कि तुम्हें सोना किसके साथ है. हिंदुस्तान की लड़कियों और औरतों, कभी ये न भूलना – जो आदमी तुम्हारे देश पर राज करते हैं, सोचते हैं कि 18 की उम्र में तुम सेक्स और बच्चे पैदा करने लायक बड़ी हो जाती हो, लेकिन सिर्फ़ तभी तक, जब तक अपना जीवनसाथी चुनने का हक तुम्हारे पास नहीं रहता.

एक समय था जब तुम्हें 12 साल की उम्र में एक अजनबी को सौंप देना गलत नहीं समझा जाता था. तुम्हारी 8, 9, 12, 14 या 18 में शादी कर दी जाती थी, क्योंकि वो तुम्हें अपने फ़ैसले लेने से रोक देना चाहते थे.

बड़ा ‘आसान’ है ये कह देना कि वो परंपराओं से बंधे हुए थे. कि उन्होंने तुम्हारे लिए जो सबसे सही था, वही किया. कि ज़िंदगी बड़ी मुश्किल है और सही जीवनसाथी मिलना आसान बात नहीं. कि वो चाहते थे कि तुम सुरक्षित रहो और ज़माना बहुत खराब है. कि तुम दुनिया के बारे में ज़्यादा नहीं जानतीं. लेकिन इस बात में एक कड़वा सच छिपा है – कि वो तुमसे तुम्हारी पसंद छीन लेना चाहते हैं. ये बुरा लगेगा सुनने में, लेकिन वो चाहते यही हैं कि तुम उनकी मर्ज़ी से सेक्स करो. गंदा लगता है न सुनने में, तो ये है गंदा.

साफ़ शब्दों में कहूं तो ये गुलामी है. वो इंसान, जिसे अपनी पसंद से सेक्स पार्टनर चुनने को नहीं मिलता वो गुलाम ही है.

गुलामी. ये शब्द विवेक, परिवार, गार्जियन और नैतिकता जैसे शब्दों के बीच कहीं छिपा बैठा रहता है. उस कानून का इशारा समझो, जिसमें कोर्ट मैरिज करने का इरादा कोर्ट में शादी करने से कहीं पहले ज़ाहिर करना होता है. ताकि तुम्हारे घरवालों के पास तुम्हें ढूंढ निकालने, तुम्हारा दिमाग ठिकाने लगाने और तुम्हारी इच्छाओं को मारने के लिए पर्याप्त समय हो. उस वर्दी की जेब के इशारे को समझने की कोशिश करो, जिसके चलते पुलिसवाला तुम्हारे घरवालों को ‘खबर’ कर देता है, जब तुम अपनी मर्ज़ी से अपने साथी के साथ होती हो. तुम्हें फरमान सुनाती पंचायतों के इशारे समझो. ये सारे इशारे तुम्हें तुम्हारी किताबों में भी मिल जाएंगे, जो तुम्हें लड़को से अलग बैठकर पढ़नी होंगी, उन मेडिकल फॉर्म्स में मिल जाएंगे जो तुम भरोगी.

हिंदुस्तान में लड़कियों पर होने वाले ज़ुल्मों में सबसे बड़ा हाथ करीबी रिश्तेदारों का ही होता है. सांकेतिक तस्वीर.
हिंदुस्तान में लड़कियों पर होने वाले ज़ुल्मों में सबसे बड़ा हाथ करीबी रिश्तेदारों का ही होता है. सांकेतिक तस्वीर.

25 की उम्र हो या 35 या 45. तुम कभी उतनी परिपक्व नहीं समझी जाओगी कि अपना साथी चुन सको. पहले तुम्हारी ‘कच्ची’ उम्र का ज़िक्र आएगा, फिर तुम्हारी ‘नादानी’ का. फिर वो तुमसे कहेंगे कि तुम्हारे पास अनुभवों की कमी है. फिर वो गुहार लगाएंगे कि तुम उनकी इज़्ज़त बिरादरी (या कॉलोनी!) में न उछालो. कुल मिलाकर आखिर में वो तुम्हें शर्मिंदा कर देंगे.

रेप होने के लिए कभी तुम्हारी उम्र कम या ज़्यादा नहीं होगी. लेकिन खुद अपना जीवनसाथी चुन सको, इतनी बड़ी तुम कभी नहीं होगी. जब ये इमोश्नल ब्लैकमेल काम नहीं आएगा, तब वो तुम्हें ये कहकर राज़ी कर लेंगे कि तुम खुद अपनी इच्छाओं को नहीं समझतीं. शर्म और डर तुम्हें झुका ही देंगे. तुम्हें हुक्म मानना सिखाया जाएगा. वो तुम्हें गुलामी के लिए तैयार कर देंगे.

उन्हें लगा था कि उन्होंने तुम पर कब्ज़ा कर लिया है. गुलामी जैसा ये सिस्टम बनाने में उन्होंने दो हज़ार साल लगाए. एक ऐसा सिस्टम, जिसमें हम सभी एक दूसरे के खिलाफ़ हो गईं और अपने ‘मालिक’ की मर्ज़ी में बंध गईं. लेकिन अब वो बौखला रहे हैं. पिछले 150 साल से उन पर पीछे हटने के लिए लगातार दबाव बन रहा है. इसलिए वो तुम्हें ‘तुम्हारी जगह’ दिखा रहे हैं. तुम्हारी जगह बेड़ियों में है. तुम्हारी खाल, तुम्हारी ज़ुबान और तुम्हारा गर्भ, सब बेड़ियों में जकड़ा जा रहा है.

वो तुम्हारे खिलाफ़ मुक्कों और हथियारों का इस्तेमाल करेंगे. साथ ही, तुम्हारी नादानी का भी. ‘कानून’ का सहारा लेंगे. कुछ और काम नहीं आएगा, तो वो तुम्हें मार डालेंगे. इसकी शुरुआत हो चुकी है. हिंदुस्तान की लड़कियों और औरतों, तुम्हें बहलाकर रखा गया है कि तुम इस संस्थागत गुलामी को तोड़ कर आज़ाद हो सकती हो. शायद इस वक्त एक मौका है भी. लेकिन कल के बारे में मैं कुछ नहीं कह सकती.


ये आर्टिकल अंग्रेज़ी वेबसाईट ‘डेली ओ’ के लिए एनी ज़ैदी ने लिखा है. वेबसाइट की इजाज़त से हम इसका हिंदी अनुवाद आपको पढ़वा रहे हैं. ‘दी लल्लनटॉप’ के लिए ये अनुवाद रुचिका ने किया है.


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