अपना खाका लगता हूं एक तमाशा लगता हूं आईनों को जंग लगा अब मैं कैसा लगता हूं अब मैं कोई शख्स नहीं उसका साया लगता हूं सरे रिश्ते तिश्ना हैं क्या मैं दरिया लगता हूं उस से गले मिल कर खुद को तनहा तनहा लगता हूं खुद को मैं सब आँखों में धुन्दला धुन्दला लगता हूं मैं हर लम्हा उस घर से जाने वाला लगता हूं क्या हुए वो सब लोग के मैं सोना सोना लगता हूं मसलिहत इस में क्या मेरी टूटा फूटा लगता हूं क्या तुमको इस हाल में भी मैं दुनिया का लगता हूं कब का रोगी हूं वैसे शेहेर-ऐ-मसीहा लगता हूं मेरा तालू तर कर दो सचमुच पियासा लगता हूं मुझसे कमा लो कुछ पैसे जिंदा मुर्दा लगता हूं मैंने सहे हैं मक्र अपने अब बेचारा लगता हूं ***
'अपना खाका लगता हूं, एक तमाशा लगता हूं'
एक कविता रोज में आज पढ़िए जॉन एलिया की ग़ज़ल.
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फोटो - thelallantop
आज पढ़िए जॉन एलिया की ग़ज़ल 'अपना खाका लगता हूं'.
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