NASA का Artemis-2 मून मिशन धरती पर लैंड करने के लिए ऐसी टेक्नीक यूज करने वाला है, जो पहले कभी किसी ह्यूमन स्पेसफ्लाइट पर यूज नहीं हुई है. री-एंट्री की ये टेक्नीक है स्किप मनूवर.
स्किप मनूवर तकनीक से धरती पर लौटेगा नासा का मून मिशन, हर डिटेल जानें
NASA Artemis II splashdown: नासा का Artemis-2 मून मिशन धरती पर लैंड करने के लिए ऐसी टेक्नीक यूज करने वाला है, जो पहले कभी किसी ह्यूमन स्पेसफ्लाइट पर यूज नहीं हुई है. री-एंट्री की ये तकनीक है स्किप मनूवर. Orion Atmosphere में एंट्री करेगा मगर लैंडिंग नहीं.


जैसे तालाब में पत्थर फेंकने पर वो डूबने के पहले पानी पर टप्पा खाकर हल्का सा उछलता है. कुछ-कुछ वैसा ही.
Orion वायुमंडल में एंट्री करेगा मगर लैंडिंग नहीं. एटमॉस्फेयर को छूकर स्पीड थोड़ी कम करेगा. फिर वापस ऊपर चला जाएगा. फिर नीचे आएगा और फाइनली लैंड करेगा.
मगर इतनी उछल-कूद क्यों?
कभी कोई भारी सामान लेकर चलिए तो बीच में रुकते हैं? हैं ना? जब ऐस्ट्रोनॉट्स का कैप्सूल धरती की तरफ आता है, तो कई चीजें बहुत जल्दी जल्दी बदलती हैं. इसलिए थोड़ा पॉज जरूरी है.
इतने दिन से ऐस्ट्रोनॉट माइक्रोग्रैविटी में थे. वहां थी वेटलेसनेस. नीचे आते वक्त उनकी स्पीड तेजी से कम होती है. तो शरीर पर अचानक बहुत फोर्स लगता है. जब डिसेंट को दो पार्ट में कर दिया जाता है, तो ये फोर्स एक बार में लगने की जगह दो पार्ट्स में डिवाइड हो जाती है. ऐस्ट्रोनॉट्स को कम झटका लगता है.
दूसरी चीज- हीट. धरती के ऊपर एटमॉस्फेयर है, गैस, धूल वगैरह की लेयर है. जैसे-जैसे ऊपर जाते हैं, ये लेयर पतली होती जाती है. अब ऊपर से नीचे आते वक्त वायुमंडल की डेंसिटी बढ़ती है. इसमें से होकर जब कैप्सूल गुजरता है तो कंप्रेशन उसकी बाहरी लेयर को 2500 डिग्री सेल्सियस से भी ज्यादा गर्म कर देता है. मगर वापस ऊपर जाने से ये हीट भी दो पार्ट्स में डिवाइड हो जाती है.
स्किप गाइडेंस की हेल्प से NASA सही से ये पता लगा सकेगा कि कैप्सूल कहां लैंड होगा. अभी तक एक बड़ा सा दायरा होता था जिसमें कहीं पर भी लैंडिंग हो सकती थी. अब सटीक लोकेशन पता होगी तो जो नेवी के जहाज ऐस्ट्रोनॉट्स को लाने के लिए तैनात होंगे, वो खट्ट से जाकर उन्हें पिक कर लेंगे. Orion की लैंडिंग लाइव देखने के लिए नीचे दी गई लिंक पर क्लिक कर सकते हैं.
प्लस, आमतौर पर जब लैंडिंग होती है तो ऐस्ट्रोनॉट्स का कॉन्टैक्ट धरती से टूट जाता है. मगर इस बार दो बार में नीचे आना होगा तो कॉन्टैक्ट भी दो बार टूटेगा. इसलिए आखिर के 20 मिनट नासा की पूरी टीम अपनी सांसें रोके रहेगी.
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