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छह महीने का भ्रूण गिराना चाहती थी महिला, कोर्ट ने डॉक्टरों की राय पर दे दी इजाज़त

बता दें, ज्यादा विकसित भ्रूण को गिराना क्राइम है.

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मौजूदा कानून के अनुसार 20 हफ़्तों तक के भ्रूण को बेहद जरूरी होने पर ही दो डॉक्टरों की राय के बाद गर्भपात कराया जा सकता है. (सांकेतिक तस्वीर)
पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने मेडिकल गर्भपात को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया है. चंडीगढ़ की एक महिला कोर्ट के पास अर्जी लेकर पहुंची थी. प्रेग्नेंसी के 25वें हफ्ते में. महिला और उसके पति का कहना था कि अगर प्रेग्नेंसी को जारी रखा जाएगा, तो जो बच्चा पैदा होगा, वह स्वस्थ नहीं होगा. कोर्ट ने महिला को इस गर्भपात की मंजूरी दे दी है.
अब पूरा मामला समझ लीजिए
चंडीगढ़ की रहने वाली इस महिला और उसके पति ने हाई कोर्ट में अर्जी डाली थी. मेडिकल गर्भपात की इजाजत के लिए. उन्होंने कोर्ट को बताया कि महिला के पेट में जो बच्चा पल रहा है, उसमें गंभीर विकृतियां पाई गई हैं.  इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़, इस अर्जी के बाद हाई कोर्ट ने चंडीगढ़ के पोस्टग्रेजुएट इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (PGIMER) को निर्देश दिए थे कि वो मामले की जांच करें. संस्थान ने अपनी रिपोर्ट में सलाह दी,
"पेशेंट इस समय गर्भपात करवा सकती है क्योंकि भ्रूण के अंदर बेहद गंभीर असामान्यताएं पाई गई हैं, जो उसके विकास के लिए ठीक नहीं हैं."
इस रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए जज फतेहदीप सिंह की बेंच ने निर्णय दिया कि मां वयस्क है और मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ है. मेडिकल बोर्ड की राय है कि प्रेग्नेंसी के 25वें हफ्ते में मेडिकल गर्भपात कराया जा सकता है. पोटैशियम क्लोराइड के इंजेक्शन द्वारा. इसलिए महिला को इसकी मंजूरी दी जाती है.
Pregnant भ्रूण में गंभीर विकृतियां थीं, अगर बच्चे का जन्म हो भी जाता तो वो कई गंभीर बीमारियों से जूझता रहता. (सांकेतिक तस्वीर)

जस्टिस फ़तेहदीप सिंह ने ये भी कहा,
"न्याय की दिशा में अदालतों को बेहद संकीर्ण तरीके से काम नहीं करना चाहिए. उन्हें इंसानी पीड़ा, रिश्ते और इच्छाओं को लेकर एक बड़े परिप्रेक्ष्य को अपनाने की ज़रूरत है. इसी तरह उन्हें ये सुनिश्चित करना चाहिए कि धार्मिक रूढ़िवादिता और सामाजिक कुप्रथाओं की वजह से पीड़ितों को कानूनी और वैध सहायता मिलने से वंचित न रखा जाए."
कानून क्या कहता है?
भारत में इस वक़्त एबॉर्शन के लिए MTP एक्ट 1971 लागू है. MTP मतलब मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी. ये एक्ट बताता है कि किन परिस्थितियों में महिला अपना एबॉर्शन करा सकती है. किनसे करा सकती है. कहां करा सकती है. लेकिन इन सभी नियमों को समझने से पहले ये बता दें कि एबॉर्शन और मिसकैरिज में अंतर होता है. एबॉर्शन यानी मेडिकली टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी. यानी दवाइयों या मेडिकल मदद से गर्भपात कराना. वहीं मिसकैरिज का मतलब होता है प्राकृतिक कारणों से गर्भपात हो जाना, या बिना किसी मेडिकल छेड़छाड़ के बच्चे का गिर जाना.
MTP एक्ट के अनुसार एबॉर्शन कराने के लिए ये महिलाएं एलिजिबल हैं:
वयस्क महिलाएं, जिनकी प्रेग्नेंसी 12 हफ़्तों से कम की हो. वे किसी रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर की सलाह पर एबॉर्शन करा सकती हैं.
ये समय सीमा 20 हफ़्तों तक बढ़ाई जा सकती है, अगर दो मेडिकल प्रैक्टिशनर एबॉर्शन के लिए हामी भरें तो.
लेकिन इस समयसीमा में बदलाव की कोशिश चल रही है. केंद्रीय कैबिनेट ने इसमें संशोधन का एक बिल स्वीकृत किया है जिसमें कानूनी रूप से वैध एबॉर्शन की समयसीमा 20 हफ्ते से बढ़ाकर 24 हफ्ते करने का प्रस्ताव है. ये बिल  लोकसभा से पास हो गया है, लेकिन राज्यसभा से स्वीकृत होने के इंतजार में है.
पहले भी अदालतों ने दी है मंजूरी
फिलहाल 20 हफ्ते के बाद अगर कोई महिला गर्भपात कराना चाहे तो उसे अदालत की स्वीकृति लेनी होती है. आमतौर पर ये मंजूरी बेहद जरूरी केसेज में ही मिलती है. अदालतों ने पहले भी कुछ मामलों में ऐसी स्वीकृति दी है. ये ऐसे मामले थे, जिसमें बच्चे को गंभीर विकार थे, या उसके जन्म लेने से महिला की जान या शारीरिक/मानसिक सेहत को खतरा था.
साल 20 17 में सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई की एक महिला को 31 हफ़्तों की प्रेग्नेंसी अबोर्ट करने की इजाज़त दी थी. इस मामले में भी पेट में पल रहे बच्चे में गंभीर विकृतियां थीं. उसकी दोनों किडनियां काम नहीं कर रही थीं. इसी तरह साल 2019 में कोलकाता हाई कोर्ट ने महिला को 29 हफ्ते की प्रेग्नेंसी गिराने की छूट दी थी. उनके गर्भ में पल रहे बच्चे को डाउन सिंड्रोम डिटेक्ट हुआ था. ये एक तरह की जन्मजात दिक्कत है जो बच्चे के विकास पर असर डालती है.

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