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उस पिता की कहानी जिसने बेटी को बॉक्सर बनाने के लिए अपनी नौकरी दांव पर लगा दी

बेटी की बॉक्सिंग में सबकुछ झोंक देने को लेकर लोग मज़ाक बनाते थे.

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बेटी को मुक्केबाज़ बनाने के लिए खुद की नौकरी तक दांव पर लगा दिए नीतू घनघस के पिता

हरियाणा के भिवानी जिले के धनाना गांव की नीतू घंघस. खबर तो आपको मिल ही गई होगी, नीतू ने कॉमनवेल्थ गेम्स में 48 किलो कैटेगिरी में गोल्ड मेडल जीता है. अपनी इस जीत का क्रेडिट नीतू अपने पिता को देती हैं. बेटी टॉप की मुक्काबाज बने, ये सुनिश्चित करने के लिए उनके पिता जय भगवान घंघस ने अपनी नौकरी तक दांव पर लगा दी. 

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हर पल मिला पिता का साथ

नीतू के पिता हरियाणा सचिवालय में काम करते थे. वे अपनी बेटी की ट्रेनिंग पर खासा ध्यान देते थे. बेटी को खिलाने के लिए उन्हें अक्सर गांव से भिवानी लाना-लेजाना पड़ता था. इसी वजह से अक्सर उन्हें अपने दफ्तर से छुट्टी लेनी पड़ती थी. इसके चलते उन्हें चार साल तक बिना वेतन के छुट्टी पर रहना पड़ा. वेतन न आने की वजह से परिवार को काफी आर्थिक तंगी का भी सामना करना पड़ता था. कई बार तो उन्हें रोज़मर्रा की ज़रूरतों के लिए भी उधार लेना पड़ जाता था.  पिता ने बेटी की अच्छी डाइट के लिए उधार के रुपयों से एक भैंस भी ख़रीदी थी. काम छोड़कर इस तरह बेटी के खेल पर खुद पर झोंक देने पर कई लोग जय भगवान का मज़ाक भी बनाते थे.  

नीतू के पिता ने आज तक से जुड़े जगबीर घंघस को बताया कि ओलंपिक जब विजेंदर सिंह ने मेडल जीता, उसके बाद उन्होंने 2012 नीतू को बॉक्सिंग खिलाना शुरू किया. जैसे-जैसे दिन बीते वैसे-वैसे खेल का खर्च बढ़ने लगा. नीतू के पिता कहते हैं,

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“बेटी को गोल्डन गर्ल बनाने के लिए अपना नया मकान नहीं बना पाया. पूरे परिवार ने कभी अच्छे कपड़े नहीं पहने. लोग हौसला बढ़ाने के बजाय ताने मारते थे.”

मैरी कॉम को नीतू मानती हैं इंस्पिरेशन

ये नीतू का पहला कॉमनवेल्थ गेम्स था. 22 साल की नीतू ने कॉमनवेल्थ क्वालीफाई करने के लिए हुए ट्रायल बाउट में मैरी कॉम को हराया था. नीतू मैरी कॉम को अपनी प्रेरणा बताती हैं. नीतू जिस गांव से आती हैं, उसे मुक्केबाजों का अड्डा माना जाता है. इस गांव ने देश को कई मुक्केबाज दिए हैं. नीतू को नैशनल लेवल के बॉक्सर जगदीश सिंह ने ट्रेनिंग दी है, उन्होंने ही विजेंदर सिंह को भी ट्रेनिंग दी थी.

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