आंध्र प्रदेश का चित्तूर ज़िला. 'इंडिया टुडे' से जुड़े पत्रकार आशीष पांडे की रिपोर्ट के मुताबिक, लॉकडाउन के कुछ दिन पहले यहां के मदनपल्ली के शिवालयम टेंपल स्ट्रीट में एक परिवार एक घर में रहने आया. परिवार में थे चार लोग. डॉक्टर वी पुरुषोत्तम नायडू, जिन्होंने कैमिस्ट्री में PhD की है और सरकारी डिग्री कॉलेज में वाइस प्रिंसिपल थे. दूसरा, उनकी पत्नी वी. पद्मजा, जो मैथमेटिशियन हैं, गणित में गोल्ड मेडल भी ले चुकी हैं और IIT कोचिंग ट्रेनर थीं. इनकी दो बेटियां- 27 बरस की अलेख्या और 22 साल की साईं दिव्या. दोनों ही अच्छी खासी पढ़ी-लिखी. 24 जनवरी के शाम पुरुषोत्तम ने अपने एक दोस्त को कॉल किया. कहा कि उसने और उसकी पत्नी ने अपनी दोनों बेटियों की हत्या कर दी है और दोनों बाद में ज़िंदा हो जाएंगी. इसके बाद दोस्त पहुंचा पुरुषोत्तम के घर. जो मंज़र देखा डर गया. घर में खून ही खून बिखरा पड़ा था. दोनों बेटियों के शव भी खून से लथपथ पड़े हुए थे.
बेटियों की हत्या कर रिलैक्स बैठे थे मां-बाप, जांच में अंधविश्वास के अलावा ये बड़ी बात सामने आई
दो सगी बहनों की हत्या कर उनके ज़िंदा होने की राह देख रहे थे पैरेंट्स


इसके बाद दोस्त सीधा पहुंचा पुलिस के पास. घटना की जानकारी दी. फिर DSP (डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस) ए. रवि मनोहर अचारी पुलिस की टीम को लेकर मौके पर पहुंचे. देखा कि पद्मजा एक कमरे के फर्श पर बैठी हुई है, पुरुषोत्तम सोफे पर. एक बेटी का शव एक कमरे में पड़ा हुआ था, दूसरी बेटी का शव पूजा के कमरे में. एक बेटी के शरीर पर लाल कपड़े थे, तो दूसरी बेटी के शरीर पर कोई कपड़ा नहीं था. दोनों ही कमरों में खून फैला हुआ था. इसके बाद फिर पुलिस ने दोनों शवों को अपने कब्ज़े में किया. पुरुषोत्तम और पद्मजा को हिरासत में लिया और जांच शुरू की.

इस घर में परिवार रहता था. (फोटो- आशीष पांडे)
'कलयुग खत्म होकर सतयुग शुरू हो जाएगा'
55 बरस के पुरुषोत्तम को IPC की धारा 302 (मर्डर) के तहत आरोपी नंबर-1 बनाया, 50 बरस की पद्मजा को आरोपी नंबर-2. पूछताछ में पता चला कि ये परिवार किसी तरह की सीक्रेट पूजा कर रहा था. और इसी पूजा के बाद दोनों ने अपनी दोनों बेटियों की हत्या कर दी. छोटी बेटी को दोपहर के वक्त मारा. बड़ी बेटी को शाम के वक्त. एक का गला काटा गया, दूसरे को डंबल्स (जो एक्सरसाइज़ में इस्तेमाल होता है) से मारा. दोनों आरोपियों को यकीन था कि 25 जनवरी की सुबह सतयुग शुरू हो जाएगा और उनकी बेटियां दोबारा ज़िंदा हो जाएंगी. मां को लगता था कि उनकी बड़ी बेटी शिव का अवतार थी. और पद्मजा ने अपने पूरे परिवार को भी इस बात पर भरोसा दिलवा दिया था. सभी ये मानने लगे थे कि अलेख्या शिव का अवतार थी. खैर, डबल मर्डर की घटना के बाद पुलिस आरोपियों की गिरफ्तारी के पहले दोनों का कोरोना टेस्ट कराने ले गई. 26 जनवरी के दिन. वहां पद्मजा ने टेस्ट कराने से मना कर दिया. ज़िद पर अड़ गई. कहा,
"मैं शिव हूं. मेरे शरीर के कण से ही कोरोना आया है. ये बिना वैक्सीन के इस्तेमाल से मार्च में जाएगा. मेरे गले में हलाहल हो रहा है. कोरोना टेस्ट करने की कोई ज़रूरत नहीं है."
हालांकि बाद में पुरुषोत्तम, जिसने पद्मजा की तुलना में काफी शांति से अपने सैंप्ल्स दिए थे, उसके कहने पर पद्मजा ने अपना सैंपल दिया. दोनों को फिर सिविल जज के सामने पेश किया गया, जहां से उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. इसके पहले मदनपल्ली सरकारी अस्पताल में दोनों का मानसिक चेकअप भी हुआ. जहां डॉक्टर्स को पता चला कि पद्मजा के पिता एक मानसिक बीमारी के शिकार थे और इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई थी. इसके अलावा पद्मजा का चेकअप करने वाली डॉक्टर राधिका ने बताया कि पद्मजा SDD यानी शेयर्ड डिल्यूज़न डिसॉर्डर (shared delusion disorder) जिसे शेयर्ड सायकोसिस डिसॉर्डर भी कहते हैं, उसका इसका है. डॉक्टर राधिका ने कहा,
"उसे पूरा भरोसा है कि कलयुग खत्म होगा और सतयुग आएगा. उसे ये भी लगता है कि उसकी बड़ी बेटी शिव थी. उसे ये भी लगता है कि दोनों बेटियां ज़िंदा होंगी और दुनिया को बदलेंगी. इस लॉकडाउन में उन्होंने पूजा करना शुरू कर दिया, किसी से मिलते नहीं थे. और पद्मजा के डिल्यूज़न से बाकी लोग भी फिर प्रभावित हो गए."

पद्मजा ने कोरोना टेस्ट का सैंपल देने से मना कर दिया था. (फोटो- आशीष पांडे)
क्या है SDD?
क्या है SDD ये जानने के लिए हमने बात की डॉक्टर प्रवीण त्रिपाठी से. ये सायकायट्रिस्ट हैं. उन्होंने बताया कि SDD से पीड़ित व्यक्ति ऐसी बातों पर भरोसा करने लगता है, जो असल में सच नहीं होतीं और उसके साथ रह रहे लोगों को भी वो अपनी बातों पर यकीन दिलवा देता है. उन्होंने कहा,
"पढ़ा-लिखा होना कुछ हद तक अंधविश्वास से बचा सकता है, लेकिन बीमारी से नहीं बचा सकता. बीमारी किसी को भी हो सकती है. डिल्यूज़न डिसऑर्डर जिसे कहते हैं, जिसे शेयर्ड सायकोसिस कहते हैं, ये भी एक मानसिक बीमारी है. किसी को भी हो सकती है. डिल्यूज़न डिसऑर्डर मतलब व्यक्ति को एक डिल्यूज़न हो जाता है. मतलब एक ऐसी गलत धारणा बन जाती है, जो कि गलत है और इंसान को उस पर पूरा विश्वास है. और चाहे आप उसे कितने भी कारण दे दीजिए उस विश्वास को तोड़ने के, वो टूटता नहीं है. वो उस पर 100 फीसद अडिग रहता है कि ये बाद सही है. और यही सच है और कुछ सच नहीं है. आमतौर पर अगर किसी एक व्यक्ति को कोई डिल्यूज़न हो गया, तो कई बार ये होता है कि ये डिल्यूज़न दूसरे फैमिली मेंबर्स के साथ शेयर हो जाता है. उसकी भी कुछ कंडिशन्स होती हैं. मान लीजिए कि एक परिवार है, जो बाकी समाज से कटा हुआ है. और उस परिवार को जो सबसे डॉमिनेंट व्यक्ति है, जिसकी बात बाकी लोग सुनते हैं, जिसकी बात की इज्ज़त की जाती है, मान लीजिए उसे कोई डिल्यूज़न डेवलप हो गया, तो बाकी परिवार के लोग उसकी बातें सुनते हैं, तो वो बिलीफ कई बार शेयर होने लगते हैं."
डॉक्टर प्रवीण ने ये भी बताया कि इस बीमारी का इलाज मुमकिन है. डिल्यूज़न डिसॉर्डर का शिकार व्यक्ति दवाओं के ज़रिए ठीक हो सकता. सायकायट्रिस्ट के ट्रीटमेंट से. वहीं इस व्यक्ति के साथ रहने वाले लोगों को जब इस व्यक्ति से अलग कर दिया जाए, तो वो बिना दवा के भी ठीक हो जाते हैं. इस केस को डील करने का क्या सायकॉलॉजिकल पहलू हो सकता है, इस पर डॉक्टर प्रवीण ने कहा,
"इसका सायकायट्रिक एस्पेक्ट अलग है, लीगल अलग है. लीगली इसमें जो डिफेंस क्रिएट किया जाएगा वो इनसेनिटी पर किया जाएगा. 'इनसेनिटी एज़ अ डिफेंस' इसे कहते हैं. इसकी जो भाषा है, वो बहुत क्लीयरकट डिफाइन है. बताना होता है कि जो एक्ट हुआ, उस टाइम व्यक्ति किसी ऐसी बीमारी की वजह से उस हालत में नहीं था कि कुछ सोच पाए और अपने एक्शन के परिणामों को समझ पाए. तब जाकर ये कह सकते हैं कि इनसेनिटी डिफेंस की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है. बाकी इसे सिर्फ लीगली हैंडल करना ठीक नहीं रहेगा. ज़ाहिर सी बात है कि पूरी प्रोसेस लीगल सिस्मट देखेगा. लेकिन इस केस का ट्रीटमेंट बहुत ज़रूरी है. क्योंकि ऐसे केसेज में ट्रीटमेंट पर इम्प्रूवमेंट हो जाता है. हालांकि इस केस में ये देखना होगा कि बीमारी डायरेक्ट उसे कॉन्ट्रिब्यूट कर रही थी या नहीं."

डॉक्टर प्रवीण त्रिपाठी, सायकायट्रिस्ट.
अब सवाल आता है कि इस तरह के मामले को पुलिस किस तरह से डील करती है. ये भी बताते हैं. जुलाई 2018 याद कीजिए. दिल्ली के बुराड़ी में एक परिवार के 11 लोग एक ही घर के अंदर मृत पाए गए थे. जांच के दौरान इस केस में भी पूजा और धार्मिक भावनाओं वाला एंगल सामने आया था. इस मामले को 'क्राइम तक' के सीनियर एक्ज़िक्यूटिव एडिटर और सीनियर क्राइम जर्नलिस्ट शम्स ताहिर खान ने काफी गहराई के साथ कवर किया था. उनका कहना है कि इस तरह के मामलों को डील करने में पुलिस के सामने बड़ी दिक्कत होती है, क्योंकि आरोपी हार्टकोर क्रिमिनल नहीं होते हैं. ऐसे मामलों में आरोपियों को लगता ही नहीं है कि उन्होंने कोई अपराध किया है, उन्हें लगता है कि वो तो एक रिवाज़ कर रहे थे और पुलिस बीच में आ गई. ऐसी स्थिति में पुलिस चौबीसों घंटे आरोपियों के ऊपर नज़र रखती है. कस्टडी के दौरान भी और जेल में बंद होने के दौरान भी. शम्स ताहिर खान कहते हैं कि पुलिस ऐसे मामलों को बाकी मामलों से काफी अलग तरह से डील करती है, सेंसिटिविटी के साथ. क्योंकि उन्हें भी इस बात का डर होता है कि ये आरोपी कहीं खुद को ही नुकसान न पहुंचा लें. दूसरा जो मानसिक रोगी होते हैं उन्हें जेल में इलाज देने की भी पूरी कोशिश होती है.
खैर, इस मामले में आगे पुलिस किस तरह से डील करती है, ये तो समय के साथ पता चल ही जाएगा. मगर एक नागरिक के तौर पर ज़रूरी है कि अगर इस तरह के कोई मामले आपको अपने सामने डेवलप होते हुए दिखें. तो अपनी जान-पहचान के इन लोगों को मेडिकल हेल्प के लिए ले जाएं. इससे पहले कि बहुत देर हो जाए.




















