मीरा को लगा, शायद ऐसे वो अपने डांस मूव्स पर थोड़ी मेहनत कर लेगी. लोगों का फीडबैक मिलेगा तो बेहतर कर पाएगी. लेकिन डर भी लग रहा था. क्योंकि पहली बार वो अपनी कोई परफॉरमेंस ऑनलाइन अपलोड करने जा रही थी. आखिर किसी तरह डर पर काबू पाकर उसने वीडियो अपलोड कर दिया. यूट्यूब के साथ साथ फेसबुक पर भी. और साथ में लिखा,
वॉट डू यू थिंक गाइज?
प्रतीकात्मक तस्वीर.मीरा को लगा था लोग उसके डांस पर कमेन्ट करेंगे. कमियां-अच्छाइयां बताएंगे. किसी तरह उसने एक घंटा निकाला, और कमेन्ट सेक्शन चेक किया. और धक से रह गई.
कमेन्ट सेक्शन में अजीबोगरीब तरह की बातें लिखी हुई थीं. कोई उसे मोटी कह रहा था. तो कोई उसे ‘अजीब सी दिखने वाली’. किसी ने उसकी बांहों पर तंज कसे थे, तो किसी ने उसकी हाईट पर. दो मिनट तक स्क्रोल करने के बाद मीरा झेल नहीं पाई. उसने लॉग आउट कर दिया. थोड़ी ही देर में उसने अपने वीडियो भी हटा लिए.
उस दिन के बाद मीरा ने कभी ऑनलाइन वीडियो नहीं डाले.
उदाहरण से आगे
आपने ऊपर जो पढ़ा, वो सिर्फ एक नज़ीर नहीं, लाखों लोगों की हकीकत है. ख़ास तौर पर सोशल मीडिया की लाइफ में ये अक्सर देखने को मिलता है. कि जो भी ‘कन्वेंशनल’ यानी पारंपरिक तौर पर ‘खूबसूरत’ या आकर्षक की परिभाषा में फिट नहीं बैठता, उस व्यक्ति पर सैकड़ों कमेंट्स की बौछार कर दी जाती है. जहां उसके काम को नज़रंदाज़ कर उसके शरीर या चेहरे पर टिप्पणियां की जाती हैं.
पहले इसे बुलीइंग का तमगा देकर ये कह दिया जाता था कि जो लोग ऐसा कर रहे हैं उन्हें खुद को रोकना चाहिए. किसी पर इस तरह की छींटाकशी नहीं करनी चाहिए. जैसा हमें और आपको बचपन से सिखाया जाता था.
लेकिन पिछले कुछ समय में इस ऐटीट्यूड को बदलने की कोशिश हो रही है. लोगों को ये समझाने की कोशिश की जा रही है कि शरीर से मोटा या पतला, या कद में लंबा या छोटा, व्यक्ति चाहे जैसा भी हो, वो भी बराबरी के सम्मान का हक़दार है. हर तरह का शरीर और चेहरा सुंदर है. समाज में अपनी जगह पाने लायक है. इसे बॉडी पाजिटिविटी का नाम दिया गया है. सोशल मीडिया पर कई इन्फ़्लूएन्सर्स ऐसे हैं जो लगातार इस पर बात कर रहे हैं. आसान भाषा में लोगों को जागरूक कर रहे हैं. ऐसे ही लोगों से हमने बात की. समझने की कोशिश की कि आखिर क्यों जरूरी है हमारे और आपके शरीर को इस तरह स्वीकृति दिलाना.
लोगों का क्या कहना है?
आमिना अजीज़ भारत की पहली प्लस साइज फैशन ब्लॉगर्स में से एक हैं. उन्होंने नौ साल पहले अपना फैशन ब्लॉग शुरू किया था. उन्होंने बताया,
मैं फैशन इंडस्ट्री में काम कर चुकी हूं. वहां मुझे ऐसा लगता था कि मेरा कोई प्रतिनिधित्व ही नहीं है. मुझे वहां अदृश्य सा महसूस होता था, लगता था मेरी सुनी ही नहीं जा रही है. उस समय मुझ जैसी प्लस साइज औरतें फैशन इंडस्ट्री में दिखाई नहीं देती थीं. ये शब्द भी बेहद कम इस्तेमाल होता था, और बॉडी पॉजिटिविटी का तो किसी ने नाम भी नहीं सुना था. मैंने तब इसके लिए काम करना शुरू किया.आमिना बताती हैं कि उनके लिए बॉडी पॉजिटिविटी का मतलब स्वीकार्यता, प्रतिनिधित्व, और सम्मान है. ये कि उनका शरीर भी एक अच्छा शरीर है. और समाज को उसका नजरिया बदलने की ज़रूरत है. अपने शरीर में पूरे हक़ से समाज में मौजूद रहना सबका हक़ है.
आमिना काफी समय से बॉडी पॉजिटिविटी पर काम कर रही हैं. (तस्वीर: स्पेशल अरेंजमेंट)ऐसा नहीं है कि इन मुद्दों पर बात करना आसान है. आमिना ने बताया कि उन्हें हर तरह की नफरत और ट्रोलिंग का सामना करना पड़ता है.
लोग मुझ पर आरोप लगाते हैं कि मैं मोटापे का महिमामंडन कर रही हूं, अनहेल्दी लाइफ स्टाइल को बढ़ावा दे रही हूं, और लोग सिर्फ मेरे लुक्स देखकर मेरी हेल्थ और लाइफस्टाइल के बारे में पूर्वाग्रह से ग्रसित हो जाते हैं. उनको लगता है कि मैं मोटी हूं तो जरूर आलसी होउंगी जो पूरे दिन बस खाती रहती है. लेकिन मैं लोगों की इन बातों को खुद को प्रभावित नहीं करने देती.निष्ठा तनेजा. राइटर हैं, मॉडलिंग भी करती हैं. उन्होंने बताया,
मुझसे हमेशा लोग कहते थे कि मेरे बस बाल अच्छे हैं. और बाकी कुछ भी नहीं. मैं ये सब सुन सुन कर थक चुकी थी. एक बार तो जब मैं नौंवी कक्षा में थी, तो एक लड़के ने मेरा मज़ाक उड़ाया. मेरे शरीर का निचला हिस्सा भारी है. तो वो कमर से नीचे अपना और अपने क्लासमेट का स्वेटर भरकरक्लास में घूमने लगा और लोगों से पूछने लगा, कि वो किसकी मिमिक्री कर रहा है. ये सब करते हुए वो मेरी तरफ देख रहा था. इस चीज ने मुझे तोड़कर रख दिया था. मैं बहुत रोई, लेकिन उस दिन मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि मैं उसको पलट कर जवाब दे पाती.निष्ठा बताती हैं कि उनके दोस्त को भी जब उन्होंने बताया कि वो मॉडलिंग करती हैं, तो उसे यकीन नहीं हुआ था. जब उन्होंने प्लस साइज मॉडलिंग के बारे में बताया तब जाकर उसे यकीन हुआ. ये सब भी इसलिए होता है क्योंकि लोगों के मन में सुन्दरता की एक तय परिभाषा बैठ गई है. और ये सालों-साल की कंडिशनिंग का नतीजा है. निष्ठा ये भी बताती हैं कि वो अपने ट्रोल्स को व्यंग्यात्मक तरीके से जवाब देती हैं.
अपने शरीर को स्वीकारना ज्यादा ज़रूरी है, बजाय इसके कि आप किसी और से वैलिडेशन लें. ऐसा लगभग सभी बॉडी पॉजिटिव एक्टिविस्ट और मॉडल्स का मानना है. (तस्वीर : निष्ठा तनेजा)जीशा चौधरी. हमेशा से एक्टर/मॉडल बनना चाहती थीं. लेकिन उनके आस-पास के लोगों ने हमेशा उनको बताया कि मॉडलिंग उनके जैसे फिगर वाले लोगों के लिए नहीं बनी. तो उन्होंने फैशन डिजाइनिंग शुरू कर दी. बाद में फिर उन्होंने अपने बनाए कपड़ों की मॉडलिंग भी शुरू कर दी. नए स्टाइल्स को एक्सप्लोर करना शुरू किया. प्रयोग किए, और लोगों को पसंद भी आए. नामी ब्रैंड्स के लिए भी वो काम कर चुकी हैं. बॉडी शेमिंग को लेकर जीशा बताती हैं कि उनका वजन बढ़ता-घटता रहता था. क्लास में उन्हें लड्डू, गोलू इत्यादि बुलाते थे तो उन्हें अजीब लगता था.
जीशा कहती हैं कि कोई उन्हें ये बताने वाला नहीं था कि बॉडी पाजिटिविटी होती क्या है. अब उनका मानना है कि उन्हें अपने शरीर से प्यार है. और खुद से प्यार है. खुद के साथ सिम्पथी नहीं है. अपने स्ट्रेच मार्क्स से, अपनी मेडिकल हिस्ट्री से. सब कुछ को अपनाते हुए अपने आप को स्वीकार करना, खुद के लिए ज़रूरी है. ट्रोलिंग भी होती है. वो लॉन्जरी ब्रैंड के लिए भी मॉडलिंग करती हैं.
जीशा की मॉडलिंग की तस्वीरों पर भी कई तरह के कमेन्ट आते है, लेकिन जीशा उन्हें खुद पर हावी नहीं होने देतीं. (तस्वीर: जीशा चौधरी)मौलश्री. कंटेंट राइटर हैं. बताती हैं,
मेरे लिए बॉडी पॉजिटिविटी का मतलब है हर तरह के शरीर को नॉर्मल मानना. मेरा शरीर आस पास के लोगों के मुकाबले बड़ा है, मेरे पार्टनर से भी. लेकिन अब मुझे यकीन है कि ये ठीक है. मैं योग करती हूं, वर्क आउट भी. इसलिए नहीं कि 28 इंच की जीन्स में फिट हो जाऊं, बल्कि इसलिए कि कुछ भी खाऊं तो भारी बाहरी या ब्लोटेड न लगे.
पिछले साल जब मैं एक वीडियो स्केच सीरीज कर रही थी, उसके वीडियोज़ के नीचे कमेन्ट आते थे:
चाची बहुत मोटा गयी हैं, चाची वजन घटाओ वर्ना चाचा छोड़ देंगे, चाची का मुंह फुटबॉल जैसा...
पढ़कर मन खराब हो जता था. लेकिन अब मैं अपने शरीर को लेकर खुद भी मजाक नहीं करती. मेरे शरीर ने मुझे बेहतरीन चीज़ें करने में मदद की है. मैं इसको लेकर शर्मिंदा क्यों होऊं?
मौलश्री का मानना है कि जिस शरीर ने उनके लिए इतना कुछ किया है, उसे लेकर वो शर्मिंदा कैसे हो सकती हैं. (तस्वीर; मौलश्री)चलते-चलते
जो हम और आप देखते हैं, जरूरी नहीं कि वो ही पूरा सच हो. और ऐसा नहीं है कि सिर्फ मोटे लोगों को ही इस तरह की ट्रोलिंग या शेमिंग से गुज़ारना पड़ता है. पतले लोगों को भी शर्मिंदा किया जाता है. दोनों तरह की शेमिंग ही किसी को भी हताश करने के लिए काफी है. और बाकी विद्वान् लोग तो कह ही गए हैं, ‘अच्छा नहीं बोल सकते तो कुछ ना ही कहना अच्छा’. अगली बार किसी को ट्रोल करने के लिए वो कमेन्ट टाइप करने जाएं, या दोस्तों के बीच आपस में ही मजाक उड़ाने की इच्छा हो, तो थोड़ा ठहर कर सोच लीजियेगा. शायद दुनिया थोड़ी बेहतर हो जाए.














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