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उत्तराखंड के जबरन धर्म परिवर्तन कानून के तहत सिर्फ 5 केसों की सुनवाई पूरी, सारे आरोपी बरी

सितंबर 2025 तक इस कानून के तहत 62 मामले दर्ज हुए थे. इनमें से 51 मामलों के रिकॉर्ड उन्हें मिले. इनमें सिर्फ पांच मामलों की पूरी सुनवाई हुई और किसी भी केस में आरोप साबित नहीं हो पाए.

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उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी. (India Today)

उत्तराखंड में बीजेपी सरकार ने सात साल पहले ‘जबरन धर्म परिवर्तन’ रोकने के लिए एक कानून बनाया था. उत्तराखंड फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट (UFRA). लेकिन इन सात सालों में इस कानून से सजा कितनों को मिली? जवाब है- 'एक भी नहीं.' गिरफ्तारियां तो हो रही हैं, लेकिन जितने मामलों की सुनवाई पूरी हुई, उनमें से किसी में भी आरोपियों को सजा नहीं हुई. अदालत के रिकॉर्ड बताते हैं कि इस कानून के तहत जो मामले दर्ज किए जा रहे हैं उनमें सबूतों की कमी बार-बार सामने आ रही है.

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अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस के लिए ऐश्वर्या राज ने इस पर एक विस्तृत रिपोर्ट की है. उन्होंने 30 RTI दायर कीं, जिनके आधार पर यह रिपोर्ट लिखी. रिपोर्ट के मुताबिक सितंबर 2025 तक इस कानून के तहत 62 मामले दर्ज हुए थे. इनमें से 51 मामलों के रिकॉर्ड उन्हें मिले. इनमें सिर्फ पांच मामलों की पूरी सुनवाई हुई और किसी भी केस में आरोप साबित नहीं हो पाए.

कम से कम सात मामलों को बीच में ही खारिज कर दिया गया. कारण अलग-अलग, लेकिन कमोबेश एक जैसे थे. किसी केस में शिकायत करने वाला अपने बयान से पलट गया. किसी में गवाहों के बयान मेल नहीं खाए तो किसी केस में जबरन धर्म परिवर्तन के ठोस सबूत मिले ही नहीं.

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39 मामलों में से ज्यादातर में आरोपी जमानत पर बाहर हैं. कई मामलों में अदालत ने यह कहते हुए जमानत दी कि (महिला पुरुष के बीच) संबंध आपसी सहमति से थे. कुछ मामलों में बयान विरोधाभासी सामने आए. तो कुछ में कानूनी प्रक्रिया में कमी थी. हालांकि कुछ मामलों में जमानत से इनकार हुआ है या सुनवाई बाकी है.

कुछ मामलों ने तो पुलिस की लापरवाही की कलई खोल कर रख दी. उदाहरण के लिए, अमन सिद्दीकी का केस. उनकी शादी दो परिवारों की सहमति से हुई थी और दंपती ने हलफनामा दिया था कि महिला इस्लाम नहीं अपनाएगी. फिर भी उन्हें करीब छह महीने जेल में रहना पड़ा. मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जमानत देते हुए कहा कि जब शादी दोनों की मर्जी और परिवार की सहमति से हुई है, तो आपत्ति नहीं होनी चाहिए. बाद में हाई कोर्ट ने भी निचली अदालत की कार्यवाही पर रोक लगा दी.

यह कानून 2018 में लागू हुआ था. 2022 में इसमें सजा बढ़ाई गई और 2025 में इसे और सख्त किया गया. इसमें सजा 10 साल तक और गंभीर मामलों में 20 साल या उम्रकैद तक की जा सकती है. हालांकि, 2025 का संशोधन अभी लागू नहीं हुआ है क्योंकि राज्यपाल ने उसमें कुछ त्रुटियों की ओर इशारा करते हुए वापस भेज दिया है. कानून का उद्देश्य बताया गया कि धोखे, दबाव, लालच या शादी के जरिए धर्म परिवर्तन को रोकना है.

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ऐश्वर्या राज की रिपोर्ट के मुताबिक 2022 के बाद इस कानून के तहत दर्ज मामलों की संख्या बढ़ी है. 2023 में सबसे ज्यादा 20 मामले दर्ज हुए और 2025 में सितंबर तक 18 मामले हो चुके थे. इस पूरे मामले पर पुलिस की कोई टिप्पणी सामने नहीं आई है.

इस रिपोर्ट में एक और अहम बिंदू को रेखांकित किया गया. जिन पांच मामलों में आरोपी निर्दोष साबित हुए, उनमें से दो में शिकायत ऐसे लोगों ने की थी जिनका सीधे तौर पर केस से लेना-देना ही नहीं था. एक मामले में फेसबुक वीडियो के जरिए हिंदू धर्म की आलोचना और ईसाई धर्म की प्रशंसा का आरोप लगाया गया था. लेकिन अदालत ने कहा कि किसी को भी अपना धर्म मानने और प्रचार करने का अधिकार है, जब तक वह किसी और के अधिकारों का उल्लंघन न करे. सबूत पुख्ता नहीं थे, इसलिए आरोपी बरी हो गया.

दूसरे मामले में एक पादरी और उनकी पत्नी पर सामूहिक धर्म परिवर्तन कराने का आरोप लगा था. लेकिन अदालत ने पाया कि यह साबित नहीं हुआ कि उन्होंने किसी को लालच देकर धर्म बदलवाया. उन्हें भी बरी कर दिया गया.

एक अन्य मामले में एक महिला के लापता होने पर उसके पति ने शिकायत की थी. बाद में महिला ने कहा कि वह अपनी मर्जी से गई थी और किसी तरह का यौन शोषण या जबरदस्ती नहीं हुई. अदालत ने अपहरण, बलात्कार और जबरन धर्म परिवर्तन के आरोपों को साबित न होने पर आरोपी को बरी कर दिया.

एक और मामले में शिकायतकर्ता ने अदालत में कहा कि उसने अपनी बहन के अपहरण और जबरन धर्म परिवर्तन का आरोप कभी नहीं लगाया था. बहन ने भी कहा कि उसने अपनी मर्जी से शादी की थी. सबूत न मिलने पर आरोपी बरी हो गया.

पांचवें मामले में एक नाबालिग लड़की के पिता ने जबरन धर्म परिवर्तन का आरोप लगाया, लेकिन लड़की तारीख और समय स्पष्ट नहीं बता सकी और गवाहों के बयान भी पुख्ता नहीं थे. आरोपी बरी हो गया और अपील में भी फैसला बरकरार रहा.

कुछ मामले जो अदालत में चल रहे हैं उनमें पाया गया है कि संबंध आपसी सहमति से थे, लेकिन उम्र कम होने के कारण कुछ धाराएं बनी रहीं. कई मामलों में महिलाओं ने अपने शुरुआती बयान बदल दिए या अदालत ने जांच में गड़बड़ी देखी. कुछ मामलों में मुस्लिम पुरुषों पर पहचान छिपाकर शादी करने और धर्म परिवर्तन के लिए उकसाने का आरोप है, लेकिन इनमें भी कई जगह बयान विरोधाभासी पाए गए या पुख्ता सबूत नहीं मिले.

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